नई दिल्ली: भारत का शिक्षा पर खर्च भूटान और मालदीव जैसे अन्य सार्क देशों से कम है. इसे ध्यान में रखते हुए, एक संसदीय पैनल ने केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय से आग्रह किया है कि वह राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 की सिफारिश के अनुसार शिक्षा पर खर्च को GDP के 6% तक बढ़ाने के प्रयास करे.
शिक्षा, महिला, बाल, युवा और खेल पर संसदीय स्थायी समिति ने अपनी ‘उच्च शिक्षा विभाग की 2025-26 अनुदान मांगों’ रिपोर्ट में रेखांकित किया कि एनईपी 2020 में केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा सकल घरेलू उत्पाद के 6 प्रतिशत तक सार्वजनिक शिक्षा निवेश में उल्लेखनीय वृद्धि की बात कही गई है, लेकिन यह ध्यान देने योग्य है कि 2021-22 में कुल शिक्षा व्यय (केंद्र, राज्य और केंद्र शासित प्रदेश) सकल घरेलू उत्पाद का केवल 4.12 प्रतिशत था.
कांग्रेस के राज्यसभा सांसद दिग्विजय सिंह की अध्यक्षता वाली समिति ने बुधवार को संसद में पेश की गई रिपोर्ट में कहा, “समिति ने यह भी उल्लेख किया है कि भूटान और मालदीव जैसे सार्क देश 2022 में अपने सकल घरेलू उत्पाद का क्रमशः 7.47 प्रतिशत और 4.67 प्रतिशत खर्च कर रहे हैं, जबकि भारत शिक्षा पर 4.12 प्रतिशत खर्च कर रहा है.”
समिति ने इस बात पर जोर दिया कि शिक्षा मंत्रालय को शिक्षा पर खर्च बढ़ाने के लिए ईमानदारी से प्रयास करना चाहिए, समिति ने कहा: “शिक्षा मंत्रालय को शिक्षा पर सकल घरेलू उत्पाद के 6 प्रतिशत पर खर्च को व्यवहार्य बनाने के लिए वित्त मंत्रालय से ईमानदारी से अतिरिक्त धन की मांग करनी चाहिए, जिससे स्कूली शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तक सार्वजनिक शिक्षा प्रणाली को वास्तव में विश्व स्तरीय और समाज के सभी वर्गों के लिए सुलभ बनाया जा सके.”
समिति ने आगे कहा कि सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के प्रतिशत के रूप में शिक्षा पर खर्च में पिछले कुछ वर्षों में असंगति देखी गई है. वर्ष 2014-15, 2015-16 और 2016-17 में केंद्र और राज्यों द्वारा शिक्षा पर कुल खर्च जीडीपी के प्रतिशत के रूप में क्रमशः 4.07%, 4.2% और 4.24% रहा. हालांकि, बाद के वर्षों में यह प्रवृत्ति बदल गई, और 2017-18, 2018-19 और 2019-20 में यह आंकड़ा क्रमशः जीडीपी का 3.87 प्रतिशत, 3.9 प्रतिशत और 4.04 प्रतिशत रह गया.
इसमें कहा गया है कि वर्ष 2020-21 तक शिक्षा खर्च में बढ़ोतरी हुई और यह जीडीपी का 4.36% तक पहुंच गया, लेकिन 2021-22 में घटकर 4.12% रह गया.
समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा है, “समिति सिफारिश करती है कि शिक्षा पर सकल घरेलू उत्पाद के प्रतिशत के रूप में खर्च की हिस्सेदारी बढ़ाई जानी चाहिए और केंद्र सरकार द्वारा शिक्षा पर खर्च में इसे लगातार बनाए रखा जाना चाहिए ताकि एनईपी 2020 में निर्धारित लक्ष्य को हासिल किया जा सके.”
फुल टाइम वीसी के बिना संचालित हो रही सेंट्रल यूनिवर्सिटीज़ पर चिंता
समिति ने अपनी रिपोर्ट में इस बात पर भी चिंता जताई कि दिसंबर 2024 तक 10 सेंट्रल यूनिवर्सिटीज़ का प्रबंधन नियमित कुलपतियों (वीसी) के बिना किया जा रहा है.
समिति ने कहा, “भारतीय उन्नत अध्ययन संस्थान के निदेशक का पद अगस्त 2021 से खाली है. इसी तरह, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय की कार्यकारी परिषद, संस्थान के प्रबंधन और प्रशासन के लिए जिम्मेदार सर्वोच्च कार्यकारी निकाय, जून 2021 से विश्वविद्यालय के विजिटर के रूप में माननीय राष्ट्रपति द्वारा नामित सदस्यों की नियुक्ति में विफलता के कारण निष्क्रिय है.”
इसमें कहा गया है, “इन सदस्यों की अनुपस्थिति में, कार्यकारी परिषद तीन साल से नहीं बुलाई गई है, जिससे प्रमुख कार्य—जिसमें संकाय सदस्यों का चयन भी शामिल है—पूरी तरह से कुलपति के पास रह गए हैं, जो अपनी आपातकालीन शक्तियों पर निर्भर रहे हैं.”
इसमें कहा गया है कि एनईपी 2020 यह वादा करता है कि उच्च शिक्षा संस्थानों में नेतृत्व के पद लंबे समय तक खाली नहीं रहेंगे (जैसा कि अक्सर होता है) और निवर्तमान और आने वाले कुलपति एक अवधि के लिए ओवरलैप होंगे.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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