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Thursday, 18 July, 2024
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पीने का पानी, वॉशरूम के टूटे दरवाजे, बढ़ी हुई फीस – ‘A++’ रेटिंग वाले गोरखपुर यूनिवर्सिटी की क्या है हालत

आर्थिक रूप से कमजोर पृष्ठभूमि के छात्र फीस बढ़ने की शिकायत करते हैं. अन्य लोग बेहतर बुनियादी ढांचा चाहते हैं, जबकि डीडीयूजीयू प्रशासन या तो इनको खारिज कर देता है या इसके लिए धन की कमी को जिम्मेदार ठहराता है.

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गोरखपुर: बिना दरवाज़ों के शौचालय, पीने के पानी की पर्याप्त व्यवस्था के लिए नियमित विरोध प्रदर्शन, परीक्षा के रिज़ल्ट्स आने में देरी और कथित 400 प्रतिशत फीस में बढ़ोत्तरी. ऐसा लगता है कि ये उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के निर्वाचन क्षेत्र में दीन दयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय (डीडीयूजीयू) के छात्रों के सामने आने वाली समस्याएं हैं – जो कि इसे राज्य के टॉप 5 उच्च शिक्षा संस्थानों में जगह दिलाने वाले नेशनल असेसमेंट एंड एक्रेडिटेशन काउंसिल (एनएएसी) से इस साल जनवरी में प्राप्त प्रतिष्ठित ‘A++’ रेटिंग से वाले विश्वविद्यालय को शोभा नहीं देता.

इसके अलावा 1956 में स्थापित इस विश्वविद्यालय में ऐसे मुद्दों की एक लंबी लिस्ट है. कुलपति (वीसी) राजेश सिंह, जिनका कार्यकाल 4 सितंबर को समाप्त होने वाला है, को एक्सटेंशन नहीं दिया गया और इनके बाद लखनऊ यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर पूनम टंडन इनका स्थान लेंगी.

लेकिन पूर्वी उत्तर प्रदेश के 12 जिलों और बिहार पड़ोसी जिलों से इसमें पढ़ने वाले दो लाख से अधिक छात्रों के लिए, पिछले तीन वर्षों में 25 से अधिक कार्यक्रमों में लगातार बढ़ती फीस सबसे खास मुद्दा है. इसके कारण छात्रों और पुलिस के बीच झड़प हुई जिसके बाद 21 जुलाई को आरएसएस से जुड़े छात्रों के संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) के सदस्यों के नेतृत्व में एक समूह ने वीसी के साथ कथित तौर पर मारपीट की.

डीडीयूजीयू के रजिस्ट्रार अजय सिंह ने फीस बढ़ोत्तरी के दावों का खंडन किया और दिप्रिंट को विश्वविद्यालय की वेबसाइट पर लिस्टेड फी स्ट्रक्चर के बारे में बताया.

हालांकि, दिप्रिंट के पास मौजूद पीएचडी स्कॉलर्स को जारी की गई फीस की रसीदें बताती हैं कि उन्होंने छह महीने के लिए शुल्क के रूप में 6,388 रुपये का भुगतान किया, जो वेबसाइट पर दिखाए गए 4,890 रुपये से अधिक था.

दिप्रिंट के सवालों का जवाब देते हुए, विश्वविद्यालय के एक अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, “शैक्षणिक सत्र 2023-24 में डीडीयू गोरखपुर विश्वविद्यालय में स्नातक, स्नातकोत्तर, पीएचडी और स्व-वित्तपोषित कार्यक्रमों के लिए फीस में बढ़ोत्तरी उत्तर प्रदेश में अन्य राज्य संचालित विश्वविद्यालयों में वर्तमान में लागू शुल्क से अभी भी कम है.”

यह दावा करते हुए कि फीस की बढ़ोत्तरी ने सिर्फ स्व-वित्तपोषित पाठ्यक्रमों को प्रभावित किया है, अधिकारी ने एक बयान में कहा, “विश्वविद्यालय वर्तमान में 1,585 की कुल छात्र संख्या के साथ 97 (स्व-वित्तपोषित) डिग्री, डिप्लोमा और प्रमाणपत्र पाठ्यक्रम चला रहा है. 1,585 में से केवल 400 छात्र ही फीस वृद्धि से प्रभावित हैं. 97 कोर्सेज़ में से केवल 16 में फीस बढ़ाई गई है जबकि 7 कोर्सेज़ में कटौती की गई है. वहीं 74 कोर्सेज़ में फीस में कोई बदलाव नहीं किया गया है.’

विश्वविद्यालय में अधिकांश स्व-वित्तपोषित कोर्सेज़ के लिए, किसी को प्रवेश परीक्षा में बैठने की आवश्यकता नहीं होती है और सीटों की उपलब्धता के अनुसार एडमिशन मिल जाता है. चूंकि इन कोर्सेज़ के लिए कोई सरकारी धन नहीं मिलता है, इसलिए इनकी फीस भी नियमित पाठ्यक्रमों की तुलना में अधिक है.

हालांकि, एक फैकल्टी मेंबर ने दिप्रिंट को बताया, “मुख्य शिकायत यह है कि 2023-24 से पहले एनरोल्ड छात्रों से भी नई संरचना के अनुसार लंबित शुल्क का भुगतान करने के लिए कहा जा रहा है. इसने सबसे अधिक नाराजगी को जन्म दिया, जिसके कारण जब छात्रों की आवाज़ को अनसुनी कर दी गई तो वी-सी के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया गया और यहां तक कि हिंसा भी हुई.

‘PhD कार्यक्रमों की फीस में 3 से 4 गुने की बढ़ोत्तरी’

शैक्षणिक सत्र 2023-24 के लिए मार्च और जुलाई में डीडीयूजीयू द्वारा जारी किए गए दो ब्रोशर के बीच तुलना करने से पता चलता है कि बीएससी (कृषि), एमबीए, बीबीए, बीजेएमसी और बीए एलएलबी सहित 25 पाठ्यक्रमों की फीस में वृद्धि की गई है.

दिलचस्प बात यह है कि विश्वविद्यालय की वेबसाइट पर उपलब्ध फी स्ट्रक्चर दिप्रिंट के पास मौजूद ब्रोशर में उल्लिखित फ्री स्ट्रक्चर से बहुत कम है.

21 जुलाई की घटना के सिलसिले में गिरफ्तार किए गए आठ छात्रों में से एक एबीवीपी के गोरख प्रांत के संयुक्त सचिव मयंक राय ने आरोप लगाया कि एमबीए उन पाठ्यक्रमों में से एक है, जिसकी फीस में पिछले तीन वर्षों में 112 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई है.

उन्होंने आरोप लगाया, “जबकि 2021 में इसकी फीस 47,100 रुपये थी, लेकिन 2022 में बढ़कर यह 68,000 रुपये और 2023 में बढ़कर 1 लाख रुपये कर दी गई. पीएचडी (प्रैक्टिकल) और पीएचडी (नॉन-प्रैक्टिकल) कार्यक्रमों के लिए शुल्क में क्रमशः 312.79 प्रतिशत और 419 प्रतिशत की वृद्धि की गई है.“

नए ब्रोशर के मुताबिक, अतिरिक्त विश्वविद्यालय शुल्क को छोड़कर, DDUGU के एमबीए प्रोग्राम की फीस वास्तव में 1 लाख रुपये (50,000 रुपये प्रति सेमेस्टर) है.

दिप्रिंट से बात करते हुए, एक पीएचडी स्कॉलर ने बताया कि पहले, पीएचडी (प्रैक्टिकल) पाठ्यक्रम की फीस 3,096 रुपये प्रति वर्ष थी जिसे कि बढ़ाकर 12,768 रुपये कर दिया गया है.

उन्होंने कहा, “पीएचडी (नॉन-प्रैक्टिकल) पाठ्यक्रमों के लिए, वार्षिक शुल्क 2,076 रुपये हुआ करता था और अब, यह बढ़कर 10,776 रुपये हो गया है. इसके अलावा, छात्रों को अपनी अंतिम थीसिस जमा करने के लिए 3,200 रुपये का भुगतान करना पड़ता था, लेकिन अब, यह राशि भी बढ़ाकर 10,500 रुपये कर दी गई है.”

‘बाकाया फीस का नए स्ट्रक्चर के हिसाब से करें पेमेंट’

छात्रों ने आगे आरोप लगाया कि जिन लोगों ने शैक्षणिक सत्र 2023-24 की शुरुआत से पहले पीएचडी पाठ्यक्रमों में दाखिला लिया था और जिनकी फीस अभी तक लंबित है, उन्हें नए फी स्ट्रक्चर के मुताबिक पेमेंट करने को कहा गया है.

ऊपर जिक्र किए गए पीएचडी स्कॉलर ने कहा, “नई शुल्क संरचना इस जुलाई में पेश की गई थी. कई विद्यार्थियों ने अभी तक पिछले सेमेस्टर की फीस जमा नहीं की है. उनसे नए फी स्ट्रक्चर के मुताबिक भुगतान करने को कहा गया है. इसके कारण पिछले महीने विरोध प्रदर्शन हुआ और छात्रों ने वीसी का घेराव किया,”

इसके अलावा, छात्रों का कहना है कि कई अन्य मद भी हैं जिनके तहत उन्हें भुगतान करना होगा.

बीएससी द्वितीय वर्ष की एक छात्रा नयनतारा (बदला हुआ नाम) ने कहा, “हमें हर सेमेस्टर में लगभग 1,400 रुपये का पंजीकरण शुल्क देना होगा. इसके अलावा, हमें प्रति सेमेस्टर परीक्षा शुल्क के रूप में 150 रुपये का भुगतान करना होगा. छोटी-छोटी बढ़ोत्तरी से कुल खर्च बढ़ रहा है. जो लोग मध्यम वर्गीय परिवारों से हैं वे यह राशि वहन कर सकते हैं लेकिन यह विश्वविद्यालय गरीबों के बच्चों के लिए भी पसंदीदा संस्थान है. हर कोई इसे वहन नहीं कर सकता.”

एबीवीपी के मयंक राय ने कहा कि जब विश्वविद्यालय ने पहली बार अगस्त 2021 में रजिस्ट्रेशन फी पेश किया, तो एबीवीपी सदस्यों के नेतृत्व में छात्रों ने इसे “अनरिकॉर्डेड फी” बताते हुए इस कदम का विरोध किया.

“हमने कई ज्ञापन दिए और वी-सी द्वारा हमें आश्वासन दिया गया, लेकिन उन्होंने इसे अगले सेमेस्टर से लेना शुरू कर दिया… ऐसी बढ़ोत्तरी कभी नहीं की गई,” उन्होंने आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा कि आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के छात्र पंजीकरण शुल्क का भुगतान कैसे कर पाएंगे.

इस दावे पर कि छात्रों की बकाया फीस नए स्ट्रक्चर के हिसाब से ली जा रही है, रजिस्ट्रार अजय सिंह ने कहा कि हर साल, छात्रों को नया एडमिशन लेना पड़ता है और उसी के अनुसार फीस ली जाती है. धन की कमी का हवाला देते हुए, उन्होंने दिप्रिंट को बताया, “हमें 450 टीचर्स और 1,000 कर्मचारियों को सैलरी देनी होती है. अगर सरकार फंड दे तो हमें फीस बढ़ाने की जरूरत नहीं पड़ेगी. कर्मचारियों के वेतन का सालाना खर्चा 120 करोड़ रुपये है जिसके लिए सरकार की तरफ से हमें केवल 8.61 करोड़ रुपये मिलते हैं.

त्रुटिपूर्ण एवं देरी से आ रहा रिजल्ट

एक और मुद्दा जिसके कारण परिसर में विरोध प्रदर्शन हुआ, वह रिज़ल्ट का देर से या गलत आना था.

मनीष कुमार (बदला हुआ नाम) कुशीनगर के एक गांव से हैं और 2021 तक ढांढ़ा बुज़ुर्ग के एक एफिलिएटेड कॉलेज से बीकॉम की पढ़ाई कर रहे थे.

जब उनके पहले सेमेस्टर के नतीजे जारी हुए, भले ही एक साल की देरी के बाद, उन्हें इस आधार पर ‘असफल’ घोषित कर दिया गया कि वह तीन परीक्षाओं में शामिल नहीं हो पाए थे.

उन्होंने आरोप लगाया, “मैं यह परिणाम देखकर हैरान रह गया क्योंकि मैं सभी परीक्षाओं में शामिल हुआ था. हमने कॉलेज के अधिकारियों से पूछा लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ,” मनीष ने कहा कि उन्होंने अपने जीवन के दो साल खो दिए. उन्होंने आगे कहा, “इस साल, मुझे एक अन्य संबद्ध संस्थान, कबूतरी देवी कॉलेज में फ्रेश एडमिशन लेना पड़ा.”

यह कोई अलग मामला नहीं लग रहा था. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, जब 2022 में नतीजे जारी हुए तो 2,000 से ज्यादा छात्रों की ऐसी ही शिकायतें थीं. डीडीयूजीयू के एक फैक्ल्टी मेंबर ने इसकी पुष्टि की, जिन्होंने कहा कि कई छात्रों ने गलत परिणामों के बारे में शिकायत की थी.

उन्होंने कहा, “सैकड़ों छात्रों को कुछ परीक्षाओं में अनुपस्थित दिखाया गया था और वे यह साबित करने के लिए एक कार्यालय से दूसरे कार्यालय भागते रहे कि वे वास्तव में परीक्षा वाले दिन उपस्थित थे. जबकि कुछ छात्रों ने इससे परेशान होकर विश्वविद्यालय छोड़ने का विकल्प चुना, तो अन्य छात्रों को यह साबित करने के लिए काफी संघर्ष करना पड़ा कि उनका परिणाम गलत है. छात्रों की दुर्दशा देखना निराशाजनक था.”

छात्रों का कहना है कि नतीजों का देरी से आना नियमित मामला हो गया है और हजारों लोग अभी भी अपने पहले सेमेस्टर के नतीजे का इंतजार कर रहे हैं. नयनतारा ने कहा, “मैंने इस साल पांचवें सेमेस्टर में प्रवेश किया है लेकिन मेरे तीसरे सेमेस्टर का परिणाम अभी तक नहीं आया है. इससे छात्रों के मन में भ्रम और डर पैदा होता है.”

त्रुटिपूर्ण या देरी से आने वाले नतीजों के मुद्दे पर, रजिस्ट्रार ने कहा कि अलग अलग सिस्टम में कई परीक्षाएं आयोजित होने के कारण रिजल्ट्स तैयार करने वाली एजेंसी पर अत्यधिक बोझ था.

सिंह ने कहा, “पहले, हमारे पास एक सेमेस्टर सिस्टम था. फिर हमने 2021 में चॉइस बेस्ड क्रेडिट सिस्टम (CBCS) पेश किया और इसके तुरंत बाद, उसी साल राष्ट्रीय शिक्षा नीति लागू की गई. कुछ छात्र पुरानी व्यवस्था से पढ़ाई कर रहे हैं तो कुछ नए सेमेस्टर या सीबीसीएस सिस्टम से एनरोल्ड हैं. इसलिए, स्वाभाविक रूप से, इसमें कुछ समय लगेगा.”

कैंपस इन्फ्रा से जुड़े मुद्दे

जब दिप्रिंट ने 12 अगस्त, 2023 को डीडीयूजीयू परिसर का दौरा किया, तो विभिन्न विभागों के अधिकांश शौचालय गंदे पाए गए, जबकि कला संकाय में, महिलाओं और विशेष रूप से विकलांगों के लिए शौचालय में दरवाजा भी नहीं था.

Washroom for women & specially abled in Arts faculty without a door | Shikha Salaria | ThePrint
कला संकाय में महिलाओं और विशेष रूप से विकलांगों के लिए बिना दरवाजे वाला शौचालय | शिखा सलारिया | दिप्रिंट

बीए एलएलबी की छात्रा अनन्या तिवारी ने कहा, “उनमें से अधिकांश (वॉशरूम) गंदे रहते हैं और उनमें लगी सैनिटरी नैपकिन मशीनें काम नहीं करती हैं.” उन्होंने कहा कि अधिकांश डिपार्टमेंट्स में गर्ल्स कॉमन रूम तक छात्राओं की पहुंच नहीं है.

Girls' common room in Maths department locked shut | Shikha Salaria | ThePrint
गणित विभाग में गर्ल्स कॉमन रूम पर लगा ताला | शिखा सलारिया | दिप्रिंट

साथ ही, नयनतारा ने कहा कि साइंस फैकल्टी के पांच विभागों – भौतिकी, रसायन विज्ञान, इलेक्ट्रॉनिक्स, गणित और डिफेंस – में से केवल डिफेंस डिपार्टमेंट में साफ पानी की उपलब्धता है.

नयनतारा ने आरोप लगाते हुए कहा, “साइकॉलजी डिपार्टमेंट में भी एक वॉटर कूलर है लेकिन वे दूसरे डिपार्टमेंट के स्टूडेंट्स को पानी लेने की अनुमति नहीं देते हैं.”

Few water coolers on campus are functional; students prefer to use the one at the main gate | Shikha Salaria | ThePrint
परिसर में कुछ वाटर कूलर काम कर रहे हैं; छात्र मेन गेट पर लगे वॉटर कूलर्स का उपयोग करते हैं | शिखा सलारिया | दिप्रिंट

हॉस्टलर्स और एबीवीपी के सदस्यों ने इस साल जून में स्वच्छ पेयजल की मांग करते हुए वीसी के आवास के बाहर विरोध प्रदर्शन किया, लेकिन उन्होंने आरोप लगाया कि समाधान के बजाय, उन्हें विरोध करने पर कार्रवाई की चेतावनी देते हुए प्रशासन द्वारा नोटिस दिए गए.

मीडिया रिपोर्ट्स से यह भी पता चलता है कि लड़कों के हॉस्टल में खराब आरओ प्लांट को लेकर छात्रों ने एक से अधिक मौकों पर वी-सी के आवास के बाहर विरोध प्रदर्शन किया. और अप्रैल में, जब आरओ प्लांट ने काम करना बंद कर दिया तो परिसर में पानी के टैंकर लाने पड़े.

A water cooler on DDUGU campus | Shikha Salaria | ThePrint
डीडीयूजीयू परिसर में एक वॉटर कूलर | शिखा सलारिया | दिप्रिंट

गंदे शौचालयों और साफ पीने के पानी की अपर्याप्त व्यवस्था के मुद्दे पर सिंह ने कहा कि टैंकरों को लाना पड़ा क्योंकि अस्थायी खराबी के कारण आरओ प्लांट काम नहीं कर रहा था. “ऐसा हो सकता है कि कुछ मशीनें ज़रूरत के वक्त काम नहीं करतीं. विभागीय प्रमुखों को इसकी जांच करनी चाहिए कि सफाई कर्मचारियों की उपस्थिति के बावजूद शौचालय गंदे क्यों रहते हैं.

A sanitary napkin dispenser lying upside down in a women's washroom on campus | Shikha Salaria | ThePrint
परिसर में महिलाओं के शौचालय में एक सैनिटरी नैपकिन डिस्पेंसर उल्टा पड़ा हुआ है | शिखा सलारिया | दिप्रिंट

इन समस्याओं के अलावा, चार ब्वॉयज़ हॉस्टल के छात्रों ने आरोप लगाया कि मेस के अर्ध-वार्षिक फीस, 18000 रुपये का पेमेंट करने के बावजूद वह काम नहीं कर रहा है. एनएसयूआई (कांग्रेस की युवा शाखा) के राज्य उपाध्यक्ष योगेश सिंह ने आरोप लगाया, “जो खाना परोसा जाता है वह ख़राब होता है, मेन्यू का कोई पालन नहीं होता है और वे आटा गूंथने के लिए सोडा का उपयोग करते हैं ताकि कम खाने से पेट भर जाए. लेकिन यह अस्वास्थ्यकर है.”

एबीवीपी के राय ने दावा किया कि “153 कमरों वाले सबसे पुराने, सबसे बड़े छात्रावास पर 2021 से पीएसी यूनिट द्वारा कब्जा कर लिया गया है”. पीएसी या प्रादेशिक सशस्त्र कांस्टेबुलरी यूपी पुलिस की एक सशस्त्र इकाई है.

उन्होंने आरोप लगाया,“छात्रों को हॉस्टल के रिनोवेशन किए जाने की बात कहकर इसे खाली करने को कहा गया था जिसे तीन से चार महीनों में पूरा हो जाना था. हालांकि, पीएसी ने जल्द ही छात्रावास पर कब्ज़ा कर लिया और अभी भी वह वहां मौजूद है. छात्रों ने इसके खिलाफ कई बार ज्ञापन दिया लेकिन हमें विश्वविद्यालय से केवल आश्वासन मिला कि पीएसी द्वारा जल्द ही इसे खाली कर दिया जाएगा. पीएसी जवान गलत तरीके से व्यवहार करते हैं, शराब पीते हैं जबकि छात्रों को पेइंग गेस्ट के रूप में रहने के लिए मजबूर किया जाता है.”

उस पर, रजिस्ट्रार अजय सिंह ने कहा कि हॉस्टल क्षतिग्रस्त हो गया था और राज्यपाल के निर्देश पर बंद कर दिया गया था, जो विश्वविद्यालय के कुलाधिपति भी हैं. उन्होंने कहा कि पीएसी इकाई सुरक्षा उद्देश्यों के लिए मौजूद है क्योंकि गोरखपुर (शहरी) मुख्यमंत्री का निर्वाचन क्षेत्र है.

छात्रों द्वारा बताई गई एक और शिकायत विश्वविद्यालय की लाइब्रेरी में नए रीडिंग मटीरियल का न होना है.

अनन्या ने कहा, “छात्र लाइब्रेरी फीस का पेमेंट करते हैं और रसीद भी लेते हैं लेकिन हमें लाइब्रेरी कार्ड नहीं मिला है. पुस्तकालय में प्रवेश के लिए मुझे अपनी विश्वविद्यालय आईडी का उपयोग करना पड़ता है. 2002 में, कानूनों में कई महत्वपूर्ण संशोधन किए गए, लेकिन लाइब्रेरी में उन्हें कवर करने वाली एक भी किताब नहीं है.”

रजिस्ट्रार ने इसका विरोध करते हुए तर्क दिया कि किताबें विभागाध्यक्ष की सिफारिश पर ही खरीदी जाती हैं. यह पूछे जाने पर कि आखिरी बार लाइब्रेरी के लिए नई किताबें कब खरीदी गई थीं, सिंह ने जवाब देते हुए कहा कि पिछले साल.

यह भी ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि इस साल मार्च में, NAAC रेटिंग के कुछ महीनों के भीतर, केंद्रीय पुस्तकालय की फाल्स सीलिंग गिर गई, जिससे छात्रों में डर पैदा हो गया.

एबीवीपी की डीडीयूजीयू यूनिट के संयुक्त सचिव शिवम पांडेय ने आरोप लगाया कि ”एनएएसी टीम को यह दिखाने के लिए फॉल्स सीलिंग लगाई गई थी कि सब कुछ ठीक है” लेकिन टीम के जाने के डेढ़ महीने के भीतर, छत गिर गई. बस “सौभाग्य से, स्टूडेंट्स सुरक्षित बच गए.”

रजिस्ट्रार सिंह ने कहा कि छत अभी भी ‘गारंटी पीरियड’ में है और इसकी मरम्मत की जाएगी. उन्होंने कहा, “ऐसी संभावना है कि कुछ कारणों से पेंट और नट ढीले हो गए हों जिसकी वजह से छत गिर गई हो लेकिन और कोई बड़ी समस्या नहीं है. यदि कोई इमारत या पुल बनता है और गिर जाता है, तो इसमें कोई क्या कर सकता है?”

(संपादनः शिव पाण्डेय)
(इस खबर को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)


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