मुंबई: टीमलीज एडटेक की रिपोर्ट “डिग्री फैक्ट्रियों से लेकर रोज़गार केंद्रों तक” के अनुसार, भारत की उच्च शिक्षा प्रणाली में उद्योग-तैयारी को लेकर बड़ा अंतर है, जहां लगभग 75 प्रतिशत संस्थान उद्योग की जरूरतों को पूरा करने में विफल हैं.
नौकरी के लिए तैयार युवाओं पर बढ़ते राष्ट्रीय फोकस के बावजूद, रिपोर्ट बताती है कि केवल 16.67 प्रतिशत संस्थान ही स्नातक होने के छह महीने के भीतर 76 से 100 प्रतिशत का प्लेसमेंट हासिल कर पाते हैं.
निष्कर्ष पूरे सिस्टम से जुड़ी डिजाइन संबंधी चुनौती की ओर इशारा करते हैं. टीमलीज एडटेक के संस्थापक और सीईओ शांतनु रूज ने कहा कि यह रिपोर्ट “आकांक्षा और क्रियान्वयन के बीच स्पष्ट अंतर” को उजागर करती है और ऐसे सिस्टम की तस्वीर पेश करती है जो अपने लक्ष्यों को हासिल करने के लिए “संरचनात्मक रूप से तैयार नहीं” है.
पाठ्यक्रम की प्रासंगिकता को भारतीय उच्च शिक्षा संस्थानों के सामने सबसे बड़ी संरचनात्मक बाधा बताया गया है. आंकड़ों के अनुसार, केवल 8.6 प्रतिशत संस्थान ही अपने सभी कार्यक्रमों में पूर्ण उद्योग-संरेखण की रिपोर्ट करते हैं, जबकि 51.01 प्रतिशत संस्थानों में कोई संरेखण नहीं है.
यह असंतुलन कक्षा में उद्योग की कम भागीदारी से और गहराता है. केवल 7.56 प्रतिशत संस्थानों ने कई कार्यक्रमों में “प्रोफेसर ऑफ प्रैक्टिस” को शामिल किया है, जिससे अधिकांश छात्र आधुनिक कार्यस्थल की जरूरतों से निरंतर परिचित नहीं हो पाते.
इसके अलावा, 60 प्रतिशत से अधिक संस्थानों ने अभी तक अपने शैक्षणिक कार्यक्रमों में मान्यता प्राप्त उद्योग प्रमाणपत्रों को शामिल करने की संभावनाएं नहीं टटोली हैं.
रिपोर्ट का कहना है कि यदि रोजगारयोग्यता को केवल एक “बज़वर्ड” से आगे ले जाना है, तो उद्योग भागीदारों के साथ पाठ्यक्रम सह-निर्माण को वैकल्पिक के बजाय अनिवार्य शर्त बनाना होगा.
हालांकि अनुभवात्मक सीख को नौकरी के लिए आवश्यक माना जाता है, रिपोर्ट बताती है कि वर्तमान में इसमें “संरचना और मानकीकरण” की कमी है.
अनिवार्य व्यावहारिक प्रशिक्षण को अपनाने की दर कम बनी हुई है. केवल 9.4 प्रतिशत संस्थानों में सभी कार्यक्रमों में इंटर्नशिप शामिल है. 37.8 प्रतिशत संस्थानों में किसी भी प्रकार की इंटर्नशिप व्यवस्था नहीं है. केवल 9.68 प्रतिशत संस्थान वास्तविक अनुभव देने के लिए लाइव उद्योग परियोजनाओं का उपयोग करते हैं.
व्यावहारिक अनुभव की इस कमी का मतलब है कि बड़ी संख्या में छात्र “नौकरी से जुड़े कौशल” के बिना ही स्नातक हो जाते हैं, जो रोजगार बाजार में आगे बढ़ने के लिए जरूरी हैं.
रिपोर्ट यह भी रेखांकित करती है कि कई संस्थान अपनी सबसे मजबूत पूंजी, यानी पूर्व छात्रों, का सही उपयोग नहीं कर पा रहे हैं. जबकि एलुमनाई उद्योग से जुड़ने का अहम सेतु होते हैं, केवल 5.44 प्रतिशत संस्थान ही “अत्यधिक सक्रिय” एलुमनाई समुदाय होने की रिपोर्ट करते हैं.
अधिकांश संस्थानों में ये संबंध बेहद सीमित या पूरी तरह अनुपस्थित हैं, जिससे छात्रों को मेंटरशिप, उद्योग संदर्भ और अनौपचारिक भर्ती चैनलों तक पहुंच नहीं मिल पाती.
“डिग्री फैक्ट्रियों” से वास्तविक “रोजगारयोग्यता केंद्र” बनने के लिए रिपोर्ट शिक्षा कार्यक्रमों के निर्माण और संचालन के तरीके में बड़े बदलाव की मांग करती है. प्रस्तावित रोडमैप में उद्योग-संरेखित पाठ्यक्रम, अनिवार्य इंटर्नशिप और औपचारिक नियोक्ता साझेदारी को शिक्षा प्रणाली के “असमझौता योग्य” घटक बनाने पर जोर दिया गया है.
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