Friday, 21 January, 2022
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S-400 के लिए भारत पर US की CAATSA प्रतिबंध की संभावना नहीं, रूस से दूसरे सैन्य सौदे आसान नहीं होंगे

5.43 अरब डॉलर की लागत वाली एस-400 'ट्रायम्फ' मिसाइल प्रणाली का सौदा रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की आगामी भारत यात्रा का केंद्र बिंदु होने जा रहा है.

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नई दिल्ली: जैसा कि विभिन्न सूत्रों ने दिप्रिंट को बताया है, अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन प्रशासन द्वारा भारत के ऊपर काउंटरिंग अमेरिकाज एडवर्सरीज थ्रू सेंक्शंस एक्ट (सीएएटीएसए-कात्सा) के तहत रूसी एस-400 वायु रक्षा प्रणालियों की खरीद के लिए प्रतिबंध लगाए जाने की संभावना नहीं है.

5.43 बिलियन डॉलर की लागत वाला एस-400 ‘ट्रायम्फ’ मिसाइल प्रणाली का सौदा 6 दिसंबर को रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की भारत यात्रा, जिसके दौरान वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ शिखर वार्ता में भी भाग लेंगे, के दौरान सुर्खियों में रहेगा.

भारत-रूस वार्षिक शिखर सम्मेलन इस साल पहली बार दोनों देशों के विदेश और रक्षा मंत्रियों को एक साथ एक मंच पर आते देखेगा क्योंकि ये दोनों देश अपने रिश्ते को उसी प्रकार एक विशेष स्वरूप देने की योजना बना रहे हैं, जैसा कि नई दिल्ली ने अपने क्वाड के साझेदारों (अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया) के साथ किया है.

दोनों पक्षों के बीच एक 10 साल के सैन्य तकनीकी समझौते पर भी हस्ताक्षर किये जाने की उम्मीद है. रेसिप्रोकाल एक्सचेंज ऑफ़ लोजिस्टिक्स एग्रीमेंट (रसद के पारस्परिक आदान-प्रदान का समझौते) भी हस्ताक्षर किये जाने हेतु तैयार है और यह सब भी वाशिंगटन को नागवार गुजरने वाला है

हालांकि अमेरिका ने इस बारे में अपना रुख अभी तक सार्वजनिक नहीं किया है कि वह एस-400 के संबंध में कात्सा लगाए जाने को लेकर भारत के साथ कैसे व्यवहार करेगा, मगर जैसा कि सूत्रों का कहना है, बाइडेन प्रशासन ने राजनयिक संवादों के दौरान भारतीय पक्ष से कहा है कि वह एस-400 सौदे के मामले में सिर्फ एक बार के अपवाद के रूप ‘प्रेसिडेंटिअल वेवर’ के तहत भारत को छूट देने के लिए ‘इच्छुक’ है.

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अगस्त 2017 में पारित, कात्सा मास्को (रूस) के साथ व्यापार करने वाले देशों के खिलाफ अमेरिका द्वारा विभिन्न प्रकार के प्रतिबंधों का प्रावधान करता है.

हालांकि, इस सूत्र का कहना है कि अमेरिका को पूरी उम्मीद है कि जहां तक हथियारों और अन्य रक्षा उपकरणों की खरीद का संबंध है, भारत रूस पर अपनी आयात निर्भरता को कम करने की दिशा में काम करना जारी रखेगा.

इस सूत्र के अनुसार, भारत पिछले डोनाल्ड ट्रम्प प्रशासन के दौरान ही अमेरिका को यह समझाने में सक्षम रहा था कि वह एस-400 सौदे पर हर हाल में आगे बढ़ेगा.

राजनयिक सूत्रों ने कहा कि नई दिल्ली को तब इस सौदे के लिए माफ़ी (वेवर) का ‘आश्वासन’ दिया गया था, जब तत्कालीन रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण ने सितंबर 2018 में आयोजित भारत-अमेरिका टू प्लस टू (2+2) वार्ता के सबसे पहली बार के आयोजन के दौरान अपने अमेरिकी समकक्ष जिम मैटिस से मुलाकात की थी.

इसके बाद ही अक्टूबर 2018 में, भारत और रूस ने एस-400 सौदे पर हस्ताक्षर किए थे.

भारतीय रक्षा और सुरक्षा प्रतिष्ठान के सूत्रों ने कहा कि इसके बाद से कात्सा मुद्दा कई मौकों पर अमेरिका के साथ कई स्तरों पर चर्चा के लाया गया है – अंतिम बार ऐसा इस साल मार्च में अमेरिकी रक्षा सचिव लॉयड ऑस्टिन की यात्रा के दौरान हुआ था.

इन सभी चर्चाओं के दौरान, मोदी सरकार ने ‘स्पष्ट रूप से’ अमेरिकी अधिकारियों से कहा कि न केवल यह सौदा कात्सा के लागू होने से पहले का है, बल्कि उन्होंने इस बात पर भी प्रकाश डाला कि यह एक ‘अमेरिकी कानून’ है, न कि संयुक्त राष्ट्र संघ का प्रावधान.


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‘रणनीतिक साझेदारों’ के रूप में बढ़ते भारत-अमेरिका संबंध

अमेरिका ने भी अब तक भारत पर कात्सा के तहत प्रतिबंध लगाने के बारे में कोई आधिकारिक बयान नहीं दिया है, और सूत्रों का कहना है कि बाइडेन प्रशासन इस तरह के कदम द्वारा मजबूती से आगे बढ़ते भारत-अमेरिका संबंधों को खतरे में नहीं डालेगा.

सूत्रों के अनुसार, भारत ने पहले ही अपने रक्षा उपकरणों के स्रोतों में विविधता ला दी है और बड़ी संख्या में अमेरिकी प्रणालियां भी भारतीय सुरक्षा बलों द्वारा सेवा में लायी जा रहीं हैं, जिनमें से कई अभी विचारधीन (पाइपलाइन में) भी हैं. अमेरिका जिन बड़े रक्षा सौदों पर नजर गड़ाए हुए है, उनमें सशस्त्र ड्रोन और भारतीय वायु सेना और नौसेना दोनों के लिए नए लड़ाकू विमानों के लिए लगभग 3 बिलियन डॉलर का सौदा शामिल है.

एक दूसरे सूत्र ने कहा कि बिडेन प्रशासन इस तथ्य को भी ‘मान्यता’ देता है कि भारत अब उसके ‘रणनीतिक सहयोगियों’ में से एक है और इसलिए वह एस-400 सौदे, जिसके तहत पहली वायु रक्षा प्रणाली पहले से ही भारत को डिलीवर की जा रही है, के लिए कात्सा को लागू करने में जल्दबाजी नहीं करेगा .

पिछले महीने, रूस की सैन्य-तकनीकी सहयोग सेवा फ़ेडरल सर्विस फॉर मिलिट्री-टेक्निकल कोऑपरेशन (एफ़.एस.एम.टी.सी) के निदेशक दिमित्री शुगेव ने समाचार एजेंसी स्पुतनिक को बताया था कि इन मिसाइल प्रणालियों की डिलीवरी ‘समय पर आगे बढ़ रही है’.

पेंटागन के प्रवक्ता जॉन किर्बी ने नवंबर में एक प्रेस वार्ता में कहा था, ‘हम इस प्रणाली के प्रति अपनी चिंता के बारे में अपने भारतीय भागीदारों को बहुत स्पष्ट रूप से बता चुके हैं.’

अक्टूबर में अपनी पहली भारत यात्रा के दौरान, अमेरिकी विदेश मंत्री वेंडी शेरमेन ने कहा था कि एस-400 किसी भी देश के सुरक्षा हितों के लिए ‘खतरनाक’ है.

2011-15 और 2016-20 के बीच, भारत के हथियारों के आयात में 33 प्रतिशत की गिरावट देखी गई और इसमें रूस से होने वाले आयात में सबसे अधिक कमी आई है. स्वीडिश थिंक-टैंक सीपरी द्वारा प्रकाशित नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, रूस द्वारा भारत को अपने हथियारों के निर्यात में 53 प्रतिशत की गिरावट देखी गई, जबकि फ्रांस से भारत के आयात में काफी वृद्धि देखी गई.


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‘क्वाड देशों को छूट देने वाले कानून पर काम चल रहा है’

रूस में पूर्व भारतीय राजदूत पी.एस. राघवन ने दिप्रिंट को बताया कि बिडेन प्रशासन अपने पूर्ववर्ती ट्रम्प शासन की तुलना में कात्सा पर ‘काफी अलग सोच रखता है’. इसे नॉर्ड स्ट्रीम 2 सौदे के तहत रूस-जर्मनी ऊर्जा साझेदारी के मामले में भी देखा जा सकता है, जहां अमेरिका ने ‘जर्मनी पर लगने वाले प्रतिबंधों को माफ करने का एक तरीका खोजा है‘.

राघवन, जो राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष भी हैं, ने कहा,‘अमेरिकी सत्ता प्रतिष्ठान के विभिन्न हलकों में अब यह अहसास हो गया है कि कात्सा में रिश्तों को नुकसान पहुंचाने की क्षमता है और वे उन संबंधों को खतरे में नहीं डालना चाहते हैं जिनके साथ कोई रणनीतिक पहलू है.’

एस -400 सौदा अब पूरी तरह से पक्का हो चुका है. राघवन ने कहा, ‘ऐसी भी खबरें हैं कि शिखर सम्मेलन से पहले इसके कुछ प्रदर्शनात्मक डिलीवरी भी होगी.

राघवन ने आगे कहा कि, ‘क्वाड देशों को कात्सा प्रतिबंधों से छूट देने वाले कानून पर काम किये जाने की भी खबरें आ रहीं हैं. अगर यह पारित हो जाता है, तो यह एक तरह से पिछले दरवाजे के माध्यम से दी जाने वाली छूट होगी. क्योंकि प्रतिबंध लगाने का मतलब होगा कि यह अमेरिका को इन देशों के साथ व्यापार करने से रोकता है और वे (अमेरिकी) ऐसा करना नहीं चाहते हैं’.

वे कहते हैं,‘सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि एक और अमेरिकी कानून (नेशनल डिफेन्स औथोरिज़ेशन एक्ट 2019) अमेरिकी प्रशासन को कई रणनीतिक और राष्ट्रीय सुरक्षा कारणों से इन प्रतिबंधों को माफ करने की शक्ति देता है, जिसका उपयोग राष्ट्रपति बिडेन कर सकते हैं.’

राघवन ने बताया कि रक्षा उपकरणों की खरीद को लेकर अमेरिका ने अब तक केवल चीन और तुर्की के खिलाफ ही कात्सा का इस्तेमाल किया है. लेकिन इसे तुर्की के खिलाफ अभी तक लागू नहीं किया गया है क्योंकि अमेरिका ‘नाटो गठबंधन के इस साझेदार के साथ व्यापार करना बंद नहीं कर सकता.’

उनका कहना है कि इस स्तर पर हो रही चर्चा पूरी तरह से कात्सा से छूट के बारे में नहीं है, बल्कि यह एस -400 सौदे के लिए कात्सा को लागू नहीं किये जाने के बारे में है. साथ हीं उनका यह भी कहना है कि ऐसे वक्त में जब रूस के साथ कई अन्य महत्वपूर्ण रक्षा लेनदेन पर विचार किया जाता है, तो हम इस कानून से आगे कैसे निपटते हैं, इस बड़े मुद्दे को हल किया जाना अभी भी बाकी है.

(इस खबर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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