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Monday, 22 July, 2024
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टोड आर्टिलरी गन को लेकर सेना की RFI जारी होते ही इजरायली ATHOS मेगा डील की रेस में लौटा

अपने अनुरोध में सेना ने साफ तौर पर कहा है कि गन सिस्टम का वजन 15 टन से कम होना चाहिए. क्योंकि स्वदेशी ATAGs का वजन 18 टन से अधिक हैं, इसलिए इजरायली फर्म एलबिट इस सौदे के लिए फिर से दौड़ में वापस आ गया है.

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नई दिल्ली: भारतीय सेना ने 1999 में तैयार की गई योजना के हिस्से के रूप में आर्टिलरी रेजिमेंट के आधुनिकीकरण के लिए 155mm/52 कैलिबर की टो गन सिस्टम हासिल करने के लिए नया रिक्वेस्ट फॉर इन्फॉर्मेशन (RFI) जारी किया है.

RFI जारी होने के बाद से इज़राइली फर्म Elbit के लिए फिर से एक नया रास्ता खुल गया है. इसका ऑटोनॉमस टोड हॉवित्जर ऑर्डनेंस सिस्टम (ATHOS) एक दशक से अधिक समय से भारतीय सेना से एक मेगा अनुबंध के लिए दौड़ में शामिल था.

हालांकि Elbit को यह मौका ऐसे समय में मिल रहा है जब भारतीय कंपनियां कल्याणी ग्रुप और टाटा, रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (डीआरडीओ) के साथ मिलकर उन्नत टोड आर्टिलरी गन सिस्टम (ATAGS) विकसित कर चुकी हैं. इस गन का इस्तेमाल लाल किले में स्वतंत्रता दिवस पर औपचारिक फायरिंग के लिए किया गया था.

20 दिसंबर को जारी RFI में खासतौर पर लिखा था कि गन सिस्टम का वजन ‘15 टन से कम होना चाहिए’ और इसी क्लॉज के चलते अडानी समूह के साथ गठजोड़ करने वाली इजरायली फर्म, भारतीय सेना को एथोस की आपूर्ति करने की दौड़ में वापस आ गई.

गौरतलब है कि ATHOS का वजन 15 टन से कम है, जबकि ATAGS का वजन 18 टन से ज्यादा है. इंडस्ट्री से जुड़े सूत्र नए RFI को इजरायली वेपेन सिस्टम के लिए एक मौके के तौर पर देख रहे हैं.

रक्षा आयात की पहली नेगेटिव लिस्ट में 155 मिमी x 52 कैलिबर टो आर्टिलरी गन भी शामिल है. हालांकि दिसंबर 2020 से व्यापार-प्रतिबंध लगाया जाना था, लेकिन बाद में इस खास गन की कट-ऑफ डेट को दिसंबर 2021 में बदल दिया गया.

फिर एक नियम लाया गया, जिसमें सशस्त्र बलों को कुछ परिस्थितियों में रक्षा उपकरण आयात करने की अनुमति दी गई, भले ही नेगेटिव इम्पोर्ट लिस्ट में उसका नाम हो.

इज़राइली गन को भी नेगेटिव लिस्ट में डाल दिया क्योंकि डीआरडीओ 155 मिमी / 52 कैलिबर हॉवित्जर – ATAGS के स्वदेशी संस्करण पर काम कर रहा था.

एथोस का इतिहास

इस गन के सौदे की प्रक्रिया 2001 में सेना की फील्ड आर्टिलरी रेशनलाइजेशन प्लान के हिस्से के रूप में शुरू हो गई थी. इस प्लान को 1999 में तैयार किया गया था.

तब से प्रस्ताव के लिए कई अनुरोध (RFPs) जारी किए गए, जिसमें Elbit के साथ-साथ फ्रांस के नेक्सटर ने UPA सरकार के तहत जारी अंतिम RFP में भाग लिया था.

यह डील पूर्ण ट्रांसफर टेक्नोलॉजी (टीओटी) प्रक्रिया के तहत ऑर्डिनेंस फैक्ट्री बोर्ड (ओएफबी) द्वारा 400 तोपों की आपूर्ति और बाकी बची 1,180 तोपों के स्वदेशी उत्पादन के लिए थी.

आरएएफआई यानि रिक्वेस्ट फॉर इंफॉर्मेशन को माल या सेवाओं के बारे में आपूर्तिकर्ताओं से जानकारी का अनुरोध करने के लिए जारी किया जाता है. वहीं RFPs का इस्तेमाल किसी प्रोजेक्ट के लिए प्रस्ताव मांगने के लिए बोली लगाने की प्रक्रिया में किया जाता है.

आखिरकार मार्च 2019 में एलबिट सिस्टम्स को सबसे कम बोली लगाने वाला बिडर (एल-1) घोषित किया गया, जिसके पहले कई सालों तक जमीनी स्तर पर परीक्षण और मूल्यांकन की प्रक्रिया चलती रही थी और यह काफी उतार-चढ़ाव से भी गुजरी थी.

हालांकि, डीआरडीओ ने किसी भी आयात योजना का विरोध करने के लिए ऑन रिकॉर्ड तर्क देते हुए कि कहा था कि ATAGS भविष्य की गन है और ATHOS से बेहतर है.

ATAGS प्रोग्राम का समर्थन करने वाली सेना ने LAC पर तनाव का हवाला देते हुए, ‘उत्तरी सीमाओं के साथ उच्च ऊंचाई वाले क्षेत्र में मध्यम तोपखाने में परिचालन संबंधी विकारों को दूर करने के लिए’ इनमें से 400 तोपों (20 रेजीमेंटों के लिए) को एलबिट से खरीदने की वकालत की थी.’

दिप्रिंट की रिपोर्ट के अनुसार, इजरायली फर्म ने तब रक्षा मंत्रालय को यह कहते हुए लिखा था कि अगर वह सिर्फ पहली 400 टो गन को खरीदती है, तो टीओटी से संबंधित संबंधित लागत को कुल अनुबंध मूल्य से घटाया जा सकता है.

पत्र में, एलबिट सिस्टम ने भारत के लिए एक विकल्प के रूप में भविष्य में 1,180 तोपों के लिए उसी कीमत पर टीओटी की पेशकश की थी, जिसका जिक्र कमर्शियल ऑफर में किया गया था.

एलबिट ने यह भी कहा कि उसने अनुबंध के तहत गनों के पहले सेट से शुरू करते हुए पहली 400 टो गनों के लिए 70 फीसदी स्वदेशीकरण हासिल करने के दृष्टिकोण और रणनीति को अंतिम रूप दे दिया है.

कंपनी ने कहा था कि एथोस को भारतीय सेना की विशेष आवश्यकताओं के अनुरूप बनाया गया है. और सेना की जरूरतों के अनुसार बंदूक के डिजाइन व विकास और फील्ड ट्रायल में करोड़ों डॉलर का निवेश किया है.

रक्षा सूत्रों के मुताबिक एलबिट ने कॉन्ट्रैक्ट डिलीवरी शेड्यूल की तुलना में बहुत पहले गन की आपूर्ति करने का वादा किया था. उसके मुताबिक वह अनुबंध पर हस्ताक्षर करने के 10 महीने के भीतर पहली छह और 14 महीनों के भीतर बाकी छह की सप्लाई सेना को कर देगा.

मसौदा अनुबंध में निर्धारित 72 महीनों के बजाय अनुबंध पर हस्ताक्षर करने के 54 महीनों के अंदर शेष सभी गनों को एक्सेलरेटेड डिलीवरी शेड्यूल के अनुसार वितरित करने का वादा किया गया था.

भारतीय रक्षा प्रतिष्ठान के साथ हुई चल रही बातचीत में एलबिट ने कहा था कि एथोस भारत में बड़े पैमाने पर उत्पादित, असेंबल और इंटीग्रेटिड- एक स्वदेशी गन बनाएगा.

(इस ख़बर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)

(अनुवाद: संघप्रिया मौर्या )


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