‘किसी छोटी सी परंपरा के बनने के लिए भी अंतहीन इतिहास की ज़रूरत पड़ती है.’
– हेनरी जेम्स
चूल्हे पर पकी रोटी का सोंधा स्वाद कितना खास होता है न और साथ में सिलबट्टे पर पिसी चटनी हो, तो क्या ही कहने. वैसे रोटी तो गर्म ही खानी चाहिए, सीधे आंच से उतरी हुई और दाल तो कुकर में नहीं पकानी चाहिए, उससे दाल के पोषक तत्व नष्ट हो जाते हैं और ये आपने सोशल मीडिया पर पढ़कर जाना था. क्या आपको भी ये सारी बातें सुनने में अच्छी लगती हैं? चलिए, हकीकत सुनिए. एक घंटे लकड़ी के चूल्हे पर लगातार खाना पकाना, 400 सिगरेट पीने के बराबर है और न जाने कितनी औरतें, इससे बीमार पड़ीं, असमय मर गईं, ज़िंदगी भर ख़ांसती रहीं, टीबी का शिकार बनीं, लेकिन लोगों का क्या याद रहा? चूल्हे पर पकी रोटी का सोंधा स्वाद.
राजतंत्र या सामंतवाद की सबसे खास बात यही होती है कि उनके नीचे आने वाला एक पूरा समूह सत्ता को खुश करने के लिए खुद को मार रहा होता है. और ये तंत्र कहीं भी सो सकता है. एक कंपनी में तमाम कर्मचारी अपनी ज़िंदगी को मालिक की खुशी के लिए, अपने साथियों के साथ-साथ अपनी ज़िंदगी भी नरक बना सकते हैं.
इस व्यवस्था का आधार ही है एक वर्ग को ताकत देने के नाम पर दूसरे को शोषण. इस पूरे सिस्टम में एक और ख़ास बात है, यहां निष्कर्ष पहले निकाला जाता है और उसके लिए तर्क बाद में बनाए जाते हैं. ये निष्कर्ष कभी नॉस्टैल्जिया के नाम पर होते हैं, तो कभी परंपरा और संस्कृति के नाम पर. इनके ज़रिए, अकसर ऐसी चीज़ें करवाई जाती हैं, जिनका यथार्थ बेहद क्रूर होता है. मसलन उत्तर भारत में ऐसे बहुत से लोग मिल जाएंगे, जिन्होंने बेहद पढ़ी लिखी लड़की से शादी की और उसके बाद उनकी नौकरी छुड़वा दी या बहुत से अयोग्य लड़कों की शादी इसलिए हो जाती है, क्योंकि उनके पिता और दादा किसी अच्छे पद पर रहे हैं या उनकी पिछली पीढ़ियां संपन्न थीं. इसके अलावा महिला से रक्त या वैवाहिक संबंध के चलते बेहद दकियानूसी परंपराएं चलाई जाती हैं.
जैसे, कई घरों में बहू की जगह ससुराल में इस स्तर पर रहेगी कि गोद में खेलने वाली ननद के भी पैर छूने पड़ेगे. मामा अपने भांजे-भांजियों के पैर छुएंगे. अच्छा, मामा से संबंध का एक दूसरा पहलू दक्षिण के कुछ समुदायों में दिखता है. वहां बहनें अपनी बेटी की शादी, अपने भाई यानी लड़की के मामा से करवा देती हैं. यह परंपरा उन जगहों पर ज़्यादा पाई जाती है, जहां मातृसत्ता रही है या बहनों को संपत्ति में हिस्सा मिलने की परंपरा थी. ऐसी जगहों पर बहन की बेटी से शादी करने का अर्थ है कि उसको दी गई संपत्ति वापस अपने पास आ जाएगी.
इन परंपराओं का सबसे क्रूर रूप तब दिखता है जब इनमें भोजन जुड़ जाता है. उदाहरण के लिए, बहुत से परिवारों में उत्तर भारत में महिलाओं को बचपन से सिखाया जाता है कि नहाए व ईश्वर को जल चढ़ाए बिना कुछ खाना नहीं है. किसी ज़माने में दिनचर्या ऐसी रही होगी कि ये काम ज़्यादा मुश्किल नहीं था. आज की तारीख में बच्चों को स्कूल, पति को ऑफ़िस भेजते-भेजते दिन का अच्छा खासा हिस्सा निकल जाता है. रोज़ की इस ‘लापरवाही’ का नतीजा बहुत सी महिलाओं ने असमय किडनी/गालब्लैडर स्टोन, पाचन संबंधी बीमारियों के रूप में भुगता है. कितनों की असमय मौत हुई है.
बीमारी तो एक चीज़ है, महिलाओं के साथ परंपरा के नाम पर होने वाली सबसे बड़ी ज़्यादती है, परंपरा के नाम पर प्रोटीन में कटौती. ज़्यादातर समुदायों में पुरुष मांसाहार करेंगे, मगर महिलाओं के लिए निषेध होगा. आपने लोगों को अपने परिवार के लड़कों से कहते भी सुना होगा कि फ़लाँ चीज़ खाओ, ताकत आती है. अकसर ये चीज़ प्रोटीन या अमीनोएसिड वाले वसा का भंडार होती है. जैसे, डॉक्टर के कहने पर या जिम में बॉडी बनाने के लिए भी अंडा खाने की ज़रूरत होगी, तो यह प्रिविलेज सिर्फ़ लड़कों के पास होगी कि ‘हमारे चिंटू, तो बाहर ही खा लेते हैं’.
सोचकर देखिए, प्रोटीन की ज़रूरत पूरी करने के लिए महिलाओं को मांसाहार करते देखना या घर से बाहर जाकर ही खा लेने का विचार कितने लोगों को ‘ऑफ़ेंड’ कर देगा. गिलास भर के दूध भी पहले पुरुष सदस्यों के लिए है, उसके बाद गुंजाइश रही, तो देखा जाएगा. जिन घरों में सब शाकाहारी या मांसाहारी हों, उनके यहां भी सबसे अच्छे लजीज़ हिस्से लड़कों के लिए ही आरक्षित रहेंगे. लेग पीस हो या सबसे बड़ा वाला आम, या तो बाबू जी की थाली में जाएगा या फिर शोना बाबू की.
मम्मियां तो होती ही खुद को भूखा रखकर बच्चों को खिलाने के लिए हैं. ये सब परंपराए हैं और भोजन से जुड़े भेदभाव करती हैं. और हां, इन सब बातों का ये मतलब नहीं है कि ये सारे नियम पुरुष बनाते या लागू करते हैं. ऊपर पढ़ा था न आपने कि सामंतवाद में व्यक्ति पहले अपना जीवन नरक करता है, फिर अपने साथ वालों का और दुनिया भर में किसी भी अतार्किक बात को जारी रखने का सबसे अच्छा तरीका है उसे पवित्रता और परंपरा का नाम देना.
बंगाल का निरामिष भोजन ऐसी ही परंपराओं में से एक है. निरामिष सुनते ही हमारी जाति वाली कंडीशनिंग उसके साथ पवित्र, शुद्ध और निर्मल जैसे विशेषण अपने-आप लगा देता है, मगर बंगाल के निरामिष भोजन का एक बड़ा हिस्सा विधवा क्विज़ीन कहलाता है और ये विधवा क्विज़ीन शोषण से उपजी रचनात्मकता है, जो दिखाता है कि जब कोई संसाधन नहीं होता, तब सच में कला सबसे अच्छी तरह निखरकर आती है.
बांग्ला निरामिष खाने के कद्रदान ऐसी बहुत सी सब्ज़ियों, फूल और साग के बारे में बताएंगे जिनको कहीं और के लोग खाने की थाली में देखने की कल्पना नहीं कर पाते हैं. केले के फूल, सजहन, पुई, सन जैसी तमाम सब्जियां बनती हैं और चाव से खाई जाती हैं. विडो क्विज़ीन (विधवा पाकशैली) बांग्ला पकवानों की एक पूरी शैली है, जिसमें अलकोप्रिय सब्ज़ियों और बहुत से कथित अखाद्य हिस्सों को बेहद स्वादिष्ट ढंग से पकाया जाता है और इसके पकवानों का स्वाद अद्भुत होता है. तभी तो माछेर झोल, रसगुल्ले और सॉन्देश की अतिलोकप्रियता के बीच दुर्गा पूजा के भोग में मिलने वाले निरामिष लाबड़ा के मुरीद कम नहीं हैं.
विधवा पाकशैली के पकवानों के इतिहास में बड़ा दर्द छिपा है. बंगाल का सवर्ण समाज आज अपने भद्रलोक वाले तमगे पर बड़ा गर्व करता है, लेकिन लंबे समय तक बंगाल में महिलाओं का कई स्तरों पर शोषण हुआ. बाल विवाह, बेमेल विवाह और बहुविवाह की सबसे ज्यादा मार महिलाओं पर पड़ी और इसमें भी बाल विधवा होना जीवन को नरक बना देने जैसा था. बचपन में हुई शादी में कई बार बच्चे की किसी बीमारी या दुर्घटना में मौत हो जाती थी और लड़की पूरा जीवन विधवा के तौर पर काटती थी. कई बार 10-15 साल की लड़की की शादी 30-40 साल के आदमी से हो जाती थी और 25-30 की उम्र तक आते-आते कई महिलाएं विधवा हो जाती थीं.
किशोरावस्था या जवानी की दलहीज़ पर विधवा होने के बाद इन महिलाओं को अपना पूरा जीवन सादगी से काटना पड़ता था. रबींद्रनाथ टैगोर की पुत्रवधू प्रतिमा देवी टैगोर भी बाल विधवा थीं. उनके पहले पति की मृत्यु बचपन में ही नदी में डूबकर हो गई थी. गुरुदेव ने प्रतिमा का विवाह अपने पुत्र रथींद्र से कराया, तो वे ठाकुरबाड़ी में आने वाली पहली विधवा बहू थीं. इस विधवा विवाह का सबसे ज़्यादा विरोध खुद प्रतिमा के परिजनों ने किया था, क्योंकि उन्हें लगता था कि अगर विधवा बेटी की शादी हो गई, तो बाकी बच्चों की शादी नहीं होगी.
विधवाओं को सादगी भरा जीवन जीना होता था. सादगी भरे जीवन का मतलब था, तामसिक या ‘गर्म तासीर वाले’ खाने की मनाही. इसका असल मतलब था स्वाद पर रोक. खाने में प्याज़-लहसुन नहीं पड़ेगा, मछली-अंडा और दूसरा मांसाहार की बात करना भी पाप था. गर्म मसाले नहीं पड़ेंगे. यहां तक की लाल रंग की मसूर की दाल भी प्रतिबंधित थी. गरिष्ठ मिठाइयों से दूरी बना दी जाती थी. वो भी ऐसे परिवेश में जहां खाना बनाना उत्सव का हिस्सा हो. जहां मछली खाने से ज्यादा उसका तालाब से आना और उसे पकाने का तरीका रोचक हो. वहां अचानक से हर चीज़ की मनाही किसी अत्याचार से कम नहीं था. इसके अलावा विधवाओं का चूल्हा अलग होता.
कई परिवारों में तो वे मुख्य रसोई में भोजन पकाने में मदद करतीं, लेकिन उसका स्वाद चखना उनके लिए प्रतिबंधित था. इस पूरी परिस्थिति का सबसे त्रासद पहलू क्या हो सकता है? कल्पना करिए कि एक परिवार में लगभग एक ही उम्र की दो महिलाएं हों. एक सधवा हो और एक बाल विधवा. सुहागन बहू के गर्भवती होने पर उसकी गोद भराई में तमाम तरह के पकवान, लड्डू और दूसरी चीज़ें बनेंगी. होने वाली संतान स्वस्थ हो, लड़का ही पैदा हो, इसलिए तमाम जतन किए जाएंगे. बहू के लिए तमाम चीज़ें पकाना और उसे खिलाना एक पारिवारिक उत्सव रहेगा.
कम से कम बच्चा पैदा होने तक तो पलकों पर रखा ही जाएगा. इस पूरे प्रक्रम में उसी उम्र की विधवा महिलाएं खटती रहती थीं, यह जानते हुए कि उन्हें न इन सारी चीज़ों में कुछ चखने के लिए मिलेगा. न उनके जीवन में ऐसा कोई दिन आएगा, जब वे इस तरह का कोई भी आनंद ले पाएं. और तो और सबसे अहम मौकों पर उनकी उपस्थिति को ही अपशकुन मान लिया जाएगा.
