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Thursday, 7 December, 2023
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उर्दू अखबारों ने इज़रायल का पक्ष लेने के लिए मोदी सरकार और कुछ देशों के ‘दोहरे मानदंडों’ की आलोचना की

पेश है दिप्रिंट का राउंड-अप कि कैसे उर्दू मीडिया ने पिछले सप्ताह के दौरान विभिन्न समाचार संबंधी घटनाओं को कवर किया और उनमें से कुछ ने इसके बारे में किस तरह का संपादकीय रुख इख्तियार किया.

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नई दिल्ली: इज़रायल और फिलिस्तीनी आतंकवादी समूह हमास के बीच चल रहा संघर्ष इस हफ्ते उर्दू प्रेस का फोकस बना रहा, जिसमें तीनों प्रमुख उर्दू अखबारों — सियासत, इंकलाब और रोज़नामा राष्ट्रीय सहारा के संपादकीय में गाज़ा पट्टी पर बमबारी के लिए तेल अवीव की आलोचना की गई.

पिछले शनिवार को इज़रायल ने हमास से हवाई, ज़मीनी और समुद्री हमला देखा, जिसकी भारत सहित कई देशों ने निंदा की और तेल अवीव को गाज़ा में जवाबी हमले शुरू करने के लिए प्रेरित किया, जो 41 किलोमीटर की पट्टी है जिसमें दो मिलियन से अधिक लोगों का घर है और हमास 2007 इसे कंट्रोल कर रहा है.

अपने संपादकीय में सियासत ने हस्तक्षेप करने और शांति स्थापित करने में असमर्थता के लिए संयुक्त राष्ट्र और अमेरिका जैसे देशों की आलोचना की. इसने संपादकीय में कहा, “वैश्विक शांति के लिए ज़िम्मेदार संगठन संयुक्त राष्ट्र और संयुक्त राज्य अमेरिका जैसी अन्य शक्तियां और उसके सहयोगी हैं.”

इसमें कहा गया है कि शामिल सभी पक्षों को बातचीत की एक मेज़ पर लाया जाना चाहिए. इसने कहा, “लेकिन यह दुखद है कि संयुक्त राष्ट्र फिलिस्तीन के लोगों को उनके अधिकार देने और (इज़रायल की) आक्रामक नीतियों को रोकने में पूरी तरह से असमर्थ है.”

अखबारों ने पांच राज्यों — राजस्थान, छत्तीसगढ़, मिजोरम, मध्य प्रदेश और तेलंगाना में चुनावों को भी व्यापक कवरेज दिया.

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इजराइल-हमास ‘युद्ध’

प्रारंभिक आकलन के अनुसार, हमास ने पिछले हफ्ते दक्षिणी इज़रायल में सैन्य ठिकानों और कस्बों पर हमले के दौरान कम से कम 100 को बंदी बना लिया था. जवाबी कार्रवाई में इज़रायल ने अपना जवाबी आक्रामक ‘ऑपरेशन आयरन स्वोर्ड्स’ शुरू किया, जिसमें पहले से ही गरीब गाज़ा पट्टी में बिजली, भोजन, पानी और ईंधन की पूरी तरह से रुकावट की घोषणा की गई.

इज़रायल और गाज़ा में संयुक्त रूप से मरने वालों की संख्या वर्तमान में 2,000 से अधिक है.

अखबारों ने हमास के हमले पर भारत सहित विभिन्न देशों की प्रतिक्रियाओं को कवर किया. रविवार को अपनी प्रतिक्रिया में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि वह “गहरे सदमे में” थे और भारत “इज़रायल के साथ एकजुटता में” खड़ा है.

नौ अक्टूबर को अपने संपादकीय में सहारा ने कहा कि इज़रायल अक्सर लोगों को बेदखल करने और “अवैध यहूदी बस्तियों” के निर्माण के लिए फिलिस्तीनी क्षेत्रों में प्रवेश करने और उनके घरों को ध्वस्त करने के लिए किसी न किसी बहाने का इस्तेमाल करता है.

संपादकीय के मुताबिक, हमला न तो अचानक हुआ है और न ही आश्चर्यजनक है. इसने कहा, “कुछ लोग हमास के हमले को अचानक हुआ बताते हैं. फिर ऐसे लोग भी हैं जो हमले को खुफिया विफलता मानते हैं और वे लोग हैं जो सोचते हैं कि फिलिस्तीनियों को कष्ट सहना तय है.”

इसमें आगे कहा गया, “सबसे पहले इस तरह के पैमाने के हमले एक दिन में नहीं किए जा सकते. दूसरा, इजरायली सैनिक आए दिन फिलिस्तीनियों पर हमला करते हैं. ऐसा कोई दिन नहीं जाता जब इज़रायल द्वारा 2-4 फिलिस्तीनियों को नहीं मारा जाता, या जब उनकी ज़मीन पर अवैध इमारतें नहीं बनाई जातीं, या जब अल-अक्सा मस्जिद पर हमला नहीं किया जाता. क्या यह संभव है कि फिलिस्तीनियों की ओर से प्रतिशोध नहीं होगा?”

अल-अक्सा मस्जिद यहूदी धर्म और इस्लाम दोनों में महत्वपूर्ण स्थान रखती है. यरूशलेम के पुराने शहर के मध्य में स्थित यहूदियों के लिए इसका धार्मिक महत्व इस तथ्य से है कि यह एक पहाड़ी पर स्थित है, जिसे हर हा-बेइत या टेम्पल माउंट के नाम से जाना जाता है — यहूदी धर्म में सबसे पवित्र स्थल.

मक्का और मदीना के बाद यह मस्जिद इस्लाम में तीसरी सबसे पवित्र मस्जिद है — मुसलमानों का मानना है कि यहीं से पैगंबर मुहम्मद स्वर्ग की ओर बढ़े थे.

11 अक्टूबर को एक संपादकीय में सियासत ने कुछ देशों के “दोहरे मानकों” का आह्वान किया. इसमें कहा गया है कि इज़रायल ने बार-बार गाज़ा और कब्जे वाले वेस्ट बैंक पर प्रतिबंध और नाकेबंदी लगाई है, लेकिन जो देश अब इसका समर्थन कर रहे हैं, उन्होंने इस कदम का विरोध करने के लिए “अपना मुंह नहीं खोला”.

संपादकीय में कहा गया, “आज हमास की कार्रवाई के जवाब में फिलिस्तीन को विकास सहायता रोकने का फैसला लिया जा रहा है. उनके लिए फिलिस्तीनी लोगों से भोजन, पानी और दवा बंद करने का इज़राइल का निर्णय अमानवीय नहीं लगता है.”

डेनमार्क और स्वीडन जैसे देशों ने फिलिस्तीन को विकास सहायता रोक दी है.

12 अक्टूबर के अपने संपादकीय में इंकलाब ने इस मुद्दे पर अपना रुख “बदलने” के लिए मोदी सरकार की आलोचना की. इजरायल को “हथियाने वाला” और “आक्रामक” कहते हुए, इसने कहा कि आर्थिक हितों और नैतिक सिद्धांतों का अपना अलग स्थान होना चाहिए.

इसमें कहा गया है, “जियो और जीने दो एक ऐसी अवधारणा है जिससे किसी भी राष्ट्र को आर्थिक लाभ के लिए समझौता नहीं करना चाहिए. वे (भारत सरकार) हमास के तरीकों पर चर्चा करते हैं, लेकिन फिलिस्तीन मुद्दे पर नहीं.” संपादकीय में कहा गया है कि फिलिस्तीनियों की चीख सुनने के बाद,“कोई भी इस बात से इनकार नहीं कर सकता कि उन्होंने (इजरायल ने) फिलिस्तीनी जीवन को नष्ट कर दिया.”

13 अक्टूबर को एक अन्य संपादकीय में इंकलाब ने कहा कि इजरायली अपने प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू से नाराज़ हैं. इसने कहा, “(इज़रायली) जनता अपने पीएम पर उनकी रक्षा करने में विफल रहने का आरोप लगाती है.”


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चुनाव

इज़रायल-फिलिस्तीन संकट के बावजूद आगामी चुनावों के प्रचार को उर्दू अखबारों के पहले पन्ने और संपादकीय पर महत्वपूर्ण कवरेज मिला. अखबारों ने राजस्थान सरकार की राज्य में जाति जनगणना की घोषणा को भी कवर किया, जहां मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की कांग्रेस एक और कार्यकाल की उम्मीद कर रही है.

10 अक्टूबर को एक संपादकीय में सहारा ने कहा कि आगामी विधानसभा चुनाव लोगों के राजनीतिक मूड को जानने में मदद कर सकते हैं, लेकिन वह अगले साल के आम चुनाव के नतीजे की सटीक भविष्यवाणी नहीं कर सकते. इसमें कहा गया है, क्योंकि दुनिया भर की स्थिति ने देश की राजनीति को भी प्रभावित करना शुरू कर दिया है.

उसी दिन सियासत ने अपने संपादकीय में कहा कि राजनीतिक दल लोगों को प्रभावित करने और उनका समर्थन पाने के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपनाएंगे. इसमें कहा गया, “जनता को गुमराह कर विफलताओं को छुपाने का भी प्रयास किया जाएगा. मतदाताओं को (वोटिंग करते समय) राजनीतिक दलों के पिछले रिकॉर्ड और वादों को पूरा करने के उनके प्रयासों की तुलना करनी होगी.”

11 अक्टूबर को इंकलाब के संपादकीय में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान पर तंज कसा गया. विशेष रूप से, यह उन्हें फिर से सीएम उम्मीदवार के रूप में पेश करने के लिए भाजपा की कथित “अनिच्छा” पर केंद्रित था.

संपादकीय में कहा गया है कि यह “भगवान की कृपा” थी कि चौहान का नाम भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के उम्मीदवारों की चौथी लिस्ट में आया.

इसमें कहा गया है, “अन्यथा यह डर था कि बीजेपी का शीर्ष नेतृत्व उन्हें टिकट से वंचित कर देगा.” इसमें कहा गया है कि चौहान को खुद भी लग रहा होगा कि “एक दिन उन्हें यह पत्र मिल सकता है कि उन्हें भाजपा के ‘मार्गदर्शक मंडल’ में नियुक्त किया गया है.”

जिसमें मोदी और एल.के. आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी जैसे दिग्गज बीजेपी नेता शामिल है. ‘मार्गदर्शक मंडल’ भाजपा के भीतर मार्गदर्शकों की एक संस्था है.

12 अक्टूबर को अपने संपादकीय में सियासत ने कहा कि बीजेपी को आखिरकार यह एहसास होने लगा है कि वह अकेले पीएम मोदी की प्रतिष्ठा पर चुनाव नहीं जीत सकती. संपादकीय के अनुसार, यह अप्रत्यक्ष स्वीकारोक्ति है कि मोदी की लोकप्रियता घट रही है.

हालांकि, संपादकीय के अनुसार, यह भाजपा को दुविधा में डालता है, खासकर जब बात शिवराज सिंह चौहान जैसे राज्य के नेताओं की हो. इसने कहा,“अपने राज्य नेतृत्व को पूरी तरह से खत्म करने से भाजपा की चुनावी संभावनाओं को भी नुकसान हो सकता है.”

अगले दिन एक अन्य संपादकीय में अखबार ने कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि भाजपा मुसलमानों को धीरे-धीरे चुनाव टिकटों से वंचित करने की नीति पर चल रही है. इसमें कहा गया है कि इस रणनीति से पार्टी को कुछ राज्यों में जीत हासिल करने में मदद मिली है, लेकिन कुछ राज्यों में हार भी मिली है.

संपादकीय में कहा गया, “हालांकि, इस खेल में सबसे महत्वपूर्ण बात मुसलमानों का राजनीतिक कौशल है. मुसलमानों को जागरूक किया जाना चाहिए कि कौन उनका उपयोग और शोषण कर रहा है और कौन उन्हें राजनीतिक सत्ता के लिए बलि का बकरा बना रहा है.”

(संपादन: फाल्गुनी शर्मा)

(उर्दूस्कोप को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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