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अगले साल के लोकसभा चुनाव में ऐश्वर्या के लॉन्च के बारे में अभी तक कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है ।राजीव अग्रवाल / ट्विटर
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नई दिल्ली: बिहार के विधायक ददन यादव ने बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव को एक सलाह दी है. उन्होंने कहा है कि लालू अपने बेटे तेजप्रताप की पत्नी ऐश्वर्या की शादी छोटे बेटे तेजस्वी से करा दें. उन्होंने यह भी कहा कि यादव परिवार में पंरपरा रही है कि अगर बड़े भाई के साथ कुछ घट जाता है या शादी के बाद वह वैराग्य की तरफ चला जाता है तो उसकी पत्नी की शादी उसके छोटे भाई से करा दी जाती है. इस तरह घर की इज़्ज़त घर में ही रह जाती है.

गौरतलब है कि तेजप्रताप अपनी पत्नी ऐश्वर्या से तलाक की अर्ज़ी लगा चुके हैं और गाहे- बगाहे सोशल मीडिया पर लिखते रहते हैं कि ऐश्वर्या के साथ रहना मुश्किल हो गया है. तेज प्रताप का कहना है कि वो खुद तो कृष्ण हैं लेकिन ऐश्वर्या राधा नहीं हैं.

इस बात के कुछ दिन पहले ही पुलवामा हमले में शहीद हुए कर्नाटक के एच गुरू की पत्नी कलावती (25) पर पति के भाई के साथ शादी करने के लिए दबाव बनाया जा रहा था. परेशान कलावती ने पुलिस से मदद मांगी. खबरों से पता चला कि सरकार और बाकी संस्थाओं से मिल रही मदद के लालच के कारण कलावती के साथ ऐसा किया जा रहा था.

दोनों ही केस भारतीय समाज में औरतों की दुर्दशा की तस्वीर दिखाते हैं. अभी भी पढ़ी-लिखी लड़कियों के शादी से बाहर निकलने या रहने की व्यवस्था घर के बड़े-बुज़ुर्गों के हाथों में है.

पति के साधु बन जाने या गुज़र जाने की दशा में देवरों से शादी करने के लिए बाध्य करना महिलाओं के हकों के खिलाफ है. पर इस प्रथा को मानने वाले सिर्फ यादव समुदाय या कलावती का परिवार ही नहीं है. समस्त ग्रामीण भारत में अलग-अलग नामों से प्रचलित ऐसी प्रथाएं हैं जो पुरुषों के मर जाने के बाद उनकी पत्नियों को देवरों से शादी करने को मजबूर करती हैं.

रंडवा प्रथा या चूड़ी पहनाना या लत्ता ओढ़ाना

पश्चिमी उत्तर-प्रदेश में पुरुष ना सिर्फ ज़मीन-जायदाद का बंटवारा करते हैं बल्कि रंडवा प्रथा के अंतर्गत आपसी सहमति से पत्नी को भी बांट लेते है. उत्तरी ग्रामीण भारत में रंडवा उस पुरुष को कहा जाता है जिसकी शादी की उम्र निकल गई हो और वह कुंवारा हो.

ऐसी ही एक व्यवस्था हरियाणा और पंजाब में ‘चूड़ी पहनाना’ के नाम से प्रचलित है. कुछ जाट परिवारों में इसे ‘लत्ता ओढ़ना’ या ‘चादर ढ़कना’ भी कहते हैं. इस व्यवस्था में पति के मर जाने के बाद उसकी पत्नी की शादी देवर और कभी-कभी जेठ से भी कर दी जाती है. मृत पति के सभी भाइयों के विवाहित होने की स्थिति में कई बार औरतों को सह-पत्नी के तौर भी रहना पड़ता है. गांव के बड़े-बुजुर्गों और पंचायत के सामने सर्वसम्मति से यह फैसला लिया जाता है. इस फैसले में औरत की मर्ज़ी नहीं पूछी जाती है.

ऐसा करने के पीछे तर्क दिए जाते हैं

अगर मरने वाला व्यक्ति सेना में है तो सरकार से मिलने वाली सुविधाएं घर में ही रह जाती हैं. अगर औरत के नाम पर कोई संपत्ति है तो वो भी घर में ही रह जाती है. हिंदू उत्तराधिकार एक्ट 1956 के मुताबिक, विधवाएं अपने मृत पति की संपत्ति पर कानूनी तौर से मालिकाना हक रखती हैं.

औरत को बाहरी पुरुषों के चंगुल में फंसने से बचाया लिया जाता है और उसकी यौन इच्छाओं की भी पूर्ति की जाती है. इसे घर की इज़्ज़त से भी जोड़ कर देखा जाता है. कुछ पढ़े-लिखे युवक इसे औरतों की सेक्सुआलिटी से भी जोड़ देते हैं.

इसे विधवाओं के पक्ष में माना जाता है. जिस पुरुष के नाम से चूड़ी पहनाई गई है उसकी नैतिक ज़िम्मेदारी होती है कि वो उस महिला सुरक्षा प्रदान करे. एक तरह से इसे विधवाओं के लिए एक प्रोग्रेसिव प्रैक्टिस बताकर उचित ठहराया जाता है.

विधवाओं को नहीं है परिवार से बाहर किसी से शादी करने का हक

ये विवाह की ऐसी संस्था है जिसमें विधवा को किसी बाहरी पुरुष से शादी करने का सामाजिक हक नहीं दिया गया. बहुत से केसों में महिला को बहु-विवाह के कुचक्र में फंसा दिया जाता है. पति की मृत्यु के बाद ससुर से लेकर जेठ द्वारा जबरदस्ती की घटनाएं अक्सर ही लोकल खबरों की हेडिंग बनती हैं. परिवार से बाहर शादी करने पर सामाजिक बहिष्कार भी झेलना पड़ता है.

10-12 साल के लड़के भी हैं इसके पीड़ित

ऐसा नहीं है कि पुरुष इस व्यवस्था के शिकार नहीं होते. कई केसों में पुरुषों की उम्र 10-12 साल की रही जब उन्हें अपने से दुगुनी उम्र की भाभियों से शादी करनी पड़ी. 2016 में हरियाणा के नारनौल के 21 वर्षीय हितेश के भाई की बाइक एक्सीडेंट में मौत हो गई. भाई की मौत के बाद भाभी और 4 साल की भतीजी की जिम्मेदारी हितेश को सौंप दी गई. हितेश उस वक्त किसी लड़की से प्रेम करते थे और उससे शादी करना चाहते थे. हितेश और उनकी भाभी (अब उनकी पत्नी) के आपसी रिश्ते का अंदाजा लगाया जा सकता है.

रिपोर्ट्स बताती हैं कि 1971 के भारत-पाक युद्ध के बाद पंजाब में शहीदों की पत्नियों को ससुराल पक्ष के साथ जबरदस्ती रखा गया जब तक कि उनके देवर शादी की उम्र तक नहीं पहुंच गए. कुछ इसी तरह 1984 के सिख दंगों में मार दिए गए पुरुषों की पत्नियों का 10-12 साल के देवरों के साथ दोबारा विवाह कर दिया गया. बाद में खबरें आईं कि ऐसी शादियों में फंसी औरतें बड़ी उम्र के पुरुषों के साथ भाग गईं.

विधायक ददन यादव ने जिस तरीके से ऐश्वर्या को कम आंका है और उन्हें बिचारी की तरह संबोधित कर रहे हैं वो शर्मनाक है. ऐश्वर्या एक पढ़ी-लिखी सशक्त महिला हैं और वो अपना भला बुरा समझती हैं. किसी और को उन पर दबाव बनाने का हक नहीं है.

सवाल ये है कि लड़की हो या लड़का, वह खुद अपनी शादी और तलाक से संबंधित निर्णय क्यों नहीं ले सकते? लगातार ये हमारे समाज के लिए मुद्दा क्यों बना रहता है? क्या ये सही वक्त नहीं है कि समाज अपने लड़के-लड़कियों को शादी के नाम पर प्रताड़ित करना बंद कर दे?


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