Thursday, 11 August, 2022
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सैनिकों के हौसले को बताती है ‘कुछ अनसुनी फौजी कहानियां’

यह रचना बिष्ट रावत की किताब 'कुछ अनसुनी फौजी कहानियां' का अंश है.

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सांझ ढल चुकी थी. क्रिकेटर बुला रहे थे. निर्मल-स्वच्छ चांद पेड़ों के बीच छिपता, आकाश में धीरे-धीरे ऊपर की ओर चढ़ता जा रहा था और वह ऐसा प्रतीत होता था, जैसे कि डरा हुआ कोई बच्‍चा जान-बूझकर किसी अंधेरे कमरे में घुसे जा रहा हो और उसे यह पता ही नहीं है कि बिजली का स्विच कहां है. शाम थमी हुई थी और मौसम में मानसून के बाद की नमी सी थी. बिष्ट ने आदतन अपने हाथ गरदन पर रगड़े और उसे पसीने से भरा पाया. ‘छिह!’

चेहरा बनाते हुए उसने अपने हाथ फिर पैंट के दोनों तरफ रगड़ लिये. अब कपड़े बदलने का समय नहीं था. असल में बदलने का उसका कोई मन भी नहीं था. वह अपने घर भी नहीं गया. कुछ देर के लिए तो उसे याद भी नहीं था कि उसने दिन में खाना खाया भी था अथवा नहीं. उसे याद आया कि वह मैस में तो गया था. वह उस डाइनिंग टेबल पर अकेला बैठा था, जिस पर बैठकर अठारह लोग एक साथ खाते थे, जहां चम्मच हमेशा दाएं, पर फोर्क बाईं ओर और खाना खाने के बाद मीठा खानेवाली चम्मच हमेशा सामने लगी होती थी. मैस के वेटर ने जल्दी खाना लगाया. पोर्सिलिन की कटोरियां, जिसमें नीले रंग का पैरा रेजिमेंट लोगो एकदम सही मिलिटरी सूक्ष्मता के साथ लगा था. चावल, दाल, चिकन करी, सलाद आदि आकार के अनुसार सजाकर रखे गए थे. उसे ऊपर देखने की भी जरूरत नहीं थी. उसे बुधवार का मेन्यू कंठस्थ याद था.

अचानक से बिष्ट ने अपनी कुरसी को लकड़ी के पैनल वाले फर्श पर पीछे की ओर किया, तभी मैस का वेटर गरमागरम रोटियां लेकर वहां आया. तभी उन्होंने कहा, ‘मनोहर, मुझे खाना नहीं खाना, प्लेट हटा दे. उन्होंने बगल की मेज से अपनी टोपी व कार की चाबी उठाई और निकल लिये. उनके खाली पेट से गड़गड़ाहट की आवाज आ रही थी.

लेफ्टिनेंट कर्नल रजनीश बिष्ट, सेना मेडल, छोटे व मोटे और टूटी हुई बॉक्सर नाक वाले व्यक्ति थे, जिनका स्वभाव बहुत ही कड़क था, जिस कारण उनके कनिष्ठ अधिकारी उनके साथ बहुत इज्जत से पेश आते थे. उन्होंने अपने कंधों को चौड़ा किया और पुरानी इमारत में प्रवेश किया. ब्रिटिशों के जमाने में वह एक स्कूल हुआ करता था, पर अब वह भारतीय सेना का एक बेस अस्पताल था.

उस इमारत के मटमैले पत्थरों पर डूबते हुए सूरज की नारंगी आभा पड़ रही थी. उन्होंने पहली बार उस इमारत की लाल छत देखी थी, जिसके चुंबकीय मेहराब थे और उन बेरंग पत्थरों पर चढ़ते सफेद बोगेनवेला के फूल बहुत सुंदर लग रहे थे तथा वे अपनी ओर सारा ध्यान खींच रहे थे. पर आज, उन्होंने उस ओर नहीं देखा. सीढ़ियों पर तेजी से चढ़ते हुए, वे लंबे, खाली पड़े कॉरिडोर पर चल रहे थे, जिनके लटकते लाइट बल्ब हरे टिन शेड पर ऐसे लग रहे थे, जैसे वे चीनी मछुआरों की टोपियां हों और उनकी वरदी में पीला रंग, उन्हें पीतल-सा लग रहा था और उनके कंधों पर लगे स्टार बहुत चमक रहे थे.

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उनके पैर इंटेसिव केयर यूनिट की ओर सहसा चले जा रहे थे और वे अकेले उन जटिल बातों को याद कर रहे थे. पंद्रह दिनों से भी ज्यादा हो गए थे, वे अपने ऑफिस से समय निकालकर वहां हर दिन, दिन में दो बार आते थे, अगर हो सके तो तीन बार भी. वे आई.सी.यू. के सामने एक संकेत के सामने रुक गए, जिसमें लिखा हुआ था—‘इस बिंदु के बाद कोई भी आगंतुक का प्रवेश वर्ज्य’, वे दरवाजे के आयताकार शीशे के पैनल से अपनी गर्दन को उचकाकर अंदर की ओर देख रहे थे. उन्हें पता था कि वे क्या देख रहे हैं.

ऐसा लग रहा था कि पंद्रह दिन पहले किसी फिल्म ने जिंदगी का कोई लम्हा कैद कर लिया हो. दरवाजे के दूसरी तरफ सफेद बिस्तर में उनकी कंपनी के सेकेंड-इन-कमांड, मेजर अभय सिंह राठौड़, शौर्य चक्र, सेना मेडल स्थिर एवं बेजान से पड़े हुए थे. वे वेंटिलेटर पर थे. बिष्ट उन्हें चुपचाप देखते रहे, जैसे वे उन्हें हर दिन देखते थे. ऐसा लग रहा था कि उनके गले का पिंड भारी हो गया हो.


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डॉक्टर उनके साथ स्पष्ट थे. राठौड़ की स्थिति पहले की अपेक्षा खराब ही थी. अगले बारह घंटे तक भी उन्हें संभालकर रखना बहुत मुश्किल था. डॉक्टर ने बिष्ट से कहा, ‘उनके माँ-बाप के साथ रहिए, उन्हें आपकी जरूरत होगी.’

वह एक लंबी रात होने वाली थी. बिष्ट शीशे से देखते रहे, वे राठौड़ के सुंदर से चेहरे को देख डॉक्टर से विस्तार में बात करते रहे कि कैसे उनके चेहरे का रंग उतर गया है, उनके गालों की हड्डियां पहले की अपेक्षा ज्यादा स्पष्ट सी दिख रही हैं, उनके होंठ पीले और खून रहित से दिख रहे हैं. राठौड़ की आंखें बंद थीं, उनका सिर सफेद पट्ट‍ियों से लिपटा हुआ था और पारदर्शी ट्‍यूबस उनके नाक व मुंह में घुसी हुई थी. उनका बाकी बचा हुआ लंबा, पतला शरीर सफेद चादर में लिपटा हुआ था और कभी-कभार वह चादर शरीर से निकलकर लटक जाया करती थी. वह आदमी अपनी जिंदगी में कभी स्थिर नहीं रहा था. ‘राठौड़, अगर तुम स्वयं को ऐसे देख लो न, तो तुम्हें खुद पर शर्म आने लगेगी. उठो घटिया आदमी, हमें तुम्हें जिंदा देखना है.’ बिष्ट बहुत सोचते रहे और उनकी आंखें आंसुओं से भर गईं.

बिस्तर के दोनों तरफ राठौड़ के माँ-बाप बैठे हुए थे—पतले, सफेद बालों वाले ब्रिगेडियर जी.एस. राठौड़ सेना मेडल, विशिष्ट सेवा मेडल एक तरफ बैठे हुए थे, जो बहुत थके हुए लग रहे थे और वहीं दूसरी ओर बिखरी हुई सी श्रीमती विमला राठौड़ थीं. उन दोनों ने अभय के हाथों को जोर से पकड़ा हुआ था, ऐसा लग रहा था कि ऐसा करके वे उसकी जिंदगी को जकड़कर रखेंगे, क्योंकि सर्जन ने यह कह दिया था कि वह अब किसी भी समय जा सकता है. एक समय तो बिष्ट ने अंदर जाने की सोची, पर फिर खुद को रोक लिया और उन वृद्ध दंपती को उनके निजी समय में परेशान करना ठीक नहीं समझा, जिसमें वे अपने इकलौते बेटे की जिंदगी के आखिरी समय को उसके साथ अकेले बिताएं.

अपनी थकी हुई आंखों पर हाथ फेरते हुए, बिष्ट आईसीयू के बाहर लकड़ी के बेंच पर बैठकर इंतजार करने लगे, उन्होंने अपनी दोनों बाहें मोड़कर उन्हें धीरे से अपने सीने के पास टिका रखी थीं. उन्हें माइग्रेन अटैक का अहसास हो रहा था, इसलिए उन्होंने अपना सिर पीछे की ओर टिका दिया. ऐसा लग रहा था कि वह सख्त लकड़ी उनकी गरदन की गुद्दी को दबा रही थी, वह ऐसी जगह थी, जहां उनके सिर के पीछे के बाल खत्म होते थे और कमीज की कॉलर शुरू होती थी. पिछले कुछ दिनों से वे बमुश्किल ही सो पाए थे. हर बार जब वे आंख बंद करते, उनकी आंखों के सामने राठौड़ के चेहरे की दर्जनों छवियां सामने आ जातीं, जिससे उनकी आंखों की नींद उड़ जाती. पहले तो उन्होंने खुद को इससे अलग करने की कोशिश की, पर जब उन्हें इससे कोई मदद नहीं मिली तो उन्होंने सोचना ही छोड़ दिया. अब वे अपने आते-जाते विचारों को ऐसे देख रहे थे, जैसे कि वे ध्यान में हों. अब अंतर सिर्फ यह रह गया था कि हर बार जब ऐसे विचार आते, ऐसे लगता था कि वह उनकी आत्मा को चाकू से चीरे जा रहे हों, उन्हें भेद रहे हों, और ऐसा लगता था कि वे किसी शारीरिक दर्द से होकर गुजर रहे हों.

उस बार उन्होंने राठौड़ को कश्मीर में देखा था—उसकी ठुड्डी में थोड़े से बाल, चेहरे में दुर्बलता की लकीरें थीं, क्योंकि पैक किए हुए राशन के सहारे उन्होंने कड़क चट्टान पर कई दिन बिताए थे और गिरी हुई बर्फ को खुरच-खुरचकर चाटकर उनका मुंह सूख गया था. मैला-कुचैला मुख अभी भी सुंदर लग रहा था. बिष्ट ने बुझे मन से सोचा और मुसकराने लगे, ‘अबे, मॉडल बनना था ना तुझे, साले फौज में क्यों आ गया मरने.’ राठौड़ एक कड़क चेहरे के सामने कुटिल मुसकान लिये हुए थे, उनकी गहरी आंखें चमक रही थीं और ऐसा लग रहा था कि वे कह रहे हों, ‘जलते हो सर, मेरे सुंदर से चेहरे से मुझे मालूम है.’

रचना बिष्ट रावत की किताब ‘कुछ अनसुनी फौजी कहानियां’

(यह रचना बिष्ट रावत की किताब ‘कुछ अनसुनी फौजी कहानियां’ का अंश है)

(रचना बिष्ट रावत ने पत्रकारिता के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान दिया और लंबे समय तक ‘स्टेट्समैन’, ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ तथा ‘डेक्कन हेराल्ड’ के साथ कार्य किया है)


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