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टिकटॉक.
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मद्रास हाईकोर्ट के निर्देशों का पालन करते हुए गूगल ने भारत में टिक टॉक ऐप को ब्लॉक कर दिया है. गूगल का कहना है कि स्थानीय कानूनों का पालन किया जाएगा. अब गूगल प्ले स्टोर से इसे डाउनलोड नहीं किया जा सकता. गौरतलब है कि 3 अप्रैल को मद्रास हाईकोर्ट ने पोर्नोग्राफी का हवाला देते हुए ऐप्पल और गूगल से इस ऐप को हटाने का निर्देश दिया था. हालांकि, इस फैसले के पीछे किसी रिसर्च या सर्वे का हवाला नहीं दिया गया है. मद्रास हाईकोर्ट के इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती भी दी गई है. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने मद्रास हाईकोर्ट के इस फैसले पर रोक लगाने से इनकार कर दिया है. कहा जा रहा है कि अगली सुनवाई 23 अप्रैल को होनी है.

क्या है चीनी ऐप टिक टॉक और ये आपके जीवन में  कैसे घुस आया

दिल्ली की अनन्या का कहना है, ‘टिक टॉक क्लास का अंतर खत्म कर रहा है. यहां गरीब भी हैं और अमीर भी. लेकिन यहां जमने के लिए मेहनत करनी पड़ती है.’ टिक टॉक एक ऐसा चाइनीज़ एप्लिकेशन है जिसको बैन करने के लिए मद्रास हाईकोर्ट ने सरकार से कहा है. अब ये मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच चुका है. बता दें कि हाल फिलहाल में इस ऐप्लिकेशन को एक बिलियन बार डाउनलोड कर इन्स्टॉल किया जा चुका है. ये वही एप्लिकेशन है जिस पर तमाम भारतीय भी उम्र, जेंडर, सोशल स्टेटस आदि सारे मानकों को तोड़ते हुए वो सारी हरकतें करते हैं जो उन्हें अपने निजी जीवन में हास्यास्पद बना देतीं हैं. अभी कुछ दिनों पहले दिल्ली पुलिस ने नामी बदमाशों के टिक टॉक पर बनाये वीडियोज़ की मदद से उन्हें गिरफ्तार किया था.

ये एक रोचक बात है कि चीन वाट्सऐप, फेसबुक और गूगल जैसी अमेरिकी कंपनियों के जवाब में अपने यहां लोकल प्रोडक्ट विकसित कर चुका है और वही वहां चलता हैं. लेकिन चाइनीज़ एप्लिकेशन टिक टॉक, इंडिया समेत अमेरिका और यूरोप तक में फैल चुका है. सितंबर 2016 में लॉन्च हुआ ये ऐप चीन में डोयीन के नाम से जाना जाता है. 2017 में 17 मिलियन (1 करोड़ सत्तर लाख) और 2018 में 45 मिलियन (4 करोड़ 50 लाख) यूज़र्स से बढ़ते हुए अब 1 बिलियन यूज़र्स (1 अरब) होने का दावा किया जा रहा है.

क्या है टिक टॉक के वीडियोज़ में जो लोगों को दीवाना बना देता है?

मैट्रिक्स फिल्म की तरह टिक टॉक मशीनों की दुनिया में इंसानों के प्रवेश की तरह है. यहां सब कुछ है, फ्री है और वीडियो बनाने के लिए हर तरह की आसान सुविधा है. साउंड खोजना हो, एडिटिंग करनी हो, वीडियो, गाने या कुछ भी खोजना हो सब आसानी से उपलब्ध है. इसके लिए किसी ट्रेनिंग की आवश्यकता नहीं है. आप अपने वीडियोज़ जैसे चाहें बना सकते हैं. वीडियोज़ देखने के लिए टैप करने की ज़रूरत नहीं है. इंस्टाग्राम स्टोरीज़ के वीडियोज़ की तरह ये आयताकार होकर लंबी हैं और इन्हें ऊपरनीचे स्क्रॉल किया जाता है. इसमें फेसबुक या ट्विटर की तरह सोचना नहीं है कि क्या करें, किसको फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजें, क्या देखें क्या देखें, एप्लिकेशन खोलते ही आपको वीडियोज़ का समंदर दिखेगा. जैसे जैसे आप वीडियोज़ देखते जाएंगे, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आपकी रुचि के बारे में जानकारी लेती जाएगी और लगातार वीडियोज़ दिखाती चली जाएगी.


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यही वजह है कि इंडिया से ही बूढ़े, बूढ़ियां, गांव के लोग, मज़दूर, नौकरीपेशा, छात्र या सेलिब्रिटीज़ सब टिक टॉक पर नज़र आते हैं. टीवी पर गंभीर रोल करने वाले लोग टिक टॉक पर छोटे बच्चों की तरह एक्ट करते हैं. यहां तक कि लोगों ने अब अपने छोटे छोटे बच्चों और पालतू पशुओं जैसे कुत्तेबिल्लियों के साथ भी वीडियोज़ बनाना शुरू कर दिया है. एक वीडियो में तो वाकई किसी कम आय वाले वर्कर के घर के लोगफिल्मों के गरीब लोगोंकी तरह एक्ट करकर के खाली पेट पानी पीकर भूख खत्म करने की एक्टिंग कर रहे थे.

टिक टॉक कैसे बन गया सारे एप्लिकेशन्स का सिरमौर?

शॉर्ट वीडियोज़ बनाने का मार्केट चीन में 2011 से ही शुरू हो चुका था. काइशू, मियाओपई, हाओकन शेपिन इत्यादि ऐप्स चीन में अभी भी पॉपुलर हैं जो वीबो (चीन का फेसबुक), बायडू इत्यादि बड़ी कंपनियों द्वारा फंडेड हैं. लेकिन 2016 में .मी नाम का ऐप लॉन्च हुआ जिसका नाम कुछ समय बाद डूयीन कर दिया गया. 2017 में इसके वीडियोज़ की रीच बढ़ने लगी और म्यूज़िकली नाम के ऐप के साथ इसे मर्ज कर दिया गया. इसके बाद ये टिक टॉक के नाम से फेमस हुआ. इसकी पैरेंट कम्पनी का अंग्रेज़ी नाम बाइटडान्स (डूयीन) है.

फिर तो 15 सेकेंड के वीडियोज़ धड़ाधड़ बनने लगे और इसका उपयोग अन्य कामों के लिए भी होने लगा. हैशटैग का प्रचलन यहां भी है और इसकी मदद से तमाम कैंपेन भी टिक टॉक पर चलाये जाते हैं. इन हैशटैग्स का इस्तेमाल कर एडिडास, नाइकी जैसी कंपनियां भी टिक टॉक पर एक तरह से अपना विज्ञापन कर रही हैं. इस ऐप की सबसे खास बात रही कि जैसे जैसे ये प्रचलित हुआ इसने अपनी कमियां दूर कर दीं. इतने सारे वीडियोज़ देखने, बनाने के बावजूद ये जल्दी क्रैश नहीं होता.

टिक टॉक रातों रात किसी को स्टार बना सकता है

ये ऐप्लिकेशन किसी को रातों रात स्टार बना सकता है. आपने एक पंद्रह सेकेंड का वीडियो डाला और अगले दिन आपके मिलियन फॉलोवर बन सकते हैं. खुद टिक टॉक इस बात को खूब प्रचारित करता है. सोशल सेलिब्रिटी बनने की सक्सेस रेट यहां पर बहुत ज़्यादा है. साथ ही आप बड़े सेलिब्रिटीज़ से भी ज़्यादा पॉपुलर हो सकते हैं यहां. अगर आप पशुओं के वीडियो डालें तो पशु प्रेमियों तक पहुंच जाएगी वीडियो. अगर आप गानों पर नाचते हुए या उनका मज़ाक बनाते हुए वीडियो बनायें, तो ऐसा कॉन्टेंट पसंद करनेवाले लोगों तक वीडियो पहुंचेगी.


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ऊपर दिल्ली पुलिस द्वारा नामी बदमाशों को पकड़ने का उदाहरण दिया. ये भी हो सकता है कि दिल्ली पुलिस के लोग भी टिक टॉक पर वीडियोज़ बना रहे हैं. हो सकता है कि मद्रास हाई कोर्ट के जिन जज महोदय ने बैन का प्रस्ताव दिया है, उनका पूरा परिवार टिक टॉक पर वीडियो बना रहा हो. अगर आप मिलेनियल्स की जीवन पद्धति नहीं समझते तो टिक टॉक खूब खराब लगेगा. लेकिन एक बार खुद वीडियोज़ बनाने और देखने लगेंगे तो ये ना छूटने वाली आदत हो जाएगा.

क्या कहते हैं लोग

हमने टिक टॉक पर एक्टिव कुछ यूज़र्स से बात की. दिल्ली की अनन्या का कहना है, ‘टिक टॉक क्लास का अंतर खत्म कर रहा है. यहां गरीब भी है और अमीर भी. लेकिन यहां जमने के लिए मेहनत करनी पड़ती है. अगर अच्छा कंटेंट बनाएंगे तभी आप हिट हैं. टिक टॉक ने टीयर 2 और टीयर 3 शहरों की हाउसवाइफ्स को मिनि सेलिब्रिटी जैसा बना दिया है. या तो वो गाना गा रही हैं या डांस कर रही हैं. अगर ये नहीं तो अपनी रोज़ाना की ज़िंदगी से जुड़ी कुछ न कुछ बात शेयर कर रही हैं. कुछ लोगों ने तो हेल्थ टिप्स देने शुरू किए और देखते ही देखते ऐसे प्रोडक्ट्स बेचने लगे. लोग प्रसिद्ध होने के लिए बहुत मेहनत करते हैं. लोग इस ऐप से इमोशनली भी जुड़ गए हैं. अगर किसी की वीडियो हिट नहीं हो रही हैं तो वो इसी पर वीडियो बनाकर लगा देता है कि उसकी वीडियो हिट क्यों नहीं हो रही हैं. इतने चैलेंजेज़ आते हैं कि एडिक्शन हो जाता है. अभी हाल-फिलहाल में डयूएट चैलेंज में सोफ्ट पोर्न जैसी कैटेगरी भी आ गई है. कभी मेकअप चैलेंज तो कभी नो मेकअप चैलेंज.’


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अनन्या ने विष्णु प्रिया लड़की का उदाहरण देते हुए बताया कि कैसे वो लिप सिंक करते हुए सेलिब्रिटी बन गईं और मीट-अप्स के ज़रिए अपने फैंस से मुलाकात करने लगीं.

वहीं यूपीएससी की तैयारी कर रहे युवराज सिंह का कहना है कि इस ऐप से लोगों में कुंठा की भावना आ रही है. लाइक और शेयर ना होने पर लोग इनस्कोयर महसूस करने लगे हैं. उन्होंने आगे कहा, ‘मैंने हाइवे पर कई लोगों को इस ऐप के चक्कर में स्टंट करते देखा है. इस चक्कर में कई दुर्घनाएं भी हो चुकी हैं. लोग मेट्रो में भी इसकी वीडियो देखते रहते हैं.’

हरियाणा के चरखी दादरी के अशोक का कहना है, ‘फेसबुक और ट्वीटर से ये ऐप अलग और मजेदार तो है लेकिन यहां भी ट्रोलिंग होती है. मैसेजस के ज़रिए. लेकिन मेरा अनुभव ठीक है. कुछ ना कुछ नया सीखने को मिलता है.’

उपरोक्त तीनों ही व्यक्ति दिन में करीब आधे घंटे से लेकर दो घंटे तक टिक टॉक पर एक्टिव रहते हैं. युवराज सिंह कोई वीडियो नहीं बनाते लेकिन अनन्या और अशोक वीडियोज़ बनाते हैं.

अब टिक टॉक लोगों के साथ क्या कर सकता है?

गूगल अर्थ सैटेलाइट द्वारा तस्वीरें लेता है. बाकी ऐप्स जैसे फेसबुक, ट्विटर पर आप अपने विचार, फोटोज़ इत्यादि डालते हैं. लेकिन टिक टॉक की पहुंच लोगों के घर के अंदर तक है. वीडियोज़ बेडरूम, टॉयलेट, छत, कोठरी हर जगह बनाये जा रहे हैं. अगर टिक टॉक चाहे तो किसी देश की जनता का पूरा रहनसहन पता करा सकता है, जनगणना भी करा सकता है. सामाजिकआर्थिक सूचकांक भी निकाल सकता है इन वीडियोज़ के आधार पर.

कुछ समय पहले म्यूज़िकली पर आरोप लगा था कि लोगों का डाटा इनके साथ सुरक्षित नहीं है. फेसबुक, ट्विटर इत्यादि पर भी ये आरोप लगते रहते हैं. तो टिकटॉक भी इन आरोपों से परे नहीं है. इसके पास तो लोगों की ज़रूरत से ज़्यादा जानकारी सामने है. सोचिए कि एक पूरा परिवारदादादादी, पोतापोती सब मिलकर वीडियो बना रहे हैं. इन वीडियोज़ से लोगों के बारे में आसानी से अंदाज़ा लगाया जा सकता है. ऐसी जानकारी लीक हो तो ये क्या क्या करा सकती है, ये समझने में कई साल लगेंगे.


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