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Tuesday, 18 June, 2024
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हिंदी दिवस: क्या बाज़ार ने हिंदी की संवेदना, रचनाशीलता, रचनात्मकता को कम किया है

रिपोर्ट बताती है कि 2021 तक इंटरनेट पर 38 फीसदी तक हिंदी भाषा के उपयोगकर्ता होंगे जो कि बाकी सभी भाषाओं की तुलना में सर्वाधिक है.

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पिछली रात मैंने एक सपना देखा
कि दुनिया के सारे लोग
एक बस में बैठे हैं
और हिंदी बोल रहे हैं

केदारनाथ सिंह कि लिखी ये चंद लाइनें बहुत कुछ कहती हैं. हिंदी को लेकर हमेशा से ही एक बड़ा सामाजिक विमर्श रहा है. पूरे देश में सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा हिंदी ही है. उत्तर भारत के कई राज्यों को हिंदी पट्टी का राज्य भी कहा जाता है लेकिन समय-समय पर हिंदी को लेकर कई सवाल भी खड़े होते रहे हैं. इसकी गुणवत्ता और इस पर आ रहे खतरों पर लगातार सवाल उठते रहे हैं.

विभिन्नताओं से भरे देश भारत में अनेक भाषाएं बोली जाती हैं. सबका अपना महत्व और विस्तार क्षेत्र है. पुरानी कहावतों में कहा भी जाता है कि हर कुछ कोस के बाद वहां की भाषा, बोली और पानी का स्वाद बदल जाता है. सभी भाषाओं का अपना महत्व है. वैसे हिंदी को लेकर एक दौर वह भी था जब कहा जाता था कि हिंदी का पतन हो रहा है, लोग हिंदी में बोलना और पढ़ना पसंद नहीं कर रहे हैं. आज वो दौर है कि अंग्रेजी के शब्दों को हिंदी से जोड़ कर बनाया जा रहा है. यह हिंदी की ताकत नहीं तो और क्या है.

आत्महीनता की शिकार है हिंदी भाषा

हिंदी के जाने-माने कवि मंगलेश डबराल हिंदी की वर्तमान स्थिति पर दिप्रिंट से बातचीत में कहते हैं:

‘इस भाषा पर लगातार बाज़ार का प्रकोप बढ़ता जा रहा है. जिस दौर में हम लोगों ने लिखना-पढ़ना शुरू किया था उस समय हिंदी समाज में बाज़ार का प्रकोप काफी कम था. हिंदी में जिस तरह से बदलाव हुआ है वो काफी उल्लेखनीय है. बाज़ार ने इसकी संवेदना, रचनाशीलता, रचनात्मकता को कम कर दिया है.’

हिंदी को लेकर अकसर कई तरह की बातें कही जाती हैं. माना ये भी जाता है कि हिंदी का पतन हो रहा है, आज का युवा हिंदी नहीं पढ़ना चाहता है. लेकिन हिंदी की गिरती स्थिति पर मनोहर श्याम जोशी पर लिखी किताब ‘पालतू बोहेमियन’ के लेखक और साहित्यकार प्रभात रंजन ने दिप्रिंट से बातचीत में बताया:’विश्वविद्यालयों में अब पहले से ज्यादा बच्चे हिंदी पढ़ने आते हैं. लेकिन उनके भविष्य को लेकर वही स्थिति बनी हुई है जैसी तब थी जब मैं दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ने आया था.’

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हिंदी के पढ़ाने के तरीके पर सवाल करते हुए लेखक प्रभात रंजन कहते हैं:

‘1960-70 के दशक में जैसे इस भाषा को पढ़ाया जाता था वैसे ही अब भी पढ़ाया जाता है. हिंदी को उस तरह से नहीं पढ़ाया जा रहा है जैसी बाज़ार में मांग है.’

हिंदी का विस्तार हो रहा है. कंप्यूटर युग ने हिंदी को खूब प्रचारित-प्रसारित किया है. आज हर मोबाइल में हिंदी टाइपिंग की व्यवस्था है जिसे लोग धड़ल्ले से इस्तेमाल कर रहे हैं. हिंदी को ग्लोबल भाषा बताते हुए मंगलेश डबराल कहते हैं:

‘हिंदी अब ग्लोबल बाज़ार की भाषा बन गई है. अब तो अंग्रेजी के विज्ञापनों में भी हिंदी के शब्दों का इस्तेमाल होने लगा है. इन सबने हिंदी का विस्तार तो किया है लेकिन इस भाषा को काफी नुकसान पहुंचाया है. हिंदी एक जो मानवीय अनुभव की भाषा है, मानवीय संघर्षों की भाषा है, उसका बहुत नुकसान हुआ है. बाजार चूंकि किसी भी मनुष्यता को नहीं मानता. वो अब हिंदी के मूल विचार को भी बाजार में लाना चाहता है.’

वह आगे कहते हैं, ‘हिंदी में इतनी आत्महीनता है कि इसे पहले भी अंग्रेजी का सहारा चाहिए था और अब भी चाहिए. इसे इससे मुक्त नहीं कराया जा सका है. बाज़ार के दौर में हिंदी एकहरी होती जा रही है. हिंदी की जो तमाम परतें थी उन्हें काफी नुकसान पहुंचा है. गंभीर सोच विचार की परंपरा अब हिंदी में काफी कम हो रही है. एक भाषा का काम यह नहीं होता है कि वो बाजार की बन कर रह जाए या बाजार में दुकान खोलकर बैठ जाए. उसका एक बड़ा काम यह भी होता है कि वो हमारे ज्ञान, संवेदना और कल्पना को बचा कर रखें.’

इससे उलट प्रभात रंजन कहते हैं, ‘हिंदी मर नहीं रही है बल्कि हिंदी दिनों दिन विस्तार कर रही है. सबसे अच्छी चीज़ तो हिंदी के साथ यह हुई है कि लोग अब हिंदी बोलने या हिंदी का लेखक कहलाने में शर्म महसूस नहीं करते हैं.’

वह हिंदी ही है जिसे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने हृदय की भाषा कहा था. उनका हिंदी से प्रेम किसी से छुपा नहीं है. हिंदी भाषा के बारे में वो कहते थे:

‘हृदय की कोई भाषा नहीं है, हृदय-हृदय से बातचीत करता है और हिन्दी हृदय की भाषा है. हिंदुस्तान के लिए देवनागरी लिपि का ही व्यवहार होना चाहिए, रोमन लिपि का व्यवहार यहां हो ही नहीं सकता.’ हिन्दी भाषा के लिए मेरा प्रेम सब हिन्दी प्रेमी जानते हैं. हिन्दी भाषा का प्रश्न स्वराज का प्रश्न है. अखिल भारत के परस्पर व्यवहार के लिए ऐसी भाषा की आवश्यकता है जिसे जनता का अधिकतम भाग पहले से ही जानता-समझता है और हिन्दी इस दृष्टि से सर्वश्रेष्ठ है. राष्ट्रीय व्यवहार में हिन्दी को काम में लाना देश की शीघ्र उन्नति के लिए आवश्यक है.’

सूचना क्रांति के बाद की हिंदी

सूचना क्रांति से पहले साहित्यिक क्षेत्र में योगदान देने वालों की संख्या बहुत ही कम थी. गिने-चुने लोग ही साहित्यिक कामों से जुड़े थे. लेकिन सूचना क्रांति के बाद हिंदी के विकास को गति मिली. नए लोग खासकर युवा वर्ग हिंदी लेखन के कार्यों से जुड़ा रहा है, कुछ-ना-कुछ लिख रहा है और इंटरनेट के माध्यम से उसे बहुतों तक पहुंचा रहा है.

‌सूचना क्रांति के बाद से एक बहस तेज होती चली गई है कि- अब नई हिंदी का विकास हो रहा है? क्या वाकई कोई नई हिंदी ने आकार लिया है? इस बात की पड़ताल किए जाने पर पता चलता है कि कुछ नए लेखक, कुछ अनगढ़-अनौपचारिक और अंग्रेजी शब्दों के मेल से बनी अपनी हिंदी को अपनी नई हिंदी बता रहे हैं. उदाहरण के तौर पर आप सत्य व्यास की कुछ साल पहले आई किताब बनारस टॉकीज को ले सकते हैं. किताब में कई जगह अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग किया गया है और साहित्यिक भाषा के बजाय आम-बोलचाल की भाषा का प्रयोग किया गया है.

‌‌2018 आते-आते हिंदी के डिजिटलाइजेशन का स्वरूप व्यापक हुआ है. गूगल से लेकर केपीएमजी इस बात को लेकर आंकड़े पेश कर रहा है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म पर हिंदी का भविष्य बाकी भाषाओं से कहीं ज्यादा उज्जवल है.

हिंदी में आने वाले दिनों में संभावना देखते हुए प्रभात रंजन कहते हैं, ‘अगर हम अधिक से अधिक पेशेवर पैदा कर सकें और उन्हें तकनीक से जोड़ सकें तो हम हिंदी का और भी विस्तार कर सकते हैं. हिंदी को पेशेवर तौर पर देखने की जरूरत है.’

नए लेखकों, साहित्यकारों की जमात तेजी से बढ़ रही है. दिलचस्प है कि इस बीच हिंदी प्रकाशकों की गतिविधियां भी तेजी से बढ़ी है. एक-एक पुस्तक का लोकार्पण सिनेमाई अंदाज़ में होने लगा है.

‌साहित्य दुनिया का जो बिक्री और बाजार का पक्ष कमजोर हो रहा था, अब वह अच्छा होता दिखाई दे रहा है. हिंदी मे समाज विज्ञान, समाजिक विषयों, राजनीति पर गंभीर पुस्तकें कम ही लिखी जाती है. इस कमी को लगातार बड़े पैमाने पर अनुवाद के जरिए पूरा किया जा रहा है. उदाहरण के तौर पर देखा जाए तो ज्यां द्रेज और अमर्त्य सेन की किताब- ‘भारत और उसके विरोधाभास’ इस संदर्भ में एक महत्वपूर्ण अनूदित पुस्तक है जिसमें भारत के आर्थिक-सामाजिक विकास का वर्णन है.

इंटरनेट पर हो रहा है लगातार हिंदी का विस्तार

‌‌हिंदी किताबों का बाजार तेज़ी से बढ़ रहा है. हिंदी में लिखने वाले नए-नए लेखक आ गए हैं, जिनकी किताबें बड़ी तादाद में बिकने लगी है. ‌वास्तव में, इस समय हिंदी में जो नए पाठक आ रहे हैं, वह हिंदी के पारंपरिक पाठकों से भिन्न है. वे आमतौर पर हिंदी में अंग्रेजी जैसा साहित्य पढ़ना चाहते हैं. हिंदी में अलग-अलग विषयों पर मौलिक किताबें ना होने के कारण हाल के दिनों में हिंदी में अनुवाद की अहमियत बढ़ी है.

प्रभात रंजन कहते हैं कि हिंदी को विस्तार देने में सबसे ज्यादा भूमिका प्रकाशकों की है. नए-नए प्रकाशक इस क्षेत्र से जुड़ते जा रहे हैं. वो कहते हैं, ‘राजकमल प्रकाशन हो या हिंदी युग्म हो इन लोगों ने बड़े पैमाने पर लेखक और पाठक तैयार किए हैं. इन्होंने नए लेखन को समर्थन दिया है.’

‌केपीएमजी और गूगल रिपोर्ट में यह देखा गया कि 70 फीसदी से भी ज्यादा भारतीय लोग इंटरनेट पर अपनी-अपनी क्षेत्रीय भाषाओं में सामग्री पाना चाहते हैं. केपीएमजी और गूगल की 2017 में आई साझा रिपोर्ट बताती है कि 2021 तक इंटरनेट पर 38 फीसदी तक हिंदी भाषा के उपयोगकर्ता होंगे जो कि बाकी सभी भाषाओं की तुलना में सर्वाधिक है. मराठी, बंगाली और तमिल भाषा के उपयोगकर्ता क्रमशः 9 फीसदी, 8 फीसदी और 6 फीसदी होंगे.

भारतीय भाषाओं पर अंग्रेजी का संकट

भारतीय भाषाओं पर आए संकट के बारे में मंगलेश डबराल कहते हैं, ‘भारतीय भाषा पर अंग्रेजी का संकट है. हर जगह इसका वर्चस्व बढ़ रहा है. हम मानते थे कि औपनिवेशिक सत्ता खत्म होने के बाद हिंदी एक समृद्ध भाषा के तौर पर सामने आएगी. लेकिन इसका उलट ही हुआ है. हिंदी अभी भी अंग्रेजी का उपनिवेश है. इस बात से कुछ नहीं होता है हिंदी का कि उसे संयुक्त राष्ट्र में बोल दिया जाता है या ओबामा भारत दौरे पर नमस्ते भारत बोल देते हैं. इससे इस भाषा का कल्याण नहीं होगा. जो लोग ऐसा करते हैं उन लोगों का हिंदी के लिए कोई भी योगदान नहीं रहा है. ‘

हिंदी को समृद्ध बनाने के बारे में डबराल कहते हैं, ‘जब तक इसे बाज़ार से नहीं बचाया जाएगा तब तक इसका कुछ नहीं हो सकता. हमें ज्यादा से ज्यादा हिंदी में बोलना चाहिए. जब तक हम सब मिलकर इसे बढ़ाने के लिए काम नहीं करेंगे तब तक इसका नुकसान ही होगा और तब तक भाषा के संकट को लेकर सवाल बना रहेगा.’

लेकिन हिंदी के संकट पर प्रोफेसर प्रभात रंजन के विचार कुछ अलग हैं. वो कहते हैं,

‘अंग्रेजी तो विश्वभाषा है. यह हिंदी के लिए संकट पैदा नहीं कर रही है. संकट अंग्रेज़ियत पैदा कर रही है. जब तक हम अपने बच्चों को हिंदी के प्रति बुनियादी चीजों के नहीं सिखाएंगे तब तक हिंदी पिछड़ती ही जाएगी.’

‌हिंदी भाषा को जन-जन तक पहुंचाने के लिए भारतीय हिंदी सिनेमा जगत का योगदान भी बहुत महत्वपूर्ण है. वर्तमान में सिनेमा जगत ने हिंदी उपन्यासों को सिनेमा के रुपहले पर्दे पर दर्शाना शुरू किया है जिससे हिंदी की दर्शकों तक पहुंच बढ़ी है. जिसे लोग काफी पसंद कर रहे हैं और इससे हिंदी की लोकप्रियता और उसकी पहुंच में भी इजाफा हुआ है.

‌2018 आते-आते डिजिटल लेखन ने एक तेज गति पकड़ी है, जो हिंदी को उसके उचित मुकाम तक पहुंचाने के लिए एक अच्छी शुरुआत कही जा सकती है. लेकिन आने वाले कुछ सालों में यह कैसे प्रगति करता है, यह देखना सभी के लिए दिलचस्प होगा और यही हिंदी के भविष्य को भी तय करेगा.

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