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गिन्नी माही | फेसबुक
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करीब 11 साल पहले जालंधर के एक पंजाबी मेले में गिन्नी माही पहली बार मंच पर लाइव परफॉर्म करने पहुंचीं, तो भीड़ को देखकर वह घबरा गई थीं. तब करीब नौ साल की गिन्नी ने आंखें बंद करके ही ‘सुमिरन बिन गोता खाओगे’ भजन गाया था. लेकिन उन्हें लोगों की इतनी वाहवाही मिली कि उसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा. अपने गानों में अब गिन्नी माही गजब के तेवर और आत्मविश्वास के साथ नज़र आती हैं.

हाल ही में उनके डाउन2अर्थ और डॉलर नामक दो गाने रिलीज़ हुए हैं. इसी महीने रिलीज़ हुए डॉलर को अब तक डेढ़ लाख से ज़्यादा व्यूज़ मिल चुके हैं.

फैन बाबा साहिब दी

गिन्नी माही फिलहाल एचएमवी, जालंधर से वोकल म्यूज़िकल इंस्ट्रुमेंट एंड डांस विषय से बीए कर रही हैं और सात वर्ष से ही संगीत का रियाज़ कर रही हैं. स्कूल में उनका नाम गुरकंवल भारती है. लेकिन बचपन से ही परिवार में उन्हें गिन्नी कहा जाता था और यही उनका प्रोफेशनल नाम बन गया. गिन्नी के मुताबिक, उन्हें पहचान 2016 के ‘फैन बाबा साहिब दी’ गाने से मिली. वे बताती हैं, ‘इस गाने से ही मेरी पहचान पूरी दुनिया में बनी.’

यह गाना बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर पर है, जिसमें उन्हें ‘कौम का मसीहा’ और ‘आवाज़ देने वाला’ बताया गया है. उन्हें ऐसा ‘बब्बर शेर’ बताया गया है, जिन्होंने कलम को ही तीर बना लिया और हक तथा सच के लिए लड़ाई लड़ी. और वाकई गिन्नी माही अंबेडकर की ज़बर्दस्त फैन हैं. वह कहती हैं, ‘मेरा ही उदाहरण लें, तो मैं अगर म्यूज़िक के क्षेत्र में आगे बढ़ पा रही हूं तो यह बाबा साहेब की ही देन है. आज कोई स्त्री राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री से लेकर तमाम पदों पर, तमाम क्षेत्रों में बुलंदी पर पहुंची पा रही हैं, तो यह उन्हीं की देन है.’ ज़ाहिर है, अंबेडकर उनके लिए महज दलित महापुरुष या दलित समुदाय के लिए कार्य करने वाले नायक भर नहीं हैं. वे महिलाओं के लिए भी उतनी ही अहमियत रखते हैं.

गिन्नी माही के पिता राकेश माही के लिए गिन्नी का जन्मदिन भी बेहद खास है. राकेश बताते हैं, ‘गिन्नी का जन्म 26 नवंबर 1998 को हुआ था. 26 नवंबर हमारे लिए इसलिए खास है, क्योंकि इसी दिन बाबा साहेब आंबेडकर ने संविधान तैयार करके सौंप दिया था.’ ज़ाहिर है, गिन्नी को अंबेडकर या अपने समाज से जुड़ी चेतना परिवार से ही मिली है. जालंधर के मॉडल टाउन के पास आबादपुरा में स्थित उनके घर में प्रवेश करते ही संत रविदास और बाबा साहेब की तस्वीरें दिख जाती हैं. यही पर गिन्नी माही को विभिन्न समारोहों-संस्थानों में मिले अवार्ड भी नज़र आ जाते हैं.

सॉन्ग ऑफ प्राइड

जालंधर में जिस इलाके में गिन्नी माही का घर है, वहां रविदासिया समुदाय के लोग काफी संख्या में रहते हैं. पंजाब में रविदास डेरों की सामाजिक आंदोलनों में बड़ी भूमिका रही है और पहले इनमें संत रविदास के लिखे पद को डीवीडी-सीडी वगैरह के ज़रिये लोगों के बीच फैलाया जाता था. लेकिन यू-ट्यूब और सोशल मीडिया के आगमन के बाद पूरा परिदृश्य ही बदल गया. पिछले पांच-छह साल में यू-ट्यूब पर रविदास, अंबेडकर या फिर चमार समुदाय को लेकर बने गीतों की भरमार आ गई है.

गिन्नी माही इनमें सबसे फ्रेश और बेहद लोकप्रिय शख्सियत हैं. 2016 में इनके डेंजर चमार-2 गाने ने भी काफी सुर्खियां बटोरी थी. इसे अब तक करीब 32 लाख व्यूज़ मिल चुके हैं. इस गाने में ‘हुंदे असे तो बध डेंजर चमार’ यानी चमार समुदाय को ‘हथियारों से भी डेंजर’ बताया गया है. इसी तरह उनके ‘हक’ गाने में प्रेरणा दी गई है कि ‘हक के लिए लड़ना बाबा साहेब सिखा गए हैं.’ ज़ाहिर है, जिस जातीय पहचान को ज़ाहिर करने में कभी झिझक और शर्म माना जाता था, वही आज इन गीतों के ज़रिए पूरे प्राइड के साथ उभरती है.

हालांकि, पंजाब में दलित समुदाय में प्रतिरोध की पूरी परंपरा रही है, लेकिन इन गीतों में यह प्राइड नए तेवर और नए सौंदर्यशास्त्र के साथ सामने आया है. मसलन, डेंजर चमार गाने को ही लीजिए. इसमें हथियारों से तुलना, वीडियो में बॉडी बिल्डर युवा, जलती आग, धातुओं के सामान आदि नया सौंदर्यशास्त्र रचते हैं. शायद यही वजह है कि दलित-पिछड़े युवाओं में गिन्नी माही के गाने काफी लोकप्रिय हैं.

दलित अस्मिता में आए इस बदलाव के बारे में गिन्नी कहती हैं, ‘समय के साथ-साथ बदलाव आ रहा है. एजुकेशन ने बहुत कुछ बदला है. इससे उनमें समझदारी आई है और वे गौरव महसूस करते हैं. गर्व करना भी चाहिए. हां, बस यही है कि समानता की बात होनी चाहिए, और कुछ नहीं.’ उनका कहना है, ‘जब लोग एक-दूसरे को एक समान मानेंगे तभी जाति व्यवस्था खत्म होगी, लेकिन लोगों को विभिन्न जातियों में बांट कर देखेंगे तो यह खत्म नहीं होगी.’

यही वह जज़्बा और उत्साह है कि उन्होंने पंजाबी सिंगर्स में एक अलग पहचान बनाई है और देश-विदेश में विभिन्न समारोहों तथा लाइव कंसर्ट में उन्हें बुलाया जाता है. पिछले साल ही जर्मनी में आयोजित ग्लोबल मीडिया फोरम में परफॉर्म करने वाली वे संभवतः सबसे कम उम्र की शख्सियत थीं. गिन्नी के मुताबिक, इतनी कम उम्र में उनकी इस शानदार कामयाबी में उनके माता-पिता का बड़ा योगदान है. गिन्नी के कंसर्ट वगैरह में राकेश को ही अक्सर उनके साथ जाना पड़ता है. इसके लिए राकेश ने अपनी टिकटिंग का जॉब भी छोड़ दिया. राकेश बताते हैं, ‘यहां रात हो या दिन लगातार गिन्नी के कंसर्ट के लिए मुझे फोन अटेंड करने पड़ते हैंत, क्योंकि कई फोन विदेशों से भी आते हैं.’

गिन्नी माही सिर्फ अपने गानों में ही नहीं, बल्कि असल ज़िंदगी और सोशल मीडिया पर भी दलित अस्मिता से जुड़े नायकों को स्मरण करना नहीं भूलतीं. हाल ही में 7 फरवरी को बाबा साहेब की पत्नी रमाबाई अंबेडकर के जन्मदिन के अवसर पर गिन्नी फेसबुक पर उन्हें याद करते हुए पोस्ट लिखा. वहीं 17 जनवरी को रोहित वेमुला को श्रद्धांजलि देते हुए उन्होंने लिखा, ‘रोहित वेमुला तेरी कुर्बानी, इतिहास के उन पन्नों में दर्ज है जो हम कभी भुला नहीं सकते.’ इसी तरह टीना डाबी के आईएएस की ट्रेनिंग में भी टॉप करने पर वह खुशी जताना नहीं भूलतीं. फेसबुक पर उन्हें साढ़े चार लाख से भी ज़्यादा लोग फॉलो करते हैं. गिन्नी समाज की अन्य समस्याओं के बारे में भी बात करती हैं. मसलन पंजाब में नशे की समस्या की ओर इशारा करते हुए वह कहती हैं, ‘मैं हर समारोह में यही संदेश देती हूं कि आज का युवा नशे के चंगुल में न फंसे और ज़्यादा से ज़्यादा एजुकेशन पर ध्यान दे. एक चपाती कम कर लो, लेकिन अपने बच्चों को पढ़ाएं.’

किसी टैग में नहीं बंधी

गिन्नी को भले ही बहुत सारे लोग दलित अस्मिता के प्रतीक के तौर पर देखते हैं, लेकिन गिन्नी बस यहीं तक सीमित नहीं है. सच कहा जाए तो वे किसी टैग में नहीं बंधी हैं. जिस खूबसूरती के साथ वह रविदास-अंबेडकर पर आधारित गीत गाती हैं, वैसे ही दिलकश तरीके से वे हिंदी बॉलीवुड गीत भी गाकर लोगों को मंत्रमुग्ध कर देती हैं. यही वजह है कि कई समारोहों में उनसे बॉलीवुड गीतों की फरमाइश होती है. गिन्नी खुद भी हर तरह के गीत गाना पसंद करती हैं. उनके पसंदीदा गायकों में नुसरत फतेह अली खां भी शामिल हैं. गिन्नी कहती हैं, ‘कलाकार की कोई जाति नहीं होती, मेरे लिए सभी एक समान हैं. मुझे हर तरह के फैन्स का भरपूर प्यार और सम्मान मिलता है.’

2015 से लेकर अब तक उनके तकरीबन 40 गाने और चार एलबम रिलीज़ हो चुके हैं. उनके एलबम में गुरुन दी दीवानी (2015), गुरपुरब है कांशी वाले दा (2016) और ढोल वाजदा संगतन दे वेहरे (2017) शामिल है. इसके अलावा उन्होंने ‘सूट पटियाला’ और ‘हॉलीडेज़’ जैसे गीत भी गाए हैं. हाल ही में 2 फरवरी को रिलीज हुए ‘डॉलर’ गाने के बारे में वह बताती हैं, ‘इसमें पंजाबियों की बात की गई है, जो विदेशों में जाकर अपनी सेवाओं देते हैं और नाम कमाते हैं. वे अपने परिवार-समाज के लिए योगदान देते हैं. उन्हीं की प्राइड के बारे में इसमें बात की गई है.’ यही वजह है कि इस गाने का नाम ‘डॉलर’ रखा गया है. ज़ाहिर है, गिन्नी माही किसी खास खांचे में नहीं बंधी है.

उनका भी ख्वाब बॉलीवुड प्लेबैक सिंगर बनने का है. इस बारे में पूछने पर वह कहती हैं, ‘क्यों नहीं, ज़रूर! मेरा भी सपना बॉलीवुड में सिंगर बनने का है. मेरे नाम के चर्चे तो हैं. इंशाअल्लाह! जल्द ही मौका मिल सकता है. मुझे उम्मीद तो है.’

(लेखक जामिया मिल्लिया इस्लामिया से मॉस कम्युनिकेशन में पीएचडी कर रहे हैं)


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