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आज जब हमारे भारत में महिला सुरक्षा एक बड़ा मुद्दा बना हुआ है, जब महिलाएं घर के बाहर तो क्या अंदर भी सुरक्षित नहीं हैं. ऐसे देश में महिलाओं की वीरगाथा का इतिहास रहा है. इस देश में सिर्फ रानी झांसी ही अकेली मर्दाना नहीं थी जिसने अंग्रेजों के दांत खट्टे किए बल्कि इसी देश में एक ऐसी रानी भी थी जिसे परिवार वालों ने त्याग दिया, लेकिन उसकी चतुरबुद्धि के आगे अच्छे-अच्छों को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया है.

आप जब यह सोच रहे हैं कि महिलाएं कमजोर हैं उनकी सुरक्षा राजनीतिक पार्टियों के मैनिफेस्टो में एक कोना तलाश रही हैं और पिछले एक दशक से भी अधिक समय से संसद में 33 फीसदी आरक्षण तक नहीं मिल पा रही हैं और महिलाओं का अधिकार जब महज एक्टिविज्म में दिखता है ऐसे ही देश की एक लंगड़ी रानी जिसने अपने लंगड़ेपन को कमजोरी नहीं मजबूती बनाया, देश पर राज किया और महमूद गज़नवी जैसे लुटेरे को एक बार नहीं बल्कि दो-दो बार देश से खदेड़ दिया. ऐसी वीरांगना थी कश्मीर की रानी दिद्दा. जिसके बारे में न तो बहुत कुछ पढ़ा गया है और न हीं कुछ सुना ही गया है.

45000 के आगे 500 सैनिकों के साथ पहुंची और 45 मिनट में पासा पलट दिया

दिद्दा इतनी तीक्ष्णबुद्दि थी कि वह चंद मिनटों में बाजी पलट दिया करती थी. आज जिस सेना के कमांडो और गुरिल्ला वार फेयर पर दुनिया चालाकी की जंग लड़ती है वह इसी लंगड़ी रानी की देन है. चुड़ैल लंगड़ी रानी के इतिहास को खंगालने पर पता चलता है कि इसने 35000 सेना की टुकड़ी के सामने 500 की छोटी सी सेना के साथ पहुंची और 45 मिनट में युद्ध जीत लिया. यह वही महान नायिका है जिसके पति ने अपने नाम के आगे पत्नी दिद्दा का नाम लगाया और दिद्क सेनगुप्ता के नाम से जाना गया.

हमारा देश महानायकों का देश है लेकिन इसी देश में महिला महानायक है दिद्दा. कश्मीर की रानी. जिसे इतिहास के पन्नों में चुड़ैल रानी का दर्जा दिया गया क्योंकि उसकी दिमागी ताकत के आगे अच्छे-अच्छे राजा नतमस्तक रहे थे. जब राजा महाराजा हार जाते तो अपनी मर्दानगी छुपाने के लिए दिद्दा को चुड़ैल कहना शुरू किया और फिर दिद्दा चुड़ैल रानी के नाम से प्रसिद्ध हुई. जब दिद्दा के पति सेनगुप्ता की मृत्यु हुई तो सत्ता हासिल करने के लिए दुश्मनों ने उसे सती प्रथा का हवाला दिया और सती करने के लिए दिद्दा से कहा गया. लेकिन उसने पूरी चाल बदल दी और सेनगुप्ता की पहली पत्नी को सती करवा दिया और अपनी शर्तों के बल पर राजगद्दी हासिल की और 50 वर्षों तक शासन किया.

यह वही दिद्दा हैं जिनकी कहानियां भले ही इतिहास के पन्नों में धुंधली हैं लेकिन लेखक आशीष कॉल ‘दिद्दा द वैरियर क्वीन ऑफ कश्मीर’ के बहाने इसे जीवंत कर दिया है और भारतीयों को बार-बार गर्व करने का मौका दिया है. इस किताब ने कश्मीर कि रानी दिद्दा के रूप में वो महानायिका दी है कि जिसने अपनी शर्तों पर अपने बनाये नियमों के अनुरूप पुरुषवादी पितृसत्तात्मक इस समाज को न सिर्फ चुनौती दी बल्कि कई मौकों पर ठेंगा भी दिखाया .

किताब को पढ़ने वाला खुद से ये सवाल करता जान पड़ता है कि ऐसी करिश्माई महिला के हाथ शासन की बागडोर रही तो उसका ज़िक्र इतना धुंधला क्यों रहा कि किसी को दिखा ही नहीं? निश्चय ही पितृसत्तात्मक इस समाज ने उस वीरांगना से मौके मौके पर मिली हार के बदले में उसकी वीरता की गाथा ही इतिहास से इस कदर ओझल कर दी कि वो सिर्फ एक चुड़ैल रानी ही बन कर कहीं गुम हो गयी.

कौन थी दिद्दा

लोहार राजवंश (आज का हरियाणा, पंजाब ,पुंज राजोरी जिसका भाग था) में जन्मी एक खूबसूरत नन्ही बच्ची को उसके माँ बाप सिर्फ इसलिए त्याग देते हैं कि वो अपंग पैदा हुई . नौकरानी का दूध पीकर पली बढ़ी वो लड़की अपने अपंग होने को बाधा न मानते हुए वो युद्ध कला में पारंगत हुई और तरह तरह के खेलों में निपुणता हासिल की . एक दिन आखेट के दौरान कश्मीर के राजा क्षेमगुप्त ने जब उस खूबसूरत राजकुमारी दिद्दा को देखा तो पहली ही नज़र में दिल दे बैठा. ये जान लेने के बाद भी कि दिद्दा लंगड़ी है , राजा क्षेमगुप्त ने उस से ब्याह रचाया और दिद्दा की किस्मत एक तरह से पलटी खा गयी. उसे पति का प्यार , मान सम्मान , पुत्र रत्न तो मिला ही , साथ ही उसने क्षेमगुप्त के राज काज में भी भागीदारी निभानी शुरू कर दी. इस भागीदारी के सम्मान में अपनी पत्नी के नाम पर सिक्का जारी किया . वो ऐसा पहला राजा बना जो अपनी पत्नी के नाम से जाना गया .

एक दिन आखेट के दौरान सेनगुप्त की मृत्यु होते ही दिद्दा की ज़िन्दगी उस दौराहे पर खड़ी थी जहाँ एक तरफ पति कि मृत्यु का दुःख और सती हो जाने की परंपरा थी और दूसरी तरफ एक नन्हे राजकुमार के राज पाठ संभालने लायक होने तक उसके पालन पोषण और शिक्षा दीक्षा की ज़िम्मेदारी निभाने वाली माँ का दायित्व . मरते राजा को राज्य सुरक्षित हाथों में देने का प्रण उसे यकायक वो शक्ति दे जाता है कि जिसके चलते वो सती होने से मन कर देती है. दिलचस्प है पढ़ना कि कैसे समय समय पर दिद्दा ने पुरुष सत्तात्मक समाज के बने बनाए नियम तोड़े और अपने खुद के नियम बनाए.

कहानी दिद्दा की वो जीवन यात्रा है जो एक अनचाही अपंग कन्या से शुरू होकर , कश्मीर के राजा की बीवी बनने और फिर विधवा होने के बाद राज्य संभालने ,कई युद्ध करने और युद्ध जीतने के लिए गुरिल्ला तकनीक इजात करने के प्रसंग से होती हुई उस दिलचस्प मोड़ से गुज़रती है जहां संभवतः विश्व कि प्रथम कमांडो सेना , एकांगी सेना के बनने का घटनाक्रम वर्णित है. तो वहीं जिस बेटे के लिए जीवित रही उसके ही द्वारा महल से निकाले जाना , जनता से जुड़ाव जारी रखना , मंदिरों का निर्माण , सारे एशिया के साथ व्यापार और ईरान तक फैले अखंड भारत की सीमाओं की रक्षा के लिए रणनीति निर्माण जैसे सन्दर्भ आपको इतिहास के उस दौर में ले जाते हैं जिसकी बात अक्सर होती ही नहीं है.

इस सबके बीच उस खूंखार मेहमूद गज़नवी का भी ज़िक्र आता है जिसके हिन्दुस्तान में प्रवेश करने के बाद जो विध्वंस हुआ उसका अपना एक लम्बा इतिहास है . इस किताब में मेहमूद गज़नी के ज़िक्र का प्रसंग एक ऐसा प्रसंग है जिस से लोग अनभिज्ञ हैं . सोमनाथ का मंदिर लूटने वाले और कई शहरों को तहस नहस करने वाले गजनी को दिद्दा ने अपनी रणनीति से एक नहीं दो दो बार भारत में घुसने से रोका और युद्ध में हराया , जिसके बाद उसने रास्ता बदला और गुजरात के रास्ते भारत में प्रवेश किया.

दिलचस्प है दिद्दा का अपने वारिस को चुनने का तरीका

एक के बाद एक कई युद्धों के प्रसंगों के बाद दिलचस्प है दिद्दा का अपने वारिस को चुनने का तरीका . एक सशक्त राज्य एक काबिल शासक के हाथों में जाए ये सुनिश्चित करने के लिए भी दिद्दा का अपना ही तरीका था. अपने भांजों के बीच उसने एक अनूठी प्रतियोगिता रखी कि जो सबसे ज़्यादा सेब एक बार में अपने हाथों में समेटकर ले आएगा वो उसे ही सत्ता की बागडोर सोंम्प देगी. साफ़ है कि दिद्दा का वो अपना तरीका था पराक्रम और बुद्धि के सही संतुलन को आंकने का .
कहानी के उतार चढ़ावों के बीच आशीष कॉल की ये किताब बार बार पाठक को कचोट जाती है कि एक ऐसी वीरांगना जिसने अखंड भारत की सीमाओं को न सिर्फ बचाया बल्कि जनता को एक अच्छा राज्य भी दिया, उसके बारे में पहले क्यों नहीं सुना या पढ़ा गया?

‘राजा विक्रमादित्य के बाद ज़मीन और शासकों को जोड़कर एक अखंड साम्राज्य पर राज्य करने वाली उस अभूतपूर्व रानी की पूरी कहानी जानने का दावा कोई नहीं कर सकता. पर, इसे पढ़ने, के बाद ऐसा लगता है कि इस कहानी के माध्यम से लेखक ने जानकारियों के उलब्ध टुकड़ों को जोड़कर शौर्य बहादुर वीरांगना रानी दिद्दा की कहानी लोगों तक पहुंचाने की एक कोशिश की है. सच पूछिए तो रानी दिद्दा की कहानी आज के जमाने में और समसामयिक तब और हो जाती है ,जब बहुत-सी महिलाएं अपने संघर्षों भरी यात्रा के बाद सत्ता और ऊंचे पदों पर न सिर्फ बैठ रही हैं, बल्कि अपनी काबलियत से दुनियां को चौंका रही हैं. बिलकुल वैसे ही, जैसे 1200 साल पहले रानी दिद्दा ने किया था.

(यह किताब रूपा पब्लिकेशन ने प्रकाशित की है और आशीष कौल इसके लेखक हैं )


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