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Sunday, 15 February, 2026
होमसमाज-संस्कृतिएक कफन का वादा जो वक्त पर पूरा न हुआ और बन गया जिंदगी भर का पछतावा

एक कफन का वादा जो वक्त पर पूरा न हुआ और बन गया जिंदगी भर का पछतावा

हज पर जाने के लिए उनके पास सिर्फ़ एक हफ़्ता बचा था और उन्हें कई रिश्तेदारों से मिलना था. दोनों मियां-बीवी ने दूर-दराज के शहरों में रहने वालों से फ़ोन पर संपर्क किया और उनसे सीधे या परोक्ष रूप से की गई किसी भी ग़लती के लिए माफ़ी मांगी.

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कफ़न

जब वह सुबह की नमाज़ के लिए वक़्त पर बिस्तर से नहीं उठ पाती थी, तो शाज़िया अपने हाई ब्लड प्रेशर को इल्ज़ाम देती थी. उसने यह कहने की आदत डाल ली थी, “अरे, ये गोलियों की वजह से मुझे सुकून ही नहीं है.”

लेकिन उसकी मां कहती थीं, “यह सब शैतान का खेल है. सुबह वो शैतान आता है, तेरे पैर दबाता है, कंबल ओढ़ाता है और थपथपाकर सुला देता है, और तुझे नमाज़ पढ़ने से रोकता है. तुम्हें उसे लात मारकर भगा देना चाहिए और सही वक़्त पर उठने की आदत डालनी चाहिए.” लेकिन शैतान का उसका निजी नौकर होना और उसके पैर दबाना शाज़िया को रोमांटिक लगता था. इसका मज़ा लेते हुए वह उसे एक-दो बार लात मारने का नाटक करती थी. देर से उठना और इसके लिए शैतान को ज़िम्मेदार ठहराना उसकी आदत बन चुकी थी.

उस दिन भी वह गहरी नींद में सो रही थी. सुबह की नमाज़ का वक़्त बीत चुका था. लेकिन किसी तरह अचानक उसकी नींद खुल गई. लेटे-लेटे ही उसने एक-दो पल ख़ुद को परखा. उसे समझ ही नहीं आया कि वह कहां सो रही है. जब उसने हाथ बढ़ाया तो उसे अपने शौहर का छूना महसूस हुआ. फिर जब उसे अंदाज़ा हुआ कि उसका सिर अपने ही तकिए पर है और उसने अपने जिस्म पर अपना ही परदेसी कंबल ओढ़ा हुआ है, तो उसे यकीन आ गया कि वह अपने ही कमरे में, अपने ही घर में सो रही है. बस एक बात, यानी, आंख खोलते ही ये एहसास होना कि वह अपने ही माहौल में है, उसे ख़ुशी और सुकून दिया.

लेकिन ख़ुशी ज़्यादा देर टिकी नहीं. उसे महसूस हुआ कि बाहर कोई रो रहा है. जैसे ही वह आहिस्ता से उठी और दरवाज़े के क़रीब पहुंची, उसने अपने बेटे फ़रमान को किसी से बात करते हुए सुना. जब वह जल्दी से अपने कमरे से बाहर आकर सामने वाले बरामदे में आई तो अल्ताफ़ परेशान खड़ा था. फ़रमान उसे तसल्ली देते हुए कह रहा था, “जो होना था सो हो गया. ये सब किसी के बस में नहीं. फ़िक्र मत करो, घर जाओ. अम्मी के उठते ही मैं सारा सामान तुम्हारे घर पहुंचा दूंगा. वो अभी सो रही हैं, उन्हें जगाना ठीक नहीं. उनकी तबियत भी ठीक नहीं है. डॉक्टर ने उन्हें बहुत आराम करने को कहा है.”

“लेकिन भैया, जमात ने तय किया है कि दफ़न आज शाम पांच बजे होगा. बाहर से कोई आनेवाला नहीं है. इसलिए गुस्ल (जिस्म को नहलाना) और बाकी रस्में जल्दी से निपटा लेनी चाहिए,” अल्ताफ़ बार-बार यही दोहराता रहा. फ़रमान ने अपना आपा खोते हुए कहा, “देखो, तुमने मुझे कोई कफ़न नहीं दिया है. अम्मी को हज से लौटे छह-सात साल हो गए हैं. इतने साल हो गए, यासीन बुआ ने अम्मी से अपना कफ़न क्यों नहीं लिया? या शायद उन्होंने लेकर कहीं रख लिया होगा. एक बार पूरे घर में तलाश कर लो.”

शाज़िया, जो उसके पीछे आकर खड़ी थी, चौंक गई. “यहां क्या हो रहा है?” उसने तुरंत अपने बेटे को पुकारा. “फ़रमान बेटा, किससे बात कर रहे हो?” फ़रमान अपनी मां की ओर मुड़कर देखा, उसके चेहरे पर बेचैनी साफ़ झलक रही थी. वह अपनी मां को काफ़ी देर तक देखता रहा. उसने मन ही मन सोचा, “ये औरतें खा-पीकर चुप नहीं बैठ सकतीं और अपने काम से काम नहीं रख सकतीं. कुछ न कुछ सिरदर्द लेती रहती हैं, वरना लगता है जैसे इनका खाना हज़म नहीं होगा.” लेकिन उसने अपनी नाराज़गी ज़ाहिर नहीं की, बल्कि कहा, “तुम जाकर सो जाओ अम्मी. तुम उठकर क्यों आईं? यहां अल्ताफ़ आया है. कहता है कि वह यासीन बुआ का बेटा है; किसी कफ़न के बारे में पूछ रहा है.”

उसे लगा मानो हज़ारों बिजलियां एक साथ उस पर गिर पड़ी हों. वह घबराकर चार क़दम आगे बढ़ीन और युवक की तरफ़ सवालिया निगाहों से देखा और गुस्से में मिली आवाज़ में पूछा, “सुबह-सुबह ये क्या हंगामा कर रहे हो? कफ़न कहां भागा जा रहा है? क्या तुम्हें इतना भी नहीं पता कि कब, किसके घर जाना है?” उन्हें साफ़ ज़ाहिर हो गया कि फ़रमान को ये सब पसंद नहीं आ रहा था. अल्ताफ़ ने अपनी आवाज़ बहुत धीमी कर ली, परेशानी भरे अंदाज़ में उन्हें देखते हुए कहा, “चाची, आज सुबह नमाज़ के वक़्त अम्मी का इंतक़ाल हो गया. इसलिए मैं कफ़न लेने आया हूं.” यह ख़बर सुनते ही शाज़िया अंदर से टूट गईं. ख़ुद को संभाल न पाने की वजह से वह पास की कुर्सी पर धड़ाम से बैठ गईं. उनके साथ एक ऐसी घटना घटी थी जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती थी. अब इसका सामना कैसे करें? इसे कैसे ठीक करें? ये विचार उसके नियंत्रण में नहीं रह गए थे. वह गहरे सदमे में थीं. “हे अल्लाह, ये क्या हो गया,” उन्होंने ग़म में डूबे स्वर में कहा.

वह न चाहते हुए भी उसे पुराने दिन याद आ गए. उस दिन उसके घर पर एक समारोह चल रहा था. उसमें उसके रिश्तेदारों और क़रीबी दोस्तों सहित बहुत बड़ी भीड़ जमा थी. शाज़िया और उसके शौहर सुभान दोनों ही हज पर जा रहे थे. वे अपने ज़्यादातर ख़ास दोस्तों और रिश्तेदारों के घर ख़ुद गए थे, उन्हें अपनी यात्रा के बारे में बताया, एक-दूसरे से गले मिले और उनसे कहा कि “अपनी कही-सुनी माफ़ कर दें, यानी वे सारी बुरी बातें भूल जाएँ जो उन्होंने उनके बारे में कही हों और जो बुरी बातें उन्होंने उनकी पीठ पीछे सुनी हों, और जो ग़लतियां उन्होंने की हों, उन्हें माफ़ कर दें.” रिश्तेदारों ने जोड़े के लिए दावतें भी रखी थीं, उन्हें जो भी कपड़े और तोहफ़े दे सकते थे, दिए, उन्हें माफ़ी का यक़ीन दिलाया और गुज़ारिश की कि शाज़िया और सुभान भी उनकी सभी ग़लतियों को माफ़ कर दें, और हल्के-फुल्के अंदाज़ में एक-दूसरे से रुख़सत हुए, यह महसूस करते हुए कि वे अपने पापों से मुक्त हो गए हैं.

हज पर जाने के लिए उनके पास सिर्फ़ एक हफ़्ता बचा था और उन्हें कई रिश्तेदारों से मिलना था. दोनों मियां-बीवी ने दूर-दराज के शहरों में रहने वालों से फ़ोन पर संपर्क किया और उनसे सीधे या परोक्ष रूप से की गई किसी भी ग़लती के लिए माफ़ी मांगी. सुभान जो एक बड़े व्यवसाय के मालिक थे और शाज़िया जो एक अमीर और आलीशान बंगले की मालकिन थीं, उनके पास सभी रिश्तेदारों और दोस्तों से ख़ुद मिलने जाने का वक़्त नहीं था. इसलिए उन्होंने सभी को एक जगह जमा करने के लिए एक दावत का इंतज़ाम किया था. मेहमानों के बीच एक-दूसरे से माफ़ी मांगने की रस्म वहां भी जारी रही.

फिर किसी बुलावा या गुज़ारिश के बग़ैर, किसी घमंड के बग़ैर, किसी ग़ुस्से या इल्ज़ाम के बग़ैर वहां जो आईं थीं वह यासीन बुआ थीं. उनके शौहर ने शादी के तीन साल के अंदर ही उन्हें दो बच्चे दे दिए थे और फिर पीछे मुड़कर देखे बिना ही चले गए थे. वह एपीएमसी यार्ड में लोडर का काम करते थे और एक दिन बोझ ढोते वक़्त दिल का दौरा पड़ने से उनकी मौत हो गई. उन्होंने अपने पति की मृत्यु के बाद मनाए जाने वाले इद्दत के वक़्त का भी पालन नहीं किया. उस वक़्त वह जवान थीं, उन्होंने सिर पर दुपट्टा बांधा और कई घरों के बर्तन धोने, झाड़ू लगाने और सफ़ाई करने लगीं, शादियों, त्योहारों, तक़रीबों, सालगिरहों के बीच अकेली रहती थीं और अपने छोटे बच्चों का पेट भरने के लिए इन घरों में होने वाले ऐसे आयोजनों की अफरा-तफरी और ख़ुशियों को झेलती रहती थीं. इद्दत के दौरान वह अपने शौहर के लिए दुआ करने और ग़म मनाने के लिए कमरे में सिर ढंक कर नहीं बैठीं. इद्दत का पालन न करने के लिए भी उनके बारे में लोगों ने खूब बुरा-भला कहा. लेकिन कीचड़ उछालने के बावजूद, उनके लिए अपने बच्चों की ज़रूरतें और भूखे पेट ज़्यादा अहम थे. उनकी मेहनत की बदौलत उनके बच्चों ने अपनी ज़िंदगी संवार ली. थोड़ी-बहुत पढ़ाई करके उनकी बेटी ने लड़कियों को क़ुरान पढ़ाया और कुछ रुपए कमाए. यासीन बुआ ने जो पैसे बचाए थे, उसमें से जोड़े, अपनी बेटी की शादी की और अपने ऑटो ड्राइवर बेटे के साथ रहने लगीं. जैसे-जैसे उनकी उम्र बढ़ती गई, उनकी हड्डियां कमज़ोर पड़ने लगीं और जब उनके हाथों की नसें फूलने लगीं और उनकी ताक़त घटने लगी, तो उन्होंने दूसरों के घरों में काम करना कम कर दिया.

उनकी सबसे बड़ी ख़्वाहिश थी अपने बेटे की शादी करवाना. लेकिन उससे भी बड़ी एक और आरज़ू ने उनके दिल, जिस्म और दिमाग़ को जकड़ लिया था; दिन भर वह ख्वाहिशों की आग में उलझी रहती थीं. पैसे बचाना और उन्हें संभाल कर रखना उनकी कंजूसी की निशानी नहीं थी, बल्कि, यह असुरक्षा की निशानी थी. जब उन्होंने अपने बेटे की शादी के लिए जमा की गई पोटली में से अपने लिए कफ़न ख़रीदने के लिए थोड़े पैसे निकाले, तो उन्हें लगा जैसे उन्होंने किसी और से चुराए हों. वह अपने गुनाह के एहसास से निकल नहीं पाईं, वह बेचैन हो गईं और तीन दिन तक उन पैसों को अपनी पल्लू में बांधकर महफ़ूज़ रखती रहीं. लेकिन उनकी ममता उनकी अदम्य निजी इच्छा के सामने झुक गई. अपनी बात मनवाने की एक अजीब-सी ज़िद ने यासीन बुआ के जोश को दोगुना कर दिया. अपने दाहिने हाथ में पल्लू की गाँठ को मजबूती से पकड़े हुए, वह नए जोश और पक्के इरादे के साथ तेजी से शाज़िया के घर की तरफ़ चल पड़ीं. शाज़िया के घर में एक बहुत बड़ी दावत थी, बहुत सारे लोग थे, तोहफ़े, जश्न चल रहा था.

उन्हें कोई दावत नहीं मिली थी. उसका स्वागत करने वाला कोई नहीं था, जो कहे, “अरे, तुम आ गईं!” न ही कोई था जो कहे, “आओ, खाना खा लो”. उन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी में कभी नहीं जाना था कि मेहमान नवाज़ी क्या होती है. उन्हें बेइज़्ज़ती का कोई एहसास नहीं था. उन्होंने जितना हो सकता था उतना काम किया. चीनी मिट्टी के बर्तन धोते-धोते उनके हाथ थक गए. बिरयानी की चिकनाई भला अब इतनी आसानी से कैसे घुलती है? सबके खाने के बाद, वह कंक्रीट के फ़र्श पर बैठ गईं और चार निवाले मुँह में डाले. उनकी पूरी निगाह शाज़िया पर थी. “शाज़िया ख़ुशक़िस्मत है, ख़ुशक़िस्मत है” उन्होंने ख़ुद से दोहराया. वह सब्र से शाज़िया की हरकतों को देखती रहीं, और सोचती रहीं थीं कि कब शाज़िया को फ़ुर्सत मिलेगी, और कब वह उनसे अपनी आरज़ू ज़ाहिर करेंगी.

शाज़िया को फ़ुर्सत कब मिलेगी? वह अपने बेशुमार रिश्तेदारों और दोस्तों से मुबारकबाद और तोहफ़े पाकर थक चुकी थीं. कुछ लोग उन्हें गले लगाते और दुआएँ देते हुए ज़िंदगी की मुश्किलों का ज़िक्र करते और हज के दौरान उनके लिए दुआ माँगने के लिए कहते. “शाज़िया आपा, मुझे अपनी सबसे छोटी बेटी के लिए कोई मुनासिब रिश्ता नहीं मिल रहा है. मेहरबानी करके उसके लिए दुआ कीजिएगा,” एक दरख्वास्त थी. एक और ने कहा, “मेरी भाभी कैंसर से बीमार हैं, मेहरबानी करके उनके शीघ्र स्वस्थ होने के लिए दुआ करें.” “मेरे बेटे को नौकरी नहीं मिल पा रही है. वह बहुत परेशान है. मेहरबानी करके उसके लिए दुआ माँँगिए.” और इस तरह उनकी मांगों की सूची बढ़ती चली गई. शाज़िया ने मुस्कुराते हुए वादा किया, “इंशाअल्लाह, मैं उनके लिए दुआ करूँगी.” और हालाँकि वह थक रही थीं, लेकिन उन्होंने ये ज़ाहिर नहीं किया और ख़ुशी-ख़ुशी सबको विदा करती रहीं. हालाँकि उन्होंने दोपहर के खाने के लिए दावत रखी थी, लेकिन लोग शाम तक आते रहे. यासीन बुआ बर्तन धोते हुए, फ़र्श साफ़ करते हुए अपनी बारी का इंतज़ार करती रहीं.

रात के ग्यारह बजे के बाद शाज़िया थककर सोफे पर बैठ गई और मुलायम कालीन पर अपने पैर पसारे, तभी हॉल के दरवाज़े पर यासीन बुआ का साया नज़र आया. बुआ सोच रही थी, “अरे बेचारी. कितनी थक गई है,” और शाज़िया के लिए बुरा महसूस कर रही थीं. उन्होंने अपने दोनों हाथ अपने आँचल पर पोंछे और दबे पाँव उसकी तरफ़ बढ़ीं, इस बात का ख़्याल रखते हुए कि अपनी गंदी और फटी एड़ियाँ कीमती कालीन पर न पड़ें. “आप कब आईं, बुआ?” शाज़िया ने थकी हुई आवाज़ में पूछा.

शाज़िया से मिलकर बेहद ख़ुश होकर उन्होंने कहा, “मैं बहुत पहले आ गई थी.” “ओह, मैंने देखा ही नहीं,” शाज़िया ने कहा और नरम लहजे में पूछा, “खाना खा लिया?” “हाँ, तुम्हारे घर के चावलों की बदौलत ही मेरी ज़िंदगी अभी भी टिकी हुई है. तुम जो भी छुओ, वो सोना बन जाए. तुम्हारे घर में बरकत हो.” इतनी थकावट के बावजूद शाज़िया को ख़ुशी महसूस हुई. “बहुत देर हो चुकी है बुआ. घर नहीं जाना क्या?” उनके माँ जैसे सवाल पर, “अल्ताफ़ ने कहा है कि वो मुझे अपनी ऑटो में घर ले जाएगा. मैं उसके आते ही चली जाऊँगी.” शाज़िया ने देखा था कि यासीन बुआ पूरे दिन किसी न किसी काम में मसरूफ़ थीं. इसलिए वह अपने भारी क़दम घसीटती हुई अपने कमरे में गईं और हाथ में कुछ पैसे लेकर बाहर आईं. “ये लो बुआ, तुम्हारे ख़र्च के लिए कुछ पैसे. हम तीन दिन में हज के लिए जा रहे हैं और पैंतालीस दिन बाद वापस आएँगे. अल्लाह हमारा हज क़बूल करे. हमारे लिए दुआ करना.”

उन्होंने बुआ के दोनों हाथ अपने हाथों में ले लिए, हाथ मिलाया और पैसे उनमें रख दिए. यासीन बुआ का दिल भर आया. शाज़िया को अपने जैसे मामूली इंसान के साथ भी इतना मेहरबान और दोस्ताना सुलूक करते देख उनकी आंखें नम हो गईं. उन्होंने शाज़िया के हाथों से पैसे नहीं लिए. इसके बजाय, उन्होंने अपनी पल्लू के सिरे पर लगी दो-तीन गाँठें खोलीं और कुछ मुड़े हुए नोट निकाले. शाज़िया की ओर हाथ बढ़ाते हुए उन्होंने विनती की: “मेरी मां, ये छह हज़ार रुपये हैं. वैसे भी आप हज पर जा रही हैं. वहां से मेरे लिए एक कफ़न ले आना. उसे वहां के पवित्र जल, ज़मज़म में डुबोकर ले आना. कम से कम मैं उस कफ़न की वजह से जन्नत तो जाऊंगी.”

एक पल के लिए शाज़िया को समझ नहीं आया कि उसे क्या जवाब दे. लेकिन उस वक़्त उसे नहीं लगा कि ये कोई बड़ी बात है. ‘अरे, बस एक कफ़न? अगर क़ीमत थोड़ी ज़्यादा भी हो जाए तो कोई बात नहीं, इस बेचारी को लाकर दे सकती हूं.’ उसने मन ही मन सोचा और बिना सोचे-समझे शाज़िया ने फ़ौरन हां कर दी.

जैसे ही यासीन बुआ के हाथों से नोट उसके हाथ में आए, उसे एहसास हुआ कि गरीबों की जेब से निकले पैसे भी उनकी तरह ही टूटे-फूटे, बिखरे हुए, मुड़े हुए, झुर्रीदार, गंदे, सार और रूप खो चुके होते हैं. उसे कई बार ऐसा लगता था कि कैसे ग़रीबों के हाथों की ख़ासियत की वजह से कुरकुरे नोट भी किसी अजीब और बदसूरत चीज़ में बदल जाते हैं, लेकिन अब जब उसने यासीन बुआ के हाथों से पैसे लिए, तो उसे ये यक़ीन हो गया. “ठीक है बुआ, अभी तुम जाओ,” उसने कहा और बुआ को विदा कर दिया. शाज़िया फ़ौरन अपने बेडरूम के बाथरूम में गई, पैसे सिंक पर रखे, अपनी हथेलियों में कीटाणुनाशक साबुन का घोल डाला, अपने हाथ धोए और अपने बिस्तर पर लेट गई.

शाज़िया को याद नहीं रहा कि उन्होंने यासीन बुआ द्वारा दिए गए पैसे सिंक से उठाए थे या नहीं. वे हज कमेटी के हवाई जहाज़ में सवार हुए और सुबह-सुबह मदीना पहुंच गए. वहां का अलग माहौल, धार्मिक स्थलों की भेंट और आठ दिनों के प्रवास के दौरान अनिवार्य चालीस नमाज़ों के कारण उसे वक़्त बीतने का पता ही नहीं चला. सुभान ने उसकी शॉपिंग पर भी पाबंदियाँ लगा दी थीं. उसे पाबंदियों की क्या फ़िक्र थी? उसका मानना ​​था कि क़ायदे तोड़ने के लिए ही होते हैं और वह बिना किसी झिझक के जो चाहती थीं, करती थीं. यह भी उसके लिए ऐसा ही एक मौक़ा था.

किताब को पेंगुइन स्वेदश ने छापा है जिसका अंश प्रकाशन की अनुमति से छापा जा रहा है.

हृदय दीप तथा अन्य चयनित कहानियां की लेखिका बानू मुश्ताक़ हैं. संकलन दीपा भास्ती ने किया है और कन्नड़ से हिंदी अनुवाद चंद्रशेखर मदभावी हैं.

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