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Sunday, 4 January, 2026
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एक कैप्टन, एक लड़की और एक ऐसा प्यार जो सिर्फ याद बनकर रह गया

झालावाड़ के एक छोटे से कस्बे में छुट्टियां, क्रिकेट, हेलिकॉप्टर की गूंज और एक आर्मी कैप्टन—सीमा कपूर की आत्मकथा ‘यूं गुज़री है अब तलक’ से इश्क, मासूमियत और टूटे दिल की कहानी.

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(किताब को राजकमल प्रकाश ने छापा है जिसका अंश प्रकाशन की अनुमति से छापा जा रहा है.)

इश्क़ नम्बर टू और

एक गुनाह जो मुझे आज भी सताता है

यह भी उन्हीं फसाद के छुट्टी वाले दिनों की बात है. कलेक्टर साहब के जाते ही अन्नू भैया दिल्ली एन.एस.डी. से कुछ दिनों के लिए घर आ गए. घर में जैसे बहार आ गई थी.

उन्हीं दिनों भारत-पाक क्रिकेट मैच चल रहा था. बाबूजी रेडियो पर घर के अन्दर दिन-भर मैच की कमेंट्री सुनते रहते. कोठी के बाहर मैं, नोनी और अन्नू भैया क्रिकेट खेलते. हालांकि मुझे क्रिकेट में कोई दिलचस्पी नहीं थी. अन्नू भैया ने मुझे एक पुरानी जींस और क़मीज़ भी दे दी थी. जींस और क़मीज़ हो तो क्रिकेट ही खेला जाता है. हमारा खेल बीच-बीच में थोड़ा रुक जाता, क्योंकि बाबूजी पेशाब करने नीम के नीचे आते.

बाबूजी की आदत थी, पेशाब करने जाते तो अपनी बड़ी मोहरी के पाजामे का पाँयचा दूर से ही उठा लेते थे. बाबूजी को आता देख अन्नू भैया उनसे स्कोर पूछते, इत्तफ़ाक़ से जितनी बार वे बाहर आते हमें भारत के किसी विकेट के गिरने की सूचना देते. हमारी समझ में तब आया कि बाबूजी को भारत के विकेट गिरने का तनाव होता था. इसलिए बाबूजी ने विषाक्त पानी के विसर्जन को तनाव-मुक्ति का साधन बना लिया था!

इधर मैं थी कि न तो रन ही बना रही थी और न ये दोनों मुझे आउट कर पा रहे थे. उधर बाबूजी का विसर्जन के िलए बाहर आना बढ़ने लगा था. बाबूजी इस बार बाहर आए, लेकिन विसर्जन के िलए नहीं बल्कि ख़ुशख़बरी देने िक भारत मैच जीत गया था. हमारे मैच का अन्त कुछ यों हुआ कि मुझे आउट नहीं कर पाने की वजह से अन्नू भैया ने झुँझलाहट में बैट फेंक दिया.

इस तरह क्रिकेट और अन्नू भैया की छुट्टियाँ, दोनों ख़त्म हुईं और वे कुछ दिन कोठी पर रहकर दिल्ली वापस चले गए. हमारी ज़िन्दगी फिर अपने ढर्रे पर चलने लगी. अब उसमें जींस और शर्ट भी शामिल हो गई थीं. माँ ने एक बकरी भी पाल ली थी. बकरी का नाम था ‘कस्तूरी’. माँ कस्तूरी को बहुत प्यार करती थीं. कस्तूरी को एक बच्चा भी हो गया. बच्चा बकरा था, फिर भी माँ उसे बेचना नहीं चाहती थीं. जब कभी घर में दूध ख़त्म हो जाता, कोई मेहमान आ जाता तो माँ फ़ौरन कस्तूरी को आवाज़ लगातीं, वह माँ के पुकारने पर जवाब भी देती थी. माँ कहतीं, कस्तूरी दो कप चाय के लिए दूध चाहिए. और लो जी, दूध तैयार. एक-दो कप चाय के िलए दूध तो वह हर वक़्त दे ही देती थी. लेकिन उसकी पत्ती और घास बाज़ार से लाने की ज़िम्मेदारी मेरी ही थी.

अन्नू भैया के आने से मैं कलेक्टर साहब को भूल गई थी, उनके जाते ही मैं फिर से देवदास बन गई. मेरे अन्दर के गायक मुकेश मुखर हो उठे.

ऐसी ही उदासी में गर्मियों की एक दोपहर, अपने टूटे दिल को किसी तरह समेटे हुए मैं आँगन की बगिया में अपनी छोटी-सी लौकी और सेम की बेलों की गुड़ाई कर रही थी, तभी एक अजनबी शोर ने ध्यान खींचा.

कोठी और आसपास के खेत में काम करने वाले लोग भी अपनी झोंपड़ियों और घरों से बाहर निकलकर आकाश की तरफ़ देखने लगे. यह आवाज़ झालावाड़ के लिए बिलकुल नई थी.

आकाश में दो हेल‌िकॉप्टर तैर रहे थे. बरसों-बरस में कभी कोई बड़ा नेता भूले से झालावाड़ आया था, उसके लिए शहर से बाहर हेलिपैड बनाया गया था. वहाँ अब एक कच्चा समतल मैदान नज़र आता था. हम सब देख रहे थे, उन हेलिकॉप्टरों ने दूर ज़मीन पर धीरे-धीरे उतरना शुरू कर दिया था. हम लोगों के कौतूहल का ठिकाना नहीं रहा. देखते ही देखते अचानक कबीट वाले कुएँ पर आर्मी के जवान दिखाई देने लगे. उन्होंने टेंट लगाना शुरू कर दिया. यह आर्मी वालों की ड्रिल थी.

अब हमारे लिए मनोरंजन का साधन आ गया था. मैंने साइकिल उठाई, नोनी आगे डंडे पर और कैलाश उचककर कैरियर पर बैठ गया. हम भागे-भागे हेलिपैड पर गए, आर्मी के दो हेलिकॉप्टर खड़े थे. एक कैप्टन (बाद में पता चला, उनका नाम कैप्टन नेहरा था. थोड़ी उम्र वाले थे) ने कहा, “बच्चों हेलिकॉप्टर नज़दीक से देखना है?” नोनी और कैलाश हेलिकॉप्टर को देखने पास चले गए. मैं अपने-आपको चूँकि बड़ा समझ रही थी, इसलिए थोड़ी दूरी पर खड़ी साइकिल सँभाले हेलिकॉप्टर को कौतूहल से देखती रही.

उसी कौतूहल से कोई मुझे भी देख रहा था और वह था, एक युवा कैप्टन जो अभी-अभी हेलिकॉप्टर से उतरा था. आर्मी-ऑफ़िसरों का हेलिकॉप्टर चलाना और उनकी वर्दी सब कुछ बहुत आकर्षित करने वाला था.

कबीट वाले कुएँ के खेत पर अब बहुत चहल-पहल हो गई थी. गर्मियों के सन्नाटे की जगह अब आर्मी अफ़सरों के टेंट लगा दिये गए थे.

आर्मी के जवान अब इधर-से-उधर आते-जाते दिखाई दे जाते थे. मैं नोनी और कैलाश कस्तूरी को लेकर पीछे निकल जाते और आर्मी वालों के आने-जाने को दूर से देखा करते. एक दिन मैं कुएँ की मुँडेर पर बैठी हुई थी. दूर लगे टेंट को देख रही थी कि अचानक आर्मी का एक जवान, कटे हुए फलों की प्लेट लिये मेरे पास आया. ऑफ़िसर्स के टेंट की तरफ़ इशारा करके मुझसे बोला, “साहब ने आपके लिए पहुँचाई है.” मैंने देखा, टेंट में अफ़सरों के साथ एक आकर्षक नौजवान कैप्टन सिगरेट पीते हुए मुझे देख रहा था. मुझे उसका इस तरह फल भेजना अच्छा नहीं लगा. खिन्न मन से इनकार कर मैं वहाँ से चली आई.

दो-तीन दिन तक कबीट वाले कुएँ पर गई ही नहीं. हाँ, हेलिकॉप्टरों का उड़ना, आर्मी वालों का उन्हें उड़ाना, हम सबका उन्हें दूर से देखना जारी था.

पाँच साल में कभी-कभार आने वाले नेताओं के लिए बनाया गया ऊबड़-खाबड़ हेलिपैड अब आबाद हो गया था. दूर-दराज़ के गाँवों से लोग ‘चीलगाड़ी’ यानी हेल‌िकॉप्टर देखने आने लगे थे. भीड़ देखकर एक-दो नमकीन के ठेले, खोमचे वाले, चाय की गुमटियाँ और बच्चों की फिरकी वाले भी बिक्री के लिए आ गए थे. गाँव की औरतें घूँघट में अपने पति, बच्चों के साथ कौतूहल से ‘चीलगाड़ी’ को देखतीं. बड़ा सुहावना नज़ारा था—आदमियों के कन्धे पर बैठे बच्चे, उनके पीछे चलतीं औरतें. एक हुजूम-सा बरपा था.

कैप्टन नेहरा और दूसरे कैप्टन हम लोगों से बातें भी करने लगे थे. कुछ दिनों में उनसे हमारी दोस्ती-सी हो गई, लेकिन उस कैप्टन ने मुझसे कभी बात नहीं की अलबत्ता मुस्कराते हुए दूर से देखता. मैं भी उसे देख लेती थी, पर ऐसी बन जाती जैसे देखा न हो.

हेलिकॉप्टर ने पूरे इलाक़े में हलचल मचा दी थी. लेकिन यह हलचल सिर्फ़ गाँव वालों में नहीं मची थी, ‘चीलगाड़ी’ उड़ाने वाले एक कैप्टन के दिल में भी इस गाँव की एक लड़की को देखकर मची हुई थी. उसे मैं अच्छी लगने लगी थी. यह एहसास कि कोई आपको पसन्द कर रहा है, मेरे दिल को भी अच्छा लगने लगा था.

मुझे यह पक्का पता नहीं था कि वह मुझे पसन्द करता है या नहीं लेकिन मुझे उसको देखकर ख़ुशी होने लगी थी.

वह था कैप्टन सारस्वत. गम्भीर और शर्मीला, भारी आवाज़ (उसकी आवाज़ नोनी को अमिताभ बच्चन की आवाज़ लगती थी. मुझे भी). उसका व्यक्तित्व काफ़ी आकर्षक था.

वे आपस में अंग्रेज़ी बोलते और मैं अंग्रेज़ी से थर्राती.

भारत में कोई नहीं चाहता कि किसी को पता चले कि उसे अंग्रेज़ी नहीं आती. अंग्रेज़ी के ये ‘हादसे’ मेरे जीवन में कई बार हुए. उस दिन भी एक हादसा सर से गुज़र गया.

एक दिन कैप्टन नेहरा ने हमें अपना बंकर देखने के लिए बुलाया. मैं, नोनी और कैलाश पहुँच गए. पहली बार मैंने देखा था, आर्मी के लोग किस तरह मेहनत से ज़मीन खोदकर, अन्दर रहने के लिए कमरा बनाते हैं. मैं अभी सराहना से भरी देख ही रही थी कि अचानक कैप्टन नेहरा ने मुझसे अंग्रेज़ी में कुछ पूछा जिसका जवाब मैंने धड़ल्ले से दिया, “नहीं हम चाय नहीं पीते.”

दरअसल वह मुझसे पूछ रहे थे कि “क्या हमें अपने घर चाय पिलाओगी?” अपनी लड़खड़ाती अंग्रेज़ी की वजह से मैं समझ नहीं पाई थी. वह तो नोनी ने बात सँभाली. बोला, “दीदी नेहरा अंकल चाय पर आना चाहते हैं.” मैं अंग्रेज़ी से आतंकित बस इतना ही पूछ सकी, “कब?” पता लगा उसी शाम. यानी एक घंटे के बाद.

हम तीनों कोठी के पीछे उनके कैम्प से दौड़े-दौड़े घर आए. माँ-बाबूजी आराम से लेटे हुए थे. मैंने उन्हें बताया क‌ि एक घंटे में आर्मी ऑफिसर मेहमान चाय पर घर आ रहे हैं. (मुझे अब अपने बाबूजी और माँ पर गर्व होता है, हमारे मेहमानों के लिए एक बार भी हमें न डाँटा, न ही सवाल किये बल्कि स्वागत को तैयार हो गए.)

कस्तूरी के दूध से काम चल नहीं सकता था इसलिए माँ ने मुझे और नोनी को बाज़ार से दूध और बिस्कुट लाने के लिए दौड़ाया. बाज़ार कोठी से कम-से-कम दो-ढाई मील दूर था.

मैंने उस दिन जितनी तेज़ साइकिल चलाई उतनी तेज़ पहले कभी नहीं चलाई थी. शाम से पहले सोफ़े और कुर्सी हमने घर के बाहर नीम के नीचे निकालकर लगा दिये. पाँच-छह कैप्टन, मेजर कावसजी और कैप्टन सारस्वत सब लोग आ गए.

कैप्टन सारस्वत पूरे समय चुपचाप बैठा मुस्कराता रहा. कनखियों से मुझे देखता, नज़र मिलते ही नज़रें चुरा लेता. शाम ढल रही थी, सुनहरी धूप की मुलायम किरणें चारों तरफ़ फैली हुई थीं. दिल में गुदगुदी-सी थी.

चाय के बाद सबने मेरा गाना सुना. कैप्टन सारस्वत के दोस्तों के मुताबिक उन सब में एक वही अच्छा गाने वाला था. उसके दोस्तों और माँ-बाबूजी के आग्रह पर उसने शरमाते हुए गाना सीटी के साथ शुरू किया :

“ये शाम मस्तानी मदहोश किये जाए, मुझे डोर कोई खींचे तेरी ओर लिये जाए.” दूसरी लाइन पर उसने कनखियों से मेरी तरफ़ देखा. उस समय ऐसा लगा िक समय बस थम जाए, यह शाम ना ढले बस वहीं की वहीं थम जाए. लेकिन शाम को ढलना था सो ढलने लगी. साथ ही समय भी ढल गया. सब मेहमान अपने कैम्प में लौट गए.

मध्यवर्ग के लोगों की एक अदा होती है, मेहमानों के सामने बड़े संस्कारी बनते हुए या तो बहुत कम खाते हैं या खाते ही नहीं. लेकिन मेहमान के जाने के बाद उसके छोड़े नाश्ते पर टूट पड़ते हैं. मैं और नोनी भी बिस्कुट पर हाथ साफ़ कर रहे थे. मेरे मुँह में बिस्कुट, हाथ में बिस्कुट और अचानक देखती हूँ कि कैप्टन नेहरा और मेजर कावसजी सामने खड़े हैं. दोनों बिस्कुट से भरा मेरा मुँह देखकर मुस्कराए. मैं शर्मिन्दा होकर बिस्कुट निगलने की कोशिश कर रही थी. माँ-बाबूजी ने मुस्कराकर दोनों को बैठने के लिए कहा. दोनों ने थोड़ा इधर-उधर की बात की फिर कैप्टन नेहरा ने मुझे वहाँ से जाने को कहा. उन्हें माँ-बाबूजी से कुछ बात करनी थी.

मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि ये लोग मेरी शिकायत करने आए हैं या कुछ और बात है? मैंने बड़ी कोशिश की दूसरे कमरे से उन लोगों की बातें सुनने की, नोनी को जासूसी करने के लिए भेजा पर उसे भी भगा दिया गया. मेरा दिल धड़क रहा था. क्या बात हो सकती है?

अजीब संयोग था. दोनों मेरे रिश्ते की बात करने आए थे, कैप्टन सारस्वत ने उन्हें भेजा था, वे मुझसे शादी करना चाहते थे.

इतने सारे युवा कैप्टनों के बीच में कैप्टन सारस्वत का मुझे अच्छा लगना सिर्फ़ मेरे मन का फितूर नहीं था, उसका भी वही हाल था. बात जंगल में आग की तरह कोठी पर फैल गई, सब ख़ुश थे.
उस दिन मुझे यह पता चला कि छठी इन्द्री भी होती है. और कभी-कभी छठी इन्द्री काम भी करती है, और वह जो भी कहती है, सही कहती है. वह दूसरी बात थी कि कलेक्टर साहब के केस में मेरी छठी इन्द्री फ़ेल हो गई थी.

वैसे बल्लियाँ कहीं दिख नहीं रही थीं, पर दिल बल्लियों उछल रहा था और इस दिल के चक्कर में पेट की तरफ़ से मैं बिलकुल ग़ाफ़िल हो गई थी. दिल से भूख का शायद कोई सम्बन्ध था. दिल के अलग तरह से धड़कने के उपलक्ष्य में मैंने कैलाश के घर, मिर्च वाली दाल और ढेर सारे घी में बनी बाटियाँ दबाकर खा लीं. परिणामस्वरूप, पेट ने जलवा दिखा दिया. मुझे पेचिश लग गई. इस नामुराद ‘अमीबा’ को अभी ही पेट में उतरना था?

रोमांस के दिनों में शरीर की इस तरह की हरकत, बिलकुल अशोभनीय थी. लेकिन मरता क्या न करता. जल्दी ठीक होने के लिए बाबूजी ने इंट्रोवायफ्राम गोली की झड़ी लगा दी. इस नासपीटे ‘अमीबा’ के कारण दो-तीन दिन से कुएँ पर भी जाना नहीं हुआ था.

एक शाम विरह के मारे कैप्टन साहब ख़ुद आ गए हमसे मिलने. मेरा दिल वैसे ही धड़क रहा था जैसे कलेक्टर साहब को देखकर धड़कता था. लेकिन इस धड़कन में दहशत का एक धड़का भी था. मुझे डर था, कहीं मेरे सत्यवान पिताश्री, कैप्टन साहब को मेरे पेट का हाल न बता दें.

अपने पिछले कुछ अनुभवों के आधार पर यह बात सत्य साबित हो गई थी कि बाबूजी को सच बोलने की गम्भीर बीमारी थी. वे हालात-ए-बयानी को मचल जाते थे. इसलिए मैंने एहतियातन नोनी को बाबूजी के ऊपर नज़र रखने के लिए लगा दिया और ताकीद कर दी कि जैसे ही बाबूजी मेरी बीमारी की बात छेड़ें तुरन्त मुझे पुकारा जाए ताकि मैं दौड़कर आ सकूँ और फ़ौरन विषय बदल दूँ.

अपने जासूस को लाम पर छोड़ मैं निश्चिन्त होकर शरबत बनाने रसोई में चली गई. शरबत का गिलास कैप्टन को दिया. एक-दूसरे की उँगलियाँ थोड़ी-सी छू गईं. फ़िल्मों में बजने वाली शहनाइयाँ, चारों तरफ़ बजने लगीं.

कैप्टन सारस्वत शरबत पीते-पीते बाबूजी से बातें करते रहे. उनका विषय मुझे कुछ याद नहीं. बस इतना याद है, वे मुझे कभी-कभी ताक लेते, मेरे और उनके होंठों पर प्यारी-सी मुस्कराहट बिखर जाती फिर उसे समेटकर वह बाबूजी से बातें करने लगते, और मैं फिर उसी मुस्कराहट का इन्तज़ार करती. समयावधि ख़त्म हो गई और कैप्टन जाने लगे तो मैं उन्हें छोड़ने दरवाज़े के बाहर तक आई. वह धीरे से सबकी नज़रें बचाकर मेरी तरफ़ अँधेरे में झुके, मेरे कान के पास अपना मुँह लाए, किसी अनजाने वाक्य को सुनने के लिए मैं दम-साधे वहीं जम-सी गई थी. वे धीरे से फुसफुसाए. उनकी साँसों की गरमाहट मेरे कानों को छू गई. मैं ट्रांस में थी, अंग्रेज़ी के वे तीन शब्द सुनने को मेरी आँखें बन्द थीं, वे शब्द जो हर हिन्दीभाषी को आते थे, जूली फ़िल्म के गाने ने जिसे प्रचलित कर दिया था. जूली, आय लव यू. वे बोले, “एंट्रोवायफ़ार्म खाती रहना, ठीक हो जाओगी.” मैं समझ गई कि मेरा पर्दाफ़ाश हो गया था. मेरी अनुपस्थिति का फ़ायदा उठाया गया था. मुझे आज भी लगता है, उस पूरे प्रकरण में नोनी की शिरकत भी ला‌िज़मी रही होगी. ख़ैर, मैंने आख़िरी कोशिश की एकदम अनभिज्ञ बनने की. मैंने कहा, ‘क्यों, मुझे क्या हुआ है?’ वह मुस्कराया और बोला, ‘मुझे बाबूजी ने सब बता दिया है.’ सच बोलती हूँ इतनी शर्म आई, इतनी शर्म आई कि बस पूछिए मत. एक तो यह रोमांसविहीन बीमारी पर. दूसरे, उस पर बाबूजी और नोनी का विश्वासघात. काश! मुझे कोई दिलकश बीमारी होती, फ़िल्म ‘मिली’ की तरह, जिसमें जया भादुड़ी को कैंसर हुआ था और अमिताभ बच्चन फूल लेकर आते थे, कुछ वैसा ही कैंसर-वैंसर होता तो बात कुछ और होती. कैप्टन के हाथों फूल-वूल…इस सड़ी पेचिश ने विद्यापति और रीतिकाल के बिहारी और केशव दास की शृंगाररस वाली कविता को बर्बाद कर दिया था.

मेरी बोलचाल बाबूजी से उस दिन बन्द हो गई. नोनी का मुस्कराना मेरे दिल पर छुरियाँ चला रहा था. ख़ैर! पेट पर दिल की विजय हुई. कैप्टन और मेरे दिल का धड़कना एक ख़ास अन्दाज़ में बदस्तूर जारी रहा.

पेट-कांड के अगले ही दिन उनकी ड्रिल का आख़िरी दिन था. कैप्टन सारस्वत दो मिनट के लिए मिलने आए और चले गए. मैं उन्हें छोड़ने दूर तक जाना चाहती थी, लेकिन उन्होंने मना कर दिया. मैं उदास घर आ गई. दूर से ही हेलिकॉप्टरों को देखने की कोशिश कर रही थी.

अचानक हेलिकॉप्टर की ज़ोर की आवाज़ सर के ऊपर से आई. हम सब लोग घरों से बाहर आ गए. कैप्टन सारस्वत अपने हेलिकॉप्टर से हमारे घर के ऊपर चक्कर लगा रहे थे, उन्होंने हेल‌िकाॅप्टर चलाते हुए इशारे से बाय-बाय की मुद्रा में हाथ हिलाया. रफ़त भाई यह नज़ारा देखकर बोले, “हेल‌िकाॅप्टर से पाँच फेरे तो हो गए, दो शादी के बाद.” मैं शरमाकर हेल‌िकॉप्टर को देखने लगी थी. पाँच-छह चक्कर लगाकर देखते ही देखते वह हेलिकॉप्टर दूर होता चला गया. आकाश का वह टुकड़ा जहाँ से वह गुज़रा था, मेरे लिए एकटक ताकते रहने का ठिकाना बन गया.

उन दिनों का प्यार और आकर्षण इतने तक ही सीमित थे. शरीर का उसमें कम-से-कम उपयोग हुआ करता था. जैसे आँखों का उपयोग; चोरी-चोरी देखना. ज़बान का उपयोग; ‘नमस्ते’, उँगलियों का स्पर्श; शरबत का गिलास देते हुए छू जाना आदि-आदि. लेकिन हाँ, दिल के और मन के उपयोग ख़ूब होते थे. इसी दिल में एक अजीब-सी टीस उठने लगी थी. न जाने क्यों मैं उस खेत में चली जाती थी. जो अब सूना हो गया था. कबीट वाले कुएँ की मुँडेर पर बैठ, ज़मीन पर तम्बुओं के उखड़ने से बने िनशानों को देखती. कैप्टन सारस्वत के टेंट के पास उसके बचे हुए सिगरेट के टोटे (टुकड़े) चुपके से बीनती, उन्हें एक छोटे-से डिब्बे में रख सहेजकर अपनी धरोहर बनाती, और न जाने किसका इन्तज़ार करती.

माँ-बाबूजी को रिश्ता पसन्द आया था, ख़ासतौर से बाबूजी को, क्योंकि सारस्वत पंजाबी, सुशील, पढ़ा-लिखा, ख़ानदानी, आर्मी वाला था.

घर में अब कैप्टन सारस्वत की चर्चा हर वक़्त होने लगी थी. मेरा आईना देखना थोड़ा बढ़ गया था. मुझे अपने अन्दर एक साँवली-सी सुन्दरी नज़र आने लगी थी. एक दिन माँ, बाबूजी से कह रही थीं, ‘अपनी गुड्डो के चेहरे में नमक है.’ माँ के गीत की पंक्तियाँ अब मेरी समझ में आने लगी थीं :

चौपालों में बात चल गई, गाँव में पड़ गए क़िस्से,

जाने किन आँखों ने कर दिये कुछ मासूम इशारे, हम तो जोगी हो गए.

इस गीत में माँ ने एक छन्द का इज़ाफ़ा और कर दिया था, यह छन्द मुझ पर लिखा गया था. माँ बाबूजी को सुना रही थीं.

इन्द्रधनुष के सात रंगों-सी आँखों में लहराए,
सरतापा इक शेर ग़ज़ल का धीरे-धीरे गाये
तुलसी जैसी काया उसकी शाम बरन कहलाए, हम तो जोगी हो गए.

माँ का मुझ पर छन्द लिखना, मेरे होने को, सार्थक-सा कर रहा था. मध्यम, निम्न-मध्यवर्ग में किसी अच्छे खाते-पीते, या अच्छी पोस्ट के रिश्ते का ख़ुद चलकर आना उस समय बड़ी बात हुआ करती थी. घर में अजीब-सी ख़ुशी थी.

मैं बार-बार नोनी से कैप्टन सारस्वत की बातें करती. दिन पर दिन वे मुझे और भी अच्छे लगते जा रहे थे. अमिताभ बच्चन की आवाज़ मुझे अच्छी लगने लगी थी. मैं एक अजीब उमंग दिल में लिये धूम रही थी.

मेरे साथ सबको कैप्टन सारस्वत का इन्तज़ार था. ख़ैर साहब, दिन बीते, महीना बीत गया. अब सबकी, ख़ास तौर से मेरी बेचैनी बढ़ रही थी. माँ-बाबूजी भी किसी सन्देश के इन्तज़ार में थे.

एक दिन भटिंडा से एक ख़त आया, जिस पर एयरफोर्स का लोगो था. पोस्टमैन से मेरे हाथ तक और मुझसे माँ के हाथ तक पहुँचते-पहुँचते मेरे कानों में सैकड़ों शहनाइयाँ बज गईं. कैप्टन सारस्वत का अंग्रेज़ी में ख़त था लेकिन मेरे लिए नहीं, माँ-बाबूजी के लिए. उसमें लिखा था, “सीमा अभी बहुत छोटी है, उसके लिए भविष्य में और भी अच्छे रिश्ते आएँगे. मैं अपने माता-पिता की मर्ज़ी से शादी कर रहा हूँ. सीमा के भविष्य के लिए मैं अपनी शुभकामनाएँ देता हूँ.”

(यूँ गुज़री है अब तलक (आत्मकथा) की लेखिका सीमा कपूर हैं.)

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