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Monday, 27 April, 2026
होमदेश‘गंभीर और अनसुलझे सवालों का बादल’—केजरीवाल दिल्ली HC की जज शर्मा की अदालत में क्यों पेश नहीं होंगे

‘गंभीर और अनसुलझे सवालों का बादल’—केजरीवाल दिल्ली HC की जज शर्मा की अदालत में क्यों पेश नहीं होंगे

दिल्ली हाई कोर्ट की जज स्वर्ण कांता शर्मा को लिखे पत्र में, पूर्व मुख्यमंत्री ने इस प्रक्रिया में 'विश्वास की कमी' का हवाला दिया है; साथ ही उन्होंने जज के खुद को इस मामले से अलग करने की मांग के पक्ष में तर्क दिए हैं और यहां तक कि गांधी के सत्याग्रह का भी ज़िक्र किया है.

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नई दिल्ली: दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली हाई कोर्ट की जज स्वर्ण कांता शर्मा को पत्र लिखकर कहा है कि वह एक्साइज पॉलिसी मामले में “उनकी अदालत” में आगे की कार्यवाही में भाग नहीं ले पाएंगे. उन्होंने कहा कि कानूनी प्रक्रिया पर उनका भरोसा “गहराई से हिल गया है.”

फरवरी में ट्रायल कोर्ट ने इस मामले में सभी 23 आरोपियों को, जिनमें केजरीवाल और वरिष्ठ AAP नेता मनीष सिसोदिया शामिल हैं, बरी कर दिया था. कोर्ट ने कहा था कि केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) का मामला न्यायिक जांच में टिक नहीं पाया.

इसके बाद एजेंसी ने इस आदेश को हाई कोर्ट में चुनौती दी.

यह पत्र तब आया जब जस्टिस शर्मा ने CBI की चुनौती की सुनवाई से खुद को अलग करने से इनकार कर दिया. केजरीवाल ने उनके हटने की मांग करते हुए याचिका दायर की थी.

पत्र में केजरीवाल ने लिखा, “मैं यह पत्र पूरे सम्मान के साथ लिख रहा हूं, न्यायपालिका के उस संस्थान के प्रति, जो दशकों से हमारे गणराज्य का एक प्रमुख स्तंभ रहा है. शुरुआत में ही मैं साफ कहना चाहता हूं कि यह पत्र न तो गुस्से में लिखा गया है, न ही किसी असम्मान या व्यक्तिगत टकराव की भावना से.” यह चार पन्नों का पत्र सोमवार को उनके एक्स हैंडल पर साझा किया गया.

उन्होंने लिखा, “इस पत्र को लिखने का मेरा एकमात्र उद्देश्य न्यायपालिका को मजबूत करना है, उसे कमजोर होने से बचाना है.”

केजरीवाल ने आगे कहा कि न तो वह और न ही उनके वकील इस मामले की सुनवाई में भाग लेंगे. उनके वकील ने भी इसकी पुष्टि की.

उन्होंने कहा, “मेरी अंतरात्मा में अब मैं उस स्थिति पर पहुंच गया हूं जहां मैं इन कार्यवाहियों में भाग नहीं ले सकता, क्योंकि मुझे लगता है कि मैं ऐसे प्रक्रिया का हिस्सा बन रहा हूं जिसमें इस विशेष संदर्भ में मेरा भरोसा गहराई से हिल गया है.”

उन्होंने जोड़ा, “मेरा विरोध हाई कोर्ट या न्यायिक व्यवस्था से नहीं है, बल्कि केवल इस मामले के आपके सामने जारी रहने से है, जहां गंभीर और अनसुलझे सवालों के कारण आपकी निष्पक्ष न्याय देने की क्षमता पर सार्वजनिक संदेह पैदा हुआ है.”

केजरीवाल ने अपने फैसले का एक मुख्य कारण 20 अप्रैल के उस आदेश को बताया, जिसमें जस्टिस शर्मा ने उनकी रिक्यूजल याचिका खारिज कर दी थी. उन्होंने कहा कि इससे आगे की सुनवाई की निष्पक्षता पर उनका भरोसा खत्म हो गया.

पत्र में लिखा है, “उस फैसले के बाद मुझे यह दुखद और अपरिहार्य महसूस हुआ कि मेरी कानूनी अपील को व्यक्तिगत हमला और संस्था पर आघात के रूप में देखा गया.”

उन्होंने कहा कि कोई भी व्यक्ति प्रतिकूल फैसले को स्वीकार कर सकता है, लेकिन ऐसे फैसले को नहीं जिसमें भाषा से यह लगे कि उसकी अपील को जज की गरिमा, शपथ और संस्थागत स्थिति को चुनौती माना जा रहा है.

उन्होंने कहा कि उनकी आशंका को न्यायिक रूप से “व्यक्तिगत और संस्थागत अपमान” के रूप में समझा गया.

उन्होंने कहा कि अब उन्हें यह विश्वास करना मुश्किल हो रहा है कि उन्हें इस मामले में निष्पक्ष सुनवाई मिलेगी. उन्होंने कहा कि उनकी रिक्यूजल याचिका इस “वास्तविक आशंका” के कारण थी कि न्याय सिर्फ होना ही नहीं चाहिए, बल्कि होता हुआ दिखना भी चाहिए.

महात्मा गांधी के सत्याग्रह के सिद्धांतों का जिक्र करते हुए केजरीवाल ने लिखा कि जब किसी नागरिक को अन्याय का एहसास होता है, तो उसका पहला कर्तव्य विरोध नहीं बल्कि संवाद करना होता है. उन्होंने कहा, “सबसे पहले संबंधित प्राधिकारी के सामने बात रखकर उसे सुधार का मौका देना चाहिए. और जब संवाद की संभावना खत्म हो जाए, तभी परिणाम स्वीकार करना चाहिए.”

उन्होंने जस्टिस शर्मा के खिलाफ अपनी चिंताओं को भी दोहराया, जिसमें उनके अखिल भारतीय अधिवक्ता परिषद के कार्यक्रमों में भाग लेने और उनके बच्चों का केंद्र सरकार के पैनल वकील होना शामिल है. उन्होंने ऐसे उदाहरण भी दिए जहां जज सुजॉय पॉल और अतुल श्रीधरन ने अपने बच्चों के उसी कोर्ट में प्रैक्टिस करने के कारण खुद को मामलों से अलग कर लिया था.

पत्र में कहा गया है, “पूर्व जस्टिस अभय एस. ओका ने हाल ही में कहा था कि अगर उन्हें अधिवक्ता परिषद ने आमंत्रित किया होता, तो वह इसे विनम्रता से ठुकरा देते, क्योंकि उनके अनुसार इस संगठन की राजनीतिक झुकाव है.”

उन्होंने लिखा है, “सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता इस मामले में दूसरी तरफ के वकील हैं. आपकी दोनों संतानें सीधे उनके द्वारा दिए गए मामलों पर काम करती हैं.”

अंत में केजरीवाल ने साफ किया कि वह किसी भी तरह न्यायपालिका के खिलाफ नहीं हैं, क्योंकि उन्हें अदालतों से राहत मिली है, जिसमें जमानत और बरी होने का आदेश शामिल है. उन्होंने कहा, “आज मैं न्यायपालिका की वजह से आजाद हूं. ऐसा न समझा जाए कि मेरा रुख संस्था के खिलाफ है. यह केवल उस स्थिति के खिलाफ है जहां सार्वजनिक भरोसे पर जरूरत से ज्यादा बोझ डाला जा रहा है.”

उन्होंने यह भी कहा, “संदेह दूर करने के लिए मैं स्पष्ट करना चाहता हूं कि मेरी यह असमर्थता केवल इस मामले तक सीमित है और भविष्य में उन मामलों तक होगी जहां यही चिंताएं होंगी. इसे यह न समझा जाए कि मैं हर मामले में आपके सामने पेश नहीं होऊंगा. मैं उन मामलों में पेश होता रहूंगा जहां ऐसी गंभीर और अनसुलझी चिंताएं नहीं होंगी.”

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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