नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को बॉम्बे हाई कोर्ट के उस फैसले में दखल देने से इनकार कर दिया, जिसमें रिलायंस कम्युनिकेशंस ग्रुप की कंपनियों के लोन अकाउंट्स को “फ्रॉड” घोषित किया गया था. इसके साथ ही अनिल अंबानी की उस याचिका को खारिज कर दिया गया, जिसमें उन्होंने हाई कोर्ट के आदेश पर रोक लगाने की मांग की थी.
महत्वपूर्ण बात यह रही कि आदेश सुनाने के बाद कोर्ट ने अनिल अंबानी का यह बयान भी दर्ज किया कि “वह बैंकों के साथ मामले को सुलझाना चाहते हैं.” यह बात उनके वकील वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने कही. हालांकि, सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता (बैंकों के समूह की ओर से पेश) के कड़े विरोध के बीच कोर्ट ने इस पर कोई राय नहीं दी.
सिब्बल ने कहा, “आप (बैंक) कई बार समझौते कर चुके हैं, विदेश में बैठे लोगों से भी समझौता हुआ है.” उन्होंने कहा कि भले ही बैंक समझौता न करना चाहें, लेकिन रिकॉर्ड पर यह रखा जाए कि अंबानी समझौता करना चाहते हैं.
पिछले महीने अनिल अंबानी ने केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को पत्र लिखकर अपने खिलाफ मामलों के समाधान की मांग की थी, जैसा कि स्टर्लिंग बायोटेक मामले में सांदेसरा भाइयों के लिए किया गया था.
स्टर्लिंग बायोटेक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने नवंबर 2025 में यह माना था कि अगर सांदेसरा भाई 17 दिसंबर 2025 तक सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री में 5,100 करोड़ रुपये जमा कर देते हैं, तो उनके खिलाफ सभी आपराधिक मामले खत्म किए जा सकते हैं.
मौजूदा मामले में, चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल पंचोली की पीठ ने कहा कि बॉम्बे हाई कोर्ट के फैसले में दखल देने का “कोई आधार नहीं” है. हाई कोर्ट ने पहले दिए गए अंतरिम संरक्षण को हटा दिया था और बैंकों को RBI नियमों के अनुसार आगे बढ़ने की अनुमति दी थी. सुप्रीम कोर्ट ने यह भी साफ किया कि यह फैसला लंबित सिविल मामले को प्रभावित नहीं करेगा और हाई कोर्ट से मामले का जल्द निपटारा करने को कहा.
सिंगल जज बेंच के आदेश में बैंकों को 2020 की फॉरेंसिक ऑडिट रिपोर्ट (FAR) पर कार्रवाई करने से रोका गया था, जिसमें रिलायंस ग्रुप की कंपनियों को दिए गए करीब 31,580 करोड़ रुपये के इस्तेमाल की जांच की गई थी. इसके बाद बैंक ऑफ बड़ौदा, IDBI बैंक, इंडियन ओवरसीज बैंक और ऑडिट फर्म BDO इंडिया LLP ने इस आदेश को चुनौती दी थी.
अंबानी ने 2024 में जारी शो-कॉज नोटिस को चुनौती दी थी, जिसमें 2020 की फॉरेंसिक ऑडिट रिपोर्ट के आधार पर रिलायंस कम्युनिकेशंस के अकाउंट्स को “फ्रॉड” घोषित करने की बात कही गई थी. उन्होंने कहा था कि मौजूदा दिवालियापन प्रक्रिया के कारण उन्हें जरूरी दस्तावेज नहीं मिल पाए.
गुरुवार को हुई विस्तृत सुनवाई में मुख्य सवाल यह था कि फाइनेंशियल ऑडिट कौन कर सकता है.
सिब्बल ने कोर्ट से कहा, “कोई ऐसा व्यक्ति जो फॉरेंसिक सर्विस प्रोवाइडर है और ऑडिटर नहीं है, उसके आधार पर अकाउंट को फ्रॉड घोषित नहीं किया जा सकता.”
उन्होंने कहा, “वह चार्टर्ड अकाउंटेंट (CA) नहीं है, वह खुद कह रहा है कि वह CA/ऑडिटर नहीं है.” उन्होंने यह भी कहा कि यह एक “ज्यूरिस्डिक्शन” का मामला है, क्योंकि कंपनियों को फ्रॉड घोषित करने का आधार सही ऑडिट नहीं था, जैसा कि कंपनी कानून में जरूरी है.
सीबीआई और ईडी द्वारा अंबानी के खिलाफ फंड के दुरुपयोग की जांच जारी है. सिब्बल ने कहा कि आपराधिक जांच चलती रह सकती है, लेकिन “फ्रॉड” का टैग हटाया जाना चाहिए क्योंकि सही तरीके से ऑडिट नहीं हुआ.
उन्होंने कहा कि “फ्रॉड” का टैग लगने से यह एक तरह की “सिविल डेथ” होगी, जिससे कोई भी अंबानी को पैसा उधार नहीं देगा.
वरिष्ठ वकील श्याम दीवान ने भी कहा कि यह ऑडिट कानूनी मानकों के अनुसार नहीं है, क्योंकि यह आरबीआई के 2024 मास्टर डायरेक्शंस के अनुसार योग्य व्यक्ति द्वारा नहीं किया गया.
उन्होंने कहा, “हमारे कानून के अनुसार फाइनेंशियल ऑडिट केवल सीए ही कर सकता है. जब इसके बड़े सिविल और आपराधिक परिणाम हों, तो फॉरेंसिक ऑडिट किसी योग्य व्यक्ति द्वारा ही किया जाना चाहिए.”
आरबीआई के 2024 मास्टर डायरेक्शंस के अनुसार, ऐसे मामलों में ऑडिट करने के लिए ऑडिटर का सीए होना ज़रूरी है.
कोई राहत न देते हुए चीफ जस्टिस ने कहा, “राष्ट्रीयकृत बैंकों ने सेवाएं ली हैं. उन्हें पता है कि कौन सही व्यक्ति है. क्या हम उनके फैसले को बदल सकते हैं? यह उनका पैसा है, जो उनके अनुसार हड़प लिया गया है.”
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