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Monday, 13 April, 2026
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‘भरोसे का पुल’: संवाद की राह खोलते बस्तर के पत्रकार, माओवादियों के सरेंडर में निभाई अहम भूमिका

रानू तिवारी ने बस्तर के आखिरी माओवादी कमांडर को हथियार डालने के लिए मनाया; वहीं मंकू नेताम और अंकुर तिवारी ने पिछले अक्टूबर में 210 माओवादी कैडरों के सरेंडर में मदद की.

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जगदलपुर: अप्रैल 2025 की बात है. जगदलपुर के पत्रकार विकास तिवारी को एक अचानक फोन कॉल आया. “मैं रुपेश का साथी बोल रहा हूं…वो आपसे मिलना चाहते हैं…आप दो बजे तक उसपरी घाट पर आ जाइए…” (छत्तीसगढ़ के बीजापुर में इंद्रावती नदी के किनारे).

विकास, जिन्हें रानू तिवारी के नाम से जाना जाता है, पहले शक के घेरे में थे. तब तक एक दशक से ज्यादा समय से किसी माओवादी नेता ने किसी पत्रकार से बात नहीं की थी. माओवादियों ने एक समय तिवारी को उनकी रिपोर्टिंग के कारण ‘बैन’ भी कर दिया था, लेकिन पिछले साल अप्रैल के उस दिन तिवारी के पास ज्यादा सोचने का समय नहीं था. उन्होंने कॉल करने वाले के निर्देश माने, जिसने खुद को रुपेश से जुड़ा माओवादी बताया. रुपेश प्रतिबंधित सीपीआई (माओवादी) के नॉर्थ-वेस्ट सब-जोनल यूनिट का नेता था.

इंद्रावती नदी के किनारे दिए इंटरव्यू में रुपेश ने अपनी योजनाएं बताईं और सरकार के साथ शांति वार्ता का प्रस्ताव दोहराया. इससे रुपेश और सुरक्षा बलों के बीच बातचीत का रास्ता खुला, जिसमें तिवारी संदेशवाहक बने.

अगले कुछ महीनों तक स्थानीय पत्रकार जैसे तिवारी, संदेश आगे-पीछे पहुंचाते रहे, जबकि सुरक्षा बल सर्च ऑपरेशन और इलाके में दबदबा बनाने की कार्रवाई करते रहे.

तिवारी को पहचान तब मिली जब उन्होंने बस्तर के आखिरी माओवादी कमांडर सुनाम चंद्रैया उर्फ पापा राव के सरेंडर में मदद की. इससे पहले उन्होंने सेंट्रल कमेटी सदस्य रामधर माजी के सरेंडर में भी मदद की थी.

रानू तिवारी पापा राव के साथ, बस्तर के आखिरी माओवादी कमांडर | फोटो: स्पेशल अरेंजमेंट
रानू तिवारी पापा राव के साथ, बस्तर के आखिरी माओवादी कमांडर | फोटो: स्पेशल अरेंजमेंट

छत्तीसगढ़ के गृह मंत्री विजय शर्मा को फोन कर पापा राव को हथियार डालने के लिए भरोसा दिलाने वाला तिवारी का वीडियो वायरल हुआ. शुरुआत में ये वीडियो स्क्रिप्टेड लगते हैं, लेकिन तिवारी कहते हैं कि यह एक रणनीति का हिस्सा था.

तिवारी ने कहा, “तेज़ ऑपरेशन और अंदरूनी इलाकों में तैनाती के कारण बड़ी संख्या में माओवादी सरेंडर कर रहे हैं. हर जगह फोर्स है और माओवादियों के लिए सरेंडर ही फायदेमंद है.”

उन्होंने बताया कि गृह मंत्री को किए गए फोन का मकसद माओवादियों को यह भरोसा दिलाना था कि उनके सरेंडर की बात ऊपर तक पहुंच गई है और उन्हें जंगल से बाहर आने के लिए सुरक्षित रास्ता मिलेगा.

रुपेश के इंटरव्यू के कुछ महीनों बाद फिर फोन कॉल की एक और कड़ी शुरू हुई. इस बार माओवादियों ने दो अन्य स्थानीय पत्रकार—अंकुर तिवारी और मंकू नेताम को चुना. कई दिनों की बातचीत और पर्दे के पीछे पुलिस अधिकारियों की निगरानी के बाद, दोनों ने अक्टूबर में जगदलपुर में 200 से ज्यादा माओवादी कैडरों के सरेंडर में मदद की.

पत्रकार अंकुर तिवारी बीजापुर के जंगलों से माओवादी कैडरों के एक समूह को सरेंडर से पहले बाहर लाते हुए | फोटो: स्पेशल अरेंजमेंट
पत्रकार अंकुर तिवारी बीजापुर के जंगलों से माओवादी कैडरों के एक समूह को सरेंडर से पहले बाहर लाते हुए | फोटो: स्पेशल अरेंजमेंट

बस्तर रेंज के आईजी सुंदर राज पट्टिलिंगम ने कहा कि स्थानीय पत्रकार प्रशासन और माओवादियों के बीच “एक अहम कड़ी” बने.

उन्होंने कहा, “दूर-दराज इलाकों तक पहुंच और स्थानीय लोगों से जुड़ाव के कारण कई पत्रकारों ने सुरक्षा बलों, प्रशासन और हथियारबंद माओवादी कैडरों के बीच महत्वपूर्ण पुल का काम किया, जो सरेंडर पर विचार कर रहे थे.”

बस्तर में अब रानू तिवारी जैसे स्थानीय पत्रकार सेलिब्रिटी बन चुके हैं.

लेकिन उनके अपने शब्दों में, पत्रकारिता उनकी पहली पसंद कभी नहीं थी.

एक्सीडेंटल जर्नलिस्ट

हालांकि, उनकी जड़ें उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ से जुड़ी हैं, लेकिन रानू तिवारी का जन्म और पालन-पोषण जगदलपुर में हुआ.

उनके एक दोस्त, जो बस्तर में रिपोर्टर थे, ने उन्हें 2013-14 में पत्रकारिता से परिचित कराया. उस समय तिवारी कुछ सालों से बेरोज़गार थे.

तिवारी ने कहा, “यह सब संयोग से हुआ. मैंने ट्रक चलाने और कई काम करने की कोशिश की, लेकिन सबमें असफल रहा. मुझे लगता था पत्रकारिता पढ़े-लिखे लोगों के लिए होती है. मैं हमेशा थर्ड डिवीजन से पास होता था, सिर्फ मैट्रिक में फर्स्ट डिवीजन आया.”

चाय का एक और कप मंगाते हुए उन्होंने कहा, “मैंने आज तक पूरी किताब नहीं पढ़ी…हमेशा बैकबेंचर रहा…आज भी अखबार या आर्टिकल नहीं पढ़ता…पढ़ने में कमजोर हूं…”

उन्होंने माना कि उन्होंने पत्रकारिता को “बिना निवेश का अच्छा कारोबार” और “आसान पैसे कमाने का जरिया” समझकर चुना था.

अपने 10 साल के अनुभव के आधार पर तिवारी ने कहा कि बस्तर में पत्रकारिता का सिस्टम अलग है.

उन्होंने कहा, “बस्तर में ज्यादातर रिपोर्टर को सैलरी नहीं मिलती. उन्हें चैनल या अखबार का नाम इस्तेमाल करने के लिए पैसे देने पड़ते हैं और वे लोकल विज्ञापनों या सरकारी विभागों से कमीशन कमाते हैं.” उनके मुताबिक, इससे पत्रकारिता स्थानीय अधिकारियों पर निर्भर हो जाती है.

माओवादी कैडर नदी पार करते हुए, सरेंडर के लिए जाते हुए | फोटो: स्पेशल अरेंजमेंट
माओवादी कैडर नदी पार करते हुए, सरेंडर के लिए जाते हुए | फोटो: स्पेशल अरेंजमेंट

कोविड-19 के दौरान तिवारी ने अपने नाम से यूट्यूब चैनल शुरू किया और फेसबुक पर लाइव भी करने लगे, लेकिन उन्हें ज्यादा व्यूज़ नहीं मिले.

इसके बाद उन्होंने ‘बस्तर टॉकीज’ नाम से नया यूट्यूब चैनल शुरू किया, लेकिन शुरुआत में यह भी ज्यादा नहीं चला. 2021 में सुकमा से की गई उनकी ग्राउंड रिपोर्ट उनके लिए टर्निंग पॉइंट साबित हुई.

2 अप्रैल 2021 को माओवादियों ने ताडमेटला में सीआरपीएफ पर हमला किया, जिसमें 22 जवान मारे गए. तिवारी उन पहले पत्रकारों में थे जो मौके पर पहुंचे. उन्होंने कहा, “मैंने इस हमले पर सबसे विस्तृत ग्राउंड रिपोर्ट की, जिसमें हर शहीद जवान की कहानी बताई.”

पत्रकार रानू तिवारी सुरक्षा बलों के साथ | फोटो: स्पेशल अरेंजमेंट
पत्रकार रानू तिवारी सुरक्षा बलों के साथ | फोटो: स्पेशल अरेंजमेंट

रायपुर के पत्रकारों का कहना है कि तिवारी हर जगह की जानकारी रखते हैं, चाहे दूरी कितनी भी हो. उनके पास रिपोर्टरों और संपर्कों का नेटवर्क है और वे मौके पर जाकर रिपोर्टिंग करते हैं.

बस्तर में काम कर चुके पत्रकार भी मानते हैं कि तिवारी अपनी रिपोर्टिंग में “बैलेंस” बनाने की कोशिश नहीं करते, बल्कि बस्तर की जिंदगी की जटिलता को दिखाते हैं. उनके यूट्यूब चैनल ‘बस्तर टॉकीज’ के अब 6.5 लाख से ज्यादा सब्सक्राइबर हैं.

तिवारी ने कहा, “मैं सिर्फ तथ्य और लोगों की सीधी बात दिखाता हूं. इसलिए मेरे वीडियो आम न्यूज रिपोर्ट से लंबे होते हैं. मैं खबर को बैलेंस करने की कोशिश नहीं करता.”

उनकी इसी शैली के कारण माओवादियों ने उन पर सेंसरशिप भी लगाई थी.

‘आपने कितनी उंगलियां जमा की हैं, मिस्टर तिवारी?’

तिवारी ने कहा कि माओवादियों ने उन्हें LWE (वामपंथी उग्रवाद) वाले इलाकों में रिपोर्टिंग करने से ‘बैन’ कर दिया था, जब उन्होंने बस्तर में एक विरोध स्थल से ग्राउंड रिपोर्ट की थी. वहां उन्होंने गांव वालों से पूछा था कि वे माओवादी कैडरों को अपने गांव से दूर रहने के लिए क्यों नहीं कहते. इसके बाद उन्होंने एक और रिपोर्ट की, जिसमें बताया गया कि माओवादी लोगों को वोट डालने जाने पर उनकी उंगलियां काटने की धमकी देते हैं. इस रिपोर्ट के बाद तिवारी को एक माओवादी की तरफ से सख्त चिट्ठी मिली, जिसमें लिखा था: “आपने कितनी उंगलियां जमा की हैं, मिस्टर तिवारी?”

लेकिन तिवारी पीछे नहीं हटे और बाद में माओवादियों ने यह अनौपचारिक ‘बैन’ हटा दिया.

बिना तारीख की तस्वीर, जिसमें माओवादी कैडर बस्तर के घने जंगलों से गुज़रते हुए मुख्यधारा में आने के लिए जा रहे हैं | फोटो: स्पेशल अरेंजमेंट
बिना तारीख की तस्वीर, जिसमें माओवादी कैडर बस्तर के घने जंगलों से गुज़रते हुए मुख्यधारा में आने के लिए जा रहे हैं | फोटो: स्पेशल अरेंजमेंट

तिवारी ने बीजापुर के एक व्यक्ति की मुठभेड़ में मौत पर भी रिपोर्ट की थी. पुलिस का दावा था कि वह माओवादी था, लेकिन तिवारी की रिपोर्ट में परिवार के बयान के आधार पर बताया गया कि वह एक सरकारी संस्थान में रसोइया था.

तिवारी ने याद करते हुए कहा, “मैं ही अकेला था जो जंगल और गांव के अंदर जाकर इस मामले की रिपोर्टिंग करने गया. मेरे कुछ दोस्तों ने कहा था कि मुझे इस पर रिपोर्ट नहीं करनी चाहिए, क्योंकि यह उस समय के आधिकारिक बयान के खिलाफ था, खासकर जब अमित शाह का बस्तर दौरा तय था.”

इसके बावजूद, तिवारी ने कहा कि उन्हें कभी जंगलों में जाने से नहीं रोका गया.

तिवारी कहते हैं कि उनकी इसी तरह की रिपोर्टिंग ने उन्हें प्रशासन और माओवादी कैडरों दोनों के बीच पहचान और भरोसा दिलाया.

तिवारी ने कहा, “यह एक दिन में नहीं हुआ. उन्हें समझ आ गया होगा कि मेरी रिपोर्टिंग पूरी और गहराई वाली होती है. मैंने किसी भी खबर में कट-छांट नहीं की, माओवादियों के प्रेस नोट में भी नहीं…इसी तरह पुलिस की भी सारी खबरें बिना एडिट के दिखाईं.”

पत्रकार रानू तिवारी बस्तर के जंगलों में माओवादी कैडरों से बात करते हुए, उनके सरेंडर से पहले | फोटो: स्पेशल अरेंजमेंट
पत्रकार रानू तिवारी बस्तर के जंगलों में माओवादी कैडरों से बात करते हुए, उनके सरेंडर से पहले | फोटो: स्पेशल अरेंजमेंट

पापा राव के सरेंडर का ज़िक्र करते हुए तिवारी ने कहा कि यह कई महीनों की कोशिश का नतीजा था. जैसे बीजापुर के इंद्रावती नेशनल पार्क के दौरे के दौरान, उन्होंने आसपास के गांवों में कई चिट्ठियां छोड़ी थीं, ताकि उनमें से कोई एक राव तक पहुंच जाए.

उस समय राव बस्तर का आखिरी माओवादी कमांडर था.

तिवारी ने कहा, “मेरा प्रस्ताव साफ था…अगर आप सरेंडर करना चाहते हैं, तो आपके साथ मौजूद सभी कैडरों की सुरक्षा मेरी जिम्मेदारी होगी और उन्हें सरेंडर के लिए नजदीकी जिला मुख्यालय तक सुरक्षित रास्ता दिया जाएगा.”

कई हफ्तों बाद उन्हें एक कॉल आया—बीजापुर के कुटरू आओ, अकेले और जल्दी.

उन्होंने कहा, “मैं वहां पहुंचा और बाइक से अंबेली गांव गया.”

उन्होंने माना कि उन्हें अपनी सुरक्षा को लेकर शक था. तिवारी के लिए एक चीज़ फायदेमंद रही, वह था अंबेली के पास जिला रिजर्व गार्ड (DRG) की मौजूदगी. राव और उसके साथियों की स्थिति समझने के बाद तिवारी ने छत्तीसगढ़ के गृह मंत्री विजय शर्मा को फोन किया और उनसे कहा कि सुरक्षा बलों को वहां से हटाया जाए, ताकि राव उनके साथ आने को तैयार हो सके.

मंकू नेताम और अंकुर तिवारी

कांकेर के पत्रकार मंकू नेताम अपने खेत में थे, जब उन्हें एक अनजान नंबर से कॉल आया. उन्हें अंदाज़ा हो गया कि यह कॉल माओवादियों से जुड़ा हो सकता है.

उन्होंने कहा, “अगले दिन मुझे बताया गया कि मुझे अंकुर तिवारी के साथ कांकेर जिले के कामतेरा आना है.”

कामतेरा पहुंचने के पांच मिनट बाद दो माओवादी कैडर आए और उन्होंने बस्तर के जंगलों में अपने जीवन की कठिनाइयों के बारे में बताया.

नेताम ने कहा, “उन्होंने बताया कि उन्होंने पिछले दो दिन से कुछ नहीं खाया है और चावल, कपड़े और चप्पल मांगे.”

इसके बाद नेताम वापस गए और बस्तर के आईजी सुंदर राज से सरेंडर प्रक्रिया शुरू करने की अनुमति ली.

मंकू ने याद किया, “जब मैं उनके पास चावल लेकर वापस गया, तो माओवादी नेता जैसे भास्कर और राजू ने साफ कहा कि वे सरेंडर करना चाहते हैं. मैंने फिर से आईजी से संपर्क किया.”

आईजी सुंदर राज ने उन्हें नज़दीकी कैंप की जगह बताई, जहां सरेंडर पर बातचीत हुई. इसके बाद पिछले साल 15 अक्टूबर को 50 माओवादी कैडरों ने हथियार डाल दिए.

कांकेर के पत्रकार मंकू नेताम (नीली टी-शर्ट में) पिछले अक्टूबर में जगदलपुर में सरेंडर से पहले माओवादी कैडरों के साथ | फोटो: स्पेशल अरेंजमेंट
कांकेर के पत्रकार मंकू नेताम (नीली टी-शर्ट में) पिछले अक्टूबर में जगदलपुर में सरेंडर से पहले माओवादी कैडरों के साथ | फोटो: स्पेशल अरेंजमेंट

दो दिन बाद, मंकू और अंकुर ने 160 और माओवादी कैडरों के सरेंडर में मदद की.

अंकुर ने बताया कि 50 कैडरों के सरेंडर से पहले ही अगले समूह के सरेंडर की तैयारी शुरू हो गई थी.

उन्होंने कहा, “यह बहुत थकाने वाला काम था. जब हम सब जगदलपुर पहुंचे तो रात हो चुकी थी और मैं पूरी तरह थक गया था. फिर पुलिस ने मुझे एक ड्राइवर दिया और मैं बीजापुर के इंद्रावती इलाके गया, जहां मैंने 150 से ज्यादा कैडरों के सरेंडर में मदद की.”

पत्रकार अंकुर तिवारी (टी-शर्ट में) सरेंडर से पहले माओवादी कैडरों के साथ | फोटो: स्पेशल अरेंजमेंट
पत्रकार अंकुर तिवारी (टी-शर्ट में) सरेंडर से पहले माओवादी कैडरों के साथ | फोटो: स्पेशल अरेंजमेंट

यह भारत में माओवादियों का अब तक का सबसे बड़ा सामूहिक सरेंडर था और यह अंकुर, मंकू और रानू तिवारी जैसे स्थानीय पत्रकारों के बिना संभव नहीं था.

आखिर में तिवारी ने कहा, “देश में माओवादी आंदोलन के इतिहास और उसके संदर्भ पर बहस हो सकती है, लेकिन सच यह है कि माओवादी कैडरों के सरेंडर में सबसे पहले हमने ही मदद की.”

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


यह भी पढ़ें: ‘जल, जंगल, ज़मीन’ से रोज़गार तक: सरेंडर के बाद नई राह पर माओवादी


 

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