बहुत मुश्किल हालात में भी जबरदस्त हिम्मत के साथ लड़े गए कारगिल युद्ध के इतिहास में महावीर चक्र विजेता (एमवीसी) कर्नल सोनम वांगचुक की कहानी सबसे अलग है, किसी चमत्कार की वजह से नहीं बल्कि उनके शांत और मजबूत नेतृत्व की वजह से. दिल का दौरा पड़ने से उनके निधन के साथ देश ने सिर्फ एक सम्मानित सैनिक ही नहीं, बल्कि एक खास इंसान को भी खो दिया है, जो बहुत सरल, ज़मीन से जुड़े और इंसानियत से भरे हुए थे.
1999 के कारगिल युद्ध के दौरान, जब हम अलग-अलग इलाकों में ऑपरेशन कर रहे थे, तब मुझे उन्हें करीब से जानने का मौका मिला. हम कई बार मिले, बातें कीं और कई कार्यक्रमों में साथ भाषण भी दिए. फौजी वर्दी और वीरता के मेडल्स के नीचे एक ऐसा इंसान था, जिसमें बहुत ही कम मिलने वाली विनम्रता थी. उनमें अपनी तारीफ करने की जरा भी आदत नहीं थी और न ही अपनी उपलब्धियों का कोई दिखावा था. वे अपने अनुभवों को हल्के में बताते थे, बहुत अपनापन से बात करते थे और लोगों से आसानी से घुलमिल जाते थे. अनुशासन और ताकत के लिए जाने जाने वाले फौज जैसे संगठन में भी वे अपनी सादगी की वजह से अलग नज़र आते थे.
लद्दाख के कठिन इलाके में जन्मे सोनम को जैसे पहाड़ों ने ही अपने जैसा बना दिया था. वे मुश्किल हालात से लड़ने वाले, शांत दिमाग के और बिना दिखावे के इंसान थे. असम रेजीमेंट में कमीशन मिलने के बाद और फिर लद्दाख स्काउट्स के साथ काम करते हुए वे कई सालों तक सबसे कठिन ऑपरेशनों में शामिल रहे. लेकिन 1999 की गर्मियों में उन्होंने जो किया, उसने उन्हें अलग पहचान दी.

कारगिल युद्ध में बटालिक सेक्टर बहुत ही कठिन था. यह समुद्र तल से 5,000 मीटर से भी ज्यादा ऊंचाई पर है, जहां पहाड़ खतरनाक हैं और मौसम बेहद खराब रहता है. यहां हर ऑपरेशन के लिए बहुत ज्यादा शारीरिक ताकत और साफ दिमाग की ज़रूरत होती है. इसी जगह 30 मई 1999 को उस समय के मेजर सोनम वांगचुक अपनी छोटी टीम के साथ नियंत्रण रेखा के पास एक ऊंची पहाड़ी की रक्षा कर रहे थे.
इसके बाद जो हुआ, वह सेना के इतिहास का हिस्सा बन गया. उनकी टीम को ऊपर बैठे दुश्मन ने घेर लिया. दोनों तरफ से गोलीबारी में उनका एक जवान मारा गया. हालात बिगड़ सकते थे, लेकिन मेजर वांगचुक ने ऐसा नेतृत्व दिखाया, जो सच्चे लीडर की पहचान है.


उन्होंने अपने जवानों का हौसला बढ़ाया, स्थिति को सही तरीके से समझा और तुरंत फैसला लिया. पीछे हटने के बजाय उन्होंने दुश्मन पर साइड से हमला करने का फैसला किया और बचाव को हमला बना दिया. ऊंचे पहाड़ों पर, जहां सांस लेना भी मुश्किल होता है, लगातार गोलीबारी के बीच उन्होंने खुद आगे बढ़कर हमला किया. दुश्मन को पीछे हटना पड़ा, उसके कई सैनिक मारे गए और उनके हथियार भी छीन लिए गए. ऑपरेशन खत्म होने तक पूरे इलाके को नियंत्रण रेखा तक खाली करा लिया गया. यह उस युद्ध की पहली बड़ी सफलता थी.
इस बहादुरी के लिए उन्हें महावीर चक्र दिया गया. लेकिन जब भी इस बारे में उनसे बात होती, वे कोई दिखावा नहीं करते थे. वे बस इतना कहते कि उन्होंने वही किया जो जरूरी था.
यही उनकी असली पहचान थी. उनके लिए बहादुरी नाम कमाने का तरीका नहीं, बल्कि जिम्मेदारी थी. वे हमेशा सोच-समझकर, शांति से और दूसरों का सम्मान करते हुए बात करते थे. लोगों को सहज महसूस कराना उनकी आदत थी. यह गुण बहुत कम लोगों में होता है, खासकर उनमें जिन्होंने जिंदगी में इतनी मुश्किलें देखी हों.
उनकी मौत से जो खालीपन आया है, वह सिर्फ एक सैनिक के जाने का नहीं है, बल्कि एक महान इंसान के जाने का है. हमने एक ऐसे व्यक्ति को खोया है, जिसमें एक सैनिक के सबसे अच्छे गुण थे—काम में बेहतरीन, स्वभाव में सादगी और दिल में करुणा. उन्हें याद करते हुए यह भी याद आता है कि असली महानता कभी शोर नहीं करती.
कर्नल सोनम वांगचुक का जीवन सिर्फ युद्ध की बहादुरी ही नहीं, बल्कि अच्छे चरित्र की भी मिसाल था. जब जरूरत पड़ी, उन्होंने बहादुरी दिखाई, और बाकी समय बहुत सादा जीवन जिया, जबकि वे चाहें तो अलग जीवन जी सकते थे.
उन्हें आखिरी विदाई देते हुए हम सिर्फ एक सैनिक नहीं, बल्कि एक अच्छे इंसान को सम्मान दे रहे हैं. और सबसे बड़ी बात, उन्होंने आखिरी समय तक एक नेक इंसान की तरह जीवन जिया.
रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल वाई.के. जोशी (PVSM, UYSM, AVSM, VrC, SM) उत्तरी कमान के आर्मी कमांडर रह चुके हैं. कारगिल युद्ध में वे 13 JAK RIF के कमांडर थे. इसी बटालियन ने द्रास और मुश्कोह घाटी में अहम प्वाइंट 5140 और प्वाइंट 4875 पर कब्जा किया था. 13 JAK RIF को कुल 37 वीरता पुरस्कार मिले थे, जिनमें कैप्टन विक्रम बत्रा को मरणोपरांत और राइफलमैन संजय कुमार को मिला परम वीर चक्र भी शामिल है. ये उनके निजी विचार हैं.
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