नई दिल्ली: अपने आधिकारिक आवास पर कथित नकदी बरामदगी के विवाद के एक साल बाद, इलाहाबाद हाई कोर्ट के जज जस्टिस यशवंत वर्मा ने राष्ट्रपति को अपना इस्तीफा सौंप दिया.
उन्होंने पत्र में लिखा, “मैं आपके सम्मानित कार्यालय को उन कारणों का बोझ नहीं देना चाहता, जिनकी वजह से मुझे यह पत्र लिखना पड़ रहा है, लेकिन गहरे दुख के साथ मैं इलाहाबाद हाई कोर्ट के जज पद से तुरंत प्रभाव से इस्तीफा देता हूं.”
पत्र 9 अप्रैल का है.
उन्होंने लिखा, “इस पद पर सेवा करना मेरे लिए सम्मान की बात रही है.”
यह इस्तीफा उस समय आया है जब उन पर लगे आरोपों की संसदीय जांच शुक्रवार से शुरू होने वाली थी. दिप्रिंट को जानकारी मिली है कि अभियोजन पक्ष अपने गवाहों की जांच पूरी कर चुका था और बचाव पक्ष आज अपनी दलीलें शुरू करने वाला था.
इस इस्तीफे के साथ ही जजेज (इंक्वायरी) एक्ट 1968 के तहत उनके खिलाफ चल रही कार्यवाही आधिकारिक रूप से बंद हो जाती है. यह मामला तब शुरू हुआ था जब दिल्ली स्थित उनके आधिकारिक आवास पर कथित तौर पर 15 करोड़ रुपये की जली हुई नकदी मिली थी. बाद में उन्हें दिल्ली हाई कोर्ट से उनके मूल कोर्ट इलाहाबाद हाई कोर्ट ट्रांसफर कर दिया गया था.
इस्तीफे के बाद राष्ट्रपति के इसे स्वीकार करने पर उनके खिलाफ आपराधिक जांच का रास्ता खुला रह सकता है.
लोकसभा स्पीकर ओम बिरला द्वारा अगस्त 2025 में गठित तीन सदस्यीय समिति में सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस अरविंद कुमार, बॉम्बे हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस चंद्रशेखर और कर्नाटक हाई कोर्ट के वरिष्ठ वकील बी.वी. आचार्य शामिल थे. इस समिति ने आरोपों की जांच की थी और 9 गवाहों से पूछताछ की गई थी.
जनवरी में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि लोकसभा स्पीकर द्वारा कथित नकदी बरामदगी की जांच के लिए बनाई गई समिति के गठन में कोई प्रक्रिया संबंधी कमी नहीं है.
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस एस.सी. शर्मा की बेंच ने जस्टिस वर्मा की याचिका खारिज कर दी थी, जिसमें उन्होंने इस तीन सदस्यीय समिति के गठन को चुनौती दी थी, जो उनके खिलाफ महाभियोग प्रक्रिया का हिस्सा थी.
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