कोलकाता: पश्चिम बंगाल में लगभग 27 लाख लोगों के नाम, जिन्हें न्यायिक अधिकारियों की जांच के बाद वोटर लिस्ट से हटाया गया है, उनमें सबसे ज्यादा करीब 4.55 लाख नाम मुर्शिदाबाद जिले से हैं.
2011 की जनगणना के अनुसार 71 लाख आबादी वाले इस जिले में 66 प्रतिशत मुस्लिम और 33 प्रतिशत हिंदू हैं, जैसा कि जिला प्रशासन की वेबसाइट के डेटा में बताया गया है. मुर्शिदाबाद में 22 विधानसभा सीटें हैं और 4.55 लाख नाम हटने का मतलब है कि औसतन हर सीट से 20,668 नाम हटाए गए.
दो अन्य मुस्लिम बहुल जिले—मालदा और नॉर्थ दिनाजपुर में भी बड़ी संख्या में नाम हटाए गए. मालदा में 2.49 लाख नाम अयोग्य पाए गए, जबकि नॉर्थ दिनाजपुर में यह संख्या 1.76 लाख रही.
नाम न बताने की शर्त पर तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के एक नेता ने कहा, मुस्लिम बहुल सीटों में इतने ज्यादा नाम हटने का असर चुनाव नतीजों पर पड़ सकता है. हालांकि, उन्होंने कोई खास आंकड़ा नहीं बताया.
सिर्फ टीएमसी ही नहीं, भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) भी नॉर्थ-24 परगना और नदिया में बड़ी संख्या में नाम हटने के असर का आकलन कर रहे हैं. इन दोनों जिलों में मतुआ समुदाय के बड़ी संख्या में लोग रहते हैं, जिन्हें बीजेपी का कोर वोटर माना जाता है.
मतुआ समुदाय अनुसूचित जाति में आता है और पश्चिम बंगाल की आबादी का लगभग 17 प्रतिशत हिस्सा है. नॉर्थ 24 परगना में मतुआ लगभग 30 प्रतिशत आबादी हैं. यहां 3.25 लाख नाम हटाए गए.
कुल मिलाकर पश्चिम बंगाल में मतदाताओं की संख्या 28 फरवरी को चुनाव आयोग (ईसी) द्वारा जारी अंतिम सूची के बाद 7.04 करोड़ है. करीब 60 लाख नाम इसलिए हटाए गए क्योंकि वे लोग या तो मर चुके हैं या अब पश्चिम बंगाल में नहीं रहते.
इसके अलावा 60.06 लाख नाम, जिनमें तार्किक गड़बड़ी थी, जैसे नाम या जन्म तारीख में अंतर, उन्हें जांच के लिए भेजा गया. इन 60.06 लाख नामों में से चुनाव आयोग ने सोमवार रात बताया कि 58 लाख नामों की जांच हो चुकी है, जिनमें से करीब 27 लाख नाम अयोग्य पाए गए और वोटर लिस्ट से हटा दिए गए.
प्रेस कॉन्फ्रेंस में पश्चिम बंगाल के मुख्य चुनाव अधिकारी (सीईए) मनोज कुमार अग्रवाल ने कहा कि जिन 27 लाख लोगों के नाम हटे हैं, वे पुनर्विचार के लिए अपीलेट ट्रिब्यूनल में अपील कर सकते हैं. अगर ट्रिब्यूनल उनका नाम सही मान लेता है, तो उनका नाम वोटर लिस्ट में जोड़ा जाएगा और वे फिर से वोट दे सकेंगे, लेकिन इस चुनाव में नहीं. सुप्रीम कोर्ट ने 19 अपीलेट ट्रिब्यूनल बनाए हैं.
पश्चिम बंगाल में दो चरणों में मतदान होगा. कुल 294 सीटों में से 152 सीटों पर पहले चरण में 23 अप्रैल को और बाकी 147 सीटों पर दूसरे चरण में 29 अप्रैल को वोटिंग होगी.
निर्वाचन क्षेत्रों की जनसंख्या संरचना
चुनाव आयोग ने जिन लोगों के नाम वोटर लिस्ट से हटाए गए हैं, उनकी सूची सार्वजनिक नहीं की है. आयोग ने सिर्फ विधानसभा क्षेत्रों के नाम और उनमें योग्य या अयोग्य पाए गए लोगों की कुल संख्या जारी की है.
लेकिन जिलों की वेबसाइट पर उपलब्ध जानकारी के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों की जनसंख्या संरचना देखने पर पता चलता है कि जिन क्षेत्रों में मुस्लिम आबादी ज्यादा है, वहां बड़ी संख्या में नाम हटाए गए हैं.
उदाहरण के लिए मुर्शिदाबाद, जहां 4.55 लाख नाम हटाए गए, वहां कुल आबादी 71 लाख है. इसमें 66 प्रतिशत मुस्लिम और 33 प्रतिशत हिंदू हैं, जैसा कि जिला प्रशासन के डेटा में बताया गया है.

इसी तरह मालदा, जहां तीसरे सबसे ज्यादा 2.39 लाख नाम हटाए गए, वहां कुल आबादी 39 लाख है. इसमें 51 प्रतिशत मुस्लिम और 48 प्रतिशत हिंदू हैं. यहां 12 विधानसभा सीटों में औसतन हर सीट से 19,948 नाम हटाए गए.
हालांकि, सिर्फ मुस्लिम आबादी वाले क्षेत्रों में ही ज्यादा नाम नहीं हटे हैं. कुछ ऐसे निर्वाचन क्षेत्र भी हैं जहां हिंदू आबादी ज्यादा है और वहां भी बड़ी संख्या में नाम हटाए गए. लेकिन जिन लोगों के नाम हटे हैं उनकी जनसंख्या संरचना तय करना मुश्किल है, क्योंकि चुनाव आयोग का डेटा सिर्फ योग्य और अयोग्य लोगों की संख्या बताता है.
उदाहरण के लिए नॉर्थ-24 परगना में दूसरे सबसे ज्यादा 3.25 लाख नाम वोटर लिस्ट से हटाए गए. इस जिले में पांच सब-डिवीजन हैं—बरासात, बैरकपुर, बोंगांव, बसीरहाट और बिधाननगर. जिले की कुल 1 करोड़ आबादी में 74 प्रतिशत हिंदू और 25 प्रतिशत मुस्लिम हैं.
हुगली में लगभग 1.20 लाख नाम वोटर लिस्ट से हटाए गए. यहां कुल 55 लाख आबादी में करीब 83 प्रतिशत हिंदू और 15.77 प्रतिशत मुस्लिम हैं.
इसके विपरीत झारग्राम और पुरुलिया जैसे क्षेत्रों में, जहां बीजेपी की मौजूदगी है, कम नाम हटाए गए. पुरुलिया में 5,942 और झारग्राम में 1,240 नाम हटे.
पूर्व चुनाव आयुक्त अशोक लवासा ने कहा कि मुख्य चुनाव अधिकारी की कार्रवाई मौजूदा नियमों और कानून के अनुसार है, क्योंकि नियमों के अनुसार तय समय सीमा तक सूची जारी करना जरूरी होता है.
उन्होंने दिप्रिंट से कहा, “कानून में ऐसी स्थिति का प्रावधान नहीं है, जहां अपीलेट ट्रिब्यूनल अंतिम वोटर लिस्ट जारी होने और मतदान की तारीख के बीच फैसला दे. इसके लिए अदालत का आदेश जरूरी होगा कि जिन मामलों में ट्रिब्यूनल ने लोगों के पक्ष में फैसला दिया है, उनकी अलग सूची जारी की जाए.”
उन्होंने कहा कि जिन लोगों को बाद में योग्य पाया जाएगा, वे इस चुनाव में वोट देने के अधिकार से वंचित रहेंगे. “यह स्थिति चुनाव आयोग द्वारा शुरू की गई प्रक्रिया के कारण हुई है, इसमें उन लोगों की कोई गलती नहीं है.”
नई दिल्ली से अपूर्वा मंधानी के इनपुट्स के साथ.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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