कोलकाता/दिल्ली: पश्चिम बंगाल में लगभग 27 लाख लोग इस चुनाव में वोट नहीं दे पाएंगे क्योंकि न्यायिक अधिकारियों के फैसले के बाद उनके नाम वोटर लिस्ट से हटा दिए गए हैं.
सोमवार देर रात प्रेस कॉन्फ्रेंस में पश्चिम बंगाल के मुख्य चुनाव अधिकारी (सीईओ) मनोज कुमार अग्रवाल ने कहा कि पहले चरण के लिए वोटर लिस्ट आधी रात को फ्रीज़ कर दी जाएगी. उन्होंने बताया कि सोमवार शाम तक न्यायिक अधिकारियों द्वारा निपटाए गए 58 लाख मामलों में से लगभग 45 प्रतिशत नाम वोटर लिस्ट से हटा दिए जाएंगे. इसका मतलब लगभग 27 लाख वोटर हैं.
उन्होंने कहा, “जिन वोटरों के नाम न्यायिक अधिकारियों ने हटा दिए हैं, वे अपीलेट ट्रिब्यूनल में जा सकते हैं. अगर ट्रिब्यूनल उनके नाम को मंजूरी दे देता है, तो उनका नाम वोटर लिस्ट में शामिल हो जाएगा और वे बाद में वोट दे सकेंगे, लेकिन इस चुनाव में नहीं.”
जिन पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्तों से दिप्रिंट ने बात की, उनका कहना है कि पहली बार इतना बड़ा संख्या में लोगों को वोट देने के अधिकार से वंचित किया जाएगा.
28 फरवरी तक, जब स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के बाद अंतिम वोटर लिस्ट जारी हुई, पश्चिम बंगाल में कुल वोटरों की संख्या 7.04 करोड़ थी. SIR प्रक्रिया शुरू होने से पहले राज्य में 7.66 करोड़ वोटर थे, यानी 8.09 प्रतिशत की कमी आई.
ईसीआई ने 28 फरवरी को पश्चिम बंगाल की अंतिम वोटर लिस्ट जारी की थी, जिसके अनुसार 60 लाख लोगों के नाम हटा दिए गए और 60.06 लाख नाम, जिनके दस्तावेजों में “तार्किक गड़बड़ी” थी—जांच के लिए रखे गए.
सुप्रीम कोर्ट, जो पश्चिम बंगाल SIR मामले की सुनवाई कर रहा है, को सोमवार को कलकत्ता हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने बताया कि सोमवार दोपहर 12:04 बजे तक न्यायिक अधिकारियों ने 60 लाख में से 59.15 लाख मामलों पर फैसला कर दिया था. ईसीआई ने सुप्रीम कोर्ट को यह भी बताया कि सोमवार दोपहर तक सिर्फ 26,000 आपत्तियां बाकी थीं और उन्हें देर रात तक निपटा दिया जाएगा.
19 अपीलेट ट्रिब्यूनल अभी शुरू नहीं हुए
परेशानी यहीं खत्म नहीं होती, जिन लोगों के नाम वोटर लिस्ट से हटाए गए हैं, उन्हें अपीलेट ट्रिब्यूनल में चुनौती देने का अधिकार है, लेकिन यहां भी समस्या है: 19 अपीलेट ट्रिब्यूनल में से अभी तक सिर्फ छह ही काम शुरू कर पाए हैं, जिनकी अध्यक्षता रिटायर्ड जज कर रहे हैं.
सोमवार को जब दिप्रिंट ने साल्ट लेक स्थित स्यामा प्रसाद मुखर्जी–नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ ड्रिंकिंग वॉटर एंड सैनिटेशन बिल्डिंग का दौरा किया, जहां 19 अपीलेट ट्रिब्यूनल काम करेंगे—तो वहां दफ्तर बनाने का काम चल रहा था. गेट पर मौजूद गार्ड ने बताया कि ट्रिब्यूनल अभी शुरू नहीं हुए हैं और फिलहाल दफ्तर तैयार किए जा रहे हैं.
अभी तक अपीलेट ट्रिब्यूनल ने पांच मामलों की सुनवाई की है, जिनमें मुर्शिदाबाद के फरक्का विधानसभा सीट से कांग्रेस उम्मीदवार मोहताब शेख का मामला भी शामिल है, जिनका नाम जांच में था. सोमवार को नामांकन की आखिरी तारीख थी, इसलिए ट्रिब्यूनल ने सुनवाई के बाद निर्देश दिया कि शेख का नाम फिर से वोटर लिस्ट में जोड़ा जाए.
दिन में पहले दिप्रिंट से बात करते हुए पूर्व सीईली एसवाई कुरैशी ने कहा कि सत्यापन की प्रक्रिया पूरी नहीं हुई थी, इसलिए कमी प्रशासन की है, वोटर की नहीं.
कुरैशी ने कहा, “उन्हें वोट देने से नहीं रोका जा सकता. सुप्रीम कोर्ट को आदेश देना चाहिए कि जिन लोगों के मामले लंबित हैं, उन्हें इस चुनाव में वोट देने दिया जाए और सत्यापन की प्रक्रिया चुनाव के बाद भी चल सकती है.”
उन्होंने कहा कि आदर्श स्थिति में अपील की प्रक्रिया भी चुनाव के लिए वोटर लिस्ट फाइनल होने से पहले पूरी हो जानी चाहिए. जब तक ऐसा नहीं होता, तब तक वोटर लिस्ट को अंतिम मानना सही नहीं है, क्योंकि वोटरों की बात नहीं सुनी गई.
पूर्व चुनाव आयुक्त अशोक लवासा ने भी कहा कि नामांकन की तारीख तक वोटर लिस्ट पूरी तरह अंतिम हो जानी चाहिए. “अगर प्रक्रिया यह सुनिश्चित नहीं करती कि उस समय तक सूची पूरी और अंतिम हो, तो कुछ लोग बाहर रह जाएंगे…इस मामले में प्रक्रिया ईसीआई ने शुरू की और सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप से जांच की व्यवस्था की गई. अगर इस प्रक्रिया में सभी लंबित मामलों पर फैसला नहीं होता, तो कुछ लोग बाहर रह जाएंगे. अगर सिस्टम उनकी दावेदारी की सच्चाई तय नहीं कर पा रहा और इस वजह से लोग बाहर रह जाते हैं, तो यह उनके साथ अन्याय है.”
उन्होंने एक स्थिति का उदाहरण दिया, जिसमें अपीलेट ट्रिब्यूनल मतदान खत्म होने के बाद फैसला देता है और वोटर के दावे को सही ठहराता है. उन्होंने सवाल किया, “क्या इसका मतलब नहीं कि उस व्यक्ति को वोट देने का संवैधानिक अधिकार एक प्रशासनिक प्रक्रिया की वजह से छीन लिया गया?”
उन्होंने कहा, “चुनाव कराने और वोटर लिस्ट तैयार करने वाली संस्था होने के नाते आपने वोटर लिस्ट बनाने की प्रक्रिया शुरू की. अगर आपको भरोसा नहीं था कि वोटर लिस्ट समय पर पूरी हो जाएगी, तो चुनाव की घोषणा नहीं करनी चाहिए थी. पिछले 75 साल में ऐसा नहीं हुआ है.”
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