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Thursday, 9 April, 2026
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केरल में वोटिंग से दो दिन पहले, सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों की बेंच सबरीमाला मंदिर केस की सुनवाई शुरू करेगी

मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर चल रहा विवाद बराबरी के अधिकार और धर्म की आज़ादी के अधिकार पर और स्पष्टता ला सकता है.

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नई दिल्ली: इंडियन यंग लॉयर्स एसोसिएशन द्वारा पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन (PIL) दाखिल किए जाने के दो दशक बाद भी, सबरीमाला मंदिर केस के कानूनी और राजनीतिक असर महसूस किए जा रहे हैं.

सुप्रीम कोर्ट 7 अप्रैल 2026 को इस केस में ‘कानूनी सवालों’ पर सुनवाई शुरू करेगा, जो केरल में नई सरकार चुनने के लिए होने वाले चुनाव से दो दिन पहले होगी. यह मामला राज्य में अभी भी राजनीतिक रूप से संवेदनशील मुद्दा बना हुआ है.

इस याचिका को सबसे पहले इंडियन यंग लॉयर्स एसोसिएशन ने 2006 में दाखिल किया था. इसमें सबरीमाला मंदिर में ‘मासिक धर्म वाली महिलाओं’ (10 से 50 साल की उम्र) के प्रवेश पर लगे पारंपरिक प्रतिबंध को चुनौती दी गई थी. उनका कहना था कि यह प्रतिबंध संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत मिलने वाले बराबरी के अधिकार और अनुच्छेद 25 के तहत धर्म मानने और पालन करने की आज़ादी के अधिकार का उल्लंघन है.

मंदिर का प्रबंधन करने वाली संस्था ट्रावनकोर देवस्वम बोर्ड ने कहा कि महिलाओं के प्रवेश पर रोक एक ज़रूरी धार्मिक परंपरा है. उन्होंने खुद को एक धार्मिक समूह बताया. संविधान का अनुच्छेद 26 धार्मिक समूहों को अपने धार्मिक मामलों को संभालने का अधिकार देता है. दिलचस्प बात यह है कि इंडियन यंग लॉयर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष ने जान से खतरे की बात कहते हुए याचिका वापस लेने की मांग की थी, लेकिन कोर्ट ने मना कर दिया और कहा कि एक बार दायर की गई याचिका जनता की हो जाती है.

‘कमतर भगवान की संतान’

2018 में सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रतिबंध को असंवैधानिक बताया और कहा कि यह अनुच्छेद 15 और 25 का उल्लंघन है. उस समय के चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच जजों की बेंच ने कहा, “महिलाओं को कमतर भगवान की संतान मानना संविधान की अनदेखी करना है.”

कोर्ट ने यह भी कहा कि अय्यप्पा भक्त कोई अलग धार्मिक समूह नहीं हैं, इसलिए यह ज़रूरी धार्मिक परंपरा नहीं है जिसे कानून से सुरक्षा मिलती हो. जस्टिस इंदु मल्होत्रा (अब रिटायर) ने इस फैसले से असहमति जताई और कहा कि धर्म के मामलों में तर्क का इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए.

इस फैसले पर लोगों की राय अलग-अलग रही. कुछ ने इसे प्रगतिशील बताया, जबकि कुछ ने कहा कि कोर्ट ने अपनी सीमा से ज्यादा हस्तक्षेप किया. 50 से ज्यादा रिव्यू याचिकाएं दाखिल की गईं, जिनमें मंदिर के मुख्य पुजारी कंतारू राजीवरु, नेशनल अय्यप्पा डिवोटी (वुमन) एसोसिएशन, ऑल केरल ब्राह्मिन एसोसिएशन और नायर सर्विस सोसाइटी शामिल थे.

रिव्यू याचिका दायर करने वालों का कहना था कि कोर्ट ने अय्यप्पा भक्तों को अलग धार्मिक समूह नहीं मानकर गलती की. उनका कहना था कि यह प्रतिबंध भगवान अय्यप्पा, जिन्हें ब्रह्मचारी माना जाता है, की परंपरा को बनाए रखने के लिए है, न कि महिलाओं के साथ भेदभाव करने के लिए. यह भी कहा गया कि मूल याचिका दायर करने वाले खुद भक्त नहीं थे, इसलिए उनकी याचिका मान्य नहीं होनी चाहिए थी.

2019 में रिव्यू याचिकाओं की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने 3:2 बहुमत से कुछ ‘कानूनी सवाल’ बड़ी बेंच को भेजने का फैसला किया. कोर्ट ने कहा कि अन्य धर्मों से जुड़े ऐसे कई मामले लंबित हैं जिनमें समान सवाल उठते हैं, जैसे दरगाह या मस्जिद में मुस्लिम महिलाओं का प्रवेश, गैर-पारसी से शादी करने वाली पारसी महिला का फायर टेम्पल में प्रवेश और दाऊदी बोहरा समुदाय में महिला जननांग काटने की प्रथा.

बहुमत ने कहा कि बड़ी बेंच का फैसला संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 से जुड़े अधिकारों पर बार-बार उठने वाले सवालों को स्पष्ट करेगा.

कोर्ट ने कहा कि रिव्यू याचिकाओं पर फैसला इन बड़े संवैधानिक सवालों के तय होने के बाद लिया जाएगा.

2020 में उस समय के चीफ जस्टिस एस.ए. बोबडे की अध्यक्षता में नौ जजों की बेंच ने इस प्रारंभिक सवाल को माना कि क्या रिव्यू याचिका में कोर्ट कानूनी सवाल बड़ी बेंच को भेज सकता है. बाद में कोर्ट ने इस प्रक्रिया को सही ठहराया और विस्तृत आदेश दिया. मौजूदा चीफ जस्टिस सूर्यकांत भी उस नौ जजों की बेंच का हिस्सा थे. नौ जजों की बेंच का फैसला संविधान की व्याख्या में बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है.

सुप्रीम कोर्ट नियम 2013 और संविधान के अनुच्छेद 142 और 145 का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि उसे अपने अधिकार क्षेत्र से जुड़े सवाल तय करने का अधिकार है, जब तक कि संविधान खुद उसे सीमित न करे.

फरवरी 2026 में कोर्ट ने इस सुनवाई के लिए विस्तृत आदेश जारी किया और दोनों पक्षों को अपनी दलीलें पूरी करने की समयसीमा तय की. सीनियर एडवोकेट के. परमेश्वर और एडवोकेट शिवम सिंह को अदालत का सहयोग करने के लिए एमिकस क्यूरी नियुक्त किया गया. कुल 66 जुड़े मामलों को इस सुनवाई के साथ जोड़ा गया, जिनमें मुस्लिम महिलाएं, दाऊदी बोहरा और पारसी/गैर-पारसी मामले शामिल हैं.

कोर्ट के निर्देश के अनुसार सभी पक्षों ने तय तारीख से पहले अपनी लिखित दलीलें दाखिल कर दी हैं. मुख्य रूप से बहस इस बात पर है कि जरूरी धार्मिक परंपरा किसे माना जाए और क्या कोर्ट को यह तय करना चाहिए.

जैन संगठनों के एक समूह ने कहा कि कोर्ट को धर्म के अंदरूनी मामलों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए और अनुच्छेद 25 के तहत धर्म की आजादी की रक्षा करनी चाहिए. उन्होंने ‘ज़रूरी धार्मिक परंपरा’ के सिद्धांत पर भी सवाल उठाया, जिसे कोर्ट ने शिरूर मठ केस में बनाया था.

ऑल इंडिया मुस्लिम लॉ बोर्ड ने भी कहा कि कोर्ट को धार्मिक प्रथाओं की प्रकृति तय नहीं करनी चाहिए. बोर्ड ने कहा कि धर्म और लिंग एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं. अखिल भारतीय संत समिति ने भी कहा कि कोर्ट धार्मिक विशेषज्ञ नहीं है.

केरल सरकार ने कहा कि किसी भी न्यायिक फैसले से पहले धार्मिक विद्वानों और सामाजिक सुधारकों से सलाह लेनी चाहिए. सबरीमाला मंदिर का प्रबंधन करने वाले ट्रावनकोर देवस्वम बोर्ड ने कोर्ट से कहा कि वह धार्मिक मान्यताओं का फैसला करने के बजाय लोगों की आस्था का सम्मान करे.

7 अप्रैल 2026 को जब नौ जजों की बेंच बैठेगी, तो सबरीमाला मामला सुप्रीम कोर्ट के सामने एक बड़ी परीक्षा होगा. कोर्ट 2018 के फैसले को बरकरार रखता है या धार्मिक स्वतंत्रता को प्राथमिकता देता है, इससे संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 25 और 26 के बीच संतुलन तय होगा.

यह फैसला सिर्फ यह तय नहीं करेगा कि सबरीमाला मंदिर की 18 सीढ़ियां कौन चढ़ सकता है, बल्कि यह भी तय करेगा कि एक लोकतांत्रिक देश धार्मिक परंपराओं और आधुनिक अधिकारों के बीच संतुलन कैसे बनाए.

सौम्या शर्मा दिप्रिंट स्कूल ऑफ जर्नलिज्म की पूर्व छात्रा हैं और दिप्रिंट में इंटर्न हैं.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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