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Friday, 10 April, 2026
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पश्चिम एशिया तनाव का असर: हीलियम के कारण नए MRI स्कैन लगाना पड़ सकता है महंगा

कतर में ईरान से जुड़े व्यवधान से हीलियम निर्यात प्रभावित, भारत में MRI सेवाएं फिलहाल स्थिर; लेकिन बढ़ती लागत से नए मशीन लगने में देरी और पुराने स्कैनर पर बोझ संभव.

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नई दिल्ली: दो मार्च को कतर के रास लाफान इंडस्ट्रियल सिटी पर ईरान से जुड़े हमलों ने ग्लोबल हीलियम मार्केट को झटका दिया है और इसका असर अब भारत के रेडियोलॉजी सेंटरों तक पहुंचने लगा है.

रेडियोलॉजिस्ट और Siemens जैसी मेडिकल टेक्नोलॉजी कंपनियों ने दिप्रिंट को बताया, डॉक्टर जिन बीमारियों जैसे कैंसर, न्यूरोलॉजिकल डिसऑर्डर और दिल से जुड़ी समस्याओं की पहचान के लिए एमआरआई स्कैन पर निर्भर रहते हैं, उन एमआरआई मशीनों की नई इंस्टॉलेशन महंगी हो सकती है, अगर सप्लाई में कमी और बढ़ती है.

कतर दुनिया की लगभग एक-तिहाई हीलियम सप्लाई देता है. हीलियम अलग से नहीं निकाला जाता—इसे LNG (लिक्विफाइड नेचुरल गैस) प्रोसेसिंग के दौरान बायप्रोडक्ट के रूप में हासिल किया जाता है. इसका महत्व इसलिए है क्योंकि कतर की सरकारी कंपनी QatarEnergy, जो देश के पूरे गैस एक्सपोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर को चलाती है, ने ईरानी हमलों के बाद अपने गैस शिपमेंट पर फोर्स मेज्योर घोषित कर दिया, जिसका मतलब है कि वह अपने नियंत्रण से बाहर की परिस्थितियों के कारण कॉन्ट्रैक्ट पूरे नहीं कर सकती—तो हीलियम एक्सपोर्ट भी रुक गया.

इस रुकावट का असर अब भारत में महसूस किया जा रहा है. हालांकि, इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स ने दिप्रिंट को बताया कि एमआरआई सेवाएं पूरी तरह बंद होने जैसी स्थिति, जिसका सबसे ज्यादा डर था—आने की संभावना कम है. भारत में अभी जो ज्यादातर एमआरआई मशीनें लगी हैं, वे आधुनिक तकनीक पर आधारित हैं, जिनमें बहुत कम हीलियम लगता है और नियमित रीफिल की ज़रूरत लगभग नहीं होती. सप्लाई में रुकावट का असर मुख्य रूप से उन अस्पतालों पर पड़ेगा, जो नई मशीन लगाने की योजना बना रहे हैं या जो अभी भी पुराने उपकरण इस्तेमाल कर रहे हैं.

Siemens Healthcare Private Limited के मैनेजिंग डायरेक्टर हरिहरन सुब्रमणियन ने कहा, “स्थिति ने चुनौतियां ज़रूर पैदा की हैं, लेकिन हमने अलग-अलग स्रोतों से सप्लाई और रणनीतिक स्टॉक रखने के जरिए अपने ऑपरेशन को जारी रखा है.” बेंगलुरु स्थित Siemens AG की यह इकाई मेडिकल टेक्नोलॉजी और इमेजिंग में विशेषज्ञ है.

कतर का आपके MRI स्कैन पर असर कैसे पड़ता है

कतर दुनिया की लगभग एक-तिहाई हीलियम सप्लाई करता है. एमआरआई मशीनों के लिए हीलियम ज़रूरी होता है क्योंकि यह सुपरकंडक्टिंग मैग्नेट को लगभग -269°C या 4 केल्विन तक ठंडा रखता है. बिना कूलिंग के स्कैनर काम नहीं कर सकता.

इस रुकावट का असर उन कंपनियों पर पड़ रहा है, जिन्होंने पहले ही पुराने दामों पर सप्लाई के समझौते कर रखे थे.

मैक्स हेल्थकेयर, नई दिल्ली में रेडियोलॉजी सर्विसेज के डायरेक्टर डॉ. भरत अग्रवाल ने कहा, “इक्विपमेंट बनाने वाली कंपनियों और सप्लायर को उन ऑर्डर के लिए हीलियम की बढ़ी हुई कीमत का सामना करना पड़ रहा है, जिनकी सप्लाई वे पहले ही तय कर चुके हैं. चुनौती यह है कि तय कीमत के बाद इन बढ़ी हुई लागत को अस्पतालों पर डालना आसान नहीं होता.”

उन्होंने दिप्रिंट को बताया, “हीलियम और लॉजिस्टिक्स की बढ़ी हुई लागत एमआरआई मशीनों की कीमत बढ़ा सकती है, जिससे नई मशीन खरीदने की योजना में देरी हो सकती है.”

आर्थिक दबाव भी स्थिति को और मुश्किल बना रहा है.

आंध्र प्रदेश मेडटेक ज़ोन (AMTZ) के मैनेजिंग डायरेक्टर और फाउंडर सीईओ डॉ. जितेंद्र शर्मा ने कहा, “ऊर्जा की लागत 1.5 से 2 गुना तक बढ़ गई है, जिसका सीधा असर हीलियम सहित इंडस्ट्रियल गैसों पर पड़ रहा है और पूरे सिस्टम में लागत का दबाव बढ़ रहा है.” AMTZ भारत का सबसे बड़ा मेडिकल डिवाइस मैन्युफैक्चरिंग क्लस्टर है, जो हेल्थकेयर उपकरणों के उत्पादन, परीक्षण और इनोवेशन को सपोर्ट करता है.

भारत में एमआरआई सेवाएं बंद क्यों नहीं होंगी

दिल्ली-एनसीआर में डायग्नोस्टिक सेंटर चलाने वाली Mahajan Imaging & Labs के फाउंडर और मैनेजिंग डायरेक्टर डॉ. हर्ष महाजन ने बताया, भारत में सरकारी और निजी क्षेत्र में करीब 4,800 एमआरआई मशीनें लगी हैं, जिनमें से ज्यादातर Zero Boil-Off (ZBO) तकनीक का इस्तेमाल करती हैं—इसमें लिक्विड हीलियम मशीन के अंदर सील रहता है और सामान्य उपयोग के दौरान उड़ता (evaporate) नहीं है. यह बंद रेफ्रिजरेशन सिस्टम में लगातार रीसायकल होता रहता है.

उन्होंने कहा, “अगर आज मैं एक मशीन खरीदता हूं, जिसमें लिक्विड हीलियम भरा है और वह 90 प्रतिशत है, तो चार साल बाद भी वह 90 प्रतिशत ही रहेगा—जब तक मशीन सही तरह से चलती रहे और कोई लीकेज न हो.”

भारत में लगी कुल मशीनों में से केवल लगभग 100–200 मशीनें ही पुरानी तकनीक वाली हैं, जिनमें समय-समय पर हीलियम भरने की ज़रूरत होती है, जिसे डॉ. महाजन ने “बहुत मामूली” बताया. उन्होंने दिप्रिंट से कहा, “देश में जो एमआरआई मशीनें पहले से लगी हैं, उन्हें किसी तरह की समस्या नहीं होगी.”

एमआरआई की कीमत पर क्या असर पड़ा

लागत का दबाव, भले ही बहुत बड़ा संकट नहीं है, लेकिन अब इसे साफ तौर पर मापा जा सकता है.

AMTZ द्वारा दिप्रिंट के साथ साझा किए गए अनुमान के अनुसार, हीलियम की कीमत ऐतिहासिक स्तर करीब 30–35 डॉलर प्रति लीटर से बढ़कर 50 डॉलर या उससे अधिक हो गई है. इससे कुल इंस्टॉलेशन लागत में 3-7 प्रतिशत तक बढ़ोतरी हुई है और एमआरआई सिस्टम की कीमत, जो आमतौर पर 1.5T से 3T मशीनों के लिए 5 करोड़ रुपये से 15 करोड़ रुपये के बीच होती है—लगभग 5 से 10 प्रतिशत तक बढ़ सकती है.

सबसे ज्यादा असर ऑपरेशन स्तर पर दिख रहा है. पहले एक बार हीलियम रीफिल कराने में लगभग 25 लाख रुपये खर्च होते थे, जो अब 35 लाख रुपये या उससे ज्यादा हो सकते हैं. कॉन्ट्रैक्ट की शर्तों के आधार पर यह 20 से 50 प्रतिशत तक बढ़ोतरी है, जिसमें पुरानी मैग्नेट सिस्टम और पूरी तरह आयात किए गए पैकेज वाले कॉन्ट्रैक्ट पर ज्यादा असर पड़ रहा है.

AMTZ के एमडी डॉ. शर्मा ने कहा, “एमआरआई प्रोजेक्ट में हीलियम पहले मुख्य लागत नहीं था, लेकिन अब यह कुल प्रोजेक्ट की लागत में एक अहम हिस्सा बन गया है—खासकर नई इंस्टॉलेशन के लिए.”

दबाव के मुख्य बिंदु: नई मशीनें और पुरानी मशीनें

इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स के अनुसार असर मुख्य रूप से दो जगह दिखेगा.

नई एमआरआई मशीनें पहले से भरे हुए लिक्विड हीलियम के साथ भेजी जाती हैं, लेकिन ट्रांसपोर्ट के दौरान कुछ हीलियम कम हो जाता है, इसलिए इंस्टॉलेशन के समय टॉप-अप करना पड़ता है. डॉ. महाजन ने कहा, “इसकी जिम्मेदारी इक्विपमेंट बनाने वाली कंपनियों—जैसे GE, Siemens और Philips—की होती है, जो हीलियम सप्लायर के साथ समन्वय करती हैं. वहां कुछ दिक्कत हो सकती है, लेकिन अस्पतालों या डायग्नोस्टिक सेंटर के लिए यह सीधी समस्या नहीं है.”

बेंगलुरु की एक मेडिकल टेक्नोलॉजी कंपनी के एक इंडस्ट्री स्रोत ने दिप्रिंट को बताया कि हीलियम की कमी चल रही है, हालांकि उनकी कंपनी मध्य-पूर्व और यूरोप के कई सप्लायर से गैस लेती है, जिससे सप्लाई में कुछ लचीलापन बना हुआ है.

उन्होंने कहा, “अभी तक तीन बड़ी कंपनियों—Siemens, GE Healthcare और Philips Healthcare—में से किसी ने भी बढ़ी हुई लागत सीधे अस्पतालों पर नहीं डाली है.”

दूसरा दबाव पुरानी मशीनों पर है. पुरानी एमआरआई मशीनें (1997–2005) हर महीने लगभग 1–3 प्रतिशत हीलियम खो देती हैं, इसलिए उन्हें बार-बार रीफिल करना पड़ता है और उनका रखरखाव महंगा होता है. इन मशीनों में आमतौर पर हीलियम का स्तर 40–60 प्रतिशत तक गिरने पर रीफिल करना ज़रूरी होता है, ताकि मशीन बंद न हो जाए. अब जब हीलियम कम उपलब्ध और महंगा हो गया है, तो यह नियमित रीफिल और महंगा हो जाएगा.

हरियाणा और राजस्थान में चार सेंटर चलाने वाले नारूला डायग्नोस्टिक्स सेंटर के ऑन्कोलॉजिस्ट डॉ. अर्जुन नारूला ने दिप्रिंट को बताया कि उन्होंने अपनी योजना के अनुसार मशीन अपग्रेड कम से कम छह महीने के लिए टाल दिया है.

‘टेक्नोलॉजी ही लंबी अवधि का समाधान है’

मैन्युफैक्चरर इसे हल करने के लिए नई टेक्नोलॉजी पर जोर दे रहे हैं. नई मशीनें (2005 के बाद की) Zero Boil-Off तकनीक का उपयोग करती हैं, जो हीलियम को मशीन के अंदर ही रीसायकल करती है. इससे हीलियम का नुकसान बहुत कम होता है और मशीन 7–10 साल तक बिना रीफिल के चल सकती है, जिससे यह ज्यादा टिकाऊ और किफायती बनती है.

अगली पीढ़ी की मशीनें इससे भी आगे हैं—हीलियम-फ्री एमआरआई सिस्टम, जिनमें मैग्नेट को ठंडा करने के लिए बहुत कम या बिल्कुल भी लिक्विड हीलियम की ज़रूरत नहीं होती. इसके बजाय ये conduction cooling जैसी वैकल्पिक कूलिंग तकनीक का इस्तेमाल करती हैं. इससे हीलियम पर निर्भरता कम होती है, मेंटेनेंस कम होता है, लागत घटती है और एमआरआई सिस्टम ज्यादा स्थिर, छोटे और इंस्टॉल करने में आसान हो जाते हैं.

AMTZ की मटेरियल साइंटिस्ट दिव्या पाटिल ने कहा, “टेक्नोलॉजी में बदलाव बहुत ज़रूरी है—कम हीलियम वाले एमआरआई सिस्टम में हीलियम की जरूरत लगभग 1,500 लीटर से घटकर 20 लीटर से भी कम हो सकती है, जबकि Zero Boil-Off और हीलियम-फ्री तकनीक लंबी अवधि का समाधान बनकर उभर रही हैं.”

Siemens पहले ही इस दिशा में आगे बढ़ चुका है. सुब्रमणियन ने कहा, “हमने DryCool तकनीक के साथ हीलियम-फ्री एमआरआई पेश किए हैं, जिनमें 1 लीटर से भी कम हीलियम की ज़रूरत होती है.”

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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