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Sunday, 5 April, 2026
होमफीचरछोटे शहरों के भारत की रील इकॉनमी की कहानी: लाइट्स, कैमरा और बेरोज़गारी

छोटे शहरों के भारत की रील इकॉनमी की कहानी: लाइट्स, कैमरा और बेरोज़गारी

तुलसी में ज़्यादातर कंटेंट क्रिएटर्स लॉग ऑफ कर चुके हैं और वापस खेतों, फैक्ट्रियों या बेरोज़गारी में लौट गए हैं. कम होते व्यूज़, आपसी मतभेद और शॉर्ट-फॉर्म वीडियो के साथ खुद को ढाल न पाने की वजह से यह गिरावट आई.

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भोपाल/इंदौर/विदिशा/रायपुर/तुलसी: टिकेश्वर वर्मा का फोन काम पर जाते समय लगातार बजता रहता है. महाराष्ट्र से छत्तीसगढ़ तक के ग्राहक इलेक्ट्रिक व्हीकल और लिथियम बैटरियों के बारे में पूछते हैं, लेकिन 24 साल के इस युवक की छोटी सी मरम्मत की दुकान ‘TikTechEV’ नहीं, बल्कि उसी नाम का उनका यूट्यूब चैनल उनके बिज़नेस को आगे बढ़ा रहा है.

इस युवा ने 2024 के आखिर में बैटरी और ईवी रिपेयर के वीडियो पोस्ट करना शुरू किया. ये वीडियो हिट हो गए और जल्द ही उन्हें अपने गांव के पास सीमेंट और पावर प्लांट में लंबी शिफ्ट करने वाले साथियों से कम से कम दोगुनी कमाई मिलने लगी.

रायपुर से करीब 50 किमी दूर स्थित तुलसी गांव को 2023 में मीडिया ने भारत की “YouTube कैपिटल” कहा था. आंशिक रूप से पक्की सड़कों वाले इस छोटे से गांव को ग्रामीण डिजिटल महत्वाकांक्षा के मॉडल के रूप में पेश किया गया, जहां 2018 में यूट्यूब के बूम से प्रभावित होकर करीब 4,000 आबादी में से लगभग एक चौथाई लोग कंटेंट क्रिएशन में आ गए थे. टिकेश्वर भी उनमें से एक थे.

आज तुलसी से वह चर्चा खत्म हो चुकी है. भारत के कंटेंट क्रिएशन के इस ग्राउंड जीरो पर सपना खत्म हो चुका है.

2023 में तत्कालीन रायपुर कलेक्टर सर्वेश्वर भुरे द्वारा लगवाया गया 25 लाख रुपये का कंटेंट स्टूडियो अब जर्जर पंचायत कार्यालय बन चुका है. ज़्यादातर क्रिएटर्स लॉग ऑफ कर चुके हैं और खेतों, फैक्ट्रियों या बेरोज़गारी में लौट गए हैं. लोगों का कहना है कि कम होते व्यूज़, आपसी मतभेद और शॉर्ट-फॉर्म वीडियो के साथ खुद को ढाल न पाने की वजह से यह गिरावट आई.

तुलसी, छत्तीसगढ़ में अब बंद हो चुका Hamaar Flix स्टूडियो | फोटो: सबा गुरमत/दिप्रिंट
तुलसी, छत्तीसगढ़ में अब बंद हो चुका Hamaar Flix स्टूडियो | फोटो: सबा गुरमत/दिप्रिंट

2010 में अकादमिक क्रेग जेफ्री ने भारत के युवाओं में फैली ‘टाइमपास’ के कल्चर पर एक अहम किताब लिखी थी. ‘Timepass: Youth, Class, and the Politics of Waiting in India’ में बताया गया था कि बेरोज़गारी से जूझ रहे युवा घंटों चाय की दुकानों पर इंतज़ार करते हुए, कॉलेज कैंपस या गांव के पुलिया के पास समय बिताते थे, यहां तक कि ग्रेजुएशन के बाद भी.

तब से बहुत कुछ नहीं बदला है. “टाइमपास जेनरेशन” अब ऐसे युवाओं में बदल गई है जो इंतज़ार को ही फिल्माते, एडिट करते और अपलोड करते हैं, इस उम्मीद में कि लाइक्स और वायरल होने की इस भीड़भाड़ और अस्थायी दुनिया में उन्हें बड़ी कमाई मिल सकती है.

घटते नौकरी के अवसरों को देख रही इस पीढ़ी के लिए कंटेंट क्रिएशन एक सपना भी बन गया है और एक विकल्प भी. छोटे शहरों और कस्बों में ज़ेन ज़ी काम के लिए इंस्टाग्राम, यूट्यूब और शॉर्ट-फॉर्म कंटेंट की ओर जा रही है, जो अक्सर कमाई का मुख्य जरिया भी बन जाता है. सस्ता डेटा, स्मार्टफोन और आसान एडिटिंग टूल्स ने इसमें प्रवेश आसान बना दिया है, जबकि खासकर ग्रेजुएट युवाओं के लिए स्थायी नौकरी कम होती जा रही है. इसका नतीजा यह है कि एक ऐसा समूह तैयार हो रहा है जो एक साथ कम रोज़गार वाला भी है और बेहद कनेक्टेड भी, जो दिखने की कोशिश में लगा है ताकि उसे पैसे, पहचान और आज़ादी में बदला जा सके—हालांकि, ज़्यादातर के लिए, जैसे तुलसी में, यह वादा अब भी अनिश्चित है.

पॉप-कल्चर कमेंटेटर और लेखक अनुराग माइनस वर्मा इस समय की तुलना 2000 के शुरुआती दौर के बीपीओ बूम से करते है, जहां अवसर के साथ-साथ सपना भी उतना ही बड़ा था.

उन्होंने कहा, “यह सपना वही है जो लोगों के पसंदीदा कंटेंट क्रिएटर्स बेच रहे हैं” और बताया कि क्रिएटर्स की लाइफस्टाइल और संपत्ति का दिखावा लोगों में वैसी ही महत्वाकांक्षा पैदा करता है. “Carryminati या अनुभव सिंह बस्सी महंगी कारों की फोटो डालते हैं. इसलिए खासकर छोटे शहरों में यह सपना बहुत बड़ा मोटिवेशन बन जाता है.”

यह अस्थिरता भर्ती करने वालों को भी दिखती है. इंदौर के एक हायरिंग कंसल्टेंट तरुण ने कहा कि अब 60 से 70 प्रतिशत ज़ेन ज़ी उम्मीदवार किसी न किसी तरह का कंटेंट क्रिएशन का अनुभव लेकर आते हैं.

उन्होंने कहा, “लेकिन मैं फिर भी उन्हें बीपीओ की नौकरी लेने को कहता हूं. इसमें 15,000-20,000 रुपये मिलते हैं, इसमें ग्लैमर नहीं है, लेकिन यह स्थिर है.” उन्होंने यह भी कहा कि अब वे नौकरियां पाना भी मुश्किल होता जा रहा है.

उनके अनुसार, कॉलेज के छात्र बीपीओ की नौकरी करने के बाद भी कंटेंट में किस्मत आजमाते रहते हैं. “वे इंदौर और भोपाल जैसे शहरों के कॉमेडियन जाकिर खान और आदित्य कुलश्रेष्ठ जैसे क्रिएटर्स को देखते हैं और सोचते हैं कि उन्हें भी कोशिश करनी चाहिए.”

जय वर्मा और आदित्य बघेल, जिन्होंने छत्तीसगढ़ के तुलसी गांव से यूट्यूब चैनलों की लहर शुरू की थी, अब रायपुर के एक साधारण कमरे में बैठकर अपने वीडियो बनाने के सपनों पर फिर से सोच रहे हैं | फोटो: सबा गुरमत/दिप्रिंट
जय वर्मा और आदित्य बघेल, जिन्होंने छत्तीसगढ़ के तुलसी गांव से यूट्यूब चैनलों की लहर शुरू की थी, अब रायपुर के एक साधारण कमरे में बैठकर अपने वीडियो बनाने के सपनों पर फिर से सोच रहे हैं | फोटो: सबा गुरमत/दिप्रिंट

तुलसी का उभार और पतन

तुलसी में यूट्यूब का बूम 2018 में शुरू हुआ, जब केमिस्ट्री ट्यूटर जय वर्मा और उनके दोस्त ज्ञानेंद्र शुक्ला, जो उस समय एसबीआई में थे, ने ‘Being Chhattisgarhiya’ नाम से यूट्यूब पर एक कॉमेडी चैनल शुरू किया.

उन्होंने गांव की ज़िंदगी, परीक्षाओं, Sony के लोकप्रिय शो सीआईडी की पैरोडी और The Viral Fever (टीवीएफ) जैसे यूट्यूब चैनलों से प्रेरित स्केच वीडियो बनाए. गांव के लोग वीडियो में एक्टिंग करते थे और सफलता बढ़ती गई. करीब 1.28 लाख सब्सक्राइबर्स और 2.78 करोड़ से अधिक व्यूज़ के साथ यह चैनल हिट हो गया.

2024 में अपने चरम पर, गांव से 40 से अधिक चैनल चल रहे थे. सबसे प्रसिद्ध चैनलों में ‘36 Garhiya’, ‘Alwa Jalwa’, ‘Fun Tapri’ और ‘Gold CG04’ शामिल थे, जो स्केच वीडियो और लोकल म्यूजिक के लिए जाने जाते थे. एक दर्जन से अधिक चैनल विज्ञापन और ब्रांड डील से कमाई कर रहे थे. कुछ समय के लिए कंटेंट क्रिएशन एक सफल ग्रामीण अर्थव्यवस्था जैसा लग रहा था.

फिर व्यूज़ कम हो गए. ब्रांड कोलैबोरेशन से आने वाला पैसा खत्म हो गया. ‘Being Chhattigarhiya’ भी अब लगभग बंद पड़ा है.

33-वर्षीय जय, जो चुनाव आयोग में काम करने के बाद अब बेरोज़गार हैं, बताते हैं, “हमारी सबसे बड़ी गलती यह थी कि हम रील्स और शॉर्ट-फॉर्म में शिफ्ट नहीं हो पाए. धीरे-धीरे हमें कंटेंट के आइडिया मिलना बंद हो गए और गांव के लोगों की रुचि भी कम हो गई.”

दूसरों का भी यही हाल हुआ. को-फाउंडर शुक्ला अब फैक्ट्री में शिफ्ट करते हैं. जो ग्रामीण पहले वीडियो में एक्टिंग करते थे, वे वापस खेतों और दिहाड़ी के काम में लौट गए. जो कभी डिजिटल गोल्ड रश था, अब सिर्फ याद बनकर रह गया है.

फिर भी यह विचार तुलसी से पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है, बल्कि बदल गया है.

टिकेश्वर वर्मा, तुलसी गांव के बाहरी इलाके में अपनी लिथियम बैटरी और EV रिपेयर की दुकान पर काम करते हुए | फोटो: सबा गुरमत/दिप्रिंट
टिकेश्वर वर्मा, तुलसी गांव के बाहरी इलाके में अपनी लिथियम बैटरी और EV रिपेयर की दुकान पर काम करते हुए | फोटो: सबा गुरमत/दिप्रिंट

टिकेश्वर वर्मा इस कहानी की अलग तरह की सफलता हैं. वीडियो की वजह से उनका बिज़नेस तेजी से बढ़ रहा है और पहले के क्रिएटर्स की तरह सिर्फ वायरल होने के पीछे भागने के बजाय उनका यूट्यूब चैनल उनके काम का ही विस्तार है.

उन्होंने कहा, “मैं महीने में करीब 35,000 रुपये कमाता हूं, कभी-कभी एक लाख भी.” टिकेश्वर थोड़े झिझकते हुए अपनी कमाई की पूरी जानकारी बताने से बचते हैं.

बूम के पीछे के आंकड़े

भारत में क्रिएटर्स की बढ़ती संख्या बहुत बड़ी है और असमान भी. यूट्यूब की 2024 Culture and Trends रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया भर में 65 प्रतिशत ज़ेन ज़ी खुद को कंटेंट क्रिएटर मानते हैं. भारत में यह संख्या बहुत ज्यादा, 83 प्रतिशत है. सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ने इंस्टाग्राम रील्स और यूट्यूब शॉर्ट्स जैसे शॉर्ट-फॉर्म फॉर्मेट को बढ़ावा दिया, जिससे कुछ ही मिनटों में वीडियो बनाकर पोस्ट करना आसान हो गया.

लेकिन यह तेज़ बढ़ोतरी बढ़ते रोजगार संकट के साथ ही हो रही है. International Labour Organization (ILO) की 2024 रिपोर्ट के अनुसार, भारत में कॉलेज ग्रेजुएट्स के बीच बेरोज़गारी दर 29.1 प्रतिशत तक है. मार्च 2026 की अज़ीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी रिपोर्ट के अनुसार, इस साल 15 से 25 साल के लगभग 40 प्रतिशत और 25 से 29 साल के 20 प्रतिशत ग्रेजुएट बेरोज़गार हैं.

इस वजह से स्क्रीन टाइम भी बढ़ा है. 2025 की Ernst & Young रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय लोग रोज़ औसतन 5 घंटे स्मार्टफोन पर बिताते हैं, जो 2023 में 3.3 घंटे प्रतिदिन था.

भोपाल की कंटेंट क्रिएटर और फूड ब्लॉगर कवलप्रीत कौर कलसी अपने फोन का औसत दैनिक स्क्रीन टाइम दिखाती हुई | फोटो: सबा गुरमत/दिप्रिंट
भोपाल की कंटेंट क्रिएटर और फूड ब्लॉगर कवलप्रीत कौर कलसी अपने फोन का औसत दैनिक स्क्रीन टाइम दिखाती हुई | फोटो: सबा गुरमत/दिप्रिंट

यह समानता संयोग नहीं है. जैसे-जैसे ऑफलाइन अवसर कम हो रहे हैं, समय और महत्वाकांक्षा ऑनलाइन की ओर बढ़ रही है. यहां तक कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी सार्वजनिक रूप से डिजिटल कंटेंट को सस्ते डेटा के कारण आय के अवसर के रूप में बताया है.

नीतियां भी अब इस दिशा में बढ़ रही हैं. यूनियन बजट 2026 में “content creator labs” के लिए 250 करोड़ रुपये का प्रस्ताव रखा गया. भोपाल से बठिंडा तक यह वादा आकर्षक लगता है: ब्रांड डील, स्पॉन्सरशिप, विज्ञापन से कमाई और पहचान. अब युवा हर चीज़ को फिल्म कर रहे हैं—शहर के चौक में डांस, पार्क में घूमना, किचन की बातचीत और जिम में डेडलिफ्ट — यानी रोजमर्रा की चीजों को कमाई वाले कंटेंट में बदलना.

लेकिन हर कोई इससे पैसा नहीं कमा रहा है. यह अब भी एक सपना ही है.

Bloomberg के कॉलमिस्ट एंडी मुखर्जी ने लिखा कि कम होते अवसरों के बीच युवा चीन के “lying flat” मूवमेंट से प्रेरणा ले रहे हैं, जहां कई 20-25 साल के लोग पारंपरिक नौकरी और रेस से बाहर रहने का विकल्प चुन रहे हैं.

उन्होंने 2025 में लिखा, “जिसे creator economy कहा जा रहा है, वह असल में टाइमपास का व्यावसायीकरण है, जिसमें राज्य भी सक्रिय रूप से प्रोत्साहन दे रहा है.”

विजय बैरागी, जो “Vidisha Shahar” अकाउंट चलाते हैं और युवा विवेक राज, जो BTech छात्र हैं और जिन्होंने “Vijay Bhaiyya” से वीडियो एडिटिंग और रील बनाना सीखा | फोटो: सबा गुरमत/दिप्रिंट
विजय बैरागी, जो “Vidisha Shahar” अकाउंट चलाते हैं और युवा विवेक राज, जो BTech छात्र हैं और जिन्होंने “Vijay Bhaiyya” से वीडियो एडिटिंग और रील बनाना सीखा | फोटो: सबा गुरमत/दिप्रिंट

छोटे शहरों में क्रिएटर्स का बूम

तुलसी से करीब 600 किमी दूर, मध्य प्रदेश के विदिशा में 29-वर्षीय विजय बैरागी का दिन एक इंस्टाग्राम रील के शॉट प्लान करने से शुरू होता है, जो उसकी हफ्ते की कमाई तय कर सकता है.

वह दो कॉलेज छात्रों को कैमरा एंगल और लोकेशन समझा रहे थे—एक बीटेक कर रहा है और दूसरा बीबीए. दोनों ने कोई औपचारिक ट्रेनिंग नहीं ली है. उन्होंने InShot और Premiere Pro जैसे ऐप पर एडिटिंग सीखी, उम्मीद है कि ये काम शुरुआती नौकरियों से बेहतर कमाई दे सकते हैं.

विजय का कंटेंट क्रिएशन में आना संयोग था. उन्होंने 2019 में सिक्योरिटी सुपरवाइजर की नौकरी छोड़कर फास्ट-फूड की दुकान खोली. महामारी में वह बंद हो गई. उनके पास सिर्फ फोन बचा और एक इंस्टाग्राम पेज, जिसे उन्होंने कोविड के दौरान ऑक्सीजन और ब्लड की जानकारी साझा करने के लिए बनाया था.

उन्होंने कहा, “बहुत लोग फॉलो करने लगे, तो मैंने विदिशा की अपडेट के लिए अलग इंस्टाग्राम पेज बना लिया.” वह पेज ‘Vidisha Shahar’ अब स्थानीय विज्ञापन प्लेटफॉर्म भी बन गया है. दुकानें, क्लिनिक, रेस्टोरेंट और ट्यूटर उन्हें शॉर्ट वीडियो में फीचर करने के लिए पैसे देते हैं.

उन्होंने कहा, “जब यहां डीमार्ट खुला और लोगों को बुलाना था, हमने एक रील. हमने डीमार्ट, कॉफी शॉप, लोकल वेडिंग फोटोग्राफर्स और कई लोगों के साथ काम किया है. अब मेरे 1.3 लाख से ज्यादा फॉलोअर्स हैं.”

उन्होंने कहा, “एक रील से मुझे लगभग 5,000 से 8,000 रुपये मिलते हैं.”

काम लगातार मिलता है, लेकिन तय नहीं होता. कुछ हफ्तों में कई ब्रांड कोलैब मिलते हैं, तो कुछ हफ्ते बिना किसी कॉल के निकल जाते हैं. वह लोकल ट्रेंड देखते हैं, क्लाइंट से बात करते हैं, शूट करते हैं, एडिट करते हैं, अपलोड करते हैं और फिर एल्गोरिदम पर निर्भर रहते हैं.

घर पर इसका असर दिखता है. उनकी विधवा मां, जो पहले घर की अकेली कमाने वाली थीं, ने इस बदलाव में मदद के लिए उन्हें पहला आईफोन दिलाया. उनकी बहन अब “timepass Reels” बनाती है. उनकी एक मौसी भी जुड़ गई हैं, जिनके कुछ वायरल वीडियो के बाद हजारों फॉलोअर्स हो गए.

पूरा परिवार अब एक नए तरह के काम के अनुसार ढल गया है—ऐसा काम जो कुछ साल पहले तक था ही नहीं और जिसमें कोई गारंटी भी नहीं है.

यह अनिश्चितता उनके आसपास के कई लोगों में दिखती है.

अश्मीत कौर सेठी (बाएं) एक फैन से मिलते हुए और फोटो खिंचवाते हुए | फोटो: सबा गुरमत/दिप्रिंट
अश्मीत कौर सेठी (बाएं) एक फैन से मिलते हुए और फोटो खिंचवाते हुए | फोटो: सबा गुरमत/दिप्रिंट

विजय की दोस्त 23-वर्षीय अश्मीत कौर सेठी ने 2021 में सीए फाउंडेशन परीक्षा में फेल होने के बाद कंटेंट क्रिएशन शुरू किया. उन्होंने अगले साल परीक्षा पास कर ली, लेकिन फिर उस रास्ते पर वापस नहीं गईं.

तब तक उनका फूड व्लॉग पेज ‘Cravings 24 Seven’ चलने लगा था.

उन्होंने कहा, “मुझे लोगों से इतना प्यार मिलने लगा कि सीए बनने में मेरी रुचि खत्म हो गई.”

शुरुआत में उनके माता-पिता इस करियर बदलाव को लेकर हिचकिचा रहे थे, लेकिन ब्रांड सहयोग मिलने और कमाई स्थिर होने के बाद उनका नजरिया बदल गया.

उन्होंने कहा, “विदिशा जैसे छोटे शहर से कोई फूड और खाने की जगहों की समीक्षा नहीं कर रहा था. मैं इसलिए आगे बढ़ पाई क्योंकि मेरा कंटेंट लोकल था और स्थानीय लोग उससे जुड़ते थे.”

अब वह एक रील के लिए 6,000 से 8,000 रुपये लेती हैं और अच्छे महीने में 1 लाख रुपये तक कमा लेती हैं.

लेकिन उनके पास भी बैकअप प्लान है. अश्मीत अब कंटेंट क्रिएशन के साथ एमबीए कर रही हैं.

प्रतिभा साहू रायपुर के एक रेस्टोरेंट में अपने इंस्टाग्राम पेज के लिए “कंसेप्ट शूट” के दौरान पोज़ देती हुई | फोटो: सबा गुरमत/दिप्रिंट
प्रतिभा साहू रायपुर के एक रेस्टोरेंट में अपने इंस्टाग्राम पेज के लिए “कंसेप्ट शूट” के दौरान पोज़ देती हुई | फोटो: सबा गुरमत/दिप्रिंट

लेकिन रायपुर की रहने वाली 20 साल की ब्यूटी कंटेंट क्रिएटर प्रतिभा साहू के पास कोई बैकअप प्लान नहीं है. सिर्फ एक साल में उनके 54,000 से ज्यादा इंस्टाग्राम फॉलोअर्स हो गए हैं और उन्हें पता है कि वायरल होने का तरीका क्या है: Pinterest girlie और brainrot कंटेंट.

उनका कंटेंट हाइपरलोकल नहीं है; वह अपने “एस्थेटिक” को SoBo (South Bombay) गर्ल बताती हैं.

स्थानीय साउथ इंडियन रेस्टोरेंट में ‘concept photoshoot’ के दौरान प्रतिभा ने कहा, “कॉस्मोपॉलिटन कंटेंट से ही मेरे वीडियो चलते हैं.”

उन्होंने BSc की डिग्री ली है लेकिन उनकी असली रुचि कंटेंट में है. उनका सपना मुंबई है और वह अपना रास्ता बदलने का कोई प्लान नहीं रखतीं.

एक कंटेंट क्रिएटर का इंस्टाग्राम पेज, जिसमें काफी फॉलोअर्स हैं | फोटो: सबा गुरमत/दिप्रिंट
एक कंटेंट क्रिएटर का इंस्टाग्राम पेज, जिसमें काफी फॉलोअर्स हैं | फोटो: सबा गुरमत/दिप्रिंट

एक समानांतर इंडस्ट्री

विजय और अश्मीत जैसे क्रिएटर्स के साथ-साथ एक छोटी लेकिन बढ़ती हुई गिग वर्क की दुनिया भी उभर रही है—एडिटर, कैमरा ऑपरेटर, स्क्रिप्ट में मदद करने वाले — जिनमें से ज़्यादातर ने खुद से सीखा है और लगभग सभी युवा हैं.

भोपाल में 20 साल की उम्र के आसपास की कवलप्रीत कौर कलसी, जिनके पास बीकॉम की डिग्री है और बेहतर नौकरी के कम विकल्प थे. उन्होंने फूड वीडियो पोस्ट करना शुरू किया. अपनी दोस्त अश्मीत की तरह, अब ब्रांड कोलैब से उन्हें पहले सेल्स की नौकरी में मिलने वाले 15,000 से 20,000 रुपये से कहीं ज्यादा कमाई होती है.

लेकिन उनका काम दूसरों पर भी निर्भर करता है: ग्रामीण राजस्थान के दो युवा एडिटर जो शूटिंग और पोस्ट-प्रोडक्शन संभालते हैं.

कलसी ने कहा, “यह एक समानांतर इंडस्ट्री बना रहा है, जिसमें लोग प्रोफेशनली ट्रेन नहीं हैं, लेकिन खुद से सीखकर काम कर रहे हैं.”

भोपाल की फूड व्लॉगर और रील मेकर कवलप्रीत कौर कलसी मॉल के फूड कोर्ट में बैठकर अपने फोन का स्क्रीन टाइम दिखाती हुई | फोटो: सबा गुरमत/दिप्रिंट
भोपाल की फूड व्लॉगर और रील मेकर कवलप्रीत कौर कलसी मॉल के फूड कोर्ट में बैठकर अपने फोन का स्क्रीन टाइम दिखाती हुई | फोटो: सबा गुरमत/दिप्रिंट

विदिशा में, जो कॉलेज छात्र सुबह बीटेक या बीकॉम की क्लास में होते हैं, वे अक्सर शाम को रील शूट करते हैं या स्थानीय इन्फ्लुएंसर्स के लिए वीडियो एडिट करते हैं. उन्होंने ये स्किल्स यूट्यूब ट्यूटोरियल से सीखी हैं; काम अनौपचारिक नेटवर्क से मिलता है.

अश्मीत ने कहा, “जिस छात्र को बेसिक एडिटिंग आती है, वह एक रील से 1,500 से 2,000 रुपये कमा सकता है.” अब वह प्रोजेक्ट के अनुसार फ्रीलांसर की एक लिस्ट रखती हैं, जिन्हें ज़रूरत पड़ने पर बुला सकती हैं.

यह काम अनियमित है लेकिन आसानी से उपलब्ध है. इसमें किसी औपचारिक ट्रेनिंग, डिग्री या बड़े निवेश की ज़रूरत नहीं होती, सिर्फ एक स्मार्टफोन या लैपटॉप काफी होता है. कई लोगों के लिए यह कमाई का पहला अनुभव बन जाता है — जल्दी और कभी-कभी कैंपस प्लेसमेंट से ज्यादा फायदेमंद, जो शायद कभी मिले ही नहीं.

आज भारत में लगभग 85 करोड़ इंटरनेट यूजर्स हैं, जिनमें से करीब 40 लाख खुद को क्रिएटर या ‘इन्फ्लुएंसर’ मानते हैं. भले ही इनमें से कम लोग अच्छी कमाई करते हों, लेकिन वे एक बड़ी सर्विस चेन की मांग पैदा करते हैं, जिससे कंटेंट एक बिखरी हुई, गिग आधारित इंडस्ट्री बन गया है.

हालांकि, यह चेन अनौपचारिक और कमजोर है. इसमें कोई कॉन्ट्रैक्ट नहीं, तय सैलरी नहीं और लगातार काम की कोई गारंटी नहीं. काम ट्रेंड, फॉलोअर्स और एल्गोरिदम पर निर्भर करता है.

मध्य प्रदेश के रायसेन शहर में दो युवा अपने इंस्टाग्राम पर अपलोड करने के लिए डांस रील और फ्रीस्टाइल डांस वीडियो देखते हुए | फोटो: सबा गुरमत/दिप्रिंट
मध्य प्रदेश के रायसेन शहर में दो युवा अपने इंस्टाग्राम पर अपलोड करने के लिए डांस रील और फ्रीस्टाइल डांस वीडियो देखते हुए | फोटो: सबा गुरमत/दिप्रिंट

एल्गोरिदम की इकॉनमी और उसकी सीमाएं

दिखने में भले ही यह तेज़ी से बढ़ती दुनिया लगे, लेकिन क्रिएटर इकॉनमी में असमानता बहुत ज्यादा है. भारत के लाखों क्रिएटर्स में से केवल बहुत कम लोग लगातार कमाई कर पाते हैं; ज़्यादातर “नैनो-क्रिएटर” बने रहते हैं, लगातार पोस्ट करते हैं, ज्यादा लोगों तक पहुंचने की कोशिश करते हैं, लेकिन कमाई बहुत कम या बिल्कुल नहीं होती.

कई लोग उस सफलता का सपना देखते हैं जो कुशा कपिला या डॉली सिंह जैसे क्रिएटर्स को मिली — रील्स से असली बिज़नेस तक पहुंचना, लेकिन ऐसा बहुत कम होता है.

कमाई बहुत अलग-अलग होती है. इन्फ्लुएंसर मार्केटिंग प्लेटफॉर्म Kofluence के अनुसार, कुछ हजार फॉलोअर्स वाले क्रिएटर्स एक पोस्ट से 500 से 5,000 रुपये तक कमा सकते हैं, जबकि 10 लाख फॉलोअर्स वाले बड़े इन्फ्लुएंसर्स एक पोस्ट के लिए 2 लाख रुपये से ज्यादा लेते हैं. विदिशा और तुलसी जैसे छोटे शहरों के क्रिएटर्स की कमाई आमतौर पर कम रहती है और एंगेजमेंट कम होने पर घटती-बढ़ती रहती है.

टिकेश्वर वर्मा TikTechEV यूट्यूब चैनल से अपनी कुछ कमाई दिखाते हुए | फोटो: सबा गुरमत/दिप्रिंट
टिकेश्वर वर्मा TikTechEV यूट्यूब चैनल से अपनी कुछ कमाई दिखाते हुए | फोटो: सबा गुरमत/दिप्रिंट

प्लेटफॉर्म भी अलग-अलग तरह से कमाई का मौका देते हैं. यूट्यूब विज्ञापन और मेंबरशिप के जरिए कमाई की सुविधा देता है, जबकि इंस्टाग्राम, जो कई लोगों का मुख्य प्लेटफॉर्म है — लगभग पूरी तरह ब्रांड डील पर निर्भर है.

इस अस्थिरता के बावजूद, इंदौर की करियर काउंसलर विभा गांधी, जो हर महीने दर्जनों छात्रों से मिलती हैं, कहती हैं कि अब 16 से 25 साल के कई युवा कंटेंट क्रिएशन को मुख्य करियर विकल्प मानने लगे हैं.

उन्होंने कहा, “वे लगातार मेहनत वाली नौकरी से थक चुके हैं. लेकिन जब तक आप कुछ अलग नहीं करते, यह टिकाऊ नहीं है. आपके पास प्लान बी होना चाहिए.”

जो लोग सफल हो जाते हैं, वे भी जोखिम कम करने की कोशिश करते हैं. बैकअप प्लान, साइड बिज़नेस या अन्य काम कई लोगों के लिए जरूरी होते हैं.

उद्यमी अक्षय हुनका, जिन्होंने मध्य प्रदेश में ‘Berozgaar Sena’ शुरू की, एक बड़ी समस्या की ओर इशारा करते हैं: भरोसेमंद रोजगार डेटा की कमी और मुख्यमंत्री रोजगार योजना जैसी नीतियों का सीमित असर. 2023 के राज्य चुनाव से पहले किए गए अपने अभियान के आधार पर उनका अनुमान है कि राज्य के “कम से कम 70 प्रतिशत” युवा बेरोज़गार हैं, जिससे कई लोग कंटेंट क्रिएशन जैसे अस्थायी विकल्पों की ओर बढ़ते हैं.

उन्होंने कहा, “लोग स्थिरता चाहते हैं. कितने प्रतिशत लोग वास्तव में यूट्यूब या इंस्टाग्राम से सफल हो सकते हैं? सिर्फ इसलिए कि यह आकर्षक लगता है, इसका मतलब यह नहीं कि यह आसान है.”

रायपुर कलेक्टर के दान से 25 लाख रुपये में बना ‘HamaarFlix’ अब पंचायत की बैठक और ऑफिस के रूप में इस्तेमाल हो रहा है | फोटो: सबा गुरमत/दिप्रिंट
रायपुर कलेक्टर के दान से 25 लाख रुपये में बना ‘HamaarFlix’ अब पंचायत की बैठक और ऑफिस के रूप में इस्तेमाल हो रहा है | फोटो: सबा गुरमत/दिप्रिंट

व्यूज़ के बाद

तुलसी में पुराना स्टूडियो ज्यादातर दिनों खुला रहता है. साइनबोर्ड पर Netflix से प्रेरित फॉन्ट में ‘HamaarFlix’ लिखा है और धूल भरी दीवार पर रंगीन यूट्यूब का लोगो बना है. पंचायत के सदस्य कागज़ों के साथ बैठे रहते हैं, चाय, बीड़ी और फाइलों के बीच काम चलता रहता है.

‘एडिटिंग रूम’, जहां पिछले साल तक कैमरे और कंप्यूटर थे, अब खाली और बंद पड़ा है. अंदर सिर्फ एक टूटा हुआ एलसीडी मॉनिटर धूल खा रहा है.

बाहर 61 साल के प्यारे लाल वर्मा, जो कभी ‘Being Chhattisgarhiya’ वीडियो में नियमित दिखते थे, अब फिर अपने खेत में काम कर रहे हैं. कैमरे की जगह अब रोज़ का मेहनत भरा काम है.

कुछ दूरी पर टिकेश्वर ग्राहकों के बीच अपना फोन टूलबॉक्स के सहारे टिकाकर एक और रिपेयर वीडियो रिकॉर्ड कर रहे हैं. उनके लिए अब यूट्यूब कोई जोखिम नहीं रहा — यह एक साधन बन गया है.

उन्होंने कहा, “मैं अपना रेगुलर काम भी करता हूं, लेकिन कंटेंट क्रिएशन ने मुझे उसे बेहतर तरीके से मार्केट करने में मदद की है. आखिर बात यह है कि आप इसे कितनी समझदारी से इस्तेमाल करते हैं.”

और किसी तरह, यह उनके लिए जरूरी बन चुका है.

उन्होंने हंसते हुए कहा, “जो सोशल मीडिया पर नहीं है, वह ज़िंदगी में भी कहीं नहीं है.”

(इस ग्राउंड रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


यह भी पढ़ें: ‘हमारा भरोसा हिल गया’—ट्रांस संशोधन बिल से गरिमा गृह पर छाया भ्रम का साया


 

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