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Thursday, 2 April, 2026
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उद्धव ठाकरे MLC के 6 साल में सत्ता और विपक्ष दोनों तरफ रहे—मगर नतीजे कुछ खास नजर नहीं आते

शिवसेना नेता ने मजबूरी में महाराष्ट्र के उच्च सदन में प्रवेश किया, संकटों के बीच शासन चलाया, और अपने पीछे एक ऐसा रिकॉर्ड छोड़ा जिसे उनके अपने समर्थक भी एक 'गंवाया हुआ अवसर' करार देते हैं.

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मुंबई: जब उद्धव ठाकरे 24 मार्च को महाराष्ट्र विधान परिषद को संबोधित करने के लिए खड़े हुए, तो उन्होंने एक कविता का सहारा लिया—एक ऐसी कविता जो अपने सबसे करीबी लोगों द्वारा गलत समझे जाने के बारे में थी.

ठाकरे ने मराठी कवि सुरेश भट की पंक्तियां सुनाईं.

कुछ इस तरह: “मुझे समझ नहीं आया कि मेरा दोस्त कौन था और दुश्मन कौन. जो भी मुझसे मिला उसने मुझे परेशान किया. मेरे अपने लोग मुझसे नाराज थे, लेकिन किसी ने मुझे समझने की कोशिश नहीं की.”

यह उनके छह साल के एमएलसी कार्यकाल—जो आधिकारिक रूप से मई में खत्म हो रहा है—के लिए एक सही समापन जैसा था. यह कार्यकाल मजबूरी में शुरू हुआ, सत्ता और विपक्ष दोनों में बीता, और साथियों के अनुसार एक कठिन लेकिन अधूरा सीखने का दौर रहा, जबकि आलोचकों के मुताबिक यह एक खोया हुआ मौका था.

मजबूरी

उद्धव ठाकरे 14 मई 2020 को महाराष्ट्र विधान परिषद के सदस्य बने—अपनी इच्छा से नहीं बल्कि संवैधानिक जरूरत के कारण. जब 2019 में शिवसेना, एनसीपी और कांग्रेस की महा विकास अघाड़ी सरकार बनी और उद्धव मुख्यमंत्री बने, तब उनके पास कोई विधायी या प्रशासनिक अनुभव नहीं था और वह किसी भी सदन के सदस्य नहीं थे. उनके पास छह महीने का समय था, नहीं तो उन्हें पद छोड़ना पड़ता.

पेशे से फोटोग्राफर, वह विधान भवन में प्रवेश करने वाले दूसरे ठाकरे बने. उनके बेटे आदित्य, जिन्होंने 2019 विधानसभा चुनाव लड़ा था, परिवार के पहले सदस्य थे जिन्होंने कोई चुनाव लड़ा.

एक ऐसे परिवार के लिए जिसने हमेशा चुनावी राजनीति के बाहर रहकर सत्ता चलाई—बाल ठाकरे ने मुख्यमंत्री बनने से मना कर दिया था और कहा था कि “रिमोट कंट्रोल” उनके पास रहेगा—ये दोनों कदम बड़े बदलाव थे.

राजनीतिक विश्लेषक संजय पाटिल ने इसे पीढ़ीगत बदलाव बताया.

उन्होंने कहा, “आदित्य ठाकरे का चुनाव लड़ना एक सकारात्मक संकेत था. बाद में उद्धव ठाकरे का एमएलसी बनना दिखाता है कि उन्होंने खुद को सार्वजनिक आलोचना और लोकतांत्रिक जिम्मेदारी के लिए तैयार किया. यह बड़ा बदलाव था, भले ही मजबूरी में हुआ.”

उन्होंने आगे कहा, “उद्धव का उस ठाकरे आभा से बाहर आना और लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भाग लेना और मुख्यमंत्री बनना बहुत बड़ी बात थी.”

ऊपरी सदन में मुख्यमंत्री

मुख्यमंत्री के रूप में उनके साल, विधान परिषद में उनकी सबसे सक्रिय अवधि रही—क्योंकि सरकार चलाने की जिम्मेदारी से दूर रहना संभव नहीं था. उद्धव ने महाराष्ट्र को कोविड-19 महामारी और जून 2020 व मई 2021 में आए दो चक्रवातों के दौरान संभाला. सहयोगियों का कहना है कि संसदीय काम उनके रोजमर्रा का हिस्सा था.

शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के नेता और एमएलसी अनिल परब ने कहा, “जब वह मुख्यमंत्री थे, तो वह रोज संसदीय काम में शामिल रहते थे क्योंकि उन्हें सरकार चलानी होती थी. इससे उनमें बदलाव भी आया क्योंकि पार्टी चलाना और संसदीय काम अलग होते हैं.”

उनकी सदन में मौजूदगी अनुशासन बनाए रखने में भी काम आई.

राजनीतिक विश्लेषक हेमंत देसाई ने कहा, “उनकी मौजूदगी से शिवसेना के नेताओं को लगता था कि उनका नेता पास है और सब देख रहा है. अफवाहों के बावजूद कि और विधायक उन्हें छोड़ सकते हैं, उनकी मौजूदगी से नेता सतर्क रहते थे कि कौन किससे मिल रहा है और क्या हो रहा है. इस लिहाज से उनका सदन में होना महत्वपूर्ण था.”

हालांकि, 2022 में उनकी सरकार गिर गई, जब शिवसेना के अंदर बगावत हुई और गठबंधन बहुमत खो बैठा. इसके बाद शिवसेना दो हिस्सों में बंट गई—उद्धव की यूबीटी और दूसरी धड़ा, जिसका नेतृत्व अब उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे कर रहे हैं.

एमएलसी के रूप में अपने कार्यकाल में उद्धव ने अपने फंड का इस्तेमाल व्यक्तिगत जुड़ाव और राजनीतिक महत्वाकांक्षा दोनों दिखाता है.

2021 में उन्होंने शिवाजी पार्क के वॉकिंग ट्रैक को सुधारने और रोशनी लगाने के लिए 1.25 करोड़ से 1.3 करोड़ रुपये दिए. उन्होंने मुंबई की लाइब्रेरी में किताबें बांटने के लिए भी फंड का इस्तेमाल किया.

2022 में उन्होंने आजाद मैदान में ‘लोकशाही चौक’ बनाने का प्रस्ताव रखा और इसके लिए 5 करोड़ रुपये दिए. लेकिन सरकार गिरने के बाद यह प्रोजेक्ट पूरा नहीं हुआ.

शासन के मामले में, शिवसेना (यूबीटी) के प्रवक्ता हर्षल प्रधान ने पर्यावरण संतुलन को उनकी पहचान बताया.

उन्होंने कहा, “विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाए रखना उनके कार्यकाल की खास बात थी.” मुख्यमंत्री बनने के बाद उनके पहले फैसलों में से एक था मुंबई के आरे को जंगल घोषित करना, जो विकास और संरक्षण के विवाद में था. उन्होंने गोरेगांव में मैंग्रोव पार्क बनाने का भी निर्देश दिया.

प्रधान ने कहा कि उनके कार्यकाल की आलोचना हुई, “लेकिन एक बात साफ थी—वह समस्याओं से भागते नहीं, उनका सामना करते हैं. उन्होंने कभी विरोधियों पर व्यक्तिगत हमला नहीं किया. उनका जाना सिर्फ एक व्यक्ति का नहीं, एक नेतृत्व शैली का अंत है.”

विपक्ष के साल

2022 में सरकार गिरने के बाद उद्धव विपक्ष में आ गए. उनका अंदाज—जो पहले से ही शांत और काव्यात्मक था—वैसा ही बना रहा.

उन्होंने किसान आत्महत्या, कर्ज माफी की मांग, धारावी पुनर्विकास, चुनाव में गड़बड़ी के आरोप, मराठी भाषा की स्थिति और शिवसेना नाम व चुनाव चिन्ह के कानूनी विवाद जैसे मुद्दे उठाए.

प्रधान ने कहा कि हर सत्र से पहले वह टीम के साथ बैठक करते थे और तय करते थे कि कौन से मुद्दे उठाने हैं.

उन्होंने कहा, “उनके भाषण आक्रामक नहीं थे, लेकिन संतुलित और स्पष्ट दिशा वाले थे. उनके कार्यकाल ने दिखाया कि राजनीति धैर्य, संवाद और संतुलन का भी नाम है.”

परब ने उनके शांत रवैये का बचाव किया. “जरूरी नहीं कि वह हमेशा बोलें. पहले वह मुख्यमंत्री थे, तो अपनी ही सरकार के खिलाफ सवाल पूछना ठीक नहीं लगता. बाद में हम सब मौजूद थे. उनके निर्देश होते थे. वह बैठकों में शामिल होते थे, लेकिन बोलना जरूरी नहीं था,” उन्होंने कहा.

आलोचना

यह बचाव उनके आलोचकों को संतुष्ट नहीं करता, जो कहते हैं कि विपक्ष में आने के बाद उनकी उपस्थिति कम हो गई.

उनके समर्थकों ने स्वास्थ्य कारण बताए, लेकिन विरोधी सहमत नहीं हैं.

एक शिवसेना (शिंदे) नेता ने कहा, “वह गंभीर नहीं दिखे. सत्र में उनकी उपस्थिति देखिए. उनके भाषणों का कोई असर नहीं था. अगर वह फिर आते भी हैं, तो ज्यादा फर्क नहीं पड़ेगा.”

देसाई ने कहा, “उनका प्रदर्शन औसत रहा. मुझे नहीं लगता कि वह फिर एमएलसी बनेंगे, लेकिन उन्हें बनना चाहिए. अगर बनते हैं तो उन्हें बेहतर प्रदर्शन करना होगा. उनके साथियों को उनका प्रभाव महसूस होना चाहिए. उन्हें सरकार को घेरने पर ध्यान देना चाहिए.”

उन्होंने तुलना करते हुए कहा, “एमएलसी के रूप में उनका काम प्रभावी नहीं था. उन्होंने ऐसा कोई मुद्दा नहीं उठाया जिससे असर पड़े. इस मामले में उनका कार्यकाल शरद पवार जैसा रहा, जिनके आखिरी राज्यसभा कार्यकाल में वह भी चुप रहते थे.”

देसाई ने कहा कि उनके भाषण याद रखने लायक नहीं थे. “अनिल परब और भास्कर जाधव को छोड़कर शिवसेना यूबीटी के नेता भी खास प्रभाव नहीं छोड़ पाए.”

पाटिल ने माना कि यह एक अच्छा मौका था जो खो गया.

उन्होंने कहा, “जब उद्धव बोलते हैं तो खबर बनती है. लेकिन अगर वह सदन में बोलते, तो और बड़ी खबर बनती.”

उपस्थिति के सवाल पर भी पाटिल ने कहा कि उनकी मौजूदगी से साथियों और सरकार पर दबाव बनता.

उन्होंने कहा, “उन्हें मौका मिला था. जैसे लोग कहते हैं कि उन्होंने मुख्यमंत्री के रूप में अच्छा काम किया, वैसा उनके एमएलसी कार्यकाल के बारे में नहीं कहा जा सकता.”

विदाई

अपनी विदाई भाषण में उद्धव शांत और भावुक दिखे.

उन्होंने कहा, “मैं दिल से कलाकार हूं, राजनीति मेरी ताकत नहीं है. फिर भी आप सबने मेरा साथ दिया, इसके लिए मैं सभी का धन्यवाद करता हूं.”

फिर उन्होंने महाराष्ट्र की राजनीति पर टिप्पणी की. “यह इंडियन पॉलिटिकल लीग जैसा लगता है, जहां गठबंधन बदलते रहते हैं. एक टीम मजबूत हो रही है और बाकी नहीं. मैच खेलने के लिए बाकी टीमों का होना भी जरूरी है,” उन्होंने कहा.

मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने पुरानी दोस्ती को याद करते हुए कहा, “हमारी दोस्ती बनी थी. मैं नहीं कहूंगा कि अब नहीं है. जिन्हें मेरा हाथ पकड़कर चलना था, वे बात पकड़कर बैठ गए,” उन्होंने कहा और उनके शांत स्वभाव और फोटोग्राफी की तारीफ की.

आगे क्या

मई में होने वाले एमएलसी चुनाव इसलिए हो रहे हैं क्योंकि उद्धव सहित नौ सदस्यों का कार्यकाल खत्म हो रहा है. एमएलसी का चुनाव विधायक गुप्त मतदान से करते हैं.

मौजूदा स्थिति में महा विकास अघाड़ी केवल एक नेता को 78 सदस्यीय सदन में भेज सकती है.

उद्धव के करीबी चाहते हैं कि वह वापस आएं.

परब ने कहा, “हम चाहते हैं कि वह लौटें. अब उन्हें सदन के कामकाज की समझ है और इसका असर पड़ता है.”

संजय राउत भी चाहते हैं कि वह वापस आएं. लेकिन वह चुनाव लड़ेंगे या नहीं, यह फैसला उन्हीं का होगा.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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