कोयंबटूर: तमिलनाडू के कोयंबटूर और तिरुप्पुर के बड़े टेक्सटाइल हब, जिन्हें अक्सर भारत का मैनचेस्टर कहा जाता है, में मशीनों की आवाज़ अब भी आ रही है, लेकिन काम करने वाले मजदूर पहले से कम दिख रहे हैं. हॉस्टल आधे खाली हैं, फैक्ट्री फ्लोर पर स्टाफ कम है और प्रोडक्शन लाइन पर दबाव दिखने लगा है.
इस इलाके की स्पिनिंग और टेक्सटाइल मिलों में काम करने वाले तीन लाख से ज्यादा प्रवासी मजदूर होली और रामनवमी पर अपने घर जाने के बाद वापस नहीं लौटे हैं. वे बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड, ओडिशा और असम में ही रुक गए हैं. बढ़ती महंगाई, अनिश्चितता और संभावित लॉकडाउन में फंस जाने का डर, जो कोविड महामारी की याद दिलाता है—इसके बड़े कारण हैं.
मजदूरों और मिल मालिकों ने दिप्रिंट को बताया कि LPG की भारी कमी और रोज़मर्रा की चीज़ों की कीमतों में तेज़ बढ़ोतरी के कारण तमिलनाडु वापस आना मुश्किल फैसला बन गया है.
23 मार्च को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बयान से भी मजदूरों की चिंता बढ़ गई. उन्होंने देश से कहा था कि पश्चिम एशिया युद्ध के आर्थिक असर का सामना करने के लिए एकजुट, सतर्क और तैयार रहें, जैसे कोविड महामारी के दौरान किया था. जो मजदूर मिलों में काम जारी रखे हुए हैं, उन्होंने भी माना कि बाकी मजदूरों की चिंता सही है.

प्रीकोट लिमिटेड के चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर अश्विन चंद्रन ने दिप्रिंट से कहा: “हां, हम पश्चिम एशिया संघर्ष और LPG की कमी के अप्रत्यक्ष असर का सामना कर रहे हैं. गर्मियों में फिर से कोविड जैसे हालात की बात से घबराहट बढ़ गई है. हमारे ज्यादातर मजदूरों ने मैट्रिक भी पास नहीं किया है, इसलिए उनसे यह उम्मीद करना सही नहीं होगा कि वे इस संकट की गंभीरता को पूरी तरह समझ लें.”
कोयंबटूर-तिरुप्पुर टेक्सटाइल बेल्ट की 600 से ज्यादा छोटी-बड़ी टेक्सटाइल कंपनियों में करीब 12 लाख प्रवासी मजदूर अलग-अलग काम करते हैं. तमिलनाडु के दस पश्चिमी जिलों में लगभग 60 लाख ब्लू कॉलर (90 प्रतिशत) और व्हाइट कॉलर कर्मचारी अपनी आजीविका के लिए टेक्सटाइल उद्योग पर निर्भर हैं. अब सभी चिंतित हैं.
महंगाई और डर
कोयंबटूर के बाहर के. जी. नायडू मिल्स और कन्नबिरन मिल्स के मजदूरों ने दिप्रिंट से अपनी चिंता साझा की.
उत्तर प्रदेश के चित्रकूट के रहने वाले बच्छलाल, जो के. जी. नायडू मिल्स के सेग्रिगेशन यूनिट में काम करते हैं, उन्होंने कहा, “हम में से कई और कोयंबटूर, तिरुप्पुर, सोमनूर और पल्लडम की दूसरी मिलों में काम करने वाले लोग साल में आठ-नौ महीने हॉस्टल या अस्थायी घरों में रहते हैं. हमारे पास स्थानीय राशन कार्ड नहीं है, इसलिए हमें कमर्शियल गैस सिलेंडर पर निर्भर रहना पड़ता है. आज ब्लैक मार्केट में एक सिलेंडर 2,500 रुपये का है और एक सिलेंडर के लिए तीन दिन की मजदूरी खर्च करना बहुत मुश्किल है.”
असम के रहने वाले करीब 20 साल के मजदूर रकीबुल इसाब ने बताया कि पहले जहां चाय 8 रुपये की मिलती थी, अब 15 रुपये की हो गई है, “जहां हम पहले ठेले पर खाना खाते थे, वे अब बंद हैं और हम होटल में खाना अफोर्ड नहीं कर सकते. अब मैं हफ्ते में सिर्फ एक बार चिकन या मटन बिरयानी खाता हूं, क्योंकि मुझे घर पैसे भेजने होते हैं. बाकी दिनों में मैं मिल की कैंटीन में खाना खाता हूं.”
के. जी. नायडू और कन्नापिरन फैक्ट्रियों में प्रवासी मजदूरों के लिए हॉस्टल हैं और अब उनके परिवारों को भी कंपनी की कैंटीन में खाना खाने की अनुमति दी गई है.
के. जी. मिल्स के एचआर हेड ओ. रामबाबू ने कहा कि उनकी कंपनी मजदूरों को भरोसा दिला रही है कि उनकी देखभाल की जाएगी. “हम मजदूरों और उनके परिवारों को कैंटीन में खाना दे रहे हैं और यात्रा खर्च में भी मदद कर रहे हैं. हम लगातार उनसे संपर्क में हैं.”
लेकिन बिहार के पूर्णिया के रहने वाले सुंदर राम का मानना है कि कुछ महीनों तक गांव में रुकने से कोई नुकसान नहीं होगा. उन्होंने अपने तीन भाइयों को भी यही सलाह दी है, जो अभी पल्लडम के पास ईश्वर मिल्स में काम पर वापस नहीं लौटे हैं.
उन्होंने कहा, “हम लकड़ी के चूल्हे पर खाना बनाने के आदी हैं और हमने केरोसिन स्टोव भी नहीं छोड़ा है. मैं और मेरे भाई करीब छह साल से ईश्वर मिल्स में काम कर रहे हैं और अगर हम खर्च कम रखें तो गुज़ारा हो जाएगा.” सुंदर राम ने 2020 में 470 रुपये रोज की मजदूरी से काम शुरू किया था और अब करीब 780 रुपये रोज कमाते हैं और मिल में उनका पद भी बढ़ा है.
लॉकडाउन का डर और LPG की कमी का असर मिलों में काम करने वाली लगभग 50 प्रतिशत महिला मजदूरों पर ज्यादा पड़ा है. कई निजी हॉस्टल अस्थायी रूप से बंद हो गए हैं. मिलें मजदूरों की सुरक्षा और सुविधा का ध्यान रख रही हैं, लेकिन महिलाओं ने कहा कि कोविड का डर अब भी उनके मन में है.
ओडिशा के कोरापुट जिले की प्रीति साहू और समिता पात्रा ने पिछले 20 दिनों में दो बार हॉस्टल बदला है, क्योंकि उनके पुराने हॉस्टल की मालिक ने कम आय के कारण 30 बेड वाला हॉस्टल बंद कर दिया. भारत के अलग-अलग हिस्सों से 20 से ज्यादा लड़कियां अभी वापस नहीं लौटी हैं, इसलिए हॉस्टल चलाना महंगा पड़ रहा था.
प्रीति और समिता के लिए बिना मेस वाला हॉस्टल ठीक नहीं था. प्रीति ने कहा, “हम 22 मार्च के आसपास लौटे तो देखा कि हमारा हॉस्टल लगभग खाली था. मालिक ने हमें नया स्थान मिलने तक रहने दिया, लेकिन मेस पहले ही बंद हो चुका था.”
साउदर्न इंडिया मिल्स एसोसिएशन (SIMA) के महासचिव डॉ. के. सेल्वराजू ने कहा कि उद्योग मजदूरों को सुरक्षित महसूस कराने की पूरी कोशिश कर रहा है. “मजदूरों की कमी पूरी करने के लिए अतिरिक्त काम पर ओवरटाइम दिया जा रहा है. हमने रोज़गार का भरोसा भी दिया है और अलग-अलग राज्यों में मजदूरों से संपर्क कर उन्हें उचित वेतन और अच्छी काम की स्थिति का आश्वासन दिया है.”
SIMA की स्थापना 1933 में हुई थी और यह देश के सबसे पुराने टेक्सटाइल संगठनों में से एक है, जो दक्षिण भारत की 2,000 से ज्यादा मिलों का प्रतिनिधित्व करता है. तमिलनाडु स्पिनिंग मिल्स एसोसिएशन (TASMA) के साथ मिलकर SIMA के अधिकारी हर हफ्ते टेक्सटाइल एंड कॉमन लेबर यूनियन (TTCU) और हैंडलूम वीवर्स कोऑपरेटिव सोसाइटीज (HWCS) के साथ बैठक कर रहे हैं.
सूत्रों ने बताया कि तमिलनाडु सरकार और उद्योग सचिव ने नई दिल्ली में कैबिनेट सचिव को टेक्सटाइल मजदूरों की स्थिति की जानकारी दी है, क्योंकि ज्यादा घबराहट होने पर 60 लाख से ज्यादा नौकरियां खतरे में पड़ सकती हैं.
टेक्सटाइल उद्योग पर असर
मिल एसोसिएशन और मालिकों के भरोसे और कोशिशों के बावजूद कई प्रवासी मजदूर अभी गांव में रुककर स्थिति देख रहे हैं. 1977 से बड़ा टेक्सटाइल उत्पादक पल्लवा ग्रुप के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर दुरई पलानीस्वामी ने कहा कि इस साल उत्पादन में 10 प्रतिशत की कमी आई है.
उन्होंने कहा, “कई मजदूर अभी तक वापस नहीं लौटे हैं, इसलिए नौकरी छोड़ने की दर ज्यादा है. हममें से कई बड़े टेक्सटाइल मिल चलाने वाले अभी अनुपस्थिति का पूरा असर नहीं समझ पाए हैं. हम स्थिति संभालने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन उत्पादन और मुनाफे में और गिरावट के लिए तैयार हैं.”
बड़ी टेक्सटाइल मिलों के पास दो-तीन महीने के लिए कपास का स्टॉक है, लेकिन छोटी मिलें जो टेक्सटाइल फैक्ट्रियों को धागा सप्लाई करती हैं, वे मजदूरों की कमी और पूंजी की कमी से ज्यादा प्रभावित हैं.
डॉ. सेल्वराजू ने कहा, “अगर युद्ध कुछ हफ्ते और चलता है, तो केंद्र सरकार को दखल देना होगा और बैंकों से कहना होगा कि छोटी मिलों को काम चलाने के लिए पूंजी दें. हमने बैंकों को बता दिया है कि अगर ओवरड्राफ्ट सुविधा मिलती है, तो मिलें अतिरिक्त ब्याज देने के लिए तैयार हैं.”
तमिलनाडु भारत का सबसे बड़ा टेक्सटाइल उत्पादन करने वाला राज्य है, जो देश के कुल टेक्सटाइल निर्यात का 41 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा देता है. वित्त वर्ष 2025 तक राज्य के टेक्सटाइल विभाग के आंकड़ों के अनुसार निर्यात 70,855 करोड़ रुपये रहा. सबसे ज्यादा निर्यात अमेरिका को होता है, जबकि यूरोपीय संघ और मध्य पूर्व भी बड़ा हिस्सा रखते हैं. तिरुप्पुर, कोयंबटूर, सलेम और इरोड जैसे प्रमुख क्लस्टर में कपास, मैन-मेड फाइबर और कपड़ों में विशेषज्ञता के साथ 1,861 मिलों के जरिए भारत की 46 प्रतिशत स्पिनिंग क्षमता तमिलनाडु में है, जिससे राज्य का टेक्सटाइल उद्योग अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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