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Tuesday, 31 March, 2026
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हरियाणा सरकार ने IDFC फर्स्ट और AU स्मॉल फाइनेंस बैंक से जुड़े ‘धोखाधड़ी’ केस की CBI जांच की मांग की

दिप्रिंट को मिली जानकारी के अनुसार, कुछ ऐसे IAS अधिकारियों के नाम अब जांच के दायरे में हैं, जो उन सरकारी विभागों में तैनात थे जिन्होंने सार्वजनिक कोष इन दो बैंकों में जमा कराया था.

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गुरुग्राम: हरियाणा सरकार ने दो प्राइवेट बैंकों से जुड़े कथित 590 करोड़ रुपये के घोटाले की जांच सेंट्रल ब्यूरो ऑफ़ इन्वेस्टिगेशन (CBI) से कराने की सिफ़ारिश की है.

एक सीनियर पुलिस अधिकारी ने दिप्रिंट को बताया कि जिन बैंकों पर शक है, वे हैं IDFC बैंक और AU स्मॉल फ़ाइनेंस बैंक. उन्होंने यह भी बताया कि केंद्रीय गृह मंत्रालय को भेजी गई सिफ़ारिश में कोटक महिंद्रा बैंक से जुड़े मामलों को शामिल नहीं किया गया है.

हरियाणा सरकार की अलग-अलग एजेंसियों ने जो पैसा जमा किया था—जिसे असल में फ़िक्स्ड डिपॉज़िट में रखा जाना था—उसे कथित तौर पर बैंक अधिकारियों ने सरकारी कर्मचारियों और कुछ प्राइवेट लोगों के साथ मिलकर अपने निजी फ़ायदे के लिए कहीं और लगा दिया. यह पैसा अब राज्य सरकार को वापस मिल गया है.

इसके बाद, मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने जांच हरियाणा एंटी-करप्शन ब्यूरो (ACB) को सौंप दी. ACB ने बैंक मैनेजरों, रिलेशनशिप मैनेजरों, सरकारी वित्त अधिकारियों और जौहरियों को गिरफ़्तार किया, जो कथित तौर पर इस पैसे के लेन-देन के खेल में शामिल थे. प्रवर्तन निदेशालय (ED) भी इस जांच में शामिल हो गया है और उसने 19 जगहों पर छापे मारे हैं.

पता चला है कि कुछ IAS अधिकारियों के नाम भी अब शक के घेरे में हैं. ये अधिकारी उन सरकारी विभागों में तैनात थे, जिन्होंने इन दोनों बैंकों में सरकारी पैसा जमा कराया था.

एक IAS अधिकारी की पत्नी पर शक है—जो IDFC बैंक में तैनात थीं—कि उन्होंने अपने रसूख का इस्तेमाल करके बैंक को सरकारी विभागों से डिपॉज़िट दिलाने में मदद की.

एक सीनियर अधिकारी ने दिप्रिंट को बताया कि हालांकि सरकारी विभागों से डिपॉज़िट दिलाने में उनकी भूमिका से इनकार नहीं किया जा रहा है, लेकिन कहा जा रहा है कि जब उन्हें कुछ गड़बड़ी का अंदाज़ा हुआ, तो उन्होंने अपने सीनियर अधिकारियों को इस बारे में बता दिया था.

इस घटनाक्रम से हरियाणा के सीनियर अफ़सरों में हड़कंप मच गया है. मामले की जानकारी रखने वाले सूत्रों का कहना है कि लगभग आधा दर्जन IAS अधिकारी जांच एजेंसियों की नज़र में हैं.

CBI के इस जांच में शामिल होने से जांच का दायरा और बढ़ने की उम्मीद है. जांच करने वाले अधिकारी उन सीनियर अफ़सरों की भूमिका की भी जांच कर सकते हैं, जिनके बारे में सूत्रों का कहना है कि जब सरकारी पैसे को सुनियोजित तरीके से कहीं और लगाया जा रहा था, तब उन्होंने जान-बूझकर इस पर ध्यान नहीं दिया.

एक चेतावनी जिसे नज़रअंदाज़ किया गया?

सूत्रों के मुताबिक, यह धोखाधड़ी शायद पहली बार नहीं है जब सरकारी फंड को प्राइवेट बैंकों में जमा करने को लेकर खतरे की घंटी बजी हो.

एक सीनियर सरकारी अधिकारी ने दिप्रिंट को बताया कि वित्त विभाग ने 2012 में ही इस तरीके को लेकर चेतावनी जारी कर दी थी, जब यह देखा गया था कि कई सरकारी अधिकारी पब्लिक फंड को एक प्राइवेट सेक्टर के बैंक में जमा कर रहे थे.

अधिकारी ने कहा, “उस समय ऐसी रिपोर्टें थीं कि जो अधिकारी सरकारी पैसा यस बैंक में भेज रहे थे, उन्हें बदले में महंगे तोहफे मिल रहे थे.”

इसके बाद वित्त विभाग ने एक निर्देश जारी किया, जिसमें किसी भी प्राइवेट बैंक में जमा किए जा सकने वाले सरकारी फंड की सीमा 25 करोड़ रुपये तय कर दी गई.

अधिकारी ने बताया कि HDFC बैंक को इस शर्त से छूट दी गई थी, क्योंकि उसके आकार और सिस्टम में उसकी अहमियत को देखते हुए, इन गाइडलाइंस के मकसद से उसे अब प्राइवेट संस्था नहीं माना जाता था.

अधिकारी ने कहा कि कुछ समय तक इन निर्देशों का पूरी ईमानदारी से पालन किया गया. फिर धीरे-धीरे, चुपके से और “गजब की चालाकी” से इन नियमों को कमज़ोर किया जाने लगा.

अधिकारियों ने 25 करोड़ रुपये की सीमा की व्याख्या इस तरह करनी शुरू कर दी कि यह पूरे बैंक के लिए नहीं, बल्कि उसकी अलग-अलग शाखाओं के लिए है. अधिकारी ने कहा, “इस सुविधाजनक व्याख्या के तहत, 10 शाखाओं वाला कोई बैंक कथित तौर पर 250 करोड़ रुपये का सरकारी फंड ले सकता था और फिर भी नियमों के दायरे में रहता. और फिर, इस मनगढ़ंत तर्क को भी छोड़ दिया गया.”

इस बीच, एक सीनियर IAS अधिकारी ने इस सुझाव को सिरे से खारिज कर दिया कि बैंकों में सरकारी फंड के लेन-देन पर नज़र रखने की सीधी ज़िम्मेदारी IAS अधिकारियों की होती है.

उस सिविल सर्वेंट ने कहा कि IAS अधिकारियों को विभागों में डायरेक्टर या बोर्ड और निगमों में मैनेजिंग डायरेक्टर के तौर पर तैनात किया जाता है; उनसे यह उम्मीद नहीं की जाती कि वे बैंकों में जमा सरकारी पैसे के रोज़मर्रा के लेन-देन पर नज़र रखें.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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