नई दिल्ली: राष्ट्रीय सुरक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था को एक चुने हुए प्रतिनिधि के व्यक्तिगत और राजनीतिक अधिकारों से ऊपर बताते हुए, पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने शुक्रवार को खडूर साहिब के लोकसभा सांसद अमृतपाल सिंह की याचिका खारिज कर दी.
अमृतपाल, जिन्हें पंजाब सरकार के गृह विभाग के प्रिवेंटिव डिटेंशन आदेश के तहत असम के डिब्रूगढ़ सेंट्रल जेल में रखा गया है, ने संसद के चल रहे बजट सत्र में शामिल होने के लिए अस्थायी रिहाई मांगी थी. अदालत ने इस मांग को राज्य की सुरक्षा चिंताओं के मुकाबले कम महत्वपूर्ण माना.
इस साल संसद का बजट सत्र का दूसरा चरण 9 मार्च से शुरू हुआ और 2 अप्रैल को खत्म होने की उम्मीद है.
33 वर्षीय खुद को उपदेशक बताने वाले और खालिस्तान के खुले समर्थक अमृतपाल ने हाई कोर्ट में 2 फरवरी 2026 के आदेश को रद्द करने की मांग की थी. यह आदेश पंजाब सरकार के गृह विभाग ने जारी किया था, जिसमें राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA) 1980 की धारा 15 के तहत उनकी अस्थायी रिहाई की अर्जी खारिज की गई थी.
चीफ जस्टिस शील नागू और न्यायमूर्ति संजीव बेरी की बेंच ने 11 पन्नों के फैसले में कहा, “जब किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार राज्य की सुरक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था से टकराता है, तो व्यक्ति की स्वतंत्रता को पीछे रखा जाता है और वह महत्वहीन हो जाती है.”
न्यायाधीशों ने यह भी कहा कि “राज्य और देश की संप्रभुता, अखंडता और सुरक्षा हमेशा सर्वोपरि होती है.”
अमृतपाल की ओर से वरिष्ठ वकील आर.एस. बैंस और वकील इमान एस. खारा और अनमोल सिंह ने दलील दी कि बजट सत्र (जो जनवरी के अंत से अप्रैल 2026 तक दो चरणों में चल रहा है) में उनकी मौजूदगी जरूरी है, ताकि वे अपने क्षेत्र से जुड़े मुद्दे उठा सकें. इनमें अगस्त 2025 की बाढ़ के बाद की स्थिति और पंजाब में नशे की समस्या शामिल है.
इसलिए उन्होंने अदालत से अस्थायी रिहाई की मांग की.
उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 101 का भी जिक्र किया, जिसमें कहा गया है कि अगर कोई सांसद 60 दिन से ज्यादा बिना अनुमति अनुपस्थित रहता है तो उसकी सीट खाली घोषित की जा सकती है. उन्होंने कहा कि उनकी लगातार हिरासत “राजनीतिक कारणों से” है और यह उनके मतदाताओं की आवाज दबाने की कोशिश है.
जवाब में पंजाब सरकार ने कहा कि NSA की धारा 15 सरकार को व्यापक अधिकार देती है और यह अनिवार्य नहीं है. राज्य ने कहा कि हिरासत में किसी सांसद को आम नागरिक से ज्यादा कोई विशेष अधिकार नहीं मिलता.
राज्य सरकार ने यह भी कहा कि अनुच्छेद 105(1) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता किसी हिरासत में बंद सांसद को अनुच्छेद 21 के तहत कानून से ज्यादा अधिकार नहीं देती. उन्होंने अमृतसर के जिला मजिस्ट्रेट और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक की रिपोर्ट का हवाला दिया, जिसमें रिहाई पर आपत्ति जताई गई थी और कहा गया था कि इससे राज्य की सुरक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था को गंभीर खतरा हो सकता है.
‘रिकॉर्ड में उपलब्ध सामग्री के आधार पर संतुष्टि’
डिवीजन बेंच ने सरकार के फैसले को सही माना और कहा कि उन्हें अमृतपाल की रिहाई खारिज करने में कोई संवैधानिक या कानूनी गलती नहीं दिखी. अदालत ने कहा कि संविधान संघीय है, लेकिन प्रिवेंटिव डिटेंशन जैसे मामलों में केंद्र को ज्यादा अधिकार दिए गए हैं, जो इस विषय की गंभीरता को दिखाता है.
अदालत ने 1975 में इंदिरा गांधी के मामले सहित पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि हिरासत में बंद सांसद को आम नागरिक से ज्यादा कोई विशेष अधिकार नहीं मिलता. इसलिए सांसद और आम आदमी दोनों पर NSA की धारा 15 के तहत समान नियम लागू होते हैं.
सांसद की सीट खाली होने के डर पर अदालत ने कहा कि सिंह संसद से अनुपस्थिति के लिए छूट मांग सकते हैं, जिस पर अलग से विचार किया जाएगा.
अदालत ने कहा कि वह राज्य के पास मौजूद सबूतों की सच्चाई की जांच नहीं कर सकती.
उसने कहा कि पंजाब सरकार का फैसला रिकॉर्ड में उपलब्ध सामग्री के आधार पर “व्यक्तिगत संतुष्टि” पर लिया गया है, जिसमें सार्वजनिक व्यवस्था को खतरे की संभावना देखी गई.
इसलिए याचिका बिना किसी लागत के खारिज कर दी गई और कहा गया कि “राष्ट्रीय हित व्यक्तिगत हितों से ऊपर हैं.”
अदालत ने कहा, “हमारा संविधान संघीय है, लेकिन इसमें कुछ प्रावधान ऐसे हैं जो केंद्र सरकार को ज्यादा शक्ति देते हैं. सातवीं अनुसूची में संसद और राज्य विधानसभाओं के अधिकार तय हैं, जिसमें संसद को यूनियन लिस्ट के महत्वपूर्ण विषयों पर कानून बनाने का अधिकार है, जबकि राज्यों को कम महत्वपूर्ण विषय दिए गए हैं.”
अदालत ने कहा कि प्रिवेंटिव डिटेंशन से जुड़े मामले सातवीं अनुसूची की यूनियन लिस्ट में आते हैं, जो इस विषय की महत्ता को दिखाता है.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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