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Saturday, 28 March, 2026
होमफीचरपुरानी कहानियां और नैतिकता से परे: भारत के टीनएजर्स अब यंग एडल्ट फिक्शन पढ़ रहे हैं

पुरानी कहानियां और नैतिकता से परे: भारत के टीनएजर्स अब यंग एडल्ट फिक्शन पढ़ रहे हैं

यंग एडल्ट्स के लिए लिखी जा रही किताबें लंबे समय से टीनएजर्स के लिए पढ़ने की कमी को पूरा कर रही हैं. ये किताबें उन टीनएजर्स तक पहुंच रही हैं जो अपनी पहचान, रिश्तों और इस उम्र की चुनौतियों से गुजर रहे हैं. इसी वजह से इनकी कॉपियां और बिक्री दोनों बढ़ रही हैं.

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नई दिल्ली: ममता पांडे बचपन में पंचतंत्र की कहानियां और चंपक पत्रिका पढ़ते हुए बड़ी हुईं. ऐसी कहानियां जिनमें ईमानदारी, दया और सम्मान जैसे नैतिक मूल्यों की सीख होती थी. लेकिन नोएडा स्थित उनके घर में उनके बच्चों की बुकशेल्फ़ एक बिल्कुल अलग कहानी कहती है. वहां जापानी मंगा जैसे जुजुत्सु कैसेन, थ्रिलर, रोमांस उपन्यास, सेल्फ-हेल्प किताबें और समकालीन फिक्शन की किताबें सजी हुई हैं. उनके बच्चे अब मिथकों और नैतिक कहानियों से आगे बढ़कर अलग-अलग शैलियों की किताबें पढ़ रहे हैं, जिनमें जटिल विषय होते हैं. ऐसी दुनिया जो ममता के बचपन की सधी हुई और सरल अंत वाली कहानियों से काफी अलग है.

42 वर्षीय ममता पांडे अक्सर अपने 17 वर्षीय बेटे प्रगेश को उत्साह से भरे अंदाज़ में उसकी नई मंगा की कहानी के ट्विस्ट और किरदारों के विकास के बारे में बताते हुए सुनती हैं. उनकी 12 वर्षीय बेटी शिवांगी की अपनी अलग पढ़ने की सूची है. अलग-अलग शैलियां, अलग-अलग कहानियां, लेकिन दोनों में ऐसी कहानियों के प्रति समान रुचि है जो आधुनिक हों और भावनात्मक रूप से गहरी हों.

कई दशकों तक भारत में बच्चों का साहित्य मुख्य रूप से परियों की कहानियों और पौराणिक कथाओं से सीधे एडल्ट साहित्य की ओर बढ़ जाता था, जिससे 12 से 18 वर्ष के पाठकों के लिए खास तौर पर बहुत कम लिखा जाता था. अब यंग एडल्ट (YA) फिक्शन इस खाली जगह को भर रहा है.

प्रगेश ने कहा. “मुझे ऐसी किताबें पसंद हैं जो मुझे सोचने पर मजबूर करें या मुझे रोमांचित बनाए रखें. जब मैं पढ़ता हूं, तो मुझे मनोरंजन और ज्ञान दोनों चाहिए. सिर्फ नैतिक शिक्षा नहीं.”

Pragesh's book collection, which ranges from romance novel of Colleen Hoover, manga and motivational titles. Almina Khatoon | ThePrint
प्रगेश का किताबों का संग्रह, जिसमें कोलीन हूवर के रोमांस उपन्यासों से लेकर मांगा और मोटिवेशनल किताबें शामिल हैं | अलमिना खातून | दिप्रिंट

आज के दौर में, जहां दृश्य माध्यमों का बोलबाला है. एनीमे, स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म, छोटे वीडियो और सोशल मीडिया. टीनएजर्स ऐसी कहानियां चाहते हैं जो उनके वर्तमान संघर्षों को दिखाएं और उनकी वास्तविक ज़िंदगी और बढ़ती स्वतंत्रता को प्रतिबिंबित करें.

अब इसके असर आंकड़ों में भी दिखने लगे हैं. जो कभी एक छोटा-सा वर्ग था, वह अब प्रकाशन उद्योग के सबसे तेज़ी से बढ़ते हिस्सों में से एक बन चुका है. विविध कहानियों, डिजिटल असर और एक ऐसी पीढ़ी के कारण, जो खुद को किताबों में देखना चाहती है, यह विकास संभव हुआ है. आज भारतीय प्रकाशक हर साल मिलकर भारतीय लेखकों की लगभग 200 बच्चों और यंग एडल्ट किताबें प्रकाशित करते हैं, जिनमें से कई की सालाना बिक्री 10,000 से अधिक कॉपिज़ होती हैं.

चेतन भगत की फाइव पॉइंट समवन (2004) ने दो दशक पहले युवा-केन्द्रित फिक्शन के इस उछाल की शुरुआत करने में अहम भूमिका निभाई थी. इसके बाद पारो आनंद, नताशा शर्मा, दिव्य प्रकाश दुबे, जेन डी’सूज़ा, सौम्या राजेंद्रन, विभा बत्रा, अनुष्का रविशंकर, सुधा मूर्ति और निकिता सिंह जैसे लेखकों. साथ ही दुर्जय दत्ता जैसे लोकप्रिय लेखकों ने इस क्षेत्र को और विस्तार दिया. इनकी कहानियां कैंपस रोमांस और थ्रिलर से लेकर फैंटेसी और सामाजिक मुद्दों पर आधारित कथाओं तक फैली हुई हैं.

लेखकों का कहना है कि यंग एडल्ट फिक्शन को लेकर लोगों की सोच में स्पष्ट बदलाव आया है. अब बुकस्टोर्स, लाइब्रेरी और साहित्यिक महोत्सवों में यंग एडल्ट फिक्शन के लिए अलग से शेल्फ़ और सत्र होते हैं. जो एक दशक पहले तक नहीं थे.

विभा बत्रा ने कहा, “जिस कमी की वजह से एक खास उम्र के पाठक खुद को देख, महसूस और कहानियों व किरदारों से जुड़ नहीं पाते थे, उसे यंग एडल्ट सेक्शन ने पूरा किया. इससे पहले ऐसी किताबें अक्सर बच्चों के सेक्शन में खो जाती थीं या एडल्ट किताबों के बीच कहीं रख दी जाती थीं.”

Pragesh Pandey reading Russian writer Fyodor Dostoevsky's White Nights. Almina Khatoon | ThePrint
प्रागेश पांडे रूसी लेखक फ्योदोर दोस्तोयेव्स्की की ‘व्हाइट नाइट्स’ पढ़ रहे हैं। अलमिना खातून | दिप्रिंट

यंग एडल्ट फिक्शन

मुंबई की लेखिका शबनम मिनावाला की यंग एडल्ट फिक्शन में यात्रा लगभग इत्तिफाक से शुरू हुई. वह पहले पत्रकार थीं, लेकिन जब उनके तीनों बच्चों का जन्म थोड़े-थोड़े अंतर पर हुआ, तो उन्होंने अपने करियर से विराम लिया. उन्हीं शुरुआती सालों में उन्होंने अपने बचपन की यादों से प्रेरणा लेकर कहानियां लिखना शुरू कीं.

उनका पहला उपन्यास द सिक्स स्पेलमेकर्स ऑफ़ दूराबजी स्ट्रीट (2013) शुरू में टीनएजर्स के लिए लिखा गया था, लेकिन धीरे-धीरे उन्हें बड़े पाठकों के लिए लिखने की दिशा में ले गया.

शबनम मिनावाला ने कहा, “मुझे इस आयु वर्ग के लिए लिखना सच में बहुत पसंद आया. युवाओं के लिए लिखना रोमांचक होता है, क्योंकि यह वह समय होता है जब भावनाएँ अपने चरम पर होती हैं. हर चीज़ या तो बहुत अच्छी लगती है या बहुत बुरी.”

आज, उनके अनुसार, यंग एडल्ट फिक्शन लेखकों को उन विषयों को गहराई से लिखने का मौका देता है, जो बचपन और वयस्कता के बीच के इस दौर से गुजर रहे टीनएजर्स से सीधे जुड़ते हैं.

शबनम मिनावाला ने कहा, “युवा न तो बच्चे होते हैं और न ही पूरी तरह एडल्ट. यंग एडल्ट फिक्शन पहचान, साथियों का दबाव, रिश्ते और मानसिक स्वास्थ्य जैसे मुद्दों को इस तरह प्रस्तुत करता है कि किशोर उनसे जुड़ाव महसूस कर सकें.”

लेखकों का यह छोटा लेकिन बढ़ता समूह भारत में यंग एडल्ट फिक्शन के विस्तार में लगातार योगदान दे रहा है.

Author Shabnam Minawala with her book. Special Arrangement
लेखिका शबनम मिनावाला अपनी किताब के साथ | विशेष व्यवस्था

नवनीत निरव ने कहा, गाज़ियाबाद के लेखक और संपादक नवनीत निरव के अनुसार, कहानियां पूरी तरह नई नहीं हैं. उनके मुताबिक, जो बदला है वह है उनका वर्गीकरण और प्रस्तुत करने का तरीका.

40 वर्षीय नवनीत निरव कहते हैं कि भारतीय साहित्य में युवा पाठकों के लिए किताबें हमेशा से मौजूद रही हैं. जैसे सत्यजीत रे की जासूसी कहानियां, एकलव्य के प्रकाशन और ‘पराग’ जैसी पत्रिकाएं. लेकिन इन्हें शायद ही कभी यंग एडल्ट के रूप में अलग पहचान दी गई.

नवनीत निरव ने कहा. “जो बदला है, वह है भाषा की सहजता और इस श्रेणी की बढ़ती पहचान.”

नवनीत निरव ने कहा, “भाषा अधिक सरल और लचीली हो गई, और यंग एडल्ट सेक्शन मुख्यधारा में आ गया.”

इंटरनेट के बढ़ते प्रभाव के साथ यह आशंका थी कि टीनएजर्स पढ़ाई-लिखाई से दूर हो जाएंगे. लेकिन नवनीत निरव के अनुसार, इसके उलट किताबों ने युवाओं के बीच एक नई सांस्कृतिक पहचान बना ली. पढ़ना अचानक ट्रेंड में आ गया और सोशल मीडिया पर इसका एक खास, समर्पित दर्शक वर्ग तैयार हो गया.

नवनीत निरव ने कहा. “किताब हाथ में रखना या अपनी शेल्फ़ पर कुछ खास लेखकों की किताबें रखना अब कूल और बौद्धिक दिखने लगा है.”

वह यह भी मानते हैं कि इस विधा का विस्तार अहम है, लेकिन अभी यह विकासशील अवस्था में है.

नवनीत निरव ने कहा. “आज यंग एडल्ट भारत के सबसे बड़े साहित्यिक बाज़ारों में से एक बन चुका है. लेकिन केवल संख्या में बढ़ोतरी काफी नहीं है. हमें गहराई भी चाहिए. खासकर ऐसा मजबूत नॉन-फिक्शन, जो समाज, विज्ञान और वास्तविक मुद्दों को किशोरों की समझ के अनुसार प्रस्तुत करे.”

वह यह भी अनुमान लगाते हैं कि आने वाले दशक में यंग एडल्ट लेखन जलवायु चिंता, तकनीकी नैतिकता और लैंगिक पहचान जैसे विषयों पर अधिक ध्यान देगा.

Author Andaleeb Wajid with her books on a shelf at a literature festival. Special arrangement
एक साहित्य उत्सव में शेल्फ़ पर अपनी किताबों के साथ लेखिका अंदालीब वाजिद | विशेष व्यवस्था

नवनीत निरव ने कहा, “यंग एडल्ट का भविष्य उन्हीं कहानियों का होगा जो सच्ची हों, उनसे जुड़ी हों. और उन्हीं के लिए लिखी गई हों.”

अंदलीब वाजिद ने कहा, बेंगलुरु की लेखिका अंदलीब वाजिद ने जब 2009 में अपना पहला उपन्यास प्रकाशित किया, तब भारतीय प्रकाशन जगत में यंग एडल्ट एक मान्यता प्राप्त श्रेणी भी नहीं थी.

उनकी रचनाएं. जैसे द तमन्ना ट्रिलॉजी (2014), माय ब्रदर’स वेडिंग (2013), और द हिना स्टार्ट-अप (2024). पहचान, रिश्तों और आत्म-खोज जैसे विषयों को केंद्र में रखती हैं.

अंदलीब वाजिद ने कहा. “मैं बस बड़े पाठकों के लिए कुछ लिखना चाहती थी,” और उन्होंने यह भी बताया कि युवाओं के लिए लिखना उन्हें अपने अनुभवों के अधिक करीब और सच्चा लगा.

अंदलीब वाजिद ने कहा. “उस समय हमारे पास इसके लिए कोई स्पष्ट शब्दावली ही नहीं थी.” उन्हें याद है कि शुरुआती ‘कमिंग-ऑफ-एज’ कहानियां, जिनमें उनकी अपनी कहानियां भी शामिल थीं, अक्सर एडल्ट साहित्य के रूप में प्रस्तुत की जाती थीं, क्योंकि बुकस्टोर्स में यंग एडल्ट के लिए अलग से कोई जगह नहीं होती थी.

फिर भी, टीनएजर्स की भावनाएं हमेशा से कहानियों का एक मजबूत आधार रही हैं.

अंदलीब वाजिद ने कहा. “यंग एडल्ट उन सभी के लिए है, जो दिल से युवा हैं.”

The popularity of young adult fiction has been growing since the 1990s and 2000s from the Harry Potter era. Almina Khatoon | ThePrint
1990 और 2000 के दशक में हैरी पॉटर के दौर से ही ‘यंग एडल्ट फिक्शन’ की लोकप्रियता लगातार बढ़ रही है | अलमिना खातून | दिप्रिंट

जब यंग एडल्ट ने मांग शुरू की

भारत में यंग एडल्ट फिक्शन के बढ़ते प्रभाव के साथ प्रकाशन उद्योग अब इस श्रेणी पर सावधानी से दांव लगाने लगा है.

समीर महाले ने कहा, “हालांकि पूरे बाज़ार के सटीक आंकड़े सीमित हैं, लेकिन 2000 के दशक में हैरी पॉटर और ट्वाइलाइट जैसी किताबों के क्रेज के बाद इस श्रेणी को व्यावसायिक सफलता मिलने लगी.” अब कई बच्चों और यंग एडल्ट किताबें हर साल 10,000 से अधिक प्रतियां बेच रही हैं.

सीरीज़ आधारित किताबें खास तौर पर बेहतर प्रदर्शन करती हैं, क्योंकि पाठक परिचित किरदारों और कहानी की दुनिया में बार-बार लौटना पसंद करते हैं. फिर भी, भारतीय प्रकाशन बाज़ार में यंग एडल्ट की हिस्सेदारी अभी भी अपेक्षाकृत छोटी है, जहां किताबों का दबदबा बना हुआ है.

सोहिनी मित्रा ने कहा, “यह श्रेणी बढ़ रही है, लेकिन अभी भी एक सीमित दायरे में है.”

सोहिनी मित्रा ने कहा, “मैं हर साल लगभग दो यंग एडल्ट किताबें प्रकाशित करती हूं, जो हमारे कुल प्रकाशनों का बहुत छोटा हिस्सा है.”

Youngsters and children now have separate sections for their books. Almina Khatoon | ThePrint
युवाओं और बच्चों के लिए अब किताबों के अलग-अलग सेक्शन हैं | अलमिना खातून | दिप्रिंट

प्रकाशक हर साल मिलकर भारतीय लेखकों की लगभग 200 बच्चों और यंग एडल्ट किताबें प्रकाशित करते हैं, और यह संख्या पिछले दशक में लगातार बढ़ी है. इसमें उन बड़ी संख्या में स्वयं-प्रकाशित किताबें शामिल नहीं हैं, जिन्होंने इस बाज़ार को और विस्तार दिया है.

सोहिनी मित्रा ने कहा, “हमने जानबूझकर समकालीन फिक्शन, हास्य और विभिन्न शैलियों पर निवेश किया और बच्चों के साहित्य को पढ़ाई की सामग्री के बजाय मनोरंजन—यानी आत्मा के लिए पोषण—के रूप में प्रस्तुत किया. असली बदलाव तब आया जब हमने युवा पाठकों पर भरोसा किया और उन्हें ऐसी दुनिया दी, जिसमें वे खुद को देख सकें.”

फिर भी, पश्चिमी देशों की तरह जहां यंग एडल्ट किताबें अक्सर बड़ी-बड़ी बेस्टसेलर बन जाती हैं, भारत में अभी तक कोई बहुत बड़ा YA फेनोमेनन देखने को नहीं मिला है.

प्रकाशकों के अनुसार, इसका एक कारण भारतीय पुस्तक बाज़ार की संरचना है. यहां किताबें, परीक्षा गाइड और शैक्षणिक सामग्री ही बिक्री का बड़ा हिस्सा बनाते हैं, जिससे मनोरंजन के लिए पढ़ी जाने वाली किताबों—जिनमें यंग एडल्ट  भी शामिल है—की हिस्सेदारी कम रह जाती है.

इसके बावजूद, प्रकाशक अब टीनएजर्स पाठकों को आकर्षित करने के लिए नई-नई शैलियों के साथ प्रयोग कर रहे हैं—जैसे कमिंग-ऑफ-एज कहानियां, रोमांस, फैंटेसी और थ्रिलर.

सोहिनी मित्रा ने कहा, “अब आत्म-खोज, रिश्ते, साथियों का दबाव, सोशल मीडिया, खेल और करियर से जुड़ी कहानियां, और मानसिक स्वास्थ्य जैसे विषयों को पहले की तुलना में कहीं अधिक गहराई से प्रस्तुत किया जा रहा है. इसके साथ ही ऐतिहासिक फिक्शन, ग्राफिक नॉवेल, स्पोर्ट्स फिक्शन, STEM से प्रेरित कहानियां और अन्य प्रयोगात्मक रूप भी बढ़े हैं.”

बच्चों के लिए समर्पित बुकस्टोर्स के बढ़ने से भी इस श्रेणी की पहचान मजबूत हुई है. बड़े शहरों में ऐसे स्टोर अब बच्चों और टीनएजर्स के लिए खास किताबें चुनते हैं और पढ़ने से जुड़े कार्यक्रम भी आयोजित करते हैं.

स्वाति रॉय ने कहा, “2008 में जब हमने शुरुआत की थी, तब से अब तक इस क्षेत्र में बड़ा बदलाव आया है.”

उन्होंने बताया कि स्वतंत्र प्रकाशकों—जैसे डकबिल, जगरनॉट, स्पीकिंग टाइगर (टॉकिंग क्यूब) और कल्पवृक्ष—के आने के साथ-साथ एकलव्य, एकतारा, नेशनल बुक ट्रस्ट और चिल्ड्रन्स बुक ट्रस्ट जैसे प्रकाशकों द्वारा हिंदी किताबों की संख्या भी बढ़ी है.

Books on environment for kids
विश्व पुस्तक मेले में हार्परकॉलिन्स के स्टॉल पर अंतरराष्ट्रीय प्रकाशक Usborne की पर्यावरण से जुड़ी कई किताबें मौजूद थीं | फ़ोटो: आकांक्षा मिश्रा | दिप्रिंट

स्वाति रॉय ने कहा, “पिछले दशक में विषयों और फॉर्मेट्स दोनों में विस्तार हुआ है. अब टीनएजर्स के लिए अधिक अर्थपूर्ण किताबें लिखी जा रही हैं.”

उन्होंने यह भी कहा कि अब जेंडर, जाति, दिव्यांगता, पर्यावरण और भावनात्मक स्वास्थ्य जैसे विषयों को बच्चों और यंग एडल्ट साहित्य में अधिक जगह मिल रही है.

हालांकि, इस बात से सभी सहमत नहीं हैं.

सोहिनी मित्रा ने कहा, “दलित, आदिवासी और अन्य हाशिए पर रहने वाले समुदायों की आवाज़ें अब भी मुख्यधारा के फिक्शन में कम दिखाई देती हैं.”

प्रकाशकों और लेखकों का यह भी मानना है कि “अपनी आवाज़” वाली कहानियों और छोटे शहरों की पृष्ठभूमि पर आधारित कथाओं की अधिक ज़रूरत है, क्योंकि अंग्रेज़ी भाषा का YA फिक्शन अभी भी मुख्यतः शहरी, मध्यवर्गीय जीवन तक सीमित है.

घरों में पढ़ने के मायने बदल रहे हैं

गाज़ियाबाद के अपने घर में एक शांत शाम को 32 वर्षीय प्रीति शुक्ला अपनी बेटी के पास बैठकर किताब पढ़ती हैं. प्रीति एक रोमांस उपन्यास पढ़ रही होती हैं, जबकि उनकी बेटी सुधा मूर्ति की किताब के पन्ने पलट रही होती है.

प्रीति के लिए यह दृश्य उनके अपने बचपन से बिल्कुल अलग लगता है.

प्रीति शुक्ला ने कहा, “बचपन में मुझे रोमांस उपन्यास बहुत पसंद थे, लेकिन मैं उन्हें अक्सर अपने परिवार से छिपाकर पढ़ती थी. मैं किताबों को अख़बार में लपेट देती थी, ताकि मेरे माता-पिता उनके नाम पहचान न सकें.”

प्रीति शुक्ला ने कहा, “हमारे माता-पिता को लगता था कि रोमांस उपन्यास पढ़ने से हम बिगड़ जाएंगे. लेकिन अब उन्हें समझ में आता है कि अलग-अलग भावनाओं को समझना कितना ज़रूरी है.”

आज, उनके अनुसार, कई माता-पिता पढ़ने को अलग नज़रिए से देखते हैं. वे अब फिक्शन को हतोत्साहित करने के बजाय उसे स्क्रीन और पढ़ाई के दबाव से राहत के रूप में बढ़ावा देते हैं.

प्रीति शुक्ला ने कहा, “अब सोच बदल गई है. माता-पिता चाहते हैं कि उनके बच्चे सिर्फ पढ़ाई के लिए नहीं, बल्कि आनंद के लिए भी पढ़ें.” उन्होंने यह भी कहा कि अब लोग अलग-अलग शैलियों को लेकर अधिक खुले विचारों वाले हो गए हैं.

While Preeti reads a romance novel, her daughter, sitting beside her, flips through a book by Sudha Murty. Special arrangement
जब प्रीति एक प्रेम-कथा पढ़ रही होती है, तो उसकी बेटी, जो उसके बगल में बैठी है, सुधा मूर्ति की एक किताब के पन्ने पलट रही होती है | विशेष व्यवस्था

फिर भी, पढ़ने की आदतें अब भी चिंता का विषय बनी हुई हैं.

कई घरों में किताबों की बातचीत के साथ-साथ यह चिंता भी जुड़ी रहती है कि बच्चे कितना समय मोबाइल चलाने या वीडियो देखने में बिताते हैं. माता-पिता चाहते हैं कि किताबें स्क्रीन के इस लगातार आकर्षण का मुकाबला कर सकें.

ममता पांडे के ड्राइंग रूम में ये दोनों दुनिया एक साथ दिखाई देती हैं.

उनका बेटा एनीमे की कहानियों पर चर्चा करता है, उनकी बेटी अपनी अलग तरह की किताबें पढ़ती है, और ममता उन्हें सुनते हुए समझने की कोशिश करती हैं.

ममता पांडे ने कहा, “पीढ़ियां, किताबें और उनकी शैलियां—सब कुछ बदल गया है. पहले कॉमिक्स महीने में एक बार आती थीं और विकल्प सीमित होते थे. अब बच्चों को इंतिज़ार नहीं करना पड़ता; उनके पास चुनने के लिए बहुत कुछ है.”

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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