नई दिल्ली: जब जवाहर भवन हॉल में बैठे बुजुर्ग लोग और पीछे की कतारों में बैठे युवा लोग ऊंघ रहे थे या आधे सोए हुए थे, तब अर्बन प्लानर और आर्किटेक्ट मुक्ता नाइक ने एक ऐसी बात कही जिससे पूरा हॉल अलर्ट हो गया. उन्होंने कहा कि अगर भारत अपने शहरों की योजना और प्रशासन को पूरी तरह से नहीं बदलेगा, तो आने वाले समय में शहर “ज्यादा गर्म, पानी में डूबे हुए, भीड़भाड़ वाले और रहने लायक नहीं” रहेंगे. यह बात उन्होंने सोमवार को ‘सिटी लिमिट्स: द क्राइसिस ऑफ अर्बनाइजेशन’ किताब के लॉन्च पर कही.
यह किताब पेंगुइन रैंडम हाउस ने प्रकाशित की है और इसे अर्बन प्लानर टिकेंद्र पंवर ने एडिट की है. इस किताब में कहा गया है कि भारत का शहरी विकास, जिसे कभी विकास का इंजन माना जाता था, अब जलवायु संकट और सामाजिक अलगाव पैदा कर रहा है.
नाइक ने कहा. “और भी ज्यादा गर्मी हो जाएगी. हम रहने लायक नहीं रहेंगे. हम पानी में डूबेंगे. हम भीड़भाड़ में रहेंगे. इससे फर्क नहीं पड़ता कि आप कितने अमीर हैं. मिडिल क्लास भी उतनी ही दुखी और परेशान होगा जितना आज गरीब हैं. क्या हम ऐसा भविष्य चाहते हैं.”
नाइक के साथ कई अर्बन प्लानर, विशेषज्ञ और प्रैक्टिशनर भी थे, जिन्होंने शहरी विकास के लिए नीतियों और योजनाओं की कमी, हिंदुत्व अर्बनिज्म के बढ़ने, बदलते शहरों, मजबूरी में पलायन, अलगाव और अस्थिर, न रहने लायक शहरीकरण पर चिंता जताई.
इस पैनल में कांग्रेस के राज्यसभा सांसद मनीष तिवारी, सीपीआई(एम) के राज्यसभा सांसद जॉन ब्रिटास, कांग्रेस प्रवक्ता गुरदीप सप्पल, शिमला के पूर्व डिप्टी मेयर और अर्बन प्लानर टिकेंद्र पंवर, समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता अभिषेक मिश्रा, वरिष्ठ पत्रकार संगीता बरुआ पिशारोटी, एक्शनएड एसोसिएशन इंडिया के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर संदीप चाचरा और अर्बन प्रैक्टिशनर अरविंद उन्नी शामिल थे.
किताब में योगदान देने वाले अरविंद उन्नी ने कहा कि सरकार ने 2015 तक शहरी विकास के लिए नीतियां और योजनाएं शुरू की थीं, लेकिन उसके बाद कोई बड़ी नई योजना नहीं आई. उन्होंने बताया कि सरकार का प्रमुख प्रोग्राम स्मार्ट सिटीज मिशन मार्च 2025 में खत्म हो गया और इसके बाद कोई नया शहरी विकास कार्यक्रम नहीं आया.
उन्होंने कहा कि दीनदयाल अंत्योदय योजना-नेशनल अर्बन लाइवलीहुड मिशन जैसी योजनाएं रुक गई हैं और कई दूसरी योजनाएं सिर्फ कागज पर हैं जिनका शहरी विकास से सीधा संबंध नहीं है. 2026 के बजट में अर्बन चैलेंज फंड का ऐलान हुआ, लेकिन उसका कोई स्पष्ट प्लान नहीं है.
उन्नी ने कहा. “अभी शहरी विकास के लिए कोई राष्ट्रीय नीति या बड़ी योजना नहीं है. स्मार्ट सिटीज मिशन खत्म हो चुका है. अब आगे क्या? DAY-NULM कहां है. यह इतनी बड़ी योजना है, लेकिन पिछले दो साल से कोई काम नहीं हुआ है. यह एक बड़ी समस्या को दिखाता है. शहरीकरण को लेकर साफ विजन और स्पष्टता की कमी है. यह बिल्कुल नहीं है.”
अर्बनाइजेशन का हेलिक्स
देश में अर्बनाइजेशन का हेलिक्स (शहरी विकास का आपस में जुड़ा ढांचा) पूंजी जमा होने से जुड़ा हुआ है. शहर उत्पादन के केंद्र की तरह काम करते हैं जहां अतिरिक्त पैसा बनता है और आदर्श रूप से इसे लोकतांत्रिक तरीके से समाज में वापस जाना चाहिए.
शिमला के पूर्व डिप्टी मेयर टिकेंद्र पंवर ने बताया कि यह अर्बनाइजेशन हेलिक्स का एक हिस्सा है, लेकिन देश शहरी आर्थिक गतिविधियों के एक दूसरे महत्वपूर्ण पहलू को समझने में असफल रहा है.
पंवर ने इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज की एक रिपोर्ट का हवाला दिया और कहा कि अर्बनाइजेशन का दूसरा हेलिक्स एक नए जलवायु संकट को दिखाता है, जिसमें 1996 के बाद जन्मे बच्चों ने हर छह महीने में एक बार आपदा का सामना करते है.
उनके अनुसार, शहरी योजना में अब रोजमर्रा की जरूरतों के बजाय पूंजी निवेश को ज्यादा प्राथमिकता दी जा रही है, और इंफ्रास्ट्रक्चर अक्सर गलत तरीके से डिजाइन किया जाता है. उन्होंने बताया कि 1970 और 1980 के दशक में शहरों में ऐसी जगह थी जो सामाजिक आवास, एनवायरमेंट योजना और जियोग्राफी के आधार पर विकास को सहारा दे सकती थी, लेकिन 1990 के बाद ध्यान शहरों को विकास का इंजन बनाने पर चला गया.
उन्होंने इस बदलाव को शहरों का मैनेजर से एंटरप्रेन्योर बनना बताया.
उन्होंने कहा. “रियल एस्टेट इसके मुख्य कारणों में से एक था. दुर्भाग्य से इससे बड़े स्तर पर अलगाव की प्रक्रिया शुरू हुई और गहरी मानवीय असमानता पैदा हुई. शहरों की पूरी क्षमता उत्पादन केंद्र से हटकर सेवा केंद्र बनने लगी, जहां अब 90 से 92 प्रतिशत लोग अनौपचारिक रूप से काम कर रहे हैं.”
पंवर ने शहरीकरण के तीसरे हेलिक्स की भी बात की, जो पहले से मौजूद सामाजिक विभाजन को और गहरा करता है और हाशिए पर रहने वाले लोगों को और पीछे धकेल देता है.
हिंदुत्व अर्बनिज्म
उन्नी ने नए शहरी मॉडल को ‘डिमोलिशन सिटी’ कहा. उन्होंने कहा कि सरकार शहरी नीतियों और योजनाओं का इस्तेमाल लोगों को हटाने के लिए एक हथियार की तरह कर रही है. उन्होंने बताया कि स्मार्ट सिटीज मिशन, प्रधानमंत्री आवास योजना और वाराणसी में हेरिटेज री-डेवलपमेंट जैसे प्रोग्राम्स का इस्तेमाल अक्सर तोड़फोड़ के जरिए शहरों को बदलने के लिए किया गया है.
उनके अनुसार, यह ट्रेंड खास तौर पर 2014 के बाद साफ दिखने लगा और कोविड-19 महामारी के बाद और ज्यादा दिखाई देने लगा, जो पहले के मुकाबले एक अलग बदलाव को दिखाता है.
उन्होंने कहा. “अब तोड़फोड़ एक हथियार बन गई है, जिसे खास समुदायों और घरों को निशाना बनाने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है, बिना मास्टर प्लान देखे या कोई कारण बताए. यह अब एक नीति बन गई है.”
उन्नी ने बताया कि शहरी तोड़फोड़ आज के समय में सामाजिक अलगाव का एक नया तरीका है, और इसे उन्होंने पुराने समय से जोड़ा जब दलितों को गांवों से बाहर कर दिया जाता था.
उन्होंने इसे तोड़फोड़ का हथियार बनना बताया और इसे ‘हिंदुत्व अर्बनिज्म’ कहा. उन्होंने आगे कहा कि अब विचारधारा यह तय कर रही है कि शहर कैसे बनेंगे, उनमें कौन रहेगा और कौन बाहर रहेगा.
“यह एक तरह से चुनना, हटाना, साफ़ करना, और अलग कर देना जैसा है. यह टिकाऊ नहीं है. और न ही यह ऐसी कोई चीज़ है जिसे हम एक समाज के तौर पर चाहते हैं,” उन्नी ने तनाव भरी आवाज़ में कहा.
कांग्रेस के राज्यसभा सांसद मनीष तिवारी ने कहा कि लोग गुस्से में हैं क्योंकि उन्हें पहले से पता है कि क्या गलत हो रहा है.
तिवारी ने आरोप लगाया कि सरकार और अधिकारी स्मार्ट सिटी के मतलब को समझने में असफल रहे हैं, क्योंकि दिए गए फंड का बड़ा हिस्सा सामान्य नगर पालिका के कामों में खर्च हो गया.
उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा. “मैं अभी भी इंतिजार कर रहा हूं कि कोई मुझे बताए कि शहर को स्मार्ट क्या बनाता है.”
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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