केरल के नेशनल हाईवे पर गाड़ी चलाते हुए ऐसा लगता है कि आने वाले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के नेतृत्व वाला यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट पूरी तरह गायब है. ज्यादातर बड़े-बड़े होर्डिंग्स पर मुख्यमंत्री पिनराई विजयन मुस्कुराते हुए नजर आते हैं, जिन पर लिखा है, “एलडीएफ के अलावा और कौन?” बीच-बीच में भारतीय जनता पार्टी के होर्डिंग्स भी दिखते हैं, लेकिन यूडीएफ की मौजूदगी सिर्फ वी डी सतीशन की फरवरी वाली ‘पुथु युगा यात्रा’ तक सीमित है.
माहौल कांग्रेस के पक्ष में, पर जीत अब भी तय नहीं
कांग्रेस नेता स्कूल के बच्चों की तरह बार-बार बहाने बनाते हुए “संसाधनों” की कमी का हवाला देते हैं. लेकिन इससे उनकी खराब योजना सामने आती है, जो लंबे समय तक चले उम्मीदवार चयन और आखिरी समय में सीट बंटवारे में साफ दिखी. चुनाव जल्दी कराने के लिए चुनाव आयोग को और ऐसी अटकलें फैलाने के लिए मीडिया को दोष देकर कांग्रेस हमेशा की तरह खुद को पीड़ित दिखा रही है. फिर भी मुकाबले की असमानता यहीं खत्म हो जाती है.
यह ऐसा चुनाव है जिसे यूडीएफ खुद ही हार सकता है.
और 2001 के बाद पहली बार कांग्रेस इतनी मजबूत स्थिति में है, जब यूडीएफ ने 140 में से 100 सीटें जीती थीं. यह बढ़त सिर्फ विजयन सरकार के खिलाफ एंटी-इंकंबेंसी की वजह से नहीं, बल्कि दिसंबर में हुए स्थानीय निकाय चुनावों में यूडीएफ की जीत से भी मिली है. केरल की राजनीति में 1995 से स्थानीय चुनाव भविष्य का संकेत देते रहे हैं. 2020 में भी ऐसा ही हुआ था, जिसने 2021 में वाम मोर्चे की वापसी का संकेत दिया था.
हालांकि, कांग्रेस के लिए जीत के मुंह से हार छीन लेना कोई नई बात नहीं है.
साथ ही, एलडीएफ का बड़ा जनसंपर्क अभियान मतदाताओं पर मनोवैज्ञानिक असर डाल सकता है, भले ही कुछ वोटर पहले ही अपना फैसला कर चुके हों.
इसलिए जरूरी है कि अंदर चल रही राजनीतिक हलचलों को समझा जाए.
राजनीतिक संदेश
अंदरूनी राजनीतिक धाराएं छुपी हुई और सूक्ष्म होती हैं, और आमतौर पर चुनाव के बाद ही समझ में आती हैं.
स्वभाव से वोटों का एकजुट होना, दूसरे पक्ष में भी एकजुटता पैदा करता है. इस चुनाव में एक बड़ा मुद्दा यह है कि अल्पसंख्यक यूडीएफ के पीछे एकजुट हो रहे हैं. जो लोग बाद में जुड़े हैं, उनके लिए बता दें कि यूडीएफ राज्य के मुस्लिम और ईसाई अल्पसंख्यकों का पारंपरिक मंच रहा है, जबकि मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी को एक तरह से ‘हिंदू पार्टी’ माना जाता है.
हाल के समय में, सीपीआई-एम के नेतृत्व वाला एलडीएफ अल्पसंख्यकों, खासकर मुस्लिम समुदाय को अपने साथ लाने की कोशिश कर रहा है, ताकि उसके हिंदू वोटों के कुछ हिस्से के बीजेपी की ओर जाने की भरपाई हो सके. 2021 में एलडीएफ की बड़ी जीत इसी बदलाव की वजह से हुई थी, जब यूडीएफ अपने वोटरों को एकजुट नहीं रख पाया था. लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में फिलिस्तीन समर्थन और सीएए के मुद्दे पर अपेक्षित लाभ न मिलने के बाद, वामपंथ ने अपनी राजनीतिक रणनीति बदल दी.
एसएनडीपी योगम और नायर सर्विस सोसाइटी जैसे संगठनों का समर्थन लेकर और जमात-ए-इस्लामी के यूडीएफ से संबंधों को मुद्दा बनाकर, वामपंथ लगातार बहुसंख्यक भावनाओं को उभार रहा है. इसका असर स्थानीय निकाय चुनावों में भी दिखा, भले ही यूडीएफ जीत गया. एलडीएफ अपने कुछ हिंदू वोटरों को वापस लाने में सफल रहा, जो पहले बीजेपी को वोट दे चुके थे.
सबरीमाला सोना चोरी मामले के बावजूद वामपंथ यह बदलाव लाने में सफल रहा. यह बदलाव खासकर तिरुवनंतपुरम और त्रिशूर जिलों में साफ दिखा, और कुछ हद तक पलक्कड़ और अलाप्पुझा में भी. इससे वामपंथ का आत्मविश्वास बढ़ा है और वह अपने हिंदू वोट बैंक को और मजबूत करने के लिए ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ तक का इस्तेमाल कर रहा है.
केरल की सेक्युलर राजनीति
पूरे भारत के नजरिए से देखने पर यह चौंकाने वाला लग सकता है, लेकिन केरल की ‘धर्मनिरपेक्ष राजनीति’ का एक ऐसा पक्ष भी है जो बाहर से दिखने जितना अच्छा नहीं है. राज्य के चुनावी इतिहास में कई बार धार्मिक और जातीय भावनाओं ने नतीजों को प्रभावित किया है. कई मामलों में यह चुनाव के बाद ही समझ में आया क्योंकि राजनीतिक संदेश बहुत सूक्ष्म होते हैं. ईएमएस नंबूदरीपाद ऐसे मामलों में माहिर थे.
लंबे समय तक केरल की राजनीति वामपंथ और विरोधी वामपंथ के बीच बंटी रही, जो बीजेपी के आने के बाद धीरे-धीरे बदल रही है. वामपंथी खेमे को कभी भी विरोधी खेमे से ज्यादा बढ़त नहीं मिली, इसलिए उन्हें सत्ता में आने के लिए अपने आधार से बाहर के वोटरों को भी जोड़ना पड़ता था. 1959 में ‘विमोचन आंदोलन’ के बाद पहली कम्युनिस्ट सरकार को हटाने की परिस्थितियों पर बाद में सवाल उठे, लेकिन इसकी पृष्ठभूमि पहले से बनी हुई थी.
नवंबर 1956 में केरल राज्य बनने से पहले त्रावणकोर-कोचीन राज्य में पनमपल्ली गोविंद मेनन के नेतृत्व में कांग्रेस सरकार थी.
लेकिन जब 1957 में केरल में पहला विधानसभा चुनाव हुआ, तब राज्य में राष्ट्रपति शासन था. मेनन का नायर सर्विस सोसाइटी से टकराव हुआ, जिसके कारण छह विधायकों ने समर्थन वापस ले लिया और सरकार गिर गई. चुनाव से पहले एनएसएस के महासचिव मन्नथ पद्मनाभन कांग्रेस में “सीरियन क्रिश्चियन वर्चस्व” के खिलाफ बोल रहे थे. पद्मनाभन ने उस समय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव एमएन गोविंदन नायर के साथ मिलकर उम्मीदवारों के चयन में काम किया, जैसा कि कम्युनिस्ट विचारक थोप्पिल भासी की यादों में बताया गया है.
समुदायों के वोटिंग पैटर्न
चुनावों में बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक भावनाओं को वामपंथ द्वारा सूक्ष्म तरीके से उभारने का यह पैटर्न केरल की राजनीति में लंबे समय से देखा गया है, हालांकि कांग्रेस ने भी कभी-कभी ऐसा किया है, जैसे ‘विमोचन आंदोलन’ के दौरान.
मार्क्सवादी इशारे 1987 के विधानसभा चुनाव से एक पैटर्न बन गए, जब वामपंथ ने ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ का इस्तेमाल किया, भले ही उसे “सिद्धांत आधारित राजनीति” कहा गया. 1990 के दशक में जनसंख्या में बदलाव के साथ, वामपंथ ने अल्पसंख्यक भावनाओं को भी उभारना शुरू किया. आज यह सुनकर अजीब लग सकता है कि केरल के मार्क्सवादियों ने दो दशकों में तीन चुनावों में सद्दाम हुसैन को प्रतीक के रूप में इस्तेमाल किया था.
अलग-अलग समुदायों के वोटिंग पैटर्न भी अलग होते हैं. मुस्लिम वोट बैंक को ज्यादा भावनात्मक माना जाता है, जो वैश्विक घटनाओं से भी प्रभावित होकर बदल सकता है, जबकि हिंदू वोट बैंक ज्यादा सूक्ष्म संदेशों से प्रभावित होता है. ईसाई वोटर सबसे ज्यादा स्विंग वोटर माने जाते हैं. इसके अलावा राजनीतिक आधार पर भी वोटिंग होती है.
दक्षिण और मध्य केरल में वोटरों को प्रभावित करना आसान है, जबकि मलाबार में वोटिंग ज्यादा राजनीतिक होती है, जहां 60 सीटें हैं. कन्नूर और पलक्कड़ जैसे मार्क्सवादी गढ़ों के कारण वामपंथ को मलाबार में कठिन परिस्थितियों में भी 50 प्रतिशत सीटें मिलने का भरोसा रहता है. इससे बाकी राज्य चुनाव का मुख्य मैदान बन जाता है.
बीजेपी का उभार
बीजेपी के एक मजबूत तीसरे विकल्प के रूप में उभरने से कई समीकरण बदल गए हैं. अब केरल की राजनीति पूरी तरह दो ध्रुवों वाली नहीं रही, भले ही यूडीएफ और एलडीएफ ऐसा दावा करते हों. 2024 के लोकसभा चुनाव में 20 प्रतिशत वोट हासिल करने के बाद बीजेपी को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. 2026 के विधानसभा चुनाव में 140 में से करीब एक-तिहाई सीटों पर बीजेपी का वोट शेयर जीत-हार तय कर सकता है.
कांग्रेस पहले ही वामपंथ और बीजेपी के बीच “समझौते” का आरोप लगा चुकी है. भले ही कोई औपचारिक समझौता न हो, लेकिन उम्मीदवारों का चयन ही वोट ट्रांसफर को प्रभावित कर सकता है. यूडीएफ के साथ अल्पसंख्यक समुदायों के जुड़ने और वामपंथ द्वारा सॉफ्ट हिंदुत्व अपनाने के कारण, एलडीएफ और एनडीए के वोटरों के बीच कुछ हद तक वोट ट्रांसफर संभव है, जिसका नुकसान यूडीएफ को हो सकता है.
ओमान चांडी के समय सहयोगी इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग द्वारा ताकत दिखाने की बात को आज भी कुछ हिंदू वोटर यूडीएफ से दूरी का कारण मानते हैं. सवाल यह है कि जहां बीजेपी जीतने की स्थिति में नहीं होगी, क्या वहां हिंदू वोटर एलडीएफ की ओर जाएंगे? या फिर विजयन सरकार के खिलाफ एंटी-इंकंबेंसी इस बदलाव को खत्म कर देगी?
इन राजनीतिक अंदरूनी धाराओं का असर चुनाव के बाद ही साफ होगा.
आनंद कोचुकुडी केरल के रहने वाले पत्रकार और कॉलमनिस्ट हैं. वे @AnandKochukudy पर ट्वीट करते हैं. विचार निजी हैं.
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