scorecardresearch
Tuesday, 24 March, 2026
होमदेशCCTV ऑपरेटर और मोबाइल रिपेयर करने वाले बने ‘पाकिस्तान के जासूस’, गाजियाबाद पुलिस ने पकड़ा नेटवर्क

CCTV ऑपरेटर और मोबाइल रिपेयर करने वाले बने ‘पाकिस्तान के जासूस’, गाजियाबाद पुलिस ने पकड़ा नेटवर्क

अब तक पुलिस ने 18 लोगों को गिरफ्तार किया है, जिनमें 6 नाबालिग हैं. गाजियाबाद पुलिस का दावा है कि यह गिरोह पाकिस्तान और अन्य देशों में बैठे हैंडलर चला रहे थे.

Text Size:

नई दिल्ली: इंस्टाग्राम को भर्ती का तरीका बनाकर और उत्तर प्रदेश के गांवों के तकनीकी जानकारी रखने वाले, लेकिन पैसों की कमी से जूझ रहे युवाओं को निशाना बनाकर, कथित जासूसी गिरोह दो साल तक बिना रोक-टोक चलता रहा, जब तक गाजियाबाद पुलिस ने इसे खत्म नहीं कर दिया. इस कथित गिरोह से जुड़े गिरफ्तार लोगों पर आरोप है कि वे सैन्य ठिकानों और रेलवे स्टेशनों के वीडियो बनाकर, अन्य लोगों के साथ-साथ पाकिस्तान में बैठे हैंडलर को भेजते थे.

अब तक पुलिस ने 18 लोगों को गिरफ्तार किया है, जिनमें 15 से 17 साल के 6 नाबालिग भी शामिल हैं.

आरोपियों की पहचान नौशाद अली (20), मीरा (28), सुहेल उर्फ रोमियो (23), इरम उर्फ महक (25), प्रवीण (19), राज वाल्मीकि (21), शिवा वाल्मीकि (20), रितिक गंगवार (23), गणेश (20), विवेक (18), गगन कुमार प्रजापति (22), और दुर्गेश निषाद (26) के रूप में हुई है.

जांच से जुड़े पुलिस अधिकारियों ने यह भी कहा कि कथित गिरोह ऐसे युवाओं को भर्ती करता था जिन्हें मोबाइल रिपेयर तकनीशियन, CCTV ऑपरेटर या कंप्यूटर मैकेनिक का कुछ अनुभव था और जिन्हें तुरंत पैसों की ज़रूरत थी.

एक सूचना

14 मार्च को, कौशांबी थाने में तैनात एक बीट अधिकारी को भोवापुर में रहने वाले कुछ लोगों के संदिग्ध गतिविधियों की सूचना मिली. गाजियाबाद पुलिस के बयान के अनुसार, “बताया गया कि ये लोग रेलवे स्टेशनों और सुरक्षा बलों से जुड़े स्थानों के वीडियो बना रहे थे, उन्हें कुछ खास लोगों को भेज रहे थे, और पैसों का लालच देकर अन्य युवाओं को भी इन गतिविधियों में शामिल कर रहे थे.”

सूचना के आधार पर, पुलिस ने कौशांबी पुलिस स्टेशन में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 61(2) (आपराधिक साजिश) और 152 (भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता को खतरे में डालने वाले कार्य) के तहत मामला दर्ज किया, साथ ही आधिकारिक गोपनीयता अधिनियम की धारा 3 और 5 भी लगाई गई.

पुलिस ने 14 मार्च को इस मामले में शुरुआत में पांच पुरुष और एक महिला को गिरफ्तार किया. अतिरिक्त पुलिस आयुक्त (LO & ट्रैफिक) राज करण नैयर ने उसी दिन प्रेस ब्रीफिंग में कहा कि उनके मोबाइल फोन गैलरी में आपत्तिजनक वीडियो और फोटो मिले, साथ ही महत्वपूर्ण ठिकानों से जुड़ी लोकेशन जानकारी भी मिली.

पुलिस सूत्रों के अनुसार, आमतौर पर CCTV कैमरा लगाने के लिए किसी व्यक्ति को लगभग 6,000-7,000 रुपये मिलते हैं, लेकिन इस मामले में आरोपियों को 16,000-17,000 रुपये मिल रहे थे. सूत्रों ने बताया कि कथित गिरोह भारत में मौजूद दो या तीन हैंडलर चला रहे थे, जो विदेशी देशों में बैठे हैंडलर को खास जानकारी भेजते थे.

गाजियाबाद पुलिस के बयान में कहा गया, “गिरोह का तरीका ऐसे जरूरतमंद लोगों को ढूंढना था जिन्हें जल्दी पैसे चाहिए होते हैं.”

इस मामले की जांच के लिए बनाई गई स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (SIT) के एक अधिकारी ने दिप्रिंट को बताया, “मुख्य हैंडलर में नौशाद अली, सोहेल मलिक, समीर उर्फ ‘शूटर’ शामिल थे, जिनका काम इंस्टाग्राम पर खास प्रोफाइल ढूंढना था.”

अधिकारी ने कहा, “वे ऐसे युवाओं को तलाशते थे जिनके पास तकनीकी कौशल हो, जैसे मोबाइल रिपेयर, कंप्यूटर मैकेनिक, CCTV ऑपरेशन और जिन्हें पैसों की ज़रूरत हो.”

पुलिस ने अपने बयान में यह भी कहा कि शक कम करने के लिए गिरोह 20-22 साल के युवक-युवतियों और यहां तक कि नाबालिगों को भी भर्ती करता था. इस मामले में गिरफ्तार दोनों महिलाएं, मीरा और महक, हाल ही में अन्य आरोपियों के साथ काम शुरू किया था.

SIT के अधिकारी ने कहा, “आरोपियों को ऐसे ऐप इस्तेमाल करना सिखाया गया था, जो संवेदनशील स्थानों की फोटो पर सीधे GPS लोकेशन और समय की जानकारी जोड़ देता है.”

सिर्फ मौके की जांच (रेक्की) के अलावा, कथित गिरोह के सदस्यों को सोलर पावर से चलने वाले, सिम आधारित अलग सीसीटीवी कैमरे लगाने का काम भी दिया गया था.

पुलिस के बयान के अनुसार, पूछताछ में आरोपियों ने बताया कि “पूरा गिरोह सीमा पार से चलाया जा रहा था.” बयान में कहा गया, “नौशाद अली ने बताया कि वह सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के जरिए इस गिरोह से जुड़ा था.”

पुलिस के अनुसार, पहले नौशाद को सुरक्षा ठिकानों और अन्य महत्वपूर्ण जगहों, जैसे रेलवे स्टेशनों आदि की रेक्की करने का काम दिया गया था. उसे इन जगहों की फोटो, वीडियो और जीपीएस लोकेशन विदेशी फोन नंबरों पर भेजनी होती थी.

गाजियाबाद पुलिस ने कहा, “इन फोटो और वीडियो को लेने के लिए उसने प्ले स्टोर से एक खास ऐप डाउनलोड किया था, और उसे इसे चलाने की ट्रेनिंग भी दी गई थी. इसी सोशल मीडिया ग्रुप के जरिए उसकी मुलाकात मीरा से हुई.”

मीरा की मुख्य भूमिका हथियारों की तस्करी करना थी. मीरा को 2025 में दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने आर्म्स एक्ट के एक मामले में पहले भी गिरफ्तार किया था. पुलिस के बयान में कहा गया, “वर्तमान गिरफ्तारी के समय मीरा सीमा पार से सीधे मिले निर्देशों के अनुसार काम कर रही थी.”

पुलिस ने कहा कि नौशाद की मुख्य भूमिका ऐसे गरीब परिवारों के तकनीकी कौशल रखने वाले युवाओं (मोबाइल रिपेयर, कंप्यूटर रिपेयर, सीसीटीवी ऑपरेशन आदि) को पैसे का लालच देकर गिरोह में शामिल करना था.

गाजियाबाद पुलिस ने बयान में कहा, “नौशाद सोशल मीडिया ग्रुप में ऐसे युवाओं को ढूंढता था जिनकी सोच आपराधिक हो लेकिन उनका कोई पुराना आपराधिक रिकॉर्ड न हो. आरोपी खुद या अपने साथियों के जरिए देश के अलग-अलग स्थानों पर सुरक्षा बलों के ठिकानों, अन्य महत्वपूर्ण जगहों, रेलवे स्टेशनों आदि की रेक्की करते थे.”

बयान में आगे कहा गया, “इसके बाद वे इन जगहों की फोटो, वीडियो और जीपीएस लोकेशन विदेशी फोन नंबरों पर भेजते थे. जीपीएस लोकेशन भेजने के लिए आरोपियों ने अपने मोबाइल फोन में एक खास ऐप इंस्टॉल किया हुआ था.”

पुलिस ने यह भी कहा कि आरोपियों को इस ऐप को चलाने की ऑनलाइन ट्रेनिंग सीमा पार बैठे हैंडलर से मिलती थी.

इसके अलावा आरोपियों ने दिल्ली कैंट रेलवे स्टेशन और सोनीपत रेलवे स्टेशन पर सोलर पावर से चलने वाले, सिम आधारित, अलग सीसीटीवी कैमरे लगाए थे और इन कैमरों का वीडियो व्हाट्सऐप के जरिए शेयर किया जा रहा था, पुलिस ने बताया. इन मामलों के अलावा पुलिस को शक है कि 50 और जगहों पर ऐसे सीसीटीवी कैमरे लगाने की योजना थी.

OTPs के लिए पेमेंट

गाजियाबाद पुलिस ने यह भी कहा कि आरोपी भारतीय सिम कार्ड के लिए जनरेट होने वाले वन-टाइम पासवर्ड (ओटीपी) को व्हाट्सऐप और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर इस्तेमाल के लिए विदेश में बैठे लोगों को भेजते थे. पूछताछ के दौरान आरोपियों ने कबूल किया कि उन्होंने ये ओटीपी शेयर किए, जिससे भारतीय सिम कार्ड का इस्तेमाल करके विदेश में व्हाट्सऐप अकाउंट चलाए जा सकें और इसके बदले हर बार 500 रुपये से 5,000 रुपये तक पैसे लिए.

पुलिस ने बताया कि सिम कार्ड अलग-अलग तरीकों से हासिल किए जाते थे—कुछ सिम छीने जाते थे, कुछ पहले से एक्टिव सिम अलग-अलग एजेंटों से खरीदे जाते थे, और कुछ सिम अपने नाम या परिवार के लोगों के नाम पर लेकर ओटीपी शेयर किए जाते थे.

जांच से जुड़े एक अधिकारी ने कहा, “हर काम के लिए उन्हें 500 रुपये से 15,000 रुपये तक पेमेंट मिलती थी. आरोपी इन पैसों के लिए यूपीआई प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करते थे, लेकिन पैसे सीधे अपने बैंक अकाउंट में लेने की बजाय, वे पेमेंट अलग-अलग पब्लिक सर्विस सेंटर या दुकानों में मंगवाते थे, जहां से बाद में कैश में पैसे ले लेते थे.”

पुलिस का यह भी दावा है कि आरोपियों के मोबाइल फोन से विदेशी फोन नंबरों के साथ हुई चैट के रिकॉर्ड (चैट लॉग) मिले हैं.

कोर्ट ने कहा संप्रभुता को खतरा

17 मार्च को आरोपियों में से दो, शिवा और रितिक, ने जमानत के लिए आवेदन किया था.

एक आरोपी के वकील ने कहा कि उसे इस मामले में गलत तरीके से फंसाया गया है. उनका कहना था कि उसने कथित अपराध नहीं किया, उसका कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है, और उसके खिलाफ कोई स्वतंत्र सबूत नहीं है. उन्होंने कहा कि आरोपी जमानत की शर्तें पूरी करने को तैयार है.

हालांकि, कोर्ट ने जमानत याचिका खारिज कर दी और कहा: “आरोपी पर आरोप है कि उसने व्यवस्थित तरीके से धार्मिक सद्भाव को नुकसान पहुंचाया, देश की संप्रभुता, एकता और अखंडता को खतरे में डालने वाली गैरकानूनी गतिविधियों में शामिल रहा, रेलवे स्टेशनों पर सोलर कैमरे लगाए, और कैंटोनमेंट एरिया की फोटो, वीडियो और लोकेशन फोन चैट के जरिए विदेशी नंबरों पर भेजी. मामले की जांच जारी है.”

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)

share & View comments