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Monday, 23 March, 2026
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SC-NCERT विवाद पर पोस्ट हटाने के दबाव का आरोप, लॉ स्टूडेंट बोला—कार्रवाई मंजूर, कोर्ट भगवान नहीं

लॉ स्टूडेंट ऋषि कुमार का कहना है कि तमिलनाडु नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी ने उनसे ‘The Supreme Court of India Has No Spine’ शीर्षक वाली सबस्टैक पोस्ट हटाने को कहा, क्योंकि ‘वकीलों और कुछ जजों के फोन आ रहे थे’.

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नई दिल्ली: तमिलनाडु नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी ने कथित तौर पर एक फाइनल ईयर लॉ स्टूडेंट से सुप्रीम कोर्ट की आलोचना वाली सबस्टैक पोस्ट हटाने को कहा है. यूनिवर्सिटी ने यह कहते हुए पोस्ट हटाने को कहा कि इससे संस्थान की “प्रतिष्ठा” और छात्र के “हित” प्रभावित हो सकते हैं.

यह निर्देश 14 मार्च को छात्र ऋषि कुमार की पोस्ट के बाद आया, जिसमें उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले की वैधता पर सवाल उठाया था, जिसमें NCERT की एक किताब के उस अध्याय पर रोक लगाई गई थी, जिसमें “न्यायपालिका में भ्रष्टाचार” का ज़िक्र था. साथ ही उस अध्याय को तैयार करने वाले तीन शिक्षाविदों को ब्लैकलिस्ट किए जाने का भी मामला सामने आया था. छात्र ने यूनिवर्सिटी के कथित ईमेल को भी अपने सबस्टैक पर साझा किया है.

उन्होंने अपनी पोस्ट में लिखा, “भारत में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार से जुड़ा डेटा ढूंढना मुश्किल नहीं है, यह हर जगह उपलब्ध है. मैंने 10 मिनट में ऐसे खबरों की चार पेज की सूची बना ली.”

उन्होंने लिखा कि न्यायपालिका को “अति-उच्च दर्जा” देने की प्रवृत्ति खत्म होनी चाहिए.

ऋषि कुमार ने कहा कि उन्होंने साफ कर दिया है कि वह अपनी निजी सबस्टैक पोस्ट ‘The Supreme Court of India Has No Spine’ को तुरंत हटाने के निर्देश का पालन नहीं करेंगे और वह “अनुशासनात्मक कार्रवाई” का सामना करने के लिए तैयार हैं.

उन्होंने यूनिवर्सिटी को भेजे ईमेल में लिखा, “अभी नहीं, कभी नहीं.”

दिप्रिंट से बातचीत में कुमार ने कहा कि वह अपने फैसले पर कायम हैं.

उन्होंने कहा, “यूनिवर्सिटी ने पहले मुझे ईमेल के जरिए संपर्क किया, जिसका मैंने जवाब दिया है. मैं खुद जाकर उनसे इस विषय पर बात करने का इच्छुक नहीं हूं, लेकिन अगर वे अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू करते हैं, तो मैं तैयार हूं.”

रविवार रात कैंपस लौटे कुमार ने कहा कि उन्हें नहीं पता यूनिवर्सिटी आगे क्या कदम उठाएगी. उन्होंने कहा, “मुझे नहीं पता यूनिवर्सिटी इस मामले में आगे बढ़ेगी या नहीं, लेकिन कुछ भी हो सकता है. अब लोग मुझसे सीधे मिल भी सकते हैं.”

26 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट ने स्कूल शिक्षा विभाग के सचिव और NCERT निदेशक को नोटिस जारी करते हुए कहा था कि न्यायपालिका की गरिमा को कम करने की कोशिश की जा रही है. कोर्ट ने कहा था कि यदि ऐसा जारी रहा तो जनता और युवाओं के बीच न्यायपालिका की प्रतिष्ठा प्रभावित हो सकती है.

दिप्रिंट ने इस मामले में तमिलनाडु नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी से ईमेल और फोन के जरिए संपर्क किया है. जवाब मिलने पर खबर अपडेट की जाएगी.

‘ऊपर से दबाव’

22 मार्च की नई सबस्टैक पोस्ट में कुमार ने लिखा, “कल यूनिवर्सिटी प्रशासन ने मुझे ईमेल भेजा. उन्होंने बताया कि सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न हाई कोर्ट के वकीलों और कुछ जजों के कई फोन आ रहे हैं, जो मेरी पोस्ट की शिकायत कर रहे हैं. उन्होंने कहा कि इससे संस्थान की प्रतिष्ठा प्रभावित हो रही है.”

मई में ग्रेजुएशन पूरा करने जा रहे 22 वर्षीय कुमार ने कहा कि उन्हें हैरानी हुई कि जज छात्रों की आलोचना के कारण यूनिवर्सिटी के जरिए पोस्ट हटवाने का दबाव बना रहे हैं.

उन्होंने कहा कि जब किताब पर रोक की खबर आई, तब वह अपने दोस्तों के साथ इस विषय पर लिखने की बात कर रहे थे. उन्होंने कहा, “न्यायपालिका पर लिखना हमेशा कठिन विषय होता है. हम लॉ स्टूडेंट जानते हैं कि अवमानना कानून के कारण सीमा बहुत पतली होती है.”

विवाद के बाद कुमार को पोस्ट पर समर्थन और आलोचना दोनों मिले हैं. उन्होंने कहा कि पहले भी कई मामलों में यूनिवर्सिटी पर दबाव बनाया गया है.

उन्होंने कहा कि प्रतिक्रिया की उम्मीद थी, लेकिन जजों के फोन आने की उम्मीद नहीं थी. “मुझे समझ है कि यूनिवर्सिटी पर भरोसेमंद लोगों का दबाव है, जिसे नजरअंदाज करना आसान नहीं होता,” उन्होंने कहा.

सबस्टैक पोस्ट में क्या कहा

कुमार की पोस्ट एक्स और सबस्टैक पर काफी साझा की गई.

उन्होंने संविधान में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर लगे उचित प्रतिबंधों का जिक्र करते हुए लिखा कि “इस संदर्भ में कोर्ट ‘स्टेट’ नहीं है और अनुच्छेद 19(2) के तहत ‘कानून’ को न्यायिक आदेश या फैसलों के बराबर नहीं माना जा सकता, इसलिए ऐसे प्रतिबंध उचित नहीं हैं.”

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(2) राज्य को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर “उचित प्रतिबंध” लगाने की अनुमति देता है.

उन्होंने पोस्ट में लिखा, “पिछले कुछ दिनों में सुप्रीम कोर्ट एक संस्था के रूप में खुद को ज्यादा स्पष्ट कर रहा है. एक ऐसा अध्याय, जिसमें न्यायपालिका की प्रशंसा की गई थी, एक महान जज का जिक्र था और कोर्ट को ‘लोकतंत्र का प्रहरी’ कहा गया था, उसे ‘साजिश’ बताया जा रहा है.”

उन्होंने लिखा, “तीन शिक्षाविदों के मौलिक अधिकार बिना किसी कानूनी आधार और पूरी सुनवाई के खत्म किए जा सकते हैं. आलोचकों को विदेश से भी निशाना बनाया जा सकता है. कोर्ट के अपने फ्री स्पीच के फैसले सब पर लागू होते हैं, सिवाय कोर्ट के.”

उन्होंने आगे लिखा, “यह कोर्ट भगवान नहीं है, न ही राजा है. यह सवालों से ऊपर नहीं है. अगर हम अब नहीं बोलेंगे, तो हमें हमेशा चुप रहना होगा.”

एक अन्य पोस्ट में कुमार ने कहा कि न्यायपालिका की आलोचना उन्होंने हल्के में नहीं की. “मुझे कई बेहतरीन जजों के साथ काम करने का मौका मिला है. मैं यह सब खुशी से नहीं लिख रहा हूं. लेकिन कोई भी संस्था सिर्फ अपने अच्छे लोगों से नहीं बनती, उसमें कमियां भी होती हैं,” उन्होंने लिखा.

उन्होंने कहा कि यूनिवर्सिटी को अपने छात्रों का साथ देना चाहिए था, लेकिन उसने ऐसा नहीं किया. हालांकि उन्होंने यह भी माना कि यूनिवर्सिटी पर दबाव काफी ज्यादा है.

उन्होंने लिखा, “यह दबाव इंटरनेट ट्रोल्स का नहीं, बल्कि सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के जजों और वकीलों का है. इसे नजरअंदाज करना आसान नहीं है.”

कुमार ने इसे सिस्टम की “संरचनात्मक समस्या” भी बताया. उन्होंने कहा कि कई नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी में हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट के जज कुलाधिपति होते हैं, जिससे संस्था के लिए स्वतंत्र रुख अपनाना मुश्किल हो जाता है.

उन्होंने लोगों से अपील की कि वे चुप रहने के कारणों पर विचार करें.

उन्होंने लिखा, “इस तरह के दबाव का डर वास्तविक है, लेकिन सोचिए आपकी चुप्पी किसके काम आ रही है. यह आपके लिए नहीं, बल्कि उन्हीं के लिए है जो चाहते हैं कि आप चुप रहें.”

अंत में कुमार ने दोहराया कि वह अपनी पोस्ट नहीं हटाएंगे. उन्होंने लिखा, “मैं अपना लेख नहीं हटाऊंगा. मैं अपने हर शब्द पर कायम हूं.”

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)

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