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Tuesday, 24 March, 2026
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ओडिशा में बीजेपी महाराष्ट्र जैसा खेला चाहती है, लेकिन नवीन पटनायक आखिरी बाधा हैं

अब दबाव में आए नवीन पटनायक वह सब कर रहे हैं जो पहले कम ही करते थे—रोज़ विधानसभा आना, बीच-बीच में बोलना, टीवी चैनलों को बयान देना और सड़कों पर उतरना.

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ओडिशा के पूर्व मुख्यमंत्री नवीन पटनायक आज खुद को किस्मत वाला मान रहे होंगे. 2018 में उनकी सरकार ने राज्य विधानसभा में विधान परिषद बनाने का प्रस्ताव पास कराया था. 2022 में तब के केंद्रीय कानून मंत्री किरेन रिजिजू ने राज्यसभा में कहा था कि केंद्र को यह प्रस्ताव मिला ही नहीं. उसके बाद इस पर कोई खबर नहीं आई. वैसे भी भारतीय जनता पार्टी और बीजू जनता दल लंबे समय तक दोस्ताना अंदाज़ में राजनीति करते रहे, जब तक उनके रिश्ते खराब नहीं हुए.

पटनायक को आज राहत होगी कि ओडिशा में विधान परिषद नहीं है. याद कीजिए जून 2022 में महाराष्ट्र में क्या हुआ था. 10 जून को बीजेपी ने छह में से तीन राज्यसभा सीटें जीत लीं, जबकि सत्तारूढ़ महा विकास अघाड़ी को चार सीटें मिलने की उम्मीद थी. साफ था कि एमवीए के कई विधायकों ने क्रॉस वोटिंग की. इसके दस दिन बाद 20 जून को विधान परिषद चुनाव में भी बीजेपी ने 10 में से पांच सीटें जीत लीं, उम्मीद से एक ज्यादा—फिर क्रॉस वोटिंग की वजह से.

महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण ने निराश होकर कहा, “राज्यसभा चुनाव में बीजेपी (105 विधायक) को 123 वोट मिले और परिषद चुनाव में 133 वोट मिले. इसका मतलब है कि दस दिन में 10 और लोगों ने बीजेपी को वोट दिया.” परिषद चुनाव के नतीजों के कुछ ही घंटों बाद शिवसेना नेता एकनाथ शिंदे 30 विधायकों के साथ मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के खिलाफ बगावत कर मुंबई छोड़कर सूरत चले गए. आगे क्या हुआ, यह इतिहास है.

16 मार्च को ओडिशा में राज्यसभा चुनाव में बीजेपी समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार दिलीप राय जीत गए. बीजेडी के आठ और कांग्रेस के तीन विधायकों ने उनके पक्ष में क्रॉस वोटिंग की. शनिवार को बीजेडी अध्यक्ष पटनायक ने इनमें से छह विधायकों को पार्टी विरोधी गतिविधियों के लिए निलंबित कर दिया, जबकि दो पहले ही निलंबित थे.

50 विधायकों में से अब विधानसभा में बीजेडी की प्रभावी ताकत 42 रह गई है—यानी 16 प्रतिशत की कमी. यही वजह है कि पटनायक खुद को भाग्यशाली मान रहे होंगे. सोचिए, अगर ओडिशा में विधान परिषद होती और खाली सीटों को भरने के लिए चुनाव होते, जैसे महाराष्ट्र में हुआ, तो क्या पटनायक अपने विधायकों की वफादारी की एक और परीक्षा झेल पाते?

2024 के विधानसभा और लोकसभा चुनाव में झटका लगने के बाद उनके कई करीबी नेता बगावत पर उतर आए. हार के सिर्फ तीन महीने बाद ममता मोहंता ने राज्यसभा से इस्तीफा देकर बीजेपी जॉइन कर ली. राज्यसभा सदस्य सुजीत कुमार ने भी यही रास्ता अपनाया. एक और राज्यसभा सदस्य देबाशीष समंत्राय ने पिछले नवंबर में बीजेडी उपाध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया, हालांकि वह पार्टी में बने हुए हैं.

बीजेडी नेताओं का कहना है कि डूबती हुई नाव से चूहे कूदना या बेहतर मौके की तलाश में लोग पार्टी छोड़ना राजनीति में आम बात है, लेकिन पटनायक के लिए बड़ा झटका पिछले नवंबर नुआपाड़ा विधानसभा उपचुनाव में बीजेडी के घटते जनाधार का दिखना था. यह उपचुनाव बीजेडी विधायक राजेंद्र ढोलकिया के निधन के कारण हुआ था और पार्टी तीसरे स्थान पर रही. बीजेपी ने दिवंगत नेता के बेटे जय को उम्मीदवार बनाया था. कांग्रेस का दूसरे स्थान पर आना बीजेडी के लिए घाव पर नमक जैसा था.

महाराष्ट्र जैसा खेल ओडिशा में?

बीजेपी ओडिशा में वही दोहराने की कोशिश करती दिख रही है, जो उसने महाराष्ट्र में किया—ठाकरे की शिवसेना और शरद पवार की नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) को तोड़ना. वह इस मिशन को लेकर इतनी गंभीर है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी पार्टी को ओडिशा के राज्यसभा उपचुनाव में कोयला घोटाले में दोषी दिलीप राय को समर्थन देने से नहीं रोका.

सत्तारूढ़ पार्टी के पास यह मिशन शुरू करने के अपने कारण हो सकते हैं. बीजेडी के गठन में बीजेपी की अहम भूमिका रही थी. अप्रैल 1997 में जब बीजू पटनायक का निधन हुआ, तब ओडिशा में बीजेपी की लगभग कोई मौजूदगी नहीं थी, जबकि कई दशकों तक कांग्रेस का दबदबा रहा था. अटल बिहारी वाजपेयी ने प्रमोद महाजन को जिम्मेदारी दी कि वह ऐसी पार्टी खड़ी करें जो पटनायक की विरासत का दावा करे और साथ ही बीजेपी के लिए जगह बनाए.

महाजन ने बीजेडी के वरिष्ठ नेताओं और बीजू के करीबी सहयोगियों, जैसे दिलीप राय और बिजॉय मोहापात्रा को साथ जोड़ा, ताकि पूर्व मुख्यमंत्री के बेटे नवीन पटनायक को आगे बढ़ाया जा सके. नवीन पटनायक को ओड़िया भाषा नहीं आती थी, वह दिल्ली के एक पांच सितारा होटल में बुटीक चलाते थे, डनहिल सिगरेट पसंद करते थे और हर शाम फेमस ग्राउस व्हिस्की का आनंद लेते थे, जैसा कि मेरे मित्र रुबेन बनर्जी ने 2018 में लिखी अपनी बेहतरीन और प्रामाणिक जीवनी नवीन पटनायक में बताया है.

1997 में नवीन पटनायक के नेतृत्व में बीजेडी की स्थापना में बीजेपी की अहम भूमिका थी. 2009 में पटनायक ने बीजेपी से गठबंधन तोड़ दिया. बीजेडी को बनाने वाली पार्टी को शायद ऐसा लगा होगा जैसे किसी ने प्यार में धोखा दे दिया—इस्तेमाल किया और छोड़ दिया. 17 साल बाद बीजेपी वही बनाने वाली चीज को खत्म करना चाहती है. अगर ऐसा होता है, तो ओडिशा बीजेपी का गुजरात जैसा किला बन सकता है—लगभग विपक्ष-मुक्त क्योंकि कांग्रेस ने कभी लड़ने की मजबूत इच्छा नहीं दिखाई.

आखिरी दीवार

ओडिशा में बीजेपी के अजेय बनने के सपने और उसके बीच नवीन पटनायक आखिरी दीवार हो सकते हैं. वे अक्टूबर में 80 साल के हो जाएंगे और उन्होंने अपने बाद किसी उत्तराधिकारी को तैयार करने की ज्यादा कोशिश नहीं की. जैसे उन्हें लगता रहा कि बीजेडी की अहमियत उनकी राजनीतिक जिंदगी तक ही सीमित है.

बीजेपी इसी बात पर भरोसा कर रही है. उसने मोहन चरण माझी को मुख्यमंत्री बनाया, जो अपने पूर्ववर्ती के बराबर नहीं माने जाते और शायद उनसे ऐसा होने की उम्मीद भी नहीं है. उनकी सरकार दिल्ली से भी चलाई जा सकती है. प्रधानमंत्री मोदी के प्रधान सचिव पी.के. मिश्रा ओडिशा से हैं, और मोदी सरकार में प्रधानमंत्री और गृह मंत्री अमित शाह के बाद तीसरे सबसे प्रभावशाली मंत्री अश्विनी वैष्णव ओडिशा कैडर के आईएएस अधिकारी रह चुके हैं.

मोदी-शाह को ओडिशा चलाने के लिए बहुत बड़े कद के स्वतंत्र सोच वाले प्रशासक की ज़रूरत नहीं है. शायद इसी वजह से उन्होंने केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को यह जिम्मेदारी नहीं दी.

एक आदिवासी मुख्यमंत्री बनाना दिखने में अच्छा लगता है. दूसरी ओर, माझी के करीबी प्रसन्न सारंगी, जो राज्य प्रशासनिक सेवा के रिटायर्ड अधिकारी हैं और अब मुख्यमंत्री के ओएसडी-सह-विशेष सचिव बनाए गए हैं, सत्ता के गलियारों में काफी प्रभावशाली माने जा रहे हैं. इसी बीच ओडिशा के राज्यपाल हरि बाबू कंभमपति भी काफी सक्रिय हैं और सरकार की योजनाओं की समीक्षा कर रहे हैं. कुछ दिन पहले वह सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों को शेयर बाजार में सूचीबद्ध होने की सलाह भी दे रहे थे.

बीजेपी को शायद इस बात की ज्यादा चिंता नहीं है कि माझी कितना बड़ा काम कर पाएंगे. बिना ज्यादा शोर किए भी काम चल सकता है. ओडिशा के लोग बहुत ज्यादा कठोर मांग करने वाले नहीं माने जाते. वैश्विक निवेशक रुचिर शर्मा ने भारतीयों के बारे में कहा था कि वे धीमी प्रगति को आध्यात्मिक तरीके से स्वीकार कर लेते हैं—यह बात यहां भी लागू होती है. कुछ कल्याण योजनाएं, कुछ बुनियादी ढांचा परियोजनाएं और शांत, कम प्रोफाइल शासन—इतना काफी होता है.

शायद यही कारण है कि नवीन पटनायक 24 साल तक लगातार सत्ता में बने रहे. पिछले चुनाव में बीजेपी ने “बाहरी” कहकर तब के आईएएस अधिकारी वी.के. पांडियन को बड़ा मुद्दा बनाया, और बीजेडी के कई नेताओं ने भी यही बात दोहराई. इससे पटनायक पर ज्यादा असर नहीं पड़ा. पांडियन ने आईएएस से इस्तीफा दे दिया है, लेकिन नवीन निवास में उनकी मौजूदगी अब भी बनी रहती है. उनके करीबी और मुख्यमंत्री के पूर्व अतिरिक्त सचिव आदित्य मोहापात्रा अब नेता प्रतिपक्ष पटनायक के निजी सचिव हैं.

तो क्या पटनायक बीजेडी के साथ वही होने से रोक पाएंगे, जो महाराष्ट्र में शिवसेना और एनसीपी के साथ हुआ? ओडिशा बीजेपी के वरिष्ठ नेता धर्मेंद्र प्रधान जानते होंगे कि 79-वर्षीय पूर्व मुख्यमंत्री क्या कर सकते हैं. जब उन्हें राजनीति में नया माना जाता था, तब भी उन्होंने कई अनुभवी नेताओं को मात दी थी.

रुबेन बनर्जी की किताब कई बातों पर रोशनी डालती है. 1997 में जब पार्टी का संविधान बन रहा था, तब पटनायक चाहते थे कि उन्हें आजीवन अध्यक्ष बनाया जाए. जब बताया गया कि चुनाव आयोग इसकी अनुमति नहीं देगा, तो उन्होंने दूसरा तरीका निकाला. बीजेडी के संविधान में राजनीतिक मामलों की समिति (PAC) को उम्मीदवार चुनने का अधिकार दिया गया था. बाद में पटनायक ने नियम बदलवाकर पार्टी अध्यक्ष को PAC के फैसले रद्द करने की ताकत दिला दी.

उस समय पार्टी नेताओं ने इस बात को ज्यादा महत्व नहीं दिया. बीजू पटनायक सरकार में नंबर-2 रहे और पार्टी के संस्थापकों में शामिल बिजॉय मोहापात्रा भी नहीं समझ पाए कि नवीन पटनायक आगे क्या कर सकते हैं. 2000 में जब भुवनेश्वर में पीएसी की बैठक चल रही थी, तब पटनायक ने अपने अधिकार का इस्तेमाल कर मोहापात्रा का पट्कुरा सीट से टिकट रद्द कर दिया और उसकी जगह एक पत्रकार को उम्मीदवार बना दिया. जब तक मोहापात्रा को पता चला, तब तक नामांकन भरने का समय निकल चुका था.

पटनायक ने पीएसी के चेयरमैन का ही टिकट रद्द कर दिया. मोहापात्रा ने एक निर्दलीय उम्मीदवार का समर्थन किया, जो जीत गया, लेकिन बाद में वह भी मुख्यमंत्री पटनायक के साथ हो गया. यहीं से मोहापात्रा का राजनीतिक सफर खत्म हो गया. अगले 24 वर्षों में बीजेडी के कई महत्वाकांक्षी नेताओं को इसी तरह झटका लगा.

संक्षेप में, नवीन पटनायक राजनीति को अच्छी तरह समझते हैं. अब जब उन पर दबाव है, तो वह वह सब कर रहे हैं जो पहले कम करते थे—रोज विधानसभा आना, बहस में हिस्सा लेना, टीवी चैनलों को बयान देना और लोगों के बीच जाना. पिछले हफ्ते एससीबी मेडिकल कॉलेज और अस्पताल में लगी आग में घायल लोगों से भी वह मिले. वह पहले से ज्यादा पार्टी विधायकों और पदाधिकारियों से मुलाकात कर रहे हैं. पार्टी विरोधियों पर सख्ती भी दिखा रहे हैं, जैसा कि जनवरी में राज्यसभा चुनाव से पहले दो विधायकों को निलंबित करने से दिखा. उन्होंने कांग्रेस के साथ भी हाथ मिलाने का फैसला किया, जिससे वह अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत से ही लड़ते रहे थे.

फिर भी स्थिति आसान नहीं है. पार्टी के अंदर अलग-अलग जगह से असंतोष की आवाजें उठ रही हैं—पदाधिकारी, विधायक और सांसद तक नाराज दिख रहे हैं. उत्तराधिकारी न होने के कारण लगता है कि पटनायक के राजनीति से हटने के बाद पार्टी टूट सकती है. लेकिन बीजेपी भी इसे आसान नहीं मान सकती. 2024 में भी बीजेडी को बीजेपी से 37,627 वोट ज्यादा मिले थे. बीजेडी को 40.64 प्रतिशत वोट और 51 सीटें मिलीं, जबकि बीजेपी को 40.49 प्रतिशत वोट और 78 सीटें मिलीं. कांग्रेस को 13.4 प्रतिशत वोट मिले.

ये आंकड़े बताते हैं कि अगर भविष्य में बीजेडी और कांग्रेस राज्यसभा चुनाव की तरह साथ आते हैं, तो बीजेपी के लिए राह आसान नहीं होगी. हालांकि इसमें एक बड़ा “अगर” है.

जनता दल के दौर के बीजू पटनायक के एक सहयोगी ने रविवार को मुझे कहा, “यहां सबसे अहम भूमिका नवीन पटनायक की है. वह अभी फिट और स्वस्थ दिखते हैं, लेकिन चुनाव तीन साल दूर हैं.” मैं इससे सहमत हूं, लेकिन एक और “अगर” जोड़ना चाहूंगा. अगर आज ओडिशा में कांग्रेस की जगह बीजेपी होती, तो सत्तारूढ़ दल चिंतित होता. क्योंकि बीजेपी अपने सहयोगियों और विरोधियों—दोनों को कमजोर करने के लिए गठबंधन की राजनीति का इस्तेमाल करने के लिए जानी जाती है. वहीं, कांग्रेस कई बार बड़े क्षेत्रीय सहयोगियों पर अतिरिक्त बोझ साबित हुई है.

डीके सिंह दिप्रिंट के पॉलिटिकल एडिटर हैं. उनका एक्स हैंडल @dksingh73 है. व्यक्त किए गए विचार निजी हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)


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