पहली बार
सन् 1928 में साइमन कमीशन के आने पर देशभर में हड़ताल हुईं, प्रदर्शन हुए, बंबई के मज़दूरों ने विरोध में एक दिन की हड़ताल की. जहाँ-जहाँ भी कमीशन गया, वहां-वहां असंख्य जन-समूह ने ‘साइमन लौट जाओ’ का नारा लगाया. ऐसे दृश्य असहयोग आंदोलन के बाद से देखने को नहीं मिले थे.
लाहौर में जब साइमन कमीशन पहुंचा तो पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर लाठियां चलाईं. लाला लाजपत राय को गहरी चोट लगी और कुछ हफ़्तों के बाद उनकी मृत्यु हो गई. सारे देश में शोक छा गया.
शोक के साथ-साथ लोगों में क्रोध और घृणा का भाव था, जिसमें कुछ पस्त-हिम्मती की पुट थी. दिनदहाड़े, हजारों लोगों की आँखों के सामने देश के एक बूढ़े और आदरणीय नेता को मौत के घाट उतार दिया गया. लोगों ने सोचा कि दुष्टों को इसकी सजा अवश्य देनी चाहिए.
हमारी पार्टी ने बदला लेने का निश्चय किया. नवंबर 1928 में लाठी चार्ज करने वाले असिस्टेंट पुलिस सुपरिटेंडेंट सांडर्स को लाहौर कोतवाली के सामने गोली मार दी गई. लोग इस घटना से उछल पड़े.
यह हमारा पहला वार था ऐसे ही और हमलों से हम सारे देश को झकझोर कर जगा देना चाहते थे.
असेंबली में बम
राष्ट्रीय आंदोलन में फिर तेजी आ गई. 1929 के दिसंबर में कलकत्ता में कांग्रेस का अधिवेशन हुआ, जिसमें यह निश्चय हुआ कि यदि एक वर्ष में ब्रिटेन औपनिवेशिक स्वराज नहीं दे तो पूर्ण स्वतंत्रता की घोषणा कर दी जाए. वर्षों से देश पर छाए हुए निराशा के काले बादल धीरे-धीरे हटने लगे. हर जगह युवक संघ बनने लगे, और बंबई में दूसरी बड़ी हड़ताल शुरू हुई.
हमें ऐसा लगा कि अब आगे एक बड़ी लड़ाई आ रही है. देश में ऐसी आग लग रही थी जैसी कि 1921-22 में लगी थी. हम उस लड़ाई में हिस्सा लेने के लिए तेजी से तैयारियां करने लगे-शस्त्र और रुपये जमा किए जा रहे थे, हथियार चलाने की शिक्षा शुरू कर गई थी. बम बनाना सिखाने के लिए जतिन दास को कलकत्ता से बुलाया गया.
अप्रैल 1929 में बड़े-बड़े अक्षरों में समाचार छपे कि सारे कम्युनिस्ट और मज़दूर नेता गिरफ़्तार कर लिए गए हैं. पूरनचंद्र जोशी भी, जो उस समय इलाहाबाद यूनिवर्सिटी विद्यार्थी और युवक संघ के नेता थे, गिरफ़्तार कर लिए गए. उनकी गिरफ़्तारी पर विद्यार्थियों ने बहुत बड़ा प्रदर्शन किया.
भगत सिंह और हमारे अन्य साथियों की कम्युनिस्ट नेताओं से पहले भेंट हो चुकी थी. हम लोग उनसे सहानुभूति रखते थे. हम लोगों ने सोचा था कि कम्युनिस्ट पार्टी से संबंध स्थापित करें. योजना यह थी कि कम्युनिस्ट जनता का संगठन करेंगे, और जन-आंदोलन चलाएँगे, और हमारी पार्टी हथियारबंद दस्ते का काम करेगी. किंतु जब हमें मालूम हुआ कि कम्युनिस्ट हथियारबंद कार्रवाई को हानिकारक समझते हैं, तब हमने अपना विचार बदल दिया. यद्यपि हम लोग कम्युनिस्टों की गिनती क्रांतिकारियों में नहीं करते थे क्योंकि क्रांति का मतलब हम लोग हथियारबंद लड़ाई समझते थे. तब भी कम्युनिस्टों की कई बातें हम लोगों से मिलती-जुलती थीं. साम्राज्यवाद के प्रति उनकी घृणा, विधानवाद का विरोध, खुले विद्रोह की बात तथा समाजवाद के लिए उनका प्रयत्न; यह सभी हमें अच्छा लगता था.
इसलिए कम्युनिस्टों की देश-व्यापी गिरफ़्तारियों को हम लोगों ने क्रांतिकारी आंदोलन पर वार समझा. कम्युनिस्ट भी साम्राज्यशाही के दुश्मन थे. उनके ऊपर चोट हमारे ऊपट चोट थी. साम्राज्यशाही एक तरफ लोगों की विधानवादी मनोवृत्ति को पुष्ट करना चाहती थी और दूसरी ओर जनता पर दमनचक्र चला रही थी. हम लोगों ने उनकी नीति का विरोध करने का निश्चय कर लिया.
कुछ दिनों के बाद केंद्रीय असेंबली में मज़दूर-हित विरोधी ट्रेड्स-डिस्प्यूट बिल पास हुआ. इसके बाद ही असेंबली भवन में सरकारी मेंबरों की सीटों के पास बम फटा. भगत सिंह और दत्त घटनास्थल पर ही पकड़े गए.
एक ओजस्वी वक्तव्य में, जिससे भगत सिंह की कलम का जोर प्रगट होता था, उन्होंने अपनी जिम्मेदारी को स्वीकार किया, और यह भी बतलाया कि उन्होंने ऐसा क्यों किया है. दोनों आदमियों को कालेपानी की सजा मिली.
उसके बाद ही अचानक हमारी लाहौर की बम फैक्ट्री का भेद खुल गया और सुखदेव, किशोरीलाल और अन्य साथी गिरफ़्तार कर लिए गए. जयगोपाल ने पुलिस के सामने पार्टी का सारा भेद खोल दिया. हंसराज वोहरा भी मुखबिर बन गया. फिर तो चारों तरफ धर-पकड़ होने लगी. और कई आदमी सरकारी गवाह बन गए. कुछ ही सप्ताह में बिहार, संयुक्त प्रांत और पंजाब के सक्रिय कार्यकर्ताओं और नेताओं को पुलिस ने पकड़ लिया. अन्य साथी गुप्त हो गए. मैं भी अंतर्धान होना चाहता था कि गिरफ़्तार हो गया.
हम लोगों की सारी तैयारी धूल में मिल गई. सारी उम्मीदों पर पानी फिर गया; सबसे अधिक निराशाजनक बात यह थी कि पुलिस के अत्याचारों को न सहने के कारण सात आदमी, जिसमें से दो हमारी केंद्रीय कमेटी के सदस्य थे, मुखबिर हो गए.
मुकदमे
जुलाई 1929 में हम तेरह आदमियों को अदालत में पेश किया गया. वहाँ फिर भगत सिंह और दत्त से हमारी मुलाकात हुई. यह भगत सिंह अब पुराने भगत सिंह नहीं थे, जिनका शारीरिक गठन और ताकत हमारी पार्टी में कहावत बन गई थी. उनका शरीर जर्जर हो चुका था. स्ट्रेचर के ऊपर रखकर वे अदातल में लाए गए. महीनों तक उन्हें और दत्त को पुलिस ने घोर यातनाएँ दी थीं और उस समय वे सभी राजनीतिक बंदियों के साथ मानुषिक व्यवहार की माँग करने के लिए भूख हड़ताल कर रहे थे. उनकी हालत देखकर हम लोगों की आँखें भर आईं.
भगत सिंह और दत्त को आजन्म कारावास की सजा हो चुकी थी, पर अब इस नए मुक़दमे में, जो 1929 का लाहौर षड्यंत्र केस कहलाया, वे फिर घसीटे गए.
तीन दिन तक हमने अदालत की कार्यवाही में दिलचस्पी नहीं ली. हम लोगों ने तीन दिन तक मुक़दमे के प्रति अपना रुख तय करने के लिए बैठकें कीं.
भगत सिंह बहुत कमज़ोर थे इसलिए वे आराम से कुर्सी पर पड़े रहते थे, फिर भी उन्होंने उस बहस में खास हिस्सा लिया.
पहली बात जिस पर उन्होंने जोर दिया, वह यह थी कि हम लोग अपने दिमाग़ से यह बात निकाल दें कि अब कुछ नहीं हो सकता है. मुक़दमे के ज़रिए भी अपना आंदोलन आगे बढ़ाया जा सकता है. कोशिश यह जरूर की जाए कि जितने लोग बच सकें, उनको बचाया जाए, पर सफाई इस तरह से पेश की जाए, जिससे ब्रिटिश सरकार के न्याय का पर्दाफाश हो और जनता समझे कि क्रांतिकारियों का लक्ष्य क्या था. अदालत में सिर्फ बयान ही न दिया जाए, बल्कि जेल में और अदालत के कमरे में हम लोग ऐसे प्रदर्शन करें, जिससे लोग समझें कि सरकार कितनी नाचीज़ है और पुलिस और अदालत उसके स्वांग हैं. इस प्रकार हम लोग हवालात में रहकर भी जनता में यह जाग्रति पैदा कर सकते हैं जो बाहर अपने कामों के जरिए हम लोग करना चाहते थे.
इन बातों से हम लोगों की हिम्मत फिर बँधी और हम लोगों ने भगत सिंह के प्रस्ताव के अनुसार काम करना तय किया. पहला काम सबने यह किया कि हम भगत सिंह और दत्त द्वारा प्रारंभ की गई भूख हड़ताल में शामिल हो गए. हमारी प्रमुख माँग थी कि सब राजनीतिक बंदियों को एक ही क्लास में रखा जाए, सबको अच्छा खाना मिले, अखबार तथा अन्य पढ़ने की सामग्री और लिखने की सुविधा दी जाए.
भूख हड़ताल
यह भूख हड़ताल 63 दिनों तक चली, और जतिन दास को शहीद बनाकर ख़त्म हुई. देश का कोना-कोना हिल गया.
प्रारंभ में जेल अधिकारियों ने सोचा कि हड़ताल चलेगी नहीं. दो बंदियों ने कुछ दिनों बाद हड़ताल तोड़ दी तो उनका ख़याल और भी पक्का हो गया. खुद हम लोग मन में डर रहे थे कि हम लोगों से चल सकेगी या नहीं. मैं सोचा करता था कि ज्यादा दिनों तक भूख की मार शायद न सह सकूँगा. इसके पहले हम लोगों ने बड़ी-बड़ी कठिनाइयाँ झेली थीं; पुलिस के साथ भिड़ंत होने से हम नहीं डरते थे. पर बहुत दिनों, हफ़्तों और महीनों तक भूखे रहने की कल्पना से भयभीत हो जाते थे. दस दिनों तक कोई खास बात नहीं हुई. भूख बढ़ती जाती थी और साथ-साथ शारीरिक कमजोरी भी बढ़ती जाती थी. कुछ लोगों को एक सप्ताह बाद चारपाई पकड़ लेनी पड़ी. मुक़दमा चल रहा था; और अदालत के कमरे में बैठने में बड़ी तकलीफ होती थी. पर, शुरू में जो डर मालूम हुआ था, अब वह मिट चुका था. भूख हड़ताल करना अब कोई कठिन कार्य नहीं मालूम होता था.
लेकिन असली लड़ाई तो आगे आने वाली थी. दस दिनों के बाद हम लोगों को जबरदस्ती खाना खिलाना शुरू किया गया. उस समय हम सब लोग अलग कोठरियों में बंद थे. कुछ तगड़े नंबरदारों के साथ डॉक्टर प्रत्येक कोठरी में जाता था, और फिर भूख-हड़ताली को चटाई पर पटककर, एक रबर की नली जबरदस्ती नाक में डाल दी जाती थी. इस नली के द्वारा जबरदस्ती दूध अंदर डाला जाता था. हम लोगों ने लाख हाथ-पैर पटके, पर बेकार. हम लोगों के गले में नीचे दूध उतारना जारी रहा. हम लोगों ने समझा कि हमारी हार हो गई.
तेरहवें रोज़ रात को मुझे खबर मिली कि जतिन दास की हालत खराब है, और उन्हें अस्पताल ले जाया गया है. कुछ ही घंटे पहले जतिन दास भले चंगे थे, फिर यकायक उनको हो क्या गया? बाद में समाचार लाने वाले उस जेल अधिकारी ने डरते हुए मुझे बताया कि ज़बरदस्ती दूध पिलाते समय कोई गड़बड़ी हो गई है और दास बेहोश पड़े हैं.
इस खबर से हम लोगों में मातम छा गया. हम लोगों में से बहुत से लोगों की और स्वयं मेरी जतिन दास से भेंट नहीं हुई थी. पर, जेल में थोड़े ही दिनों में, सब लोग उन्हें चाहने लगे थे. उनका स्वभाव सरल था, पर वे एक नंबर के मज़ाकिया थे और तरह-तरह के चुटकुले और कहानियाँ सुनाकर हम लोगों को हँसाया करते थे.
मैंने जेलर को बुलाया और लड़-झगड़कर जेल अस्पताल में पहुँच गया.
दास चारपाई पर बेहोश पड़े थे; डॉक्टर चारों ओर खड़े थे. रात कटने की कोई उम्मीद न थी. पर हालत सँभल गई, लेकिन निमोनिया ने उनको बेतरह कमजोर कर दिया. दवा या पथ्य खाने से दास ने इनकार कर दिया. कमजोरी इतनी थी कि जबरदस्ती कुछ खिलाना असंभव था.
इसके बाद से भूख-हड़ताल दूने जोश से चलने लगी. दास के बाद शिव वर्मा बीमार पड़े और उसके बाद औरों की बारी आई. शीघ्र ही सारा अस्पताल भर गया. अदालत की कार्यवाही स्थगित कर दी गई.
इसके बाद, कौन पहले मरेगा, इसकी हम लोगों में होड़ शुरू हो गई.
हम लोग डॉक्टरों को छकाने के लिए तरह-तरह के उपाय निकालने लगे. किशोरी ने लाल मिर्च खाकर गरम पानी पी लिया, जिससे उनके गले में घाव हो गया. अब जबरदस्ती गले में नली नहीं डाली जा सकती थी क्योंकि नली डालते ही बड़े ज़ोर से खाँसी शुरू हो जाती थी और फिर नली को न निकालने पर दम घुट जाने का खतरा था. मैं जबरदस्ती दूध पिलाए जाने के बाद एकाध मक्खी निगल जाता था जिससे सारा खाना बाहर निकल आता था. यह उपाय जब डॉक्टरों को मालूम हो गया तो उन्होंने पहरा कड़ा कर दिया.
हमें हराने के लिए जेल के अधिकारियों ने घड़ों में पानी के स्थान पर दूध भर दिया. यह सबसे बड़ा जुल्म था. एक दिन के बाद प्यास बरदाश्त से बाहर होने लगी. हम लोग तरसते हुए घड़े के पास जाते थे, पर दूध देखकर लौट पड़ते थे. मालूम होने लगा कि हम लोग पागल हो जाएँगे. जिस आदमी ने इस उपाय का आविष्कार किया था, यदि वह आदमी उस समय मेरे सामने आ जाता तो मैं उसका गला घोंट देता.
बाहर संतरी बैठा-बैठा हमारी हर एक गतिविधि को देख रहा था. मुझको अब प्यास बरदाश्त नहीं हो रही थी. मेरा तालू सूख रहा था और जीभ ऐंठी जा रही थी. मैंने संतरी को बुलाया और थोड़ा पानी माँगा. संतरी बोला, ‘पानी देने का हुक्म नहीं है.’
मैं पागल हो गया और घड़े को उठाकर दरवाजे पर दे मारा. घड़ा चकनाचूर हो गया. दूध जमीन पर बहने लगा और संतरी का कपड़ा उससे तर हो गया. उसको लगा मेरा दिमाग खराब हो गया है और उसका चेहरा फक हो गया. और सचमुच मेरा हवाश गुम हो गया था.
ठीक यही घटना किशोरी तथा अन्य साथियों के साथ हुई. उन सबों ने इसी प्रकार घड़े को दरवाजे पर दे मारा!
आखिर जेलर ने हमारी बात मान ली. हमारी कोठरियों में पानी लाया गया. मैंने पानी पीया और खूब पीया. नतीजा हुआ कि मैं बीमार पड़ा और पानी की एक-एक बूँद कै के साथ निकल गई.
इसी बीच में, दूसरी जेलों के राजनीतिक बंदियों ने सहानुभूति में भूख हड़तालें शुरू कर दीं. देश में हमारी माँगों का समर्थन करने के लिए एक जबरदस्त आंदोलन उठ खड़ा हुआ. हर स्थान पर आम सभाएँ और प्रदर्शन होने लगे.
कुछ दिनों के बाद मेरठ-षड्यंत्र केस के राजबंदियों ने भी भूख हड़ताल शुरू कर दी. समुद्र पार तक यह खबरें फैल गई. इंग्लैंड में भी हलचल पैदा हो गई. भारतीय जेलों की हालत पर सारे संसार का ध्यान गया.
भूख हड़ताल के बीच में कई बार भगत सिंह हम लोगों से सलाह करने के बहाने मिले, और सब हालत जानते-समझते रहे.
उनकी हालत स्वयं खराब थी फिर भी वे दास और अन्य साथियों के पास बैठते और उन्हें प्रसन्न रखते थे. उनके आने से हम लोगों में नया उत्साह पैदा हो जाता था और उनके आगमन का हम लोग हमेशा उत्सुक होकर इंतज़ार किया करते थे.
मेरे भगत सिंह किताब को पेंगुइन स्वदेश ने छापा है जिसका अंश प्रकाशन की अनुमति से छापा जा रहा है. किताब के लेखक पंकज चतुर्वेदी हैं.
