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Tuesday, 24 March, 2026
होममत-विमतसुप्रीम कोर्ट ऐसे नियम बनाए कि जज रिटायर होने के बाद अपने पद की गरिमा को ‘किराये’ पर न दे सकें

सुप्रीम कोर्ट ऐसे नियम बनाए कि जज रिटायर होने के बाद अपने पद की गरिमा को ‘किराये’ पर न दे सकें

भारत के सेवानिवृत्त न्यायाधीश विदेशी अदालतों में गवाह बनकर खड़े हो रहे हैं, यह एक संस्थागत समस्या बन गई है.

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नीरव मोदी ने ब्रिटेन से अपने प्रत्यर्पण को रोकने की जो नई कोशिश वहां की अदालत में की है, उसके समर्थन में भारत के सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस दीपक वर्मा हाल में गवाही देने के लिए खड़े हुए. खबरों के मुताबिक, उन्होंने कहा कि अगर नीरव मोदी को भारत भेज दिया गया तो वहां सीबीआई, ईडी और दूसरी एजेंसियां उससे पूछताछ करेंगी, जबकि भारत सरकार ने यह औपचारिक आश्वासन दिया है कि उससे सीबीआई या ईडी पूछताछ नहीं करेंगी. ब्रिटेन की एक अदालत में नीरव मोदी के पक्ष में गवाही दी गई. बताया जाता है कि जस्टिस वर्मा ने यह भी संकेत दिया कि ऐसा भरोसा भारतीय अदालतों के लिए ज़रूरी नहीं होगा. इस पर भारत सरकार के वकील ने उनकी विशेषज्ञता पर सवाल उठाया और अदालत ने फैसला सुरक्षित रख लिया.

यह मामला 2021 के उस मामले जैसा ही है, जब वेस्टमिंस्टर की अदालत में नीरव मोदी केस की सुनवाई के दौरान रिटायर्ड जस्टिस मार्कण्डेय काटजू ने कहा था कि भारत में नीरव मोदी के मामले की निष्पक्ष सुनवाई नहीं होगी, लेकिन ब्रिटेन की अदालत ने कहा कि उनकी गवाही में निष्पक्षता और विश्वसनीयता की कमी है और इसमें न्यायपालिका के अपने पुराने साथियों के प्रति “गुस्से का भाव” दिखता है और “किसी आलोचक के निजी एजेंडा की छाप” नज़र आती है.

लेकिन अब यह मामला किसी एक रिटायर्ड जज, किसी भगोड़े या किसी शर्मनाक खबर की हेडलाइन तक सीमित नहीं रह गया है. भारत के कई रिटायर्ड जज विदेशी अदालतों में पेश हो चुके हैं और भारत या भारत के सरकारी बैंकों के खिलाफ अपनी राय दे चुके हैं. अब इस सिलसिले को नज़रअंदाज करना मुश्किल है.

नीरव मोदी के प्रत्यर्पण के मामले में बंबई हाईकोर्ट के रिटायर्ड जज जस्टिस अभय एम. थिप्से एक विशेषज्ञ गवाह के रूप में पेश हुए और कहा कि भारतीय आरोपपत्र में लगाए गए जालसाजी और दूसरे आरोप भारतीय कानून के तहत साबित नहीं हो पाएंगे.

विजय माल्या के मामले में भी ऐसा हुआ. 2019 में माल्या के खिलाफ ब्रिटेन में हुई सुनवाई की रिपोर्ट बताती है कि राजस्थान हाईकोर्ट के रिटायर्ड जज जस्टिस पाना चंद जैन, माल्या की ओर से विशेषज्ञ गवाह के रूप में पेश हुए थे, जबकि सुप्रीम कोर्ट के एक पूर्व जज बैंकों के पक्ष में पेश हुए थे. विवाद का मुद्दा यह था कि क्या भारतीय कर्ज और वसूली ट्रिब्यूनल का आदेश विदेश में लागू हो सकता है या नहीं.

इसके बाद 2021 में भारतीय स्टेट बैंक और अन्य बनाम माल्या का मामला आया, जो ब्रिटेन में दिवालियापन की कार्यवाही से जुड़ा था. जस्टिस दीपक वर्मा माल्या की ओर से गवाही दे रहे थे और जस्टिस गौड़ा भारतीय बैंकों की ओर से. ब्रिटिश अदालत ने आखिर में जस्टिस गौड़ा की गवाही को ज्यादा महत्व दिया और कहा कि जस्टिस वर्मा की राय को कानूनी समर्थन नहीं मिला और उनकी गवाही के कुछ हिस्सों को सावधानी से देखने की ज़रूरत है.

यह नाम 2025 में संजय भंडारी के प्रत्यर्पण मामले में भी सामने आया. ब्रिटेन की अदालत के फैसले में कहा गया कि जस्टिस वर्मा ने भारत की जेलों की स्थिति, हिंसा, जबरन वसूली और मुकदमों में देरी को लेकर गवाही दी थी. उस फैसले में निचली अदालत की टिप्पणी का भी ज़िक्र किया गया, जिसमें कहा गया था कि वे “काफी ज्यादा बहस करने वाले गवाह” जैसे थे, जो कभी-कभी निष्पक्ष विशेषज्ञ गवाह की बजाय आरोपी के वकील जैसे लगते थे. निचली अदालत ने उनकी गवाही में विरोधाभासों का भी ज़िक्र किया था.

सीधी बात यह है कि ये घटनाएं न तो अकेली थीं और न ही अचानक हुईं, बल्कि इनमें एक पैटर्न दिखता है. भारत की संवैधानिक अदालतों के रिटायर्ड जज भगोड़ों, प्रत्यर्पण के आरोपियों और बड़े ऋण-डिफॉल्टरों से जुड़े विदेशी मामलों में गवाह के रूप में पेश हो रहे हैं और भारत या भारतीय संस्थाओं के खिलाफ गवाही देकर अपने पुराने न्यायिक पद का प्रभाव इस्तेमाल कर रहे हैं. न्यायपालिका की चिंता करने वाले हर व्यक्ति के लिए यह गंभीर बात है.

संस्थागत समाधान

यह साफ होना चाहिए कि यहां क्या कहा जा रहा है और क्या नहीं कहा जा रहा है.

यह नहीं कहा जा रहा कि रिटायर्ड जज रिटायर होने के बाद अपने अधिकार खो देते हैं. यह भी नहीं कहा जा रहा कि भारत सरकार के खिलाफ कही गई हर बात गलत है. रिटायर्ड जज लिख सकते हैं, बोल सकते हैं, पढ़ा सकते हैं, मध्यस्थता कर सकते हैं, सार्वजनिक विमर्श में भाग ले सकते हैं और विधिक जीवन में योगदान दे सकते हैं.

लेकिन सार्वजनिक बहस में हिस्सा लेने और विदेशी अदालतों में प्रत्यर्पण, दिवालियापन या दूसरे संवेदनशील मामलों में पैसे लेकर विशेषज्ञ गवाह बनकर गवाही देने और अपने पुराने संवैधानिक पद की नैतिक पूँजी और प्रतिष्ठा का इस्तेमाल करने में बड़ा फर्क है.

कोई रिटायर्ड जज किसी दूसरे पेशे से रिटायर हुए व्यक्ति जैसा नहीं होता. न्यायिक पद की प्रतिष्ठा निजी संपत्ति नहीं होती. वह संविधान द्वारा प्रदत्त होती है, संस्थागत विश्वास द्वारा टिकाई जाती है, और इसलिए मान्य होती है क्योंकि जनता यह मानती है कि पक्षपात या लेन-देन से ऊपर होते हैं. इसलिए रिटायर होने के बाद भी उनका प्रभाव बना रहता है. सुप्रीम कोर्ट या हाईकोर्ट का पूर्व जज किसी आम व्यक्ति की तरह विदेशी अदालत में नहीं खड़ा होता. उसके साथ उस चोगे की गरिमा भी जुड़ी रहती है, जिसे पहनकर उसने शपथ ली थी कि वह भारत के संविधान के प्रति सच्ची निष्ठा रखेगा और भारत की संप्रभुता और अखंडता की रक्षा करेगा.

इसीलिए अभी जो खालीपन दिख रहा है, वह अस्वीकार्य है. अगर ऐसा चलता रहा तो इसके तीन नतीजे होंगे. पहला, न्यायपालिका की प्रतिष्ठा एक ऐसी चीज बन जाएगी जिसे अमीर भगोड़े, आर्थिक अपराधी और विदेशी कानूनी टीमें अपने काम के लिए इस्तेमाल कर सकती हैं. दूसरा, संस्थाओं की साख कमजोर होगी. जब कोई रिटायर्ड जज विदेशी अदालत में भारतीय अदालतों, जेलों या सरकारी भरोसे पर सवाल उठाएगा, तो विदेशी अदालतें उसे सिर्फ सामान्य गवाह नहीं मानेंगी, बल्कि ऐसे व्यक्ति के रूप में देखेंगी जो कभी उसी सिस्टम का हिस्सा था जिसकी वह आलोचना कर रहा है. तीसरा, न्यायपालिका ने कोई नियम नहीं बनाया तो उसकी प्रतिष्ठा को नुकसान होगा.

संस्था असुरक्षित स्थिति में खड़ी है, फिर भी मौन है. यह चुप्पी टूटनी चाहिए.

समाधान न्यायपालिका को ही निकालना चाहिए. उसे खुद पहल करनी चाहिए.

सुप्रीम कोर्ट ‘फुल कोर्ट’ प्रस्ताव या आंतरिक नियम बनाकर अपने और हाईकोर्ट के पूर्व जजों के लिए रिटायरमेंट के बाद के लिए साफ मानक तय कर सकता है, जैसे ‘बेंगलुरु सिद्धांत’ हैं. ये नियम छोटे, स्पष्ट और लागू करने योग्य होने चाहिए. इनमें कम से कम इन बातों का ध्यान रखा जाए:

1. पूर्व जज विदेशी अदालतों में अपराध, प्रत्यर्पण या संप्रभुता से जुड़े ऐसे मामलों में गवाह के रूप में पेश न हों, जो भारत के कानूनी रुख या आधिकारिक भरोसे को कमजोर कर सकते हैं.

2. पैसे लेकर विशेषज्ञ गवाह बनने, सलाह देने या सार्वजनिक महत्व के मामलों में भूमिका निभाने के लिए स्पष्ट नियम होने चाहिए.

3. यह तय होना चाहिए कि मध्यस्थता, सलाह या गवाही जैसी कौन-सी पेशेवर भूमिकाएं पूर्व संवैधानिक पद की गरिमा के अनुरूप हैं और कौन-सी नहीं.

4. ऐसे सिद्धांत तय होने चाहिए जिनसे स्पष्ट हो कि पूर्व न्यायिक पद को पूरी तरह निजी संपत्ति नहीं माना जा सकता.

5. गंभीर उल्लंघन होने पर संस्थागत कार्रवाई का प्रावधान होना चाहिए.

रिटायरमेंट के बाद आज़ादी का मतलब यह नहीं होना चाहिए कि जिस संस्था का कभी प्रतिनिधित्व किया, उससे नैतिक रिश्ता खत्म हो जाए. शपथ भले एक समय के बाद खत्म हो जाती है, लेकिन उसका नैतिक असर खत्म नहीं होता. वास्तव में, न्यायिक अनुशासन का सबसे मजबूत आधार न्यायिक स्वतंत्रता ही है. अगर न्यायपालिका खुद अपने लिए नियम नहीं बनाएगी तो दूसरी संस्थाएं ऐसा करने की कोशिश कर सकती हैं, जो ठीक नहीं होगा. आत्म-नियंत्रण से स्वतंत्रता भी बचती है और सम्मान भी.

इसलिए असली सवाल यह नहीं है कि किसी रिटायर्ड जज को विदेश में किसी भगोड़े या ऋण-डिफॉल्टर के पक्ष में खड़े होने की कानूनी अनुमति है या नहीं. सवाल यह है कि क्या सर्वोच्च न्यायपालिका यह कहने के लिए तैयार है कि कुछ कार्य, यद्यपि कानूनी रूप से संभव हों, फिर भी संस्थागत दृष्टि से अनुचित हो सकते हैं.

किसी महान संस्था की कसौटी केवल यह नहीं होती कि वह बाहरी हस्तक्षेप का प्रतिरोध कैसे करती है। उसकी कसौटी यह भी होती है कि क्या वह अपनी आंतरिक कमजोरियों को समय रहते पहचानकर सुधार सकती है, इससे पहले कि जन-विश्वास क्षीण होने लगे.

समय आ गया है. न्यायपालिका को शांत और दृढ़ तरीके से कदम उठाना चाहिए. मामला अब किसी एक रिटायर्ड जज तक सीमित नहीं है. प्रश्न यह है कि क्या सेवानिवृत्ति के बाद न्यायिक चोगा किराये पर दिया जा सकता है.

एमबी नरगुंड सीनियर एडवोकेट हैं और आदित्य कश्यप एडवोकेट हैं. उनका एक्स हैंडल @adityak.law है. ये लेखकों के निजी विचार हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)

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