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Sunday, 22 March, 2026
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पश्चिम एशिया में युद्ध का असर सूरत के टेक्सटाइल उद्योग पर: काम और कमाई बचाने की जद्दोजहद

LPG की कमी, बढ़ती लागत और प्रभावित निर्यात के कारण परिवार चूल्हों पर खाना बनाने को मजबूर और मजदूर अपने गृह राज्यों की ओर लौट रहे हैं. उद्योग से जुड़े लोग कहते हैं कि यह अभी पूरी तरह संकट नहीं है, लेकिन असर व्यापक है.

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सूरत: भारत के टेक्सटाइल हब सूरत के बाहरी इलाके कापोद्रा की संकरी गलियों में बेचैनी भरी खामोशी है. मिलें अभी चल रही हैं, लेकिन आसपास की रिहायशी कॉलोनियों में डर, चिंता और गुस्सा बढ़ रहा है.

शहर के टेक्सटाइल उद्योग में काम करने वाले मजदूर बड़ी संख्या में सामान समेटकर लौट रहे हैं. वजह यह नहीं कि उनकी नौकरी तुरंत खतरे में है, बल्कि उनकी रोज़मर्रा की ज़िंदगी प्रभावित हो रही है. एलपीजी की सप्लाई लगातार कम हो रही है और कीमतें बढ़ रही हैं, जिससे परिवार ईंटों को जमा कर बनाए गए अस्थायी चूल्हों पर खाना बनाने को मजबूर हैं.

गुजरात का यह शहर भले ही पश्चिम एशिया के युद्ध के मैदान से दूर हो, लेकिन वहां का युद्ध यहां के मशहूर टेक्सटाइल उद्योग और उस पर निर्भर लोगों की ज़िंदगी पर गहरा असर डाल रहा है.

कच्चे माल की बढ़ती लागत, हवाई मार्गों में रुकावट और गैस की कमी के कारण उत्पादन धीमा हो रहा है और मुनाफा घट रहा है. इस दबाव के कारण शिपमेंट में देरी, सप्लाई में रुकावट और यूनिट्स पर दबाव बढ़ रहा है.

शहर के टेक्सटाइल कारोबारियों, जिनमें बड़े कारोबारी समूह भी शामिल हैं, ने दिप्रिंट को बताया कि फिलहाल वे स्थिति संभाल पा रहे हैं और इसे अभी पूरी तरह संकट नहीं मानते, लेकिन कच्चे माल की कीमतों में तेज बढ़ोतरी हुई है और गैस सप्लाई की दिक्कत उत्पादन को प्रभावित कर रही है.

सूरत का टेक्सटाइल उद्योग मध्य पूर्व—खासतौर पर UAE, सऊदी अरब और कुवैत जैसे देशों और चीन से आयात पर काफी निर्भर है.

उद्योग का सिंथेटिक सेगमेंट तैयार कपड़ों के बजाय आयातित इनपुट पर निर्भर करता है. इसमें PTA (प्योरिफाइड टेरेफ्थैलिक एसिड), MEG (मोनो एथिलीन ग्लाइकोल) और पॉलिएस्टर चिप्स जैसे पेट्रोकेमिकल कच्चे माल पश्चिम एशिया के देशों से आते हैं, जबकि चीन से सिंथेटिक यार्न, डाई और मशीनरी मिलती है. इससे तेल और मैन्युफैक्चरिंग सप्लाई चेन में किसी भी रुकावट का असर सीधे उद्योग पर पड़ता है.

अमेरिका और इज़रायल एक तरफ तथा ईरान दूसरी तरफ के बीच जारी युद्ध ने निर्यात को भी प्रभावित किया है और पेमेंट साइकिल धीमी हो गई है.

समस्या को और बढ़ा रही है नेचुरल गैस और एलपीजी की सप्लाई में रुकावट. फैब्रिक बनाने की कई प्रक्रियाओं, जैसे यार्न ट्रीटमेंट, फैब्रिक फिनिशिंग, डाइंग और ब्लीचिंग, में हाई टेम्परेचर हीटिंग की जरूरत होती है, जिसके लिए गैस जरूरी है.

एलपीजी सप्लाई प्रभावित होने के कारण सूरत टेक्सटाइल उद्योग से जुड़े मजदूरों के परिवार खाना बनाने के लिए अस्थायी चूल्हों का इस्तेमाल कर रहे हैं | फोटो: ईशा मिश्रा/दिप्रिंट
एलपीजी सप्लाई प्रभावित होने के कारण सूरत टेक्सटाइल उद्योग से जुड़े मजदूरों के परिवार खाना बनाने के लिए अस्थायी चूल्हों का इस्तेमाल कर रहे हैं | फोटो: ईशा मिश्रा/दिप्रिंट

द गुजरात चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री की टेक्सटाइल कमेटी के को-चेयर राहुल शाह ने कहा, “कच्चे माल की कीमतों में तेज बढ़ोतरी हुई है. सिर्फ पॉलिएस्टर फाइबर की कीमत करीब 24 से 50 रुपये प्रति किलो तक बढ़ गई है.”

उन्होंने कहा, “डाई, केमिकल और पैकेजिंग समेत कुल इनपुट लागत में 7 से 10 प्रतिशत तक बढ़ोतरी हुई है. उद्योग कई प्रक्रियाओं के लिए गैस, पीएनजी या एलपीजी पर निर्भर है, जैसे सिंचिंग (उच्च तापमान पर कपड़े को स्थिर करना), फिनिशिंग और गारमेंटिंग. गैस सप्लाई में किसी भी तरह की रुकावट या कीमत बढ़ने का सीधा असर उत्पादन पर पड़ता है.”

सरकारी और उद्योग के अनुमान के मुताबिक सूरत का टेक्सटाइल उद्योग भारत में सबसे ज्यादा रोजगार देने वाले सेक्टरों में से एक है, जहां करीब 15 से 18 लाख लोग काम करते हैं. यह देश के लगभग 40 प्रतिशत मैन-मेड फैब्रिक का उत्पादन करता है और रोजाना करीब 6 करोड़ मीटर कपड़ा तैयार होता है.

इस उद्योग को 6 से 7 लाख पावरलूम, 400 से 500 प्रोसेसिंग यूनिट और लगभग 1 लाख एम्ब्रॉयडरी मशीनों का बड़ा नेटवर्क समर्थन देता है.

उद्योग का सिंथेटिक सेगमेंट पश्चिम एशिया के देशों और चीन से आयातित कच्चे माल पर निर्भर है | फोटो: ईशा मिश्रा/दिप्रिंट
उद्योग का सिंथेटिक सेगमेंट पश्चिम एशिया के देशों और चीन से आयातित कच्चे माल पर निर्भर है | फोटो: ईशा मिश्रा/दिप्रिंट

दुबई के रास्ते व्यापार प्रभावित

उद्योग से जुड़े लोगों ने दिप्रिंट को बताया कि इस सेक्टर ने एक के बाद एक कई संकट झेले हैं—रूस-यूक्रेन युद्ध, महामारी और ट्रंप के दौर के टैरिफ और हर बार किसी तरह संभल गया. लेकिन लगातार झटकों से अब उद्योग पर दबाव बढ़ने लगा है.

फेडरेशन ऑफ गुजरात वीवर एसोसिएशन (FOGWA) के अध्यक्ष अशोक जीरावाला ने दिप्रिंट से बात करते हुए चुनौतियों के बारे में विस्तार से बताया, “सूरत के टेक्सटाइल उत्पादन का लगभग 80 प्रतिशत घरेलू बाजार के लिए है, लेकिन बाकी 20 प्रतिशत निर्यात पूरी तरह रुक गया है. दुबई, जो 45 से ज्यादा देशों में माल भेजने का अहम निर्यात केंद्र है, वहां कामकाज प्रभावित हुआ है, जिससे निर्यात लगभग ठप हो गया है. भुगतान अटक गए हैं, डिलीवरी रुक गई है और कैश फ्लो का चक्र टूट गया है.”

युद्ध के कारण कोयले की सप्लाई भी प्रभावित हुई है, जो टेक्सटाइल प्रोसेसिंग यूनिट्स के लिए बेहद जरूरी है. कोयले की कमी और सप्लाई में रुकावट उद्योग के लिए बड़ी चिंता बन रही है, जिससे दबाव और बढ़ गया है.

साउथ गुजरात टेक्सटाइल प्रोसेसर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष जीतू वाखारिया, जिनकी डाइंग और प्रिंटिंग यूनिट भी है, ने दिप्रिंट को बताया कि कोयले की कमी से काम प्रभावित हो रहा है, लेकिन उद्योग स्थिति संभालने की कोशिश कर रहा है.

“हम लगभग 96 प्रतिशत आयातित कोयले पर निर्भर हैं और इसका बड़ा हिस्सा इंडोनेशिया से आता है, लेकिन चल रहे संघर्ष के कारण सप्लाई कम हो रही है क्योंकि देश अपने संसाधन रोक रहे हैं. गुजरात में घरेलू कोयला उपलब्ध है, लेकिन उसकी गुणवत्ता कम है, इसलिए हम अभी भारतीय और इंडोनेशियाई कोयले का 50–50 मिश्रण इस्तेमाल कर रहे हैं. चुनौतियों के बावजूद हमारे कामगार प्रभावित नहीं हुए हैं. हमने पहले भी संकट झेले हैं और हमें भरोसा है कि इस बार भी संभल जाएंगे.”

उद्योग से जुड़े लोगों का कहना है कि गुजरात में घरेलू कोयला उपलब्ध है, लेकिन उसकी गुणवत्ता कम है, इसलिए अभी भारतीय और इंडोनेशियाई कोयले का 50–50 मिश्रण इस्तेमाल किया जा रहा है | फोटो: ईशा मिश्रा/दिप्रिंट
उद्योग से जुड़े लोगों का कहना है कि गुजरात में घरेलू कोयला उपलब्ध है, लेकिन उसकी गुणवत्ता कम है, इसलिए अभी भारतीय और इंडोनेशियाई कोयले का 50–50 मिश्रण इस्तेमाल किया जा रहा है | फोटो: ईशा मिश्रा/दिप्रिंट

हालांकि, पूरे उद्योग में भुगतान का संकट उभर रहा है. युद्ध के कारण भुगतान चक्र प्रभावित हुआ है और बड़ी मात्रा में भुगतान दुबई जैसे केंद्रों में अटका हुआ है. चल रहे संघर्ष के बीच खरीद क्षमता पर भी असर पड़ा है.

फेडरेशन ऑफ सूरत टेक्सटाइल ट्रेडर्स एसोसिएशन के कैलाश हकीम ने दिप्रिंट को बताया कि उद्योग पर कई तरह के दबाव के कारण खरीदारों की भुगतान क्षमता कम हो गई है.

उन्होंने कहा, “जब भी कोई संकट आता है, कच्चे माल की कीमतें बढ़ जाती हैं, आयात-निर्यात प्रभावित होता है और खरीद क्षमता कम हो जाती है. युद्ध का मानसिक असर भी होता है, जिससे लोग खर्च रोककर जरूरी चीजों पर ज्यादा पैसा खर्च करते हैं. यह दोहरी मार है कच्चे माल की कीमत बढ़ रही है, व्यापार के रास्ते बंद हैं और हमारे पुराने ग्राहक भी खरीदारी नहीं कर रहे.”

उद्योग से जुड़े लोगों का कहना है कि फिलहाल उद्योग किसी तरह चल रहा है, लेकिन भविष्य में यूनिट बंद होने और नौकरियां जाने का खतरा बना हुआ है | फोटो: ईशा मिश्रा/दिप्रिंट
उद्योग से जुड़े लोगों का कहना है कि फिलहाल उद्योग किसी तरह चल रहा है, लेकिन भविष्य में यूनिट बंद होने और नौकरियां जाने का खतरा बना हुआ है | फोटो: ईशा मिश्रा/दिप्रिंट

उद्योग से जुड़े लोगों का कहना है कि फिलहाल ज्यादातर यूनिट किसी तरह चल रही हैं, लेकिन भविष्य में बंद होने और नौकरियां जाने का खतरा बना हुआ है. यह सेक्टर करीब 15 लाख लोगों को रोजगार देता है और कई महिलाओं को घर से काम कर स्थायी आय का मौका देता है.

मजदूरों का संकट

सूरत के उधना जंक्शन पर पिछले एक हफ्ते से बाहर जाने वाले मजदूरों की संख्या बढ़ रही है. इनमें ज्यादातर उत्तर प्रदेश, बिहार, ओडिशा और झारखंड के मजदूर हैं, जो ट्रेन से अपने घर लौट रहे हैं.

उत्तर प्रदेश के मऊ के दिहाड़ी मजदूर लोकेश कुमार ने कहा, “हम रोज 500 रुपये कमाते हैं और गैस सप्लायर एक किलो गैस के 700 रुपये मांग रहे हैं. हम यह कैसे खरीदें? अपने बच्चों को कैसे खिलाएं?”

लेबर कॉन्ट्रैक्टर उमेश जादूगर का अनुमान है कि करीब 60 प्रतिशत मजदूर पहले ही जा चुके हैं और जिनके पास घर लौटने का विकल्प है, वे भी जल्द चले जाएंगे.

दुबई के रास्ते तैयार माल के निर्यात पर भी असर पड़ा है | फोटो: ईशा मिश्रा/दिप्रिंट
दुबई के रास्ते तैयार माल के निर्यात पर भी असर पड़ा है | फोटो: ईशा मिश्रा/दिप्रिंट

LPG सिलेंडर की कमी के कारण दिहाड़ी मजदूरों और उनके परिवारों के लिए गुजारा करना मुश्किल हो गया है. उनका आरोप है कि संकट के दौरान स्थानीय गैस सप्लायर परेशान कर रहे हैं और कीमत 7 से 10 गुना तक बढ़ा रहे हैं.

दिप्रिंट ने सूरत के कापोद्रा इलाके के कई टेक्सटाइल मजदूरों की कॉलोनियों का दौरा किया, जहां अब घर खाली होने लगे हैं, करीब 10 में से 6 घरों पर ताले लगे हैं. जो परिवार रुके हुए हैं, उन्हें खाना बनाने के लिए पारंपरिक चूल्हों का सहारा लेना पड़ रहा है.

जो रसोई पहले गैस पर चलती थी, अब सड़कों पर आ गई है. महिलाएं घंटों लकड़ी इकट्ठा कर खाना बनाने को मजबूर हैं, जिससे गुस्सा भी बढ़ रहा है.

कॉलोनी की महिलाओं ने कहा, “अब हमें खाना बनाने के लिए लकड़ी इकट्ठा करनी पड़ती है. हमने यहां चूल्हा बनाया है और बारी-बारी से इस्तेमाल करते हैं, क्योंकि हमारे घर इतने छोटे हैं कि धुआं सहन नहीं कर सकते.”

सूरत में रह गए परिवारों में निराशा बढ़ रही है.

कापोद्रा में पिछले 40 साल से रह रहीं 67 साल की कमला देवी ने कहा, “यह हमारा घर है, हम कहीं नहीं जा सकते. सरकार गैस की कीमत तय क्यों नहीं करती? क्या हमें सिर्फ चुनाव के समय याद किया जाता है? हमें अभी मदद चाहिए. इन गैस सप्लायर्स पर कार्रवाई क्यों नहीं हो रही?”

उद्योग से जुड़े लोगों का कहना है कि यह अब सिर्फ आर्थिक मंदी नहीं, बल्कि मानवीय संकट बनता जा रहा है, क्योंकि मजदूर सामान बांधकर जा रहे हैं.

दिहाड़ी मजदूर उमेश ने दिप्रिंट से कहा कि स्थिति कब सुधरेगी, इसका कोई अंदाज़ा नहीं है और मजदूरों में डर बढ़ रहा है.

उन्होंने कहा, “हम बहुत कम कमाते हैं. हम गैस खरीद नहीं पा रहे. अगर आने वाले दिनों में सब्जियों और रोज़मर्रा की चीज़ों के दाम भी बढ़ गए तो हम कैसे जिएंगे? हमारे बच्चों का क्या होगा?”

फेडरेशन ऑफ सूरत टेक्सटाइल ट्रेडर्स एसोसिएशन के कैलाश हकीम ने मजदूरों के बीच बढ़ रहे डर को समझाया.

उन्होंने कहा, “मजदूर समूह में काम करते हैं, अगर एक को समस्या होती है तो बाकी लोग भी डर जाते हैं और धीरे-धीरे बड़ी संख्या में लोग चले जाते हैं. पहले से ही 15 प्रतिशत मजदूरों की कमी है और अब LPG संकट से स्थिति और बिगड़ रही है.”

उद्योग से जुड़े लोगों का कहना है कि यह अब सिर्फ आर्थिक मंदी नहीं, बल्कि मानवीय संकट बन गया है, क्योंकि मजदूर सामान बांधकर जा रहे हैं | फोटो: ईशा मिश्रा/दिप्रिंट
उद्योग से जुड़े लोगों का कहना है कि यह अब सिर्फ आर्थिक मंदी नहीं, बल्कि मानवीय संकट बन गया है, क्योंकि मजदूर सामान बांधकर जा रहे हैं | फोटो: ईशा मिश्रा/दिप्रिंट

संकट कम करने और मजदूरों को शहर छोड़ने से रोकने के लिए उद्योगपतियों ने कम कीमत पर भोजन उपलब्ध कराने के लिए कम्युनिटी किचन शुरू किए हैं.

साउथ गुजरात टेक्सटाइल प्रोसेसर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष जीतू वाखारिया ने कहा कि वे पिछले एक साल से सूरत के पांडेसरा इलाके में कम्युनिटी किचन चला रहे हैं, जहां पहले करीब 1,000 लोगों को खाना मिलता था, जो अब बढ़कर लगभग 5,000 लोगों तक पहुंच गया है.

उन्होंने कहा, “मजदूर अभी LPG खरीदने में सक्षम नहीं हैं और नियमित रूप से खाना नहीं बना पा रहे हैं, इसलिए हम उन्हें दाल, रोटी, सब्जी और चावल सहित पूरा और अच्छा खाना देते हैं. कुछ मजदूर दोपहर और रात दोनों समय का खाना यहीं से लेते हैं. फैक्ट्री मालिक भी अपने मजदूरों के लिए यहां से खाना लेते हैं.”

फिलहाल सूरत के करघे बढ़ती लागत के बावजूद चल रहे हैं, लेकिन जिस आधार पर यह उद्योग टिका है, वह कमजोर पड़ने लगा है. संकट अब सिर्फ फैक्ट्रियों तक सीमित नहीं है, बल्कि घरों तक पहुंच गया है. अगर यह संघर्ष जारी रहता है, तो यह स्पष्ट नहीं है कि भारत की टेक्सटाइल राजधानी खुद को कैसे संभाल पाएगी.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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