नयी दिल्ली, 21 मार्च (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने मोबाइल फोन पर बनाए गए वीडियो को तुरंत सोशल मीडिया पर अपलोड करने के चलन पर चिंता व्यक्त की है और कहा है कि ऐसी गतिविधियां निष्पक्ष सुनवाई के लिए गंभीर खतरा पैदा करती हैं।
यह टिप्पणी प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम पंचोली की पीठ ने शुक्रवार को की।
पीठ एक जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही थी जिसमें आरोप लगाया गया था कि पुलिस आरोपियों के वीडियो तथा तस्वीरें सोशल मीडिया पर अपलोड करती है और लोगों को पूर्वाग्रह बनाने को प्रेरित करती है।
जनहित याचिका में कहा गया कि न्यायालय एक अन्य मामले में पहले ही राज्यों को पुलिस की प्रेसवार्ता के लिए दिशानिर्देश तैयार करने को कह चुका है, जिसमें सोशल मीडिया पोस्ट भी शामिल होंगे।
पीठ ने याचिकाकर्ता हेमेंद्र पटेल को दिशा-निर्देशों से संबंधित परिणाम की प्रतीक्षा करने का सुझाव दिया और पटेल की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन की इस बात से सहमति व्यक्त की कि आजकल मोबाइल फोन रखने वाला हर व्यक्ति मीडिया कर्मी बन गया है।
वरिष्ठ अधिवक्ता ने पुलिस द्वारा आरोपियों को हथकड़ी पहनाए जाने, रस्सियों से बांधे जाने, जुलूस निकालने, घुटने टेकने के लिए मजबूर किए जाने आदि की तस्वीरें सोशल मीडिया पर पोस्ट करने की हालिया प्रवृत्ति पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि यह व्यक्तिगत गरिमा का अपमान करने के अलावा, जनता के पूर्वाग्रह को भी बढ़ाती है।
न्यायमूर्ति बागची ने शंकरनारायणन से कहा कि पुलिस की बात करने के बजाय उन्हें पुलिस, पारंपरिक और सोशल मीडिया के लिए एक व्यापक तंत्र की मांग करनी चाहिए।
पुलिस प्रेसवार्ता के संबंध में मानक संचालन प्रक्रिया तैयार करने के लिए तीन महीने का समय दिया गया है।
न्यायाधीश ने कहा कि व्यापक परिप्रेक्ष्य में, अदालत का मानना है कि पुलिस को प्रेसवार्ता के माध्यम से आरोपी के खिलाफ पूर्वाग्रह पैदा नहीं करना चाहिए।
न्यायमूर्ति बागची ने कहा, ‘‘मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) के माध्यम से पुलिस को नियंत्रित किया जा सकता है। लेकिन मीडिया, विशेषकर सोशल मीडिया और जनता के बारे में क्या? क्या उन्हें नियंत्रित किया जा सकता है? तुलनात्मक रूप से, टीवी चैनल कहीं अधिक संयमित हैं, भले ही कोई उनके विचारों से असहमत हो।’’
उन्होंने कहा कि वर्तमान मुद्दे पर याचिका में उठाए गए तात्कालिक प्रश्न से परे व्यापक विचार-विमर्श की आवश्यकता हो सकती है।
न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि चिंता का विषय यह है कि पुलिस अधिकारी प्रेसवार्ता के दौरान अति सक्रिय हो जाते हैं और लंबित आपराधिक मामलों में ‘मीडिया ट्रायल’ का खतरा बढ़ रहा है।
उन्होंने कहा, ‘‘सच्चाई का पता लगाने के लिए स्वतंत्र जांच करना जांच एजेंसी का कर्तव्य है। संतुलन बनाए रखने के लिए यह नियमावली एक बहुत ही सकारात्मक कदम है। यह नियमावली पुलिस को ऐसे अति उत्साही बयान देने से रोकेगी जिनसे उन मामलों के संबंध में निष्कर्ष निकाला जा सकता है जिनका न्यायोचित और निष्पक्ष तरीके से निर्णय होना चाहिए।’’
न्यायमूर्ति बागची ने कहा, ‘‘हालांकि, तब क्या जब इस तरह का प्रयास, पुलिस पर लगाम लगाने के बावजूद, तीसरे पक्ष की दखलंदाजी से पैदा हुए संदूषण या दूषित वातावरण को दूर करने में सक्षम नहीं होता, जहां मीडिया के कुछ वर्ग दोनों तरफ से कहानियां गढ़ते रहते हैं, जिसके परिणामस्वरूप ‘मीडिया ट्रायल’ होता है जो कानून के शासन को पूरी तरह से कमजोर कर देता है।’’
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि सोशल मीडिया पर ऐसे ‘टैब्लॉयड’ मौजूद हैं जो ‘‘ब्लैकमेलर’’ की तरह काम करते हैं।
उन्होंने कहा, ‘‘कुछ ऐसे मंच हैं जो केवल वर्चुअल रूप से मौजूद हैं, जो ‘ब्लैकमेलर’ का काम करते हैं। ब्लैकमेल करना तो बहुत हल्का शब्द है।’’
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा, ‘‘यह डिजिटल गिरफ्तारी के समान या उससे भिन्न रूप है। राष्ट्रीय राजधानी से दूर कस्बों और शहरों में यह प्रवृत्ति देखी जा रही है कि लोग मीडियाकर्मी होने का दावा करते हैं और अपने गुप्त इरादों के लिए इसे अपने वाहनों पर खुलेआम प्रदर्शित करते हैं।’’
शंकरनारायणन ने पीठ को बताया कि वह कुछ ऐसे वकीलों को जानते हैं जो राजमार्गों पर ‘टोल टैक्स’ से बचने के लिए अपनी कारों पर ‘सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट’ के स्टिकर लगाते हैं।
पीठ ने सुझाव दिया कि चूंकि निष्पक्ष सुनवाई के मुद्दे पर एक व्यापक दृष्टिकोण की आवश्यकता है, इसलिए बेहतर होगा कि याचिका वापस ले ली जाए और अप्रैल के बाद विस्तारित दायरे के साथ फिर से दायर की जाए, जब पुलिस के लिए दिशानिर्देश या मानक प्रक्रिया (एसओपी) लागू हो जाएगी।
न्यायालय के सुझाव को मानते हुए, शंकरनारायणन ने मामला वापस लेने पर सहमति जताई।
भाषा नेत्रपाल धीरज
धीरज
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