नई दिल्ली: मार्च 2002 में, बीजू जनता दल (बीजेडी) के पूर्व नेता दिलीप रे ने कई लोगों को चौंका दिया था, जब वे राज्यसभा चुनाव में निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में जीत गए थे. उन्हें 15 बीजेपी और 6 भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) विधायकों के क्रॉस वोटिंग का फायदा मिला था. उनकी इस जीत से उस समय ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक को बड़ा झटका लगा था.
24 साल बाद, इस हफ्ते की शुरुआत में होटल कारोबारी से नेता बने दिलीप रे ने फिर ऐसा ही किया, इस बार कांग्रेस और बीजेडी के क्रॉस वोटिंग की मदद से.
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में उनकी जीत एक बार फिर “कमजोर होती बीजेडी” को दिखाती है. उनका कहना है कि 24 साल बाद रे ने अपने पुराने सहयोगी—बीजू जनता दल के नेता नवीन पटनायक को फिर झटका दिया है.
कभी नवीन पटनायक के करीबी माने जाने वाले रे ने 1997 में बीजेडी के गठन में अहम भूमिका निभाई थी. नवीन पटनायक के पिता बीजू पटनायक के भी करीबी माने जाने वाले रे के बारे में पार्टी के अंदरूनी सूत्र बताते हैं कि उन्होंने बीजू पटनायक के जीवन के आखिरी वर्षों में उनकी देखभाल की थी.
एक वरिष्ठ बीजेडी नेता ने कहा, “बीजू पटनायक की बीमारी के दौरान उन्होंने दिल्ली स्थित अपने घर पर उनकी देखभाल की थी. दरअसल, बीजू पटनायक का निधन उनके घर पर ही हुआ था. बीजू पटनायक उन पर बहुत भरोसा करते थे. राज्य में और बीजू पटनायक के समर्थकों के बीच उनकी काफी प्रतिष्ठा है.”
पूर्व केंद्रीय मंत्री 1996 से लगातार दो बार राज्यसभा सदस्य रहे. 2002 में जब पार्टी ने उन्हें राज्यसभा चुनाव लड़ने के लिए टिकट नहीं दिया, तो उन्होंने निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में नामांकन दाखिल किया. इसके बाद बीजेडी ने उन्हें पार्टी से निकाल दिया, जब उन्होंने ‘नवीन पटनायक हटाओ’ अभियान शुरू किया, लेकिन बाद में बीजेपी के समर्थन से उन्होंने फिर राज्यसभा का चुनाव लड़ा.
MAYFAIR Hotels & Resorts के संस्थापक और मालिक रे कुछ समय के लिए बीजेपी में भी रहे. उन्होंने 2009 में पार्टी जॉइन की और 2014 में BJP के टिकट पर राउरकेला विधानसभा सीट जीती.
सोमवार को उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, बीजेपी अध्यक्ष नितिन नवीन, ओडिशा के मुख्यमंत्री चरण माझी और अन्य लोगों को उनके “समर्थन और विश्वास” के लिए धन्यवाद दिया.
उन्होंने एक्स पर लिखा, “मैं बेहद विनम्र और आभारी हूं. ओडिशा से राज्यसभा चुनाव में आज की जीत सिर्फ मेरी नहीं है—यह विभिन्न राजनीतिक दलों के विधायकों द्वारा दिखाए गए विश्वास और समर्थन को दर्शाती है. मैं भारतीय जनता पार्टी के माननीय विधायकों का उनके मजबूत समर्थन के लिए धन्यवाद देता हूं. मैं बीजेडी, कांग्रेस और निर्दलीय विधायकों का भी आभारी हूं, जिन्होंने मुझे समर्थन दिया.”
जहां 2002 में सत्तारूढ़ बीजेडी के क्रॉस वोटिंग ने अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में पूर्व केंद्रीय मंत्री को राज्यसभा में दोबारा पहुंचने में मदद की थी, वहीं इस बार कांग्रेस और बीजेडी से मदद मिली.
2002 में कांग्रेस ने मॉरिस कुजूर को उम्मीदवार बनाया था, जो आखिरकार हार गए. उस समय मीडिया रिपोर्ट्स ने रे की जीत को “नवीन पटनायक के लिए बड़ा झटका” बताया था और कहा था कि पटनायक ने उनकी उम्मीदवारी रोकने की पूरी कोशिश की थी.
ट्रेन यात्रा
वरिष्ठ पत्रकार रूबेन बनर्जी, जिन्होंने ‘Naveen Patnaik’ किताब लिखी है, उन्होंने कहा, “जब नवीन ने बीजेडी प्रमुख के रूप में अपनी स्थिति मजबूत करनी शुरू की, तो उन्होंने अपने संभावित प्रतिद्वंद्वियों को हटाना शुरू किया और जल्द ही दिलीप पर भी कार्रवाई हुई. नवीन ने वाजपेयी से उन्हें केंद्रीय मंत्रिमंडल से हटवाया. 2002 में कुछ क्रॉस वोटिंग की वजह से वे निर्दलीय राज्यसभा सदस्य बनने में सफल रहे.”
1985 में राउरकेला नोटिफाइड काउंसिल के चेयरमैन के रूप में अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत करने वाले रे 1985 में राउरकेला से विधायक चुने गए थे. 1990 में वे फिर जीते और 1990 से 1995 के बीच बीजू पटनायक के नेतृत्व वाली जनता दल सरकार में उद्योग मंत्री भी रहे.
अक्टूबर 2020 में उन्हें झटका लगा, जब 1999 के कोयला ब्लॉक आवंटन मामले में सीबीआई की अदालत ने उन्हें दोषी ठहराया. उस समय वे वाजपेयी सरकार में कोयला राज्य मंत्री थे. उन्हें तीन साल की सजा दी गई, लेकिन अप्रैल 2024 में दिल्ली हाई कोर्ट ने उनकी सज़ा पर रोक लगा दी.
बनर्जी ने बताया, “मुझे याद है कि राज्यसभा मतदान से पहले नवीन पटनायक ने उन पर नज़र रखवाई थी. वे भुवनेश्वर से दिल्ली ट्रेन से जा रहे थे और पुलिस उन पर नज़र रख रही थी. जैसे ही वे ट्रेन में बैठे और ट्रेन चल पड़ी, पुलिस वहां से चली गई. पुलिस को नहीं लगा कि दिलीप उन्हें चकमा दे देंगे—अगले स्टेशन कटक पर वे ट्रैक की तरफ से उतरकर चुपचाप वापस भुवनेश्वर लौट गए ताकि राज्यसभा के नंबर मैनेज कर सकें.”
उन्होंने कहा, “2026 का राज्यसभा चुनाव एक तरह से पहले जैसी स्थिति की याद दिलाता है. पैसे वाले और सफल होटल कारोबारी होने के अलावा ओडिशा में उनकी अच्छी छवि है, खासकर बीजू पटनायक के आखिरी दिनों में उनके योगदान की वजह से. वे आमतौर पर शांत स्वभाव के व्यक्ति हैं, कम बोलते हैं और कोई नहीं जानता कि वे क्या योजना बना रहे हैं.”
कोयला आवंटन मामले में सीबीआई ने शुरू में झारखंड के गिरिडीह जिले में 105.153 हेक्टेयर गैर-राष्ट्रीयकृत, छोड़ी गई कोयला खदान के आवंटन को लेकर प्रारंभिक जांच की थी.
बाद में सीबीआई ने रे और पांच अन्य आरोपियों पर भारतीय दंड संहिता की धारा 120-B (आपराधिक साजिश) और धारा 420 (धोखाधड़ी) के तहत तथा भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के प्रावधानों के तहत आरोप लगाए. रे ने 2024 में ओडिशा चुनाव लड़ने की इच्छा के आधार पर अपनी सजा पर रोक लगाने के लिए दिल्ली हाई कोर्ट का रुख किया था. उनकी सज़ा के खिलाफ अपील अभी लंबित है.
उन्होंने अदालत से कहा था कि अगर सजा जारी रहती है तो उन्हें “ऐसा नुकसान होगा जिसकी भरपाई नहीं हो सकती.” दरअसल, दो साल या उससे ज्यादा की सज़ा मिलने पर कोई भी व्यक्ति किसी भी स्तर का चुनाव नहीं लड़ सकता. हालांकि, अप्रैल 2024 में सज़ा पर रोक लगा दी गई, लेकिन जस्टिस स्वरना कांता शर्मा ने कहा कि इस आदेश का मतलब “बरी होना” नहीं है और यह सिर्फ “सजा पर रोक” है, जो मामले की “विशेष परिस्थितियों, आरोपी के लंबे राजनीतिक करियर और उम्र” को देखते हुए दिया गया है.
पूर्व राष्ट्रपति के.आर. नारायणन के विशेष कार्य अधिकारी और प्रेस सचिव रहे एस.एन. साहू ने कहा कि ओडिशा में बीजेपी सरकार के खिलाफ काफी असंतोष है, इसलिए वे ऐसा माहौल और कहानी बनाना चाहते हैं जिसमें बीजेडी उम्मीदवार की हार दिखाकर यह बताया जा सके कि पटनायक की लोकप्रियता कम हो रही है.
साहू ने कहा, “कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष भक्त चरण दास ने उम्मीदवार तय करने के लिए तारीख घोषित होने से पहले ही नवीन पटनायक से मुलाकात का समय मांगा था, लेकिन पटनायक ने समय नहीं दिया. बाद में उन्होंने एकतरफा तरीके से डॉक्टर (दत्तेश्वर होता) को चौथा साझा उम्मीदवार घोषित कर दिया और फिर कांग्रेस व बीजेपी से उन्हें वोट देने को कहा. यह बीजेडी की ओर से थोपे जाने जैसा लगा.”
उन्होंने कहा, “दिलीप रे को कोयला घोटाले में दोषी ठहराया गया था और उनकी सज़ा पर रोक लगी है. माना जा रहा था कि उन्हें कांग्रेस का समर्थन नहीं मिलेगा. रे की वापसी उनके राजनीतिक करियर के लिए और बीजेपी के लिए भी फायदेमंद है, क्योंकि वह यह दिखाना चाहती है कि उसकी चुनावी रणनीति के सामने पटनायक सफल नहीं हो पाएंगे. बीजेपी यह संदेश देना चाहती है कि पटनायक लोकप्रिय हो सकते हैं, लोग उनका सम्मान करते हों, लेकिन वे उसकी रणनीति का मुकाबला नहीं कर सकते.”
पूर्व सिविल सेवक ने कहा कि बीजेपी सरकार के खिलाफ काफी असंतोष है और वह ऐसा माहौल बनाना चाहती है जिससे बीजेडी उम्मीदवार की हार दिखे और पटनायक की लोकप्रियता घटती नजर आए.
साहू ने कहा, “नवीन पटनायक अभी भी लोगों के बीच लोकप्रिय हैं और बीजेपी तथा सरकार की ऐसी रणनीतियों से उनकी छवि पर कोई असर नहीं पड़ा है.”
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