ममता बनर्जी की सबसे बड़ी ताकत उनकी सड़क पर लड़ने वाली शैली रही है, शासन नहीं. 2011 में उन्होंने पहली बार पश्चिम बंगाल जीता था, जब उन्होंने लेफ्ट फ्रंट को हराया. उस समय सड़कों पर लेफ्ट का दबदबा था, लेकिन ममता ने कानून-व्यवस्था की मशीनरी और लेफ्ट के गुंडों से बार-बार सीधे टकराव करके बढ़त बनाई. एक महिला होने के कारण और सड़कों पर जान जोखिम में डालने की उनकी तैयारी की वजह से, लेफ्ट फ्रंट के लिए उनसे भिड़ना आसान नहीं था. इससे 2011 में, कई पिछली चुनावी हारों के बाद, उन्हें साफ मनोवैज्ञानिक बढ़त मिली.
2021 में बीजेपी ने घातक गलती की थी. उसने ममता पर निजी हमला किया और हिंदी पट्टी वाला आक्रामक अंदाज़ अपनाया. इससे ममता को आसान जीत मिल गई, क्योंकि उन्हें भारी अल्पसंख्यक वोट मिला, जो मतदाताओं का करीब 30 फीसदी है और हिंदू वोट भी उनके प्रतिद्वंद्वी के पीछे पूरी तरह एकजुट नहीं हुआ.
इस बार तस्वीर अलग हो सकती है. ऐसा नहीं है कि बीजेपी की जीत तय है, बिलकुल नहीं, लेकिन वह अपने पक्ष में माहौल ज़रूर बना रही है. चुनाव से पहले हुए शुरुआती सर्वे में, IANS-Matrize ने ममता की तृणमूल कांग्रेस को साफ बढ़त दिखाई है, जिसमें 294-सदस्यीय पश्चिम बंगाल विधानसभा में 155-170 सीटें मिलने का अनुमान है. बीजेपी 100-115 सीटों के साथ दूसरे नंबर पर है. 2021 में बीजेपी ने सिर्फ 77 सीटें जीती थीं. बाकी पार्टियां लगभग खाली हाथ रहीं.
इस बार क्या अलग है? बहुत कुछ.
पहली बात, टेनिस की भाषा में जिसे बिना किसी दबाव की गलती कहा जाता है, ममता बनर्जी पिछले कुछ महीनों से सड़क पर गलत लड़ाई लड़ रही हैं: चुनाव आयोग के खिलाफ. चाहे वह मतदाता सूची का स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन हो, जो तमिलनाडु, केरल और बिहार समेत कई राज्यों में बिना किसी बड़ी परेशानी के हो गया, या फिर I-PAC, यानी इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमेटी, जिस पर प्रवर्तन निदेशालय ने छापा मारा—ममता ने हर मामले में खुली भिड़ंत का रास्ता चुना. छापे के बीच वह खुद पहुंच गईं और कुछ लैपटॉप भी साथ ले गईं, जिनमें महत्वपूर्ण डेटा हो सकता था.
अब ईडी गुस्से में है और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री को रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट की मदद मांग रही है. कोर्ट भी उनके इस व्यवहार से खुश नहीं है. जब उन्होंने SIR से जुड़े एक मामले में वकील की तरह पेशी दी, तब भी अदालत संतुष्ट नहीं थी. सुप्रीम कोर्ट ने कुछ सुरक्षा उपायों के साथ SIR की अनुमति दी है. यहां असली गलती यह है: ममता बनर्जी ने पिछले कई महीने बीजेपी से लड़ने के बजाय चुनाव आयोग से लड़ने में लगा दिए. उनकी पार्टी ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग तक कर दी. चाहे आप मानें या नहीं कि आयोग ने सभी दलों के साथ बराबरी का व्यवहार किया, लेकिन यह वह लड़ाई नहीं थी जिसे ममता को हर हाल में जीतना था. उन्होंने वह समय बर्बाद किया, जिसे वह अपने मतदाताओं को साथ रखने में लगा सकती थीं. लगातार 15 साल की सत्ता के बाद अब उन्हें सत्ता विरोधी माहौल का सामना करना पड़ सकता है, खासकर तब जब पश्चिम बंगाल निवेशकों को आकर्षित करने में खास कामयाब नहीं रहा, जो नौकरियां ला सकते थे.
दूसरी बात, पिछली बार के उलट, बीजेपी ने अभी तक कोई बड़ी गलती नहीं की है. उसने ममता पर निजी हमला करने के बजाय तृणमूल के शासन को निशाना बनाया है. इसमें वह उगाही पर आधारित राजनीतिक व्यवस्था भी शामिल है, जिससे आम बंगाली बहुत नाराज़ रहता है. तृणमूल के शासन के लिए एक तंज भरा शब्द इस्तेमाल होता है—“तोलामूल”. यह “तृणमूल” से मिलता-जुलता शब्द है और रिश्वत तथा वसूली की व्यवस्था की तरफ इशारा करता है.
तीसरी बात, ममता पर व्यक्तिगत हमला करने के बजाय बीजेपी ने इस बार अपनी सबसे मजबूत नेता सुवेंदु अधिकारी को मैदान में उतारकर उन्हें घेरने की कोशिश की है. 2021 में सुवेंदु ने ममता को उनके पुराने राजनीतिक गढ़ नंदीग्राम में हराया था. इस बार वह उन्हें कोलकाता के उनके घरेलू गढ़ भवानीपुर में चुनौती दे रहे हैं. यह वही रणनीति है, जिसकी शुरुआत अरविंद केजरीवाल ने की थी, जब उन्होंने नई दिल्ली सीट पर शीला दीक्षित को चुनौती दी और 2015 में उन्हें हरा दिया. बीजेपी ने 10 साल बाद उनके खिलाफ भी यही किया, जब उसने केजरीवाल के सामने अपना सबसे मजबूत उम्मीदवार प्रवेश वर्मा उतारा और उन्हें हरा दिया. बीजेपी ने सुवेंदु को भवानीपुर से उतारकर ममता को मजबूर किया है कि वह दूसरी सीटों पर अपने उम्मीदवारों के लिए प्रचार करने के बजाय अपनी सीट बचाने में ज्यादा समय लगाएं. सुवेंदु नंदीग्राम से भी चुनाव लड़ रहे हैं और अगर वह कहीं से भी जीतते हैं, और बीजेपी बहुमत पार कर जाती है, तो मुख्यमंत्री पद के लिए सबसे आगे वही होंगे.
चौथी बात, कोलकाता के बीचोंबीच, जो तृणमूल का गढ़ माना जाता है, वहां से अधिकारी की उम्मीदवारी वोटरों, खासकर भद्रलोक, को यह मजबूत संदेश देती है कि अब उनके पास तृणमूल का एक व्यवहारिक विकल्प मौजूद है. अगर बीजेपी इस किले में सेंध लगा पाती है, तो वह इस बढ़त को उत्तर और दक्षिण 24 परगना के आसपास के इलाकों तक ले जा सकती है. SIR अभ्यास के बाद भवानीपुर में 47,000 से ज्यादा नाम हटाए गए हैं. इनमें से कुछ नाम अपील प्रक्रिया के बाद वापस जुड़ सकते हैं, लेकिन यह तथ्य कि कई वोटरों को आखिरी समय तक अपने नाम जुड़वाने का इंतजार करना पड़ेगा, अपने आप में एक हल्का लेकिन असरदार संदेश देता है: ममता इस प्रक्रिया को रोक नहीं सकीं, और आगे शायद उनकी पकड़ पहले जैसी न रहे. 2021 जैसी ताकत अब उनके पास नहीं दिखती.
पांचवीं बात, इस समय रफ्तार बीजेपी के साथ है, तृणमूल के साथ नहीं. फिलहाल उपलब्ध एकमात्र Matrize-IANS सर्वे बीजेपी को 41-43 फीसदी वोट शेयर और तृणमूल को 43-45 फीसदी वोट शेयर देता है, जबकि बाकी दलों को 13-15 फीसदी. इतनी करीबी लड़ाई में, जहां आखिरी मुकाबला दो मुख्य दलों के बीच सीधा बन जाए, बीजेपी को बहुमत तक पहुंचने के लिए “बाकी” वोटों या तृणमूल से सिर्फ 2-3 फीसदी झुकाव की जरूरत होगी. पूरी तरह पक्का वोट अगर मानें, तो वह अल्पसंख्यक वोट और हिंदू वोट का एक हिस्सा है. ऐसे में यह लड़ाई हिंदू वोटों के बीच जीती या हारी जाएगी. सवाल यह है कि ममता हिंदू वोट का कितना हिस्सा अपने पास रख पाएंगी. अगर 70 फीसदी गैर-अल्पसंख्यक वोट में से 45 फीसदी बीजेपी की तरफ चला गया, तो तृणमूल की हालत खराब हो जाएगी. पश्चिम बंगाल का चुनाव 2004 के आम चुनाव जैसा लगता है, जहां एनडीए चुनाव तारीख तक ओपिनियन पोल में आगे था, लेकिन आखिर में उसने अनिर्णीत वोट खो दिए. तृणमूल आज कुछ वैसी ही स्थिति में है, जहां डर के माहौल की वजह से दिदी का वोट शेयर शायद बढ़ा-चढ़ाकर दिख रहा हो, क्योंकि कुछ वोटर खुलकर यह नहीं कहना चाहते कि वे बीजेपी को वोट देंगे.
छठी बात, 2021 में बहु-चरणीय चुनाव कराने वाला चुनाव आयोग अब उस हिंसा और डराने-धमकाने को देखकर ज्यादा सतर्क है, जो मतदान और नतीजों के दौरान सामने आई थी. आयोग ने समझ लिया है कि तृणमूल से जुड़े दबंग तत्वों को अगर ज्यादा चरण मिलें, तो वे अलग-अलग चरणों के बीच ज्यादा घूमकर वोटरों को डरा सकते हैं. इस बार सिर्फ दो चरण हैं, 23 और 29 अप्रैल, और 2,300 केंद्रीय सशस्त्र पुलिसकर्मी तैनात किए जा रहे हैं. इससे इस बार वोटर को लग रहा है कि डराने की कोशिशों पर कुछ हद तक रोक रहेगी.
आखिरी बात, वोटर यह भी देख चुका है कि ममता दीदी का नाटकीय अंदाज़ चुनाव आयोग पर असर नहीं डाल पाया, और खास तौर पर सुप्रीम कोर्ट पर भी नहीं. SIR को लेकर उनकी कोई बड़ी मांग नहीं मानी गई, और जिन वोटरों के नाम छूट गए हैं, उनकी अंतिम अपील अब न्यायिक अधिकारी तय करेंगे, जिन पर दिदी राजनीतिक आरोप नहीं लगा सकतीं.
वोटर जानता है कि दिदी की जिद की वजह से ही बहुत से वोटरों के पास अपील करने के लिए बहुत कम समय बचा है, और उनकी देर कराने वाली रणनीति कामयाब नहीं हुई. वह पहले जैसी अजेय नहीं दिखतीं. और जनता यह बात समझ चुकी है.
निष्कर्ष: बीजेपी के सामने ममता बनर्जी को सत्ता से हटाने का अब तक का सबसे अच्छा मौका है. अगर वह अब रणनीतिक गलती नहीं करती, तो उसके पास जीतने की कम से कम 50 फीसदी संभावना है. जाहिर है, सिर्फ एक सर्वे से यह तय नहीं होता कि बीजेपी जीतेगी या हारेगी, लेकिन अगर वोटर को आखिरकार बदलाव की ठीक-ठाक संभावना दिखती है, तो वह उसे पकड़ सकती है. बीजेपी को अपनी तरफ से मतदाताओं को साफ बताना होगा कि वह “तोलामूल” गिरोहों और दिदी के शासन में गैर-राज्यीय ताकतवर तत्वों द्वारा राज्य मशीनरी को कमजोर करने से कैसे निपटेगी. अगर वह जीतती है, तो उसे यह भी ध्यान रखना होगा कि दिदी को मौका मिलते ही वह फिर सड़कों पर उतर सकती हैं—क्योंकि यही उनका सबसे मजबूत क्षेत्र रहा है. बीजेपी को सिर्फ 4 मई के नतीजों तक नहीं, बल्कि उसके बाद की स्थिति के बारे में भी सोचना होगा.
आर. जगन्नाथन, स्वराज्य मैगज़ीन के पूर्व संपादकीय निदेशक हैं. वह @TheJaggi हैंडल से ट्वीट करते हैं. व्यक्त विचार निजी हैं.
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