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Wednesday, 18 March, 2026
होममत-विमतमोदी की ईरान पर तीन गलतियां एक सवाल खड़ा करती हैं—स्ट्रेटेजिक ऑटोनॉमी कहां है?

मोदी की ईरान पर तीन गलतियां एक सवाल खड़ा करती हैं—स्ट्रेटेजिक ऑटोनॉमी कहां है?

अमेरिका-इज़रायल के ईरान पर हमले को लेकर पीएम मोदी के रुख में तीन ऐसी गलतियां हुईं, जिन्हें टाला जा सकता था. इनसे उनके विश्वगुरु के दावों की सच्चाई सामने आ गई.

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अमेरिका-इज़रायल के ईरान पर हमले के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कदम दिखाते हैं कि वह भारत की लंबे समय से चली आ रही “रणनीतिक स्वायत्तता” की नीति से कितने दूर चले गए हैं. पिछली सरकारों के लिए इसका मतलब था कि पश्चिमी देशों के साथ आर्थिक और सुरक्षा संबंध मजबूत किए जाएं, लेकिन रूस और ईरान जैसे देशों के साथ रणनीतिक रिश्ते भी बनाए रखें, जो अहम तकनीक और ऊर्जा सुरक्षा से जुड़े हैं.

पीएम मोदी द्वारा इस मामले को संभालने में हुई तीन ऐसी गलतियां, जिन्हें टाला जा सकता था, इसने उनके विश्वगुरु के दावों की कमजोरी दिखा दी है और भारत की ऊर्जा सुरक्षा को खतरे में डाल दिया है. ये एक समझौता कर चुके नेता के कदम लगते हैं.

पश्चिम एशिया में किसी भी भारतीय सरकार को तीन अहम हितों के बीच संतुलन बनाना होता है:

  • भारत व्यापार और निवेश के लिए अमेरिका पर निर्भर है, और हथियारों के लिए इज़राइल पर.
  • ईरान भारत को ऊर्जा देता है और दुनिया के तेल-गैस की कीमतों को प्रभावित कर सकता है, खासकर होर्मुज जलडमरूमध्य के जरिए. यह एक क्षेत्रीय ताकत भी है, जो रूस, पाकिस्तान और अफगानिस्तान से जुड़ा है.
  • खाड़ी देश भारत के लिए तेल, गैस और उर्वरक के बड़े सप्लायर हैं और बहरीन, कुवैत, कतर, सऊदी अरब और यूएई में करीब 1 करोड़ भारतीय रहते हैं.

इतनी जटिल स्थिति में भारत के लिए सही रास्ता यह होता कि वह लड़ने वाले पक्षों से बराबर दूरी बनाए रखता, ज़रूरत पड़ने पर एक ईमानदार मध्यस्थ की भूमिका निभाता और “नियम आधारित व्यवस्था” के अपने पुराने रुख पर कायम रहता, जिसने भारत को कई दशकों तक फायदा दिया है. कम से कम इसका मतलब यह होता कि इज़रायल की यात्रा टाल दी जाती और ईरान के सुप्रीम लीडर अली हुसैनी खामेनेई की हत्या पर संवेदना व्यक्त की जाती—अगर आलोचना नहीं भी करते.

तीन गलतियां

पहली, हमने अजीब तरीके से इज़रायल की तरफ झुकाव दिखाया, जब प्रधानमंत्री ने ऐसे समय में वहां यात्रा की, जब सभी को पता था कि युद्ध हो सकता है. दूसरी, खामेनेई की हत्या पर हम चुप रहे (नियमों का क्या हुआ?) और मोदी सरकार ने दुनिया भर में अपने दूतावास प्रमुखों को ईरान के शोक संदेश रजिस्टर पर हस्ताक्षर न करने का निर्देश दिया. बाद में फैसला बदला गया और कैबिनेट मंत्री की जगह विदेश सचिव को भेजा गया.

तीसरी, हमने चुपचाप अमेरिकी नौसेना द्वारा ईरान के नौसैनिक जहाज IRIS Dena को डुबोने को स्वीकार कर लिया, जबकि यह जहाज कुछ दिन पहले ही MILAN नौसैनिक अभ्यास के लिए भारत आया था.

हमने ईरान पर हमले को लेकर कुछ नहीं कहा, लेकिन संयुक्त राष्ट्र में ईरान के खाड़ी देशों पर हमलों की निंदा वाले प्रस्ताव का समर्थन किया. खाड़ी देशों से रिश्तों के कारण यह कदम समझ में आता है, लेकिन इससे ईरान पर हमले पर हमारी चुप्पी और ज्यादा साफ हो गई. अब हालत यह है कि हम ईरान से फंसे हुए भारतीय जहाजों को निकालने की अनुमति मांग रहे हैं.

कुछ विश्लेषकों ने विपक्ष की मांग—कि भारत को इस हमले पर मजबूत प्रतिक्रिया देनी चाहिए—को “जल्दबाजी” या “सैद्धांतिक शुद्धता” पाने की कोशिश बताया है, लेकिन डर के कारण चुप रहना ही एकमात्र विकल्प नहीं है. अगर “वैश्विक मंच” पर जगह लेकर भी आप चुप ही रहने वाले हैं, तो उसका क्या मतलब? पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार शिवशंकर मेनन ने कहा था, “चुप रहना रणनीतिक नहीं होता.”

मनमोहन सिंह, जिन्होंने भारत-अमेरिका संबंधों को सबसे ज्यादा मजबूत किया, उन्होंने जुलाई 2005 में अमेरिका यात्रा के दौरान साफ कहा था कि इराक पर हमला “गलती” था.

अमेरिका के प्रति झुकाव का भी भारत को ज्यादा फायदा नहीं मिला. ट्रंप सरकार ने भारत के कृषि बाजार खोलने के बाद ही टैरिफ में थोड़ी राहत दी—वह भी ज़रूरी नहीं थी, क्योंकि अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने दो हफ्ते बाद ही उन टैरिफ को खत्म कर दिया. अमेरिका ने नई दिल्ली में कहा कि वह भारत की निर्यात क्षमता पर रोक लगाएगा और “इज़ाज़त” देगा कि भारत 30 दिनों तक रूसी तेल खरीद सके. वहीं, ट्रंप ने कई बार कहा कि उन्होंने ऑपरेशन सिंदूर खत्म कराया और पाकिस्तान के सेना प्रमुख आसिम मुनीर को व्हाइट हाउस में लंच के लिए बुलाया.

अब सवाल है—आगे क्या? हालात अपने हिसाब से आगे बढ़ेंगे और भारत सिर्फ यही उम्मीद कर सकता है कि ऊर्जा बाजार में ज्यादा उथल-पुथल न हो. ईरान अमेरिका को ज्यादा से ज्यादा नुकसान पहुंचाना चाहता है और इसका असर भारत पर भी पड़ेगा. सरकार के पास ईरान से बातचीत करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है ताकि नुकसान कम किया जा सके.

मोदी ने उस युद्ध को रोकने की कोशिश भी नहीं की, जो भारत की अर्थव्यवस्था और उनकी राजनीतिक स्थिति को नुकसान पहुंचा सकता है. इतिहास से सीख मिलती है—1973 का तेल संकट भारत में राजनीतिक उथल-पुथल का कारण बना, जिसने आपातकाल की स्थिति पैदा की. 1979 का तेल संकट भारत में जनता सरकार और अमेरिका में जिमी कार्टर की हार का कारण बना.

एक राजनीतिक नेता के तौर पर मोदी के लिए ज़रूरी है कि वह भारत की अर्थव्यवस्था और अपनी राजनीतिक स्थिति को तेल संकट से बचाएं. लेकिन अमेरिका और इज़राइल की तरफ झुकाव दिखाना यह बताता है कि वह अपने और देश के हितों के खिलाफ काम कर रहे हैं. सवाल अभी भी बना हुआ है—वह किसके हित में काम कर रहे हैं?

लेखक अमिताभ दुबे कांग्रेस के सदस्य है. व्यक्त विचार निजी हैं. उनका एक्स हैंडल @dubeyamitabh है.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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