लखनऊ: उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में डॉ. नीरज राय की ग्राउंड फ्लोर लैब किसी इंडियाना जोन्स के सपने जैसी लगती है: 4,000 साल पुराने सिंधु घाटी सभ्यता के अवशेष, उत्तर प्रदेश के 10,000 साल पुराने मेसोलिथिक साइट्स और यहां तक कि 800 साल पुराने अहोम साम्राज्य के दफन स्थल—सब यहां जांच के लिए लाए गए हैं, लेकिन राय कोई पुरातत्वविद नहीं हैं. लखनऊ के बीरबल साहनी इंस्टीट्यूट ऑफ पेलियोसाइंसेज (BSIP) में उनकी टीम भारत के ऐतिहासिक स्थलों से मिले मानव अवशेषों का और भी गहराई से—सचमुच और रूपक दोनों तरह से विश्लेषण करती है.
वे डीएनए के जरिए, एक-एक स्ट्रैंड से भारत का मानव इतिहास फिर से बना रहे हैं.
यह दक्षिण एशिया की इकलौती लैब है जो प्राचीन हड्डियों से डीएनए निकालकर उसका अध्ययन कर सकती है और उनका मिशन है उपमहाद्वीप का इतिहास समझना.
BSIP में साइंटिस्ट E और प्राचीन डीएनए लैब के लीड रिसर्चर राय ने कहा, “भारत दुनिया के सबसे ज्यादा जेनेटिक विविधता वाले देशों में से एक है, यह बात काफी समय से पता है. लेकिन यह विविधता कहां से और कैसे आई?”
लखनऊ की 8 साल पुरानी प्राचीन डीएनए लैब भारत के प्राचीन जीनोम अध्ययन के बढ़ते क्षेत्र में अहम योगदान दे रही है. BSIP के वैज्ञानिकों का काम गुजरात के वडनगर में मिले 2,000 साल पुराने कंकालों में ताजिकिस्तान की वंशावली खोजने से लेकर लद्दाख की आज की आबादी के तिब्बती, दक्षिण एशियाई और मध्य एशियाई मूल को समझाने तक फैला हुआ है. उनके एडवांस जीनोम सीक्वेंसिंग काम ने भारत की राज्य सरकारों का भी ध्यान खींचा है और पिछले दो सालों में BSIP ने असम, महाराष्ट्र और गुजरात के साथ समझौते (MoUs) किए हैं ताकि राज्यों के कुछ अहम पुरातात्विक स्थलों पर और रिसर्च की जा सके. असम के अहोम राजाओं के जेनेटिक इतिहास से लेकर यूपी के प्रतापगढ़ के निओलिथिक बस्तियों तक, ये MoUs राज्यों के लिए जेनेटिक पहचान और निरंतरता खोजने जैसा है.

इस लैब ने कश्मीर पर पहली बार प्राचीन जीनोमिक स्टडी जैसी उपलब्धियां हासिल की हैं, जिसमें श्रीनगर के पास बुर्जहोम से मिले 5,000 साल पुराने हड्डियों का इस्तेमाल किया गया और यह काम आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के साथ मिलकर किया गया, लेकिन राय का बड़ा प्रोजेक्ट, जो भारत के अलग-अलग समय और जगहों पर उनके डीएनए रिसर्च का नतीजा है, एक सवाल का जवाब ढूंढना चाहता है—क्या आर्य माइग्रेशन थ्योरी सही है?
डीएनए के जरिए वे समझना चाहते हैं कि सेंट्रल स्टेपी के चरवाहे, जिन्हें आम भाषा में आर्य कहा जाता है, आखिर कब भारत आए और उनका भारतीय समाज पर क्या असर पड़ा. पिछले दशक में यह सवाल राजनीतिक रूप से संवेदनशील हो गया है, लेकिन राय कहते हैं कि यह जानना जरूरी है कि आज के भारतीय किन-किन जीन से बने हैं.
राय पिछले करीब 15 साल से इस खोज में लगे हैं, पहले हैदराबाद के सेंटर फॉर सेल्युलर एंड मॉलिक्यूलर बायोलॉजी में रिसर्चर के रूप में और फिर BSIP में. BSIP में यह प्रोजेक्ट 2024 में शुरू हुआ, आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के साथ मिलकर, जिसके पास हड़प्पा, मोहनजोदड़ो और अन्य निओलिथिक साइट्स से मिले सभी कंकाल सुरक्षित हैं.
दुनिया के आर्कियोजेनेटिक विशेषज्ञ, जैसे कि यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया, बर्कले की पॉपुलेशन जेनेटिसिस्ट प्रिया मूरजानी, जिन्होंने 2000 दक्षिण एशियाई लोगों का जीनोम सीक्वेंस किया, भी राय से सहमत हैं.
मूरजानी ने दिप्रिंट से कहा, “भारत के पुराने और हाल के जनसंख्या इतिहास को लेकर अभी भी कई सवाल खुले हैं और यूरोप और अफ्रीका के मुकाबले भारत जीनोमिक स्टडी में कम प्रतिनिधित्व वाला रहा है. प्राचीन डीएनए ने मानव इतिहास को समझने का तरीका बदल दिया है. भारत में यह मानव अनुकूलन, बीमारियों और सहनशीलता को समझने में मदद कर सकता है.”
अभी कौन-सी रिसर्च चल रही है?
पिछले साल अक्टूबर में, राय की लैब ने कश्मीर पर पहली बार प्राचीन जीनोमिक स्टडी प्रकाशित की, जिसमें आज की आबादी को 5,000 साल पहले घाटी में रहने वाले निओलिथिक लोगों से जोड़ा गया. यह स्टडी BSIP की रिसर्चर अपर्णा द्विवेदी ने राय के मार्गदर्शन में की, जिसमें श्रीनगर के पास बुर्जहोम के निओलिथिक (3000-1000 BCE) साइट पर दफन लोगों के कान की हड्डियों और दांतों से डीएनए निकाला गया.
द्विवेदी ने कहा, “पुरातत्व हमें बुर्जहोम के बर्तनों के डिजाइन और औज़ारों के बारे में बता सकता था, लेकिन मेरी स्टडी ने पहली बार सीधा सबूत दिया कि वहां के लोगों का जेनेटिक संबंध सेंट्रल एशिया, तिब्बत, चीन और पाकिस्तान के स्वात वैली से था.”
उनकी स्टडी ने बुर्जहोम के जेनेटिक लिंक के बारे में पहले से चल रही थ्योरी को सही साबित किया, जो 1930 के दशक में इस साइट की खोज के बाद से मानी जा रही थी. लेकिन राय की टीम ने एक और बड़ी खोज की.
द्विवेदी ने उत्साह से कहा, “हमने पाया कि आज के कश्मीरी लोगों में भी वैसा ही जेनेटिक मैटेरियल है, यानी यह जगह हजारों सालों से लगातार बसी हुई है. यह पहली बार ऐसा सबूत मिला है.”
महत्वपूर्ण बात यह है कि द्विवेदी की स्टडी ने यह भी दिखाया कि बुर्जहोम साइट उसी समय की है जब परिपक्व हड़प्पा काल था और उनके बीच संपर्क और व्यापार भी था, लेकिन यह सिंधु घाटी सभ्यता का हिस्सा नहीं था. द्विवेदी, जिन्होंने हाल ही में कश्मीर के बुर्जहोम साइट के जेनेटिक इतिहास पर अपनी पीएचडी थीसिस जमा की है, ने प्राचीन सैंपल से डीएनए निकालने की मुश्किल प्रक्रिया के बारे में भी बताया.

उन्होंने हंसते हुए कहा, और लैब के क्लीन रूम में जाने से पहले ग्लव्स और मास्क पहना, “हम जरा सा भी कंटैमिनेशन का रिस्क नहीं ले सकते, क्योंकि सैंपल सैकड़ों साल पुराने हैं. हम तो इनके पास सांस लेने से भी डरते हैं.”
“अक्सर हमें एक ही हड्डी से 7-8 सैंपल निकालने पड़ते हैं, ताकि सही तरीके से एनालिसिस करने लायक डीएनए मिल सके.”
BSIP के ग्राउंड फ्लोर पर स्थित यह Ancient DNA लैब पहली नजर में दिखाई नहीं देती. अंदर यह कई कमरों का जाल है, जो एक-दूसरे से जुड़े हैं, सफेद और नीले रंग के साफ-सुथरे माहौल में, जहां हर चीज मौजूद है—अतिरिक्त PVC सूट, फ्रिज और बायोसेफ्टी कैबिनेट्स.
BSIP की बाकी लैब्स की तरह, यह भी बहुत कंट्रोल्ड माहौल में है, जहां थोड़ी सी भी गड़बड़ी सालों की रिसर्च को खतरे में डाल सकती है, लेकिन रेडियोकार्बन डेटिंग या पेलियोमैग्नेटिज्म लैब के मुकाबले, राय की लैब अपेक्षाकृत ‘हालिया’ इतिहास पर काम करती है.
BSIP के डायरेक्टर मुकेश ठक्कर ने कहा, “हम यहां ज्यादातर जो फॉसिल्स स्टडी करते हैं, वे लाखों साल पुराने होते हैं. यही हमारा जियोलॉजिकल टाइमलाइन है. इसीलिए प्राचीन डीएनए लैब खास और जरूरी है. इनके सैंपल हजारों साल पुराने हो सकते हैं, लेकिन इस संस्थान में यही सबसे ‘नए’ सैंपल हैं!”
प्राचीन DNA के लिए BSIP क्यों?
लखनऊ में स्थित यह संस्थान सिर्फ अपने नाम से ही नहीं, बल्कि बहुत कुछ पेलियोबॉटनिस्ट डॉ. बीरबल साहनी से जुड़ा है, जिन्होंने अपनी निजी फॉसिल और पेलियोबॉटनी की किताबों के कलेक्शन से BSIP की स्थापना की थी. आज भी BSIP का म्यूजियम, जो DNA लैब के पास है, साहनी के कलेक्शन से भरा हुआ है, जिसमें मशहूर ग्लोसॉप्टेरिस भी शामिल है.
म्यूजियम के एक कमरे के बीच में, लकड़ी के बॉक्सों से घिरे हुए, एक डिस्प्ले बॉक्स में बड़ा ग्लोसॉप्टेरिस पत्ती का फॉसिल रखा है; यह एक पतली, लंबी पत्ती है, जिसमें बीच और किनारों पर नसें दिखाई देती हैं. 25 करोड़ साल से भी ज्यादा पुराना यह फॉसिल इस बात का मजबूत सबूत था कि सभी महाद्वीप कभी एक बड़े सुपरकॉन्टिनेंट गोंडवाना का हिस्सा थे.
भारत, ऑस्ट्रेलिया और चीन में मिले ग्लोसॉप्टेरिस फॉसिल्स का अध्ययन करके साहनी ने खुद गोंडवाना थ्योरी में बड़ा योगदान दिया था.
BSIP के डायरेक्टर मुकेश ठक्कर ने कहा, “यही हमारे संस्थान की शुरुआत थी—हम पृथ्वी के इतिहास को उसके शुरुआती समय से ही फॉसिल और प्राचीन पराग जैसे सबूतों से समझते आए हैं. एक कोशिकीय जीवन से लेकर डायनासोर तक, हमने सबका अध्ययन किया है. इसलिए यह स्वाभाविक था कि हम मानव जीवन और मानव समाज की उत्पत्ति और विकास को भी समझें.”

लेकिन डीएनए पर काम करने वाली लैब होने के कारण, राय और उनकी टीम अपने सैंपल्स को दूसरे लैब्स—जैसे रेडियोकार्बन डेटिंग, पेलियोमैग्नेटिज्म या जियोकेमिस्ट्री, से अलग तरीके से संभालती है. आखिर डीएनए निकालने की प्रक्रिया खुद ही चीजों को नष्ट करने वाली होती है.
राय ने कहा, “DNA निकालने के लिए हमें सैंपल को बारीक पाउडर में पीसना पड़ता है और फिर केमिकल्स से ट्रीट करना होता है. यह सुनकर लोगों को हैरानी हो सकती है, लेकिन हम सैकड़ों साल पुरानी हड्डियों को ड्रिल और पीसते हैं.”
लेकिन सही रिजल्ट पाने के लिए उन्हें कई बार कोशिश करनी पड़ती है.
एक कामकाजी सोमवार को, डॉ. राय के अंडर पढ़ने वाली फाइनल ईयर पीएचडी स्टूडेंट स्निग्धा उनके ऑफिस में आई और पूछा कि सिंधु घाटी सभ्यता की साइट से मिले एक पुराने कुत्ते की हड्डी के कितने सैंपल काफी होंगे. यह प्रक्रिया काफी मुश्किल है; स्निग्धा को एक अलग क्लीन रूम में बैठना पड़ता है, ग्लव्स, मास्क और खास सफेद PVC सूट पहनकर, ताकि वह उस इतिहास के टुकड़े को छूते समय किसी भी तरह का संपर्क न करे.
राय ने कहा, “जेनेटिक मैटेरियल निकालने की उम्मीद में हम सैंपल के कान और दांत को टारगेट करते हैं.”
“लेकिन जितना पुराना सैंपल होता है, उसका DNA उतना ही खराब होता है. इसलिए दूसरी DNA लैब्स के मुकाबले, हमें कई बार एक ही सैंपल से DNA निकालने की प्रक्रिया दो, तीन, यहां तक कि चार बार दोहरानी पड़ती है, अगर पहली बार में रिजल्ट न मिले.”
भारत के जेनेटिक इतिहास की थ्योरी?
आज के भारतीयों का जेनेटिक ढांचा, कुछ स्टडी के आधार पर, जो अमेरिकी वैज्ञानिकों जैसे प्रिया मूरजानी ने की हैं—सेंट्रल स्टेपी जीन, ईरानी हंटर-गैदरर जीन और प्राचीन दक्षिण भारतीय (AASI) जीन का मिश्रण है, लेकिन यह अभी साफ नहीं है कि ये अलग-अलग जेनेटिक समूह कब और कैसे आए, आपस में मिले और आज के भारतीय बने.
बुर्जहोम इस बड़े जेनेटिक इतिहास की पहेली का एक हिस्सा है. उसी समय सिंधु घाटी सभ्यता भी थी, और उससे पहले 7,000 साल पुरानी मेहरगढ़ साइट और 12,000 साल पुराने यूपी के सराय नाहर राय के हंटर-गैदरर, जहां भारत के सबसे पुराने मानव कंकाल मिले हैं.
भारत में मानव आबादी का टाइमलाइन मौजूद है, लेकिन यह अभी भी टुकड़ों में बंटी हुई है. राय का काम इन सबको जोड़ने की कोशिश करता है. इसी वजह से वे भारत के नए पुरातात्विक खोजों के केंद्र में हैं—चाहे वह यूपी के सिनौली में मिले 4,000 साल पुराने रथ और तांबे के हथियार हों, या उत्तराखंड के रूपकुंड झील में मिले 700 CE के कंकाल.
इस समय लैब सात अलग-अलग जगहों से मिले DNA सैंपल का अध्ययन कर रही है—सिंधु घाटी सभ्यता के राखीगढ़ी, लोथल और हड़प्पा, ब्रॉन्ज एज का सिनौली, गुजरात का 800 BCE का वडनगर और असम के 800 CE के अहोम दफन स्थल.
राय ने कहा, “शुरुआती स्तर पर हम यह जान पाएंगे कि इन जगहों के पुराने DNA आज वहां रहने वाले लोगों के DNA से मिलता है या नहीं, लेकिन गहराई में जाकर हम यह भी बता सकते हैं कि इन कंकालों में जीन का सही मिश्रण क्या है और वे एक-दूसरे से कैसे जुड़े हैं. जैसे, क्या सिंधु घाटी के लोगों का सिनौली या वडनगर से कोई संबंध था?”
DNA ने भारत को कैसे बदलना शुरू किया है
पूरे भारत में घूमकर, सैंपल इकट्ठा करके और पुरातत्वविदों व भूवैज्ञानिकों से मिलकर काम करते हुए, राय की नज़र अलग हो गई है—वे जगहों और लोगों को आज के साथ-साथ हजारों साल पहले के रूप में भी देखते हैं.
राय ने कहा, “पुरातत्व ने यह तो शानदार तरीके से बताया कि सदियों पहले भारत के अलग-अलग हिस्सों में इंसान रहते थे, लेकिन वे इंसान कौन थे? सिंधु घाटी के लोग कौन थे? उत्तर और दक्षिण भारतीयों में जेनेटिक अंतर क्या है? ऋग्वेद किसने लिखा? ये सवाल पहले सिर्फ अनुमान थे, लेकिन जीनोम स्टडी हमें इनके पक्के जवाब दे सकती है.”

प्राचीन जीनोम स्टडी दो मुख्य हिस्सों में होती है—पहला डीएनए निकालना और दूसरा उसका विश्लेषण करना. लेकिन विश्लेषण के लिए वैज्ञानिकों को एक ‘रेफरेंस’ चाहिए होता है, यानी आज की आबादी का डीएनए. पुरातात्विक रिकॉर्ड, जगह की जानकारी और पहले की स्टडी के आधार पर, राय की टीम पुराने डीएनए की तुलना आज या पहले के डीएनए से करती है.
राय ने कहा, “अगर हम गुजरात के लोथल से डीएनए निकालते हैं, तो हम उसे आज के गुजरात की आबादी से तुलना करेंगे, लेकिन साथ ही राखीगढ़ी के डीएनए से भी तुलना करेंगे, क्योंकि वह भी सिंधु घाटी की साइट है. इससे हमें उस व्यक्ति के जेनेटिक रिश्ते, उसका इतिहास और उसका भविष्य भी समझ में आएगा.”
आर्य माइग्रेशन थ्योरी बनाम रिसर्च
जेनेटिक स्टडी को राजनीति से जोड़ना नया नहीं है. हिटलर के समय से ही कुछ नस्लों—जैसे आर्य—को ‘श्रेष्ठ’ बताने की कोशिश की गई. 1990 और 2000 के दशक में डीएनए स्टडी बढ़ने के बाद यूरोप में भी ‘शुद्ध’ नस्ल जैसे वाइकिंग्स पर बहस हुई.
2020 की एक बड़ी स्टडी में पाया गया कि वाइकिंग्स कोई अलग-थलग और एक जैसी नस्ल नहीं थे, बल्कि उनमें यूरोप के अंदर और बाहर के लोगों का काफी मिश्रण था.
भारत में भी प्राचीन डीएनए स्टडी के साथ आर्य माइग्रेशन, ‘असल’ भारतीय वंश और ऋग्वेद जैसे ग्रंथों में आर्यों की भूमिका जैसे राजनीतिक सवाल जुड़े हुए हैं. ‘शुद्धता’ और लगातार एक जैसी भारतीय विरासत की बातें चर्चा में रहती हैं, जबकि सबूत बताते हैं कि भारत और दुनिया का इतिहास लोगों के आने-जाने और संस्कृतियों के मिलन का रहा है.
मूरजानी ने कहा, “अगर सावधानी से किया जाए, तो जीनोमिक रिसर्च हमें सबूतों के आधार पर अतीत समझने का मजबूत मौका देती है, लेकिन जरूरी है कि इसे राजनीतिक नजर से न देखा जाए और यह साफ बताया जाए कि डीएनए क्या बता सकता है और क्या नहीं.”
प्राचीन डीएनए रिसर्च का असर
राय को पता है कि उनका काम राजनीतिक रूप से संवेदनशील है, लेकिन उनकी टीम लगातार सिनौली और वडनगर के प्राचीन डीएनए को समझने में लगी है. उनके अनुसार, इस ज्ञान के फायदे ज्यादा हैं.
उन्होंने कहा, “जैसे-जैसे हम प्राचीन डीएनए और जेनेटिक स्टडी को बढ़ा रहे हैं, हम विज्ञान और स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी योगदान दे रहे हैं. हम बीमारियों के फैलाव, शरीर की प्रतिरोधक क्षमता और अलग-अलग समुदायों में इम्युनिटी को समझ सकते हैं.”
दुनिया भर में जीनोम सीक्वेंसिंग को मेडिकल क्षेत्र की अगली बड़ी क्रांति माना जा रहा है. भारत सरकार का जीनोम इंडिया प्रोजेक्ट, जो 2025 में शुरू हुआ, 20,000 से ज्यादा भारतीयों का जीनोम स्टडी करने की कोशिश है, ताकि बायोटेक्नोलॉजी में आगे बढ़ा जा सके.
इस तरह राय की रिसर्च इतिहास को समझने और भविष्य के अवसरों के बीच एक पुल का काम करती है. इसके अलावा, प्राचीन डीएनए लैब के काम से स्थानीय लोगों में अपने इतिहास को जानने की दिलचस्पी भी बढ़ी है.
राय ने कहा, “जब मैं आखिरी बार गुजरात के वडनगर गया था, तो लोग डीएनए को लेकर बहुत उत्साहित थे. इंसानों में अपने इतिहास को जानने की एक स्वाभाविक इच्छा होती है. हमें खुशी है कि हम उन्हें उनके इतिहास के करीब ला पा रहे हैं.”
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