हाल के वर्षों में ‘डी-डॉलराइजेशन’ (डॉलर से दूरी) का विचार अकादमिक बहस से निकलकर अब भू-राजनीतिक चर्चाओं का बड़ा विषय बन गया है. BRICS बैठकों से लेकर ऊर्जा व्यापार की बातचीत तक, नीति निर्माता अब अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता कम करने की बात कर रहे हैं. रूस पर लगे प्रतिबंध, चीन का उभार और दुनिया का बंटा हुआ माहौल—इन सबने यह अटकलें बढ़ा दी हैं कि अंतरराष्ट्रीय मौद्रिक सिस्टम बदल सकता है. लेकिन जब वैश्विक बाजार में असली अनिश्चितता आती है, तो निवेशकों का व्यवहार कुछ और ही कहानी बताता है.
संकट के समय, दुनिया का झुकाव अब भी साफ तौर पर डॉलर की तरफ होता है.
पिछले दो दशकों में वित्तीय संकट, भू-राजनीतिक टकराव और बाजार में घबराहट के हर दौर में डॉलर कमजोर नहीं, बल्कि मजबूत हुआ है. इसकी वजह राजनीति नहीं, बल्कि वैश्विक फाइनेंस की बुनियादी संरचना है.
जब डर बढ़ता है, तो लिक्विडिटी जीतती है
2008 के वैश्विक वित्तीय संकट को देखें. यह संकट अमेरिका से ही शुरू हुआ था—मॉर्गेज मार्केट के गिरने और बड़े वित्तीय संस्थानों के फेल होने से. ऐसे में माना जा सकता था कि निवेशक डॉलर छोड़ देंगे, लेकिन हुआ इसका उल्टा.
जैसे ही मार्केट में घबराहट बढ़ी, दुनियाभर के निवेशक अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड खरीदने लगे. पैसा डॉलर से जुड़े एसेट्स में गया, जबकि संकट की शुरुआत अमेरिका से हुई थी. ऐसा ही 2020 में कोविड-19 महामारी के दौरान भी हुआ. जब बाजार ठप पड़ गए और अनिश्चितता बढ़ी, तो दुनिया भर की कंपनियां, बैंक और सरकारें डॉलर की लिक्विडिटी जुटाने में लग गईं. 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद भी यही देखा गया. ऊर्जा बाजार में उतार-चढ़ाव, प्रतिबंध और बढ़ते जोखिम के बीच फिर डॉलर की मांग बढ़ गई.
अर्थशास्त्री इसे ‘सेफ हेवन इफेक्ट’ कहते हैं. यानी अस्थिरता के समय निवेशक ऐसी जगह पैसा लगाना चाहते हैं जहां आसानी से लेन-देन हो सके, बड़ी मात्रा में खरीद-बिक्री हो सके और कानून व्यवस्था मजबूत हो.

आज दुनिया में अमेरिकी ट्रेजरी मार्केट जितना बड़ा और लिक्विड कोई बाजार नहीं है. इसलिए संकट के समय डॉलर सबसे सुरक्षित विकल्प बन जाता है.
यह पैटर्न आज भी दिख रहा है. मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव—खासतौर पर इजरायल, ईरान और अमेरिका के बीच टकराव—के बीच डॉलर फिर मजबूत हो रहा है. जैसे-जैसे जोखिम बढ़ता है, डॉलर की मांग भी बढ़ती है.
प्रतिबंधों का विरोधाभास
हाल के वर्षों में एक और पहलू सामने आया है. अमेरिका ने विदेश नीति के तहत वित्तीय प्रतिबंधों का ज्यादा इस्तेमाल किया है—जैसे रिजर्व फ्रीज करना, बैंकिंग एक्सेस रोकना और पेमेंट सिस्टम से बाहर करना.
रूस पर लगे बड़े प्रतिबंधों ने दिखाया कि अमेरिकी फाइनेंशियल सिस्टम कितना शक्तिशाली है. आलोचकों का कहना है कि इससे देश डॉलर का विकल्प खोजेंगे. कुछ देशों ने सोना बढ़ाया, लोकल करेंसी में व्यापार किया और नए पेमेंट सिस्टम भी आजमाए.
लेकिन इससे एक और सच सामने आता है—डॉलर सिस्टम की मजबूती. दुनिया की फाइनेंस प्रणाली अभी भी डॉलर से जुड़ी है—जैसे बैंकिंग नेटवर्क, डॉलर क्लियरिंग सिस्टम और इंटरनेशनल बॉन्ड मार्केट. प्रतिबंध इसलिए असरदार होते हैं क्योंकि दुनिया का बड़ा हिस्सा इसी सिस्टम से जुड़ा है.
इसे “सैंक्शन्स पैराडॉक्स” कहा जा सकता है—जितनी डॉलर की ताकत दिखती है, उतना ही साफ होता है कि इसके बाहर काम करना कितना मुश्किल है.
क्या दुनिया सच में डी-डॉलराइज हो सकती है?
अंतरराष्ट्रीय मौद्रिक सिस्टम हमेशा एक जैसा नहीं रहेगा. समय के साथ बदलाव संभव है. चीन की बढ़ती ताकत, क्षेत्रीय फाइनेंशियल सिस्टम और डिजिटल करेंसी जैसे बदलाव धीरे-धीरे असर डाल सकते हैं.
कुछ देश डॉलर पर निर्भरता कम करने की कोशिश कर सकते हैं. भविष्य में एक मल्टी-पोलर (कई करेंसी वाला) सिस्टम बन सकता है. लेकिन ऐसे बदलाव बहुत धीरे-धीरे होते हैं—पीढ़ियों में, न कि कुछ सालों में.
इसकी वजह है ‘नेटवर्क इफेक्ट’. डॉलर पहले से ही वैश्विक व्यापार, कर्ज और बॉन्ड मार्केट में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होता है. IMF के अनुसार, दुनिया के करीब 58% विदेशी मुद्रा भंडार अभी भी डॉलर में हैं. यूरो काफी पीछे है और बाकी करेंसी बहुत छोटी भूमिका में हैं.
जितना ज्यादा कोई करेंसी इस्तेमाल होती है, उतना ही दूसरों के लिए उसे अपनाना आसान होता है. यही नेटवर्क बदलाव को मुश्किल बनाता है.
असल में डॉलर वैश्विक फाइनेंस का “ऑपरेटिंग सिस्टम” बन चुका है.
इसे बदलने के लिए सिर्फ दूसरी करेंसी नहीं, बल्कि उतना ही मजबूत फाइनेंशियल मार्केट, भरोसेमंद संस्थान और पूरी दुनिया में फैला बैंक-निवेशक-पेमेंट सिस्टम चाहिए. अभी ऐसा कोई विकल्प मौजूद नहीं है.
इसी वजह से डी-डॉलराइजेशन की बहस अक्सर राजनीतिक इच्छा और आर्थिक हकीकत को मिला देती है.
सरकारें भले ही डॉलर पर निर्भरता कम करना चाहें, लेकिन बाजार अब भी उसी पर टिके हैं. जब भी वैश्विक संकट आता है—युद्ध, बाजार में गिरावट या आर्थिक झटका—निवेशक नई जगह नहीं जाते, बल्कि उसी सिस्टम में लौटते हैं जो पहले से मौजूद है.
अंतरराष्ट्रीय मौद्रिक सिस्टम का सबसे बड़ा विरोधाभास यही है—जिन चीजों को अमेरिका की कमजोरी माना जाता है, जैसे अस्थिरता, प्रतिबंध और बंटा हुआ फाइनेंशियल सिस्टम, वही चीजें डॉलर को और मजबूत बना देती हैं.
एक अनिश्चित दुनिया में डॉलर सिर्फ संकट झेलता नहीं, बल्कि अक्सर उनसे और मजबूत होकर निकलता है.
बिदिशा भट्टाचार्य चिंतन रिसर्च फाउंडेशन में एसोसिएट फेलो हैं. उनका एक्स हैंडल @Bidishabh है. व्यक्त किए गए विचार निजी हैं.
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