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Tuesday, 10 March, 2026
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चीन का वह आर्थिक मॉडल, जिसने उसकी तेज़ तरक्की को ताकत दी, अब धीमा पड़ता दिख रहा है

चीन के डेवलपमेंट मॉडल के केंद्र में प्रॉपर्टी सेक्टर था—घरों का निर्माण, ज़मीन की बिक्री और रियल एस्टेट में निवेश. अब इस निर्भरता के नतीजे साफ दिखने लगे हैं.

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पिछले 30 से ज़्यादा सालों से एक ही आंकड़ा वैश्विक अर्थव्यवस्था की दिशा को दिखाता रहा है: चीन की विकास दर. लगातार दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बहुत तेज़ गति से बढ़ती रही, और कई बार दो अंकों की वृद्धि भी हासिल करती रही.

लेकिन अब शायद यह दौर खत्म होने के करीब है. इस हफ्ते चीन की सालाना संसद बैठकों के दौरान बीजिंग ने संकेत दिया कि वह लगभग 4.5-5 प्रतिशत की आर्थिक वृद्धि दर को लक्ष्य बनाने में सहज है.

ज्यादातर देशों के लिए इतनी वृद्धि दर अच्छी मानी जाएगी, लेकिन चीन के लिए यह एक बड़ा बदलाव है. वह देश, जिसे कभी ऐसा माना जाता था कि वह लगातार बहुत तेज़ गति से बढ़ता रहेगा, अब कहीं धीमी रफ्तार की ओर बढ़ रहा है.

यह बदलाव सिर्फ एक सामान्य आर्थिक मंदी नहीं है; यह उस आर्थिक मॉडल के धीरे-धीरे खत्म होने का संकेत है जिसने चीन को ऊपर पहुंचाया.

ग्राफिक: श्रुति नैथानी/दिप्रिंट
ग्राफिक: श्रुति नैथानी/दिप्रिंट

वह मॉडल जिसने आधुनिक चीन बनाया

पिछले चार दशकों में चीन की आर्थिक वृद्धि मुख्य रूप से निवेश, निर्यात और निर्माण के मजबूत मेल से हुई है. देश ने बुनियादी ढांचे, मैन्युफैक्चरिंग फैक्ट्रियों और शहरी विकास पर भारी निवेश किया.

ऊंची बचत दर, सरकार का मजबूत समन्वय और खुली वैश्विक व्यापार व्यवस्था ने चीन के तेज़ औद्योगिकीकरण को संभव बनाया.

इस डेवलपमेंट मॉडल के केंद्र में प्रॉपर्टी सेक्टर था. घरों का निर्माण, ज़मीन की बिक्री और रियल एस्टेट में निवेश आर्थिक गतिविधियों के बड़े चालक बन गए.

अपने चरम पर प्रॉपर्टी सेक्टर और उससे जुड़े उद्योग चीन की जीडीपी का लगभग एक चौथाई हिस्सा बन गए थे. इसका असर स्टील और सीमेंट उत्पादन से लेकर स्थानीय सरकारों की वित्तीय स्थिति तक दिखता था.

अब इस निर्भरता के नतीजे सामने आने लगे हैं. चीन का प्रॉपर्टी सेक्टर लंबे समय से गिरावट में है. बड़े डेवलपर्स भारी कर्ज के बोझ से जूझ रहे हैं और घरों की मांग कमजोर हो रही है.

प्रॉपर्टी निवेश में गिरावट का असर पूरी अर्थव्यवस्था पर पड़ा है. इससे निर्माण गतिविधियां, स्थानीय सरकारों की आय और परिवारों की संपत्ति—तीनों प्रभावित हुए हैं.

पुराने मॉडल की सीमाएं

ग्राफिक: श्रुति नैथानी/दिप्रिंट
ग्राफिक: श्रुति नैथानी/दिप्रिंट

इसके साथ ही वह निवेश-केंद्रित रणनीति, जिसने पहले तेज़ आर्थिक विस्तार में मदद की थी, अब कम असर दिखा रही है.

कई दशकों तक हाईवे, रेलवे और शहर बनाने के बाद चीन ने विशाल बुनियादी ढांचा तैयार कर लिया है. इसलिए अब नए निवेश से आर्थिक लाभ पहले जितना नहीं मिलता, जबकि स्थानीय सरकारों और सरकारी कंपनियों का कर्ज बढ़ता जा रहा है.

विकास अर्थशास्त्र में यह पैटर्न अच्छी तरह जाना जाता है. विकास के शुरुआती दौर में देश खेती से कामगारों को उद्योगों में लाकर, विदेश से तकनीक अपनाकर और बुनियादी ढांचा बनाकर तेज़ वृद्धि हासिल कर सकते हैं.

इन बदलावों से उत्पादकता में बड़ा सुधार होता है और अर्थव्यवस्था बहुत तेज़ी से बढ़ सकती है. इसे अक्सर “कैच-अप ग्रोथ” कहा जाता है.

लेकिन यह प्रक्रिया एक समय के बाद धीमी हो जाती है. जब शहरीकरण काफी आगे बढ़ जाता है और बुनियादी ढांचा लगभग पूरा हो जाता है, तब अतिरिक्त निवेश से कम फायदा होता है.

अर्थशास्त्री इसे “पूंजी पर घटता लाभ” कहते हैं. यानी किसी देश के पास जितनी ज़्यादा सड़कें, फैक्ट्रियां और घर होते जाते हैं, हर नई चीज़ का योगदान उतना कम हो जाता है. चीन अब शायद इसी चरण के करीब पहुंच रहा है.

इतिहास में ऐसे उदाहरण मौजूद हैं. जैसे युद्ध के बाद तेज़ विकास के दौर के बाद 1970 के दशक की शुरुआत में जापान की वृद्धि धीमी हो गई थी. इसी तरह दक्षिण कोरिया और ताइवान में भी मध्यम आय स्तर पर पहुंचने के बाद विकास दर कम हो गई थी.

तेज़ विस्तार से स्थिर विकास की ओर जाना सफल अर्थव्यवस्थाओं के विकास का एक जाना-पहचाना चरण है.

बीजिंग की नए विकास इंजन की तलाश

इन संरचनात्मक बदलावों के जवाब में चीन के नीति निर्माता देश के विकास मॉडल को फिर से तैयार करने की कोशिश कर रहे हैं.

सरकारी चर्चा में अब “हाई-क्वालिटी ग्रोथ” पर ज़ोर दिया जा रहा है. इसका मतलब सिर्फ तेज़ विकास नहीं बल्कि टिकाऊ विकास, नवाचार और उत्पादकता पर ध्यान देना है.

एक बड़ा लक्ष्य घरेलू खपत की भूमिका बढ़ाना है. विकसित अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में चीन की जीडीपी में उपभोक्ता खर्च का हिस्सा अभी भी कम है.

अगर घरों का खर्च बढ़ता है तो निवेश और प्रॉपर्टी पर निर्भरता कम हो सकती है. लेकिन यह बदलाव आसान नहीं है.

कम उपभोक्ता भरोसा, रोजगार की चिंता और घरों की संपत्ति में गिरावट ने लोगों को खर्च करने में सावधान बना दिया है.

चीन की रणनीति का दूसरा बड़ा स्तंभ तकनीकी प्रगति है. बीजिंग आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, रोबोटिक्स, इलेक्ट्रिक वाहनों और उन्नत मैन्युफैक्चरिंग जैसे क्षेत्रों में भारी निवेश कर रहा है.

इसका उद्देश्य वैश्विक वैल्यू चेन में ऊपर जाना और विदेशी तकनीक पर निर्भरता कम करना है.

विकास दर धीमी होने के बावजूद चीन वैश्विक अर्थव्यवस्था में एक बड़ी ताकत बना रहेगा. उसके विशाल आकार के कारण हर साल की वृद्धि भी वैश्विक उत्पादन में बड़ा योगदान देती रहेगी.

लेकिन चीन के आर्थिक प्रभाव की प्रकृति बदल रही है.

धीमी चीनी अर्थव्यवस्था उन कमोडिटी की वैश्विक मांग को कम कर सकती है, जिनकी पहले निर्माण उछाल के दौरान बहुत ज़रूरत थी.

साथ ही घरेलू बाज़ार में कमज़ोरी का सामना कर रही चीनी कंपनियां अंतरराष्ट्रीय बाज़ारों में ज्यादा तेज़ी से विस्तार कर सकती हैं, जिससे दुनिया भर के मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी.

भारत जैसे देशों के लिए यह समय खास महत्व रखता है. जैसे-जैसे चीन मध्यम वृद्धि के दौर में जा रहा है, आने वाले वर्षों में भारत की वृद्धि तेज़ होने की उम्मीद है और यह एशिया में निवेश और सप्लाई चेन के ढांचे को बदल सकता है.

फिर भी चीन की धीमी होती अर्थव्यवस्था को उसके पतन के रूप में देखना जल्दबाज़ी होगी.

देश एक ऐसे बदलाव से गुजर रहा है जिसका सामना कई तेज़ी से विकसित हुई अर्थव्यवस्थाओं को करना पड़ता है—तेज़ “कैच-अप ग्रोथ” से एक अधिक परिपक्व और स्थिर मॉडल की ओर बढ़ना.

इसलिए असली कहानी यह नहीं है कि चीन कमजोर हो रहा है, बल्कि यह है कि चमत्कारिक तेज़ वृद्धि का वह दौर—जिसने एक पूरी पीढ़ी तक वैश्विक अर्थव्यवस्था को परिभाषित किया—अब धीरे-धीरे खत्म हो रहा है.

बिदिशा भट्टाचार्य चिंतन रिसर्च फाउंडेशन में एसोसिएट फेलो हैं. उनका एक्स हैंडल @Bidishabh है. व्यक्त किए गए विचार निजी हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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