कैथल (हरियाणा): चलिए दाढ़ी से शुरुआत करते हैं. 5 अक्टूबर को, जब बृजेंद्र सिंह जींद जिले के नरवाना विधानसभा क्षेत्र के दनोदा गांव से निकले थे, तब दाढ़ी थी—साफ-सुथरी ट्रिम की हुई. वैसी दाढ़ी, जो कोई आदमी तब रखता है जब उसके पास आईना और रोज़मर्रा की रेगुलर लाइफ होती है.
दो दशक से ज्यादा समय तक आईएएस अधिकारी रहने के बाद और फिर हिसार से पांच साल सांसद रहने के दौरान सिंह हमेशा क्लीन-शेव रहे थे. दाढ़ी अक्टूबर 2024 के विधानसभा चुनाव में हार के बाद आई, जब मतगणना खत्म हुई और जीत-हार का फर्क सिर्फ 32 वोटों का रह गया.
यात्रा के पहले दिन जो ट्रिम की हुई दाढ़ी थी, वह अब 153 दिनों और करीब 2,000 किलोमीटर के बाद कुछ और ही बन चुकी है.
लंबी, घनी—लगभग दार्शनिक जैसी. रास्ते में लोग सबसे पहले उसी पर ध्यान देते हैं. कुछ लोग कहते हैं कि इससे वह साधु जैसे लगते हैं. कुछ लोग, थोड़े कम उदार होकर, कहते हैं कि वह ऐसे लगते हैं जैसे कोई शर्त हार गए हों.
ज्यादातर लोगों को उनकी दाढ़ी वैसी लगती है जैसी राहुल गांधी की थी, जब वह देशभर में अपनी भारत जोड़ो यात्रा पर निकले थे, लेकिन सिंह खुद इन सब बातों से बिल्कुल परेशान नहीं दिखते.

सुबह मुश्किल से 11 बजे थे जब दिप्रिंट की टीम उनसे करनाल बायपास के पास जगत सिंह पुनिया के घर पर मिली—पकौड़े, चाय, ड्राइंग रूम में स्थानीय कांग्रेस कार्यकर्ताओं की भीड़ और एक शेड्यूल शीट जिसमें यहां से रात को जाट धर्मशाला में रुकने तक 17 पड़ाव लिखे थे.
पांच महीने बाद, अंदर से सद्भाव यात्रा कुछ ऐसी दिखती है: यह कोई जुलूस कम और लगातार चलते रहने वाली मशीन ज्यादा है, जिसका ढांचा साधारण है, लेकिन मकसद बहुत मजबूत.
पुनिया के घर से बृजेंद्र सिंह और कुछ सौ लोग पैदल चलते हुए सर छोटू राम चौक पहुंचे, जहां सिंह ने किसान नेता की प्रतिमा को नमन किया. कुछ लोग कारों में भी पीछे-पीछे आए.

इस इशारे के कई मायने थे. दीनबंधु सर छोटू राम, जिन्होंने 20वीं सदी की शुरुआत में अविभाजित पंजाब में किसानों और ग्रामीण गरीबों के लिए पूरी ज़िंदगी संघर्ष किया, बृजेंद्र सिंह के परदादा भी हैं.
उनके दादा नेकी राम श्योकंद, जो बंसी लाल की हरियाणा सरकार में मंत्री थे, उन्होंने सर छोटू राम की बेटी से शादी की थी.
सिंह ने हल्की मुस्कान के साथ कहा, “इस विरासत की वजह से जो सम्मान मिलता है, वह एक तरह से वरदान भी है और बोझ भी.” यह मुस्कान ऐसे व्यक्ति की थी जिसने यह जवाब कई बार दिया है और फिर भी दिल से वही बात कहता है.
वह यात्रा जिसकी किसी को उम्मीद नहीं थी
यह समझने के लिए कि बृजेंद्र सिंह यह सब क्यों कर रहे हैं, आपको 8 अक्टूबर 2024 की शाम पर वापस जाना होगा, जब हरियाणा चुनाव के नतीजे आने लगे और चुपचाप कांग्रेस की कई धारणाएं टूट गईं.
पार्टी को लग रहा था कि हालात अच्छे हैं, ज़मीन पर माहौल सकारात्मक दिख रहा था और लगभग यह सहमति बन गई थी कि हरियाणा में बीजेपी के लगातार सालों का शासन अब खत्म होने वाला है.
लेकिन ऐसा नहीं हुआ. बीजेपी तीसरी बार जीत गई.
कांग्रेस कई सीटों के साथ उचाना कलां भी हार गई, जहां खुद बृजेंद्र सिंह सिर्फ 32 वोटों से हार गए.
सिर्फ बत्तीस.
उन्होंने दोबारा गिनती के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया है.
इसके बाद, सिंह ने कहा कि एक अजीब सा सन्नाटा छा गया.
“एक आम धारणा बन गई थी कि विपक्ष गायब हो गया है. कार्यकर्ता निराश थे. लोग भी निराश थे. विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद कांग्रेस की सरकार बनने की उम्मीद रखने वाले लोगों और कार्यकर्ताओं में हताशा आ गई थी.”
राज्य में पार्टी का वरिष्ठ नेतृत्व भी कुछ हद तक चुप सा हो गया. इसी खालीपन में सिंह ने यात्रा के बारे में सोचना शुरू किया.
उन्होंने पहले दिप्रिंट को बताया था कि इस विचार पर उन्होंने राहुल गांधी से बात की थी. गांधी ने इसे मंजूरी दी.
सद्भाव यात्रा 5 अक्टूबर 2025 को नरवाना के दनोदा गांव से शुरू हुई.
दिलचस्प बात यह रही कि जब यात्रा शुरू हुई, तब न तो भूपिंद्र सिंह हुड्डा और न ही राज्य कांग्रेस अध्यक्ष राव नरेंद्र सिंह झंडा दिखाने के लिए मौजूद थे.
हालांकि कई अन्य वरिष्ठ कांग्रेस नेता, जिनमें कुमारी सैलजा, रणदीप सिंह सुरजेवाला और कैप्टन अजय सिंह यादव शामिल हैं, बाद में इस यात्रा में शामिल हुए.

कांग्रेस के कुछ नेताओं ने इसे “निजी यात्रा” कहा था.
इस बारे में पूछे जाने पर सिंह ने कूटनीतिक जवाब दिया. वह आज भी वैसे ही हैं.
तब उन्होंने कहा, था, “समस्या नेताओं के साथ है, कार्यकर्ताओं के साथ नहीं.” शुक्रवार को कैथल में उन्होंने खुद यह मुद्दा नहीं उठाया, लेकिन जब पूछा गया तो जल्दी से आगे बढ़ गए.
यह यात्रा, चाहे इसकी शुरुआत पार्टी के अंदरूनी समीकरणों से हुई हो, अब अपनी अलग पहचान बना चुकी है.
5 महीने, 57 विधानसभा क्षेत्र
सद्भाव यात्रा का रास्ता अपने तरीके से हरियाणा की चिंताओं का एक नक्शा है.
पहला चरण, अक्टूबर के दौरान, जींद-हिसार-भिवानी बेल्ट के 14 विधानसभा क्षेत्रों को कवर करता था—यह बृजेंद्र सिंह का अपना राजनीतिक इलाका है, जहां परिवार का नाम अभी भी मायने रखता है और भीड़ देखकर भरोसा मिलता था.
दूसरा चरण दक्षिण की ओर बढ़ा, नांगल चौधरी और महेंद्रगढ़ व रेवाड़ी जिलों की तरफ. सिंह ने इसे यात्रा की “असल परीक्षा” कहा. ये ऐसे विधानसभा क्षेत्र थे जहां कांग्रेस की पकड़ कमज़ोर है और जहां गर्मजोशी से स्वागत मिलेगा, इसकी कोई गारंटी नहीं थी.
लेकिन स्वागत गर्मजोशी भरा ही रहा. बृजेंद्र सिंह ने कहा, “यह बहुत हौसला बढ़ाने वाला था. यात्रियों के लिए भी और मेरे लिए भी.”

इसके बाद यात्रा अंबाला और यमुनानगर जिलों से होकर गुज़री, फिर कुरुक्षेत्र, जो मुख्यमंत्री का अपना इलाका है और अब कैथल में है. अब भी 33 विधानसभा क्षेत्र बाकी हैं और दाढ़ी अभी और बढ़ेगी.
इन 57 विधानसभा क्षेत्रों में कुछ पैटर्न इतने लगातार सामने आए हैं कि अब सिंह उन्हें क्रम से बता सकते हैं, जैसे कोई व्यक्ति किसी दस्तावेज़ को याद करके पढ़ रहा हो. कृषि संकट. युवाओं में बेरोजगारी. ऐसी सड़कें जो राष्ट्रीय राज़मार्ग से उतरते ही टूट जाती हैं. और एक बात जो थोड़ी शांत है, लेकिन बाकी सबके नीचे चल रही है—समाज के ताने-बाने में दरार. लोग इसे टुकड़ों में बताते हैं, कभी फुसफुसाकर और कभी बाज़ार की गलियों में खुलकर.
‘कांग्रेस को बचा लो’
जब बृजेंद्र सिंह सामाजिक विभाजन की बात करते हैं, तो शब्दों को लेकर सावधान रहते हैं.
वह तुरंत “सांप्रदायिक” शब्द का इस्तेमाल नहीं करते. वे कहते हैं “तनाव”. वे कहते हैं “दरारें”. वे 2013 के मुजफ्फरनगर दंगों का ज़िक्र राजनीतिक मुद्दे के तौर पर नहीं, बल्कि चेतावनी के तौर पर करते हैं.
उन्होंने कहा, “13 साल में भी वे घाव नहीं भरे हैं. हरियाणा के मेवात में भी कुछ ऐसा ही करने की कोशिश हुई थी, लेकिन सौभाग्य से खापें, जिन्हें दक्षिणी हरियाणा में ‘पाल’ कहा जाता है और किसान यूनियन वहां गए और लोगों से कहा: इस जाल में मत फंसो.”
सरकार, उनके मुताबिक, “अब भी कोशिश कर रही है.”
वह बगैर नाम लिए एक-दो बीजेपी विधायकों की भाषा का ज़िक्र करते हैं. “सामाजिक विभाजन ही भाजपा का एकमात्र एजेंडा है, क्योंकि शासन के मामले में उनके पास हरियाणा के लोगों को देने के लिए कुछ नहीं है.”
यही सद्भाव यात्रा का मुख्य संदेश है.
यह कि हरियाणा में बीजेपी राजनीतिक रूप से इसलिए सफल रही—लगातार तीन सरकारें क्योंकि उसने समाज को बांटने की राजनीति की है और कांग्रेस को सिर्फ बेहतर उम्मीदवार या बेहतर संगठन ही नहीं चाहिए, बल्कि एक ऐसा नैरेटिव चाहिए जो कस्बों, गांवों और जिलों में चलकर लोगों तक पहुंचे और उन्हें महसूस हो.
सिंह कहते हैं कि चलते हुए उन्हें जिस बात ने सबसे ज्यादा हैरान किया, वह गुस्सा नहीं था—गुस्से की उन्हें उम्मीद थी, बल्कि लोगों की इच्छा. यमुनानगर में, अंबाला में, अजनबी लोग उनके पास आकर धीरे से कहते थे: “कांग्रेस को बचा लो.”
उन्होंने कहा, “वे कांग्रेस के कार्यकर्ता या राजनीतिक एक्टिविस्ट नहीं थे. वे दुकानदार थे. ऐसे लोग जिनके दिल में राज्य और देश की भलाई थी. जो उन्होंने कहा, वह उनके दिल से आ रहा था.”
वह थोड़ा रुकते हैं.
“राष्ट्रीय मीडिया देखकर ऐसा लगता है कि लोग सिर्फ हिंदू-मुस्लिम की बात कर रहे हैं, लेकिन ज़मीन पर लोग अच्छी चीज़ों की उम्मीद करते हैं—कानून-व्यवस्था, कम अपराध और अलग-अलग धर्म, समुदाय और जाति के लोगों के बीच आपसी सम्मान. यह बात मैंने अपनी यात्रा शुरू करते समय नहीं सोची थी.”
नौकरी और पलायन
बेरोजगारी—यह मुद्दा हर विधानसभा क्षेत्र में सामने आता है, चाहे गांव हो या शहर, जाट इलाका हो या अहीर बेल्ट. बृजेंद्र सिंह इस पर गोल-मोल आंकड़े नहीं देते. वह खास उदाहरण देते हैं.
कंप्यूटर साइंस में असिस्टेंट प्रोफेसर की परीक्षा: 1,711 पद खाली, प्रक्रिया पूरी करने में 9 साल लगे और सिर्फ 39 लोग योग्य पाए गए. अंग्रेज़ी में असिस्टेंट प्रोफेसर की परीक्षा: 513 पद, 151 चयनित, और उनमें से सौ से ज्यादा हरियाणा के बाहर के थे. सिंह ने कहा, “हरियाणा पब्लिक सर्विस कमीशन के चेयरमैन रिकॉर्ड पर कहते हैं कि उम्मीदवार इसलिए फेल हुए क्योंकि राज्य के विश्वविद्यालयों का शैक्षणिक स्तर गिर रहा है.”
उनकी आवाज़ में एक शांत गुस्सा होता है—ऐसे व्यक्ति का जिसने प्रशासनिक जिम्मेदारी संभाली है और अंदर से जानता है कि नौकरशाही की लापरवाही कैसी दिखती है.
“आप 12 साल से सत्ता में हैं. आपने आरएसएस से जुड़े लोगों को कुलपति बनाया. अगर गिरावट हुई है तो जिम्मेदार आप हैं, लेकिन आप छात्रों को दोष दे रहे हैं.”
बेरोजगारी संकट का दूसरा चेहरा, जो उन्हें सबसे ज्यादा परेशान करता है, वह है जिसे वह “डंकी ट्रेल” कहते हैं.
हरियाणा के युवा 40 से 50 लाख रुपये देकर ट्रैवल एजेंटों के जरिए अवैध रास्तों से दूसरे देशों में काम की तलाश में जा रहे हैं, “मुझे सैकड़ों ऐसे गांव मिले जहां युवा ही नहीं मिले, क्योंकि वे सब विदेश चले गए हैं.”
उन्होंने कहा कि नई बात इसकी भौगोलिक पहुंच है, “अब राज्य के अंदरूनी इलाकों में भी, जहां विदेश जाना कभी विकल्प नहीं था, लोग बाहर जा रहे हैं. पंजाब सीमा के इलाकों में हमेशा से पलायन होता था. अब यह हर जगह हो रहा है.”
क्या बदला, क्या नहीं
भाजपा सरकार की शासन से जुड़ी विफलताओं को बृजेंद्र सिंह एक खास क्रम में गिनाते हैं. सबसे पहले सड़कें—क्योंकि वे सबसे जल्दी दिखाई देती हैं. “करीब दस दिन पहले हम लाडवा में थे, जो मुख्यमंत्री का अपना विधानसभा क्षेत्र है. छह दिन बाद हम गुल्हा चीका में थे. दोनों जगह लगभग एक जैसी स्थिति थी. वहां लगभग सड़कें ही नहीं थीं.”
उन्होंने यह बात हल्के अंदाज़ में कही, जैसे कंधे उचकाकर कह रहे हों, “जैसे ही आप एक्सप्रेसवे और बड़े हाईवे से उतरते हैं, आपको समझ में आ जाता है कि वह विकास कैसा दिखता है.”
बृजेंद्र सिंह ने कहा, “यहीं मैं बीजेपी सरकार के इस दावे से पूरी तरह सहमत हूं कि पार्टी क्षेत्रों या विधानसभा क्षेत्रों के आधार पर भेदभाव नहीं करती. हरियाणा एक, हरियाणवी एक, जैसा वे कहते हैं. अगर राज्य के दूसरे हिस्सों की सड़कें खराब हैं, तो मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी के अपने क्षेत्र लाडवा की सड़कें भी खराब हैं. कोई भेदभाव नहीं.” उन्होंने आगे कहा, और अगली बात पर जाने से पहले वाक्य को थोड़ी देर के लिए वहीं रहने दिया.
इसके बाद कानून-व्यवस्था.
खासकर कुरुक्षेत्र जिले में वसूली और अपराध बढ़ने की बात. यहां नए उद्योग आए हैं, पैसा आया है और उसके साथ अपराधी भी, “कुरुक्षेत्र हरियाणा का बहुत शांत जिला था, लेकिन पिछले एक साल में वहां सबसे ज्यादा हिंसक घटनाएं हुई हैं—वसूली, फिरौती.”
फिर कृषि क्षेत्र.
हिसार, रेवाड़ी और कई दूसरे जिलों में किसान प्रदर्शन कर रहे हैं—कुछ डेढ़ साल से, लेकिन “सरकार उन्हें बुलाने तक की चिंता नहीं कर रही, यहां तक कि उनके अपने विधायक भी नहीं.”
सिंह कहते हैं कि 2024 के चुनाव से पहले ज़मीन पर हालात ऐसे ही दिख रहे थे, और अब भी ज्यादा बदलाव नहीं हुआ है.
बार में: ब्रेख्त, और बात आखिर कहां जाकर रुकती है
जिला अदालत में बृजेंद्र सिंह को कैथल बार एसोसिएशन को संबोधित करना था. बार के प्रतिनिधि रणवीर प्रशार ने सत्र की शुरुआत करते हुए कहा कि वे सभी पार्टियों के नेताओं को बुलाते हैं, लेकिन ऐसी बैठकों में राजनीति नहीं करते.
सिंह ने यह सुना और फिर शुरुआत की Bertolt Brecht से जर्मन नाटककार, कवि और मार्क्सवादी विचारक, जिनकी 1956 में मौत हो गई थी और जिनके शब्द 2026 में हरियाणा की सड़कों पर भी लोगों को प्रभावित करते दिख रहे हैं.
उन्होंने “राजनीतिक रूप से अनपढ़ व्यक्ति” वाली कविता पढ़ी—उस आदमी के बारे में जो कुछ नहीं सुनता, कुछ नहीं देखता, राजनीतिक जीवन में हिस्सा नहीं लेता और यह नहीं जानता कि आटा, दवा और किराए की कीमतें भी राजनीतिक फैसलों पर निर्भर करती हैं.
और ब्रेख्त की उस चेतावनी के बारे में भी, कि ऐसी अनजानियत क्या पैदा करती है—एक छोड़ा हुआ बच्चा, एक लुटेरा और सबसे बुरा, एक भ्रष्ट राजनेता.

सिंह ने वकीलों से कहा, “राजनीति जीवन में हर जगह है. इससे बचा नहीं जा सकता.”
हरियाणा से बात आगे बढ़ते-बढ़ते राष्ट्रीय और फिर अंतरराष्ट्रीय मुद्दों तक पहुंच गई—भारत की विदेश नीति, मध्य पूर्व का युद्ध, एपस्टीन फाइल्स, और अमेरिका के साथ भारत के व्यापारिक संबंध.
उन्होंने अंत में अमेरिका के ट्रेजरी सेक्रेटरी द्वारा एक दिन पहले किया गया एक पोस्ट पढ़ा, जिसमें भारत को 30 दिनों तक रूसी तेल खरीदने की अनुमति देने की बात कही गई थी.
उन्होंने कहा, “अब हम यहां तक पहुंच गए हैं.” और बैठ गए.
फिर सड़क पर
कैथल के इस हिस्से में सिंह के साथ चल रहे लोगों की भी अपनी राय है.
पलवल से महिला कांग्रेस की जिला अध्यक्ष सविता चौधरी कहती हैं कि राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा ने पूरे देश में लोगों को उत्साहित किया था और सद्भाव यात्रा हरियाणा में वही काम कर रही है. इससे लोगों को लग रहा है कि कांग्रेस अभी भी मौजूद है, अभी भी चल रही है.
उचाना की लाजवंती ढिल्लों, जहां बृजेंद्र सिंह सिर्फ 32 वोटों से हार गए थे, कहती हैं कि यह यात्रा पूरे राज्य में एक मजबूत संदेश दे रही है—सद्भाव का और कांग्रेस की निरंतरता का.
कैथल के बालू गांव के ओम प्रकाश, जो सत्तर साल के हैं और किसी राजनीतिक पार्टी से खास जुड़ाव नहीं रखते, उन्होंने इस यात्रा को बहुत सरल शब्दों में समझाया.
उन्होंने कहा, “बृजेंद्र सिंह का एक ही संदेश है—लोग जहां चाहें वहां वोट दें, लेकिन जो लोग भाईचारा तोड़ रहे हैं, उन्हें अपने ऊपर हावी न होने दें.”
संदीप लोट, जिन्होंने 2024 का लोकसभा चुनाव इनेलो के टिकट पर सिरसा से लड़ा था और विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस में शामिल हो गए थे, कहते हैं: “जब पूरे राज्य में विधायक और सांसद इस यात्रा की बात कर रहे हैं, तो यह अपने आप में बड़ी सफलता है.”
हिसार की शकुंतला ने कहा कि वह शुक्रवार को पहली बार इस यात्रा के साथ चलीं. उनके पति 5 अक्टूबर से ही यात्रा के साथ चल रहे हैं. छोटू राम चौक और हनुमान वाटिका के बीच सड़क पर चलते हुए बृजेंद्र सिंह ने विरासत के सवाल पर एक खुली बात भी कही.
वह ऐसे व्यक्ति के परपोते हैं जिनकी तस्वीर भगत सिंह के साथ सिंघु और टीकरी बॉर्डर पर लगी थी, जहां 2020-2021 में किसान एक साल से ज्यादा समय तक धरने पर बैठे थे क्योंकि दोनों ही किसी राजनीतिक पार्टी से नहीं जुड़े थे.
उन्होंने कहा, “हर व्यक्ति की अपनी पहचान और अपनी सोच होती है. आप अपने समय की उपज होते हैं. आप अलग तरह से सोचते हैं और अलग तरह से काम करते हैं, लेकिन जहां तक किसान समुदाय की बात है, ऐसा लगता है कि सर छोटू राम के 90 साल बाद भी—हरित क्रांति के बाद भी, प्रगति और समृद्धि के बाद भी समस्याएं अभी भी मौजूद हैं.”
वह थोड़ी देर रुके. “समाधान वही है जो सर छोटू राम ने 90 साल पहले सुझाया था, या अब उससे कहीं ज्यादा कुछ करने की जरूरत है—यह देखना होगा.”
अब भी 33 विधानसभा क्षेत्र बाकी हैं.
और दाढ़ी अभी भी बढ़ रही है.
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