भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के नेता और कार्यकर्ता शायद निराश होकर हाथ मल रहे होंगे. यह एक खोया हुआ मौका है. सोचिए अगर कांग्रेस या कोई दूसरी विपक्षी पार्टी स्कूलों और कॉलेजों में राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम के संशोधित आधिकारिक संस्करण को गाने का विरोध करते हुए बयान जारी करती. सोचिए उस पार्टी के विधायक कहते कि वे ईसाई हैं और इसलिए ‘मातृभूमि’ को हिंदू देवियों—दुर्गा, सरस्वती और लक्ष्मी के रूप में दिखाने को स्वीकार नहीं करेंगे.
और यह भी सोचिए कि जब दीक्षांत समारोह में वंदे मातरम बजाया जा रहा हो तो छात्र अपनी कुर्सियों से उठने से इनकार कर दें.
ये कल्पना या काल्पनिक हालात नहीं हैं. यह सब पिछले हफ्ते नागालैंड में हुआ. बीजेपी नेता के लिए बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित राष्ट्रीय गीत के ऐसे ‘अपमान’ को सहना बहुत मुश्किल होता है—वह भी पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से कुछ हफ्ते पहले. किसी और स्थिति में बीजेपी नेता उस राज्य की सत्तारूढ़ पार्टी को राष्ट्रविरोधी, अर्बन नक्सल और ‘मुस्लिम लीग’ तक कह देते और यहां तक कि सरकार को बर्खास्त करने की मांग भी करते, लेकिन इस मामले में बीजेपी नेताओं ने चुप रहना ही बेहतर समझा और दूसरी तरफ देखने का फैसला किया.
ऐसा इसलिए है क्योंकि नागालैंड में कांग्रेस नहीं बल्कि नेशनल डेमोक्रेटिक अलायंस (एनडीए) की सरकार है. नागालैंड के उपमुख्यमंत्री वाई पैटन बीजेपी से हैं. वंदे मातरम गाने का विरोध करते हुए बयान जारी करने वाली सत्तारूढ़ पार्टी नागा पीपुल्स फ्रंट (एनपीएफ) है, जो बीजेपी की सहयोगी पार्टी है और जो विधायक राज्य विधानसभा के अंदर और बाहर राष्ट्रीय गीत के खिलाफ बोले, वे भी एनपीएफ से ही हैं.
केंद्र की सत्तारूढ़ पार्टी को नागालैंड में वंदे मातरम पर वहां के विचारों पर चुप रहना पड़ता है, अगर वह उस राज्य में सत्ता में बने रहना चाहती है जहां 2028 की शुरुआत में चुनाव होने हैं. पिछले साल अक्टूबर में सत्तारूढ़ नेशनल डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव पार्टी (एनडीपीपी) का एनपीएफ में विलय हो गया था. यह उस समय हुआ जब मेघालय, मणिपुर और नागालैंड में पांच में से चार लोकसभा सीटों पर बीजेपी और उसके सहयोगियों को हार का सामना करना पड़ा था.
कांग्रेस ने आउटर मणिपुर सीट एनपीएफ से छीन ली और नागालैंड की एकमात्र लोकसभा सीट भी 20 साल बाद एनडीपीपी से जीत ली. इस नतीजे को मणिपुर में हुए जातीय संघर्ष के संदर्भ में भी देखा गया, जहां ईसाई कुकी समुदाय सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ था. असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने उन नतीजों के लिए “एक खास धर्म” के लोगों को जिम्मेदार ठहराया था.
एनडीपीपी-एनपीएफ का विलय इस रूप में भी देखा जा रहा है कि क्षेत्रीय पार्टियां खुद को तैयार रखना चाहती हैं, अगर अगले चुनाव से पहले उन्हें बीजेपी से अलग होना पड़े. इसलिए बीजेपी नागालैंड में अपने सहयोगियों के वंदे मातरम वाले मुद्दे पर नाराज़ करने से बचेगी.
2013 में 60 सदस्यीय नागालैंड विधानसभा में एक सीट से लेकर उसके बाद के दो विधानसभा चुनावों में 12-12 सीटें जीतने तक, बीजेपी ने नागालैंड में लंबा सफर तय किया है. इस राज्य में ईसाई आबादी करीब 88 प्रतिशत है. ऐसे राज्य में जहां चुनावों में पैसा और राजनीतिक संरक्षण बड़े प्रभाव वाले कारक होते हैं, बीजेपी को अभी भी टिके रहने के लिए सहयोगी पार्टियों की ज़रूरत है. पश्चिम बंगाल के चुनाव में वंदे मातरम उसका नारा होगा, लेकिन नागालैंड में नहीं.
बीजेपी के विरोधाभास
यह बीजेपी की राजनीति में दिखने वाले कई विरोधाभासों में से बस एक नया उदाहरण है. पार्टी पूर्वोत्तर और केरल में ईसाई मतदाताओं को लुभाने की कोशिश करती है, लेकिन जब ईसाइयों पर धर्म परिवर्तन कराने के आरोप में हमला किया जाता है, तो वह अक्सर दूसरी तरफ देखती है.
दिल्ली में यह मछली बेचने वालों को धमका सकती है और बिहार में धार्मिक और शैक्षणिक संस्थानों के पास मांस और मछली की बिक्री पर रोक लगा सकती है, यह कहते हुए कि इससे “हिंसक प्रवृत्तियों” को बढ़ावा मिलता है, लेकिन कोलकाता में पार्टी कहती है कि बंगाल में मछली और मांस दोनों मिलते रहेंगे.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी “सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास” की बात बार-बार कर सकते हैं, लेकिन अपने मंत्रिमंडल में एक भी मुसलमान को शामिल नहीं करते. वह ‘रेवड़ी’ संस्कृति को देश के लिए खतरनाक बता सकते हैं, लेकिन अपनी ही पार्टी को वही चीज़ें बांटने की अनुमति दे सकते हैं.
वह परिवार के नियंत्रण वाली पार्टियों को भारतीय लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा बता सकते हैं, लेकिन एनडीए में उन्हीं पार्टियों को अपने साथ भी रख सकते हैं.
रविवार को बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बेटे निशांत ने जनता दल (यूनाइटेड) जॉइन कर लिया. कहा जा रहा है कि यह उस उत्तराधिकार योजना का हिस्सा है, जिसे बीजेपी ने तैयार करने में बड़ी भूमिका निभाई है, बदले में नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री पद बीजेपी को सौंपने की बात कही जा रही है.
महाराष्ट्र में, उपमुख्यमंत्री अजीत पवार की मौत के बाद उनकी पत्नी सुनेत्रा ने सरकार में उनकी जगह ली और नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी की अध्यक्ष भी बन गईं. उनके बेटे पार्थ अब राज्यसभा में जाने की तैयारी में हैं.
अब एनडीए की कुछ और परिवार आधारित पार्टियों को देखिए—चिराग पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी, जयंत चौधरी की राष्ट्रीय लोक दल, अनुप्रिया पटेल की अपना दल, एचडी देवेगौड़ा की जनता दल (सेक्युलर), चंद्रबाबू नायडू की तेलुगु देशम पार्टी, जीतन राम मांझी की हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (वे केंद्र में मंत्री हैं और उनके बेटे बिहार में मंत्री हैं), उपेंद्र कुशवाहा की राष्ट्रीय लोक मोर्चा (उनकी पत्नी विधायक हैं और बेटा बिहार में मंत्री है) और कॉनराड संगमा की नेशनल पीपुल्स पार्टी. यह सूची और भी लंबी है.
बीजेपी के विरोधाभासों की बात करते हुए कॉनराड संगमा का उदाहरण भी देखा जा सकता है. 2023 के विधानसभा चुनाव से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने मेघालय की संगमा सरकार को देश की सबसे भ्रष्ट सरकार बताया था. यह तब कहा गया जब उस सरकार में बीजेपी का भी एक मंत्री था, जब तक कि एनपीपी और बीजेपी ने अलग-अलग चुनाव लड़ने का फैसला नहीं किया. चुनाव खत्म होने के बाद बीजेपी फिर से संगमा सरकार में शामिल हो गई और अब फिर से उसमें उसका एक मंत्री है.
गृह मंत्रालय के आदेश को हथियार बनाना
सच्चाई यह है कि बीजेपी पहले भी इन विरोधाभासों को काफी अच्छे तरीके से संभालती रही है. पिछले तीन लोकसभा चुनावों और कई विधानसभा चुनावों में उसकी जीत इसका सबूत है.
शायद इसकी वजह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की करिश्माई अपील है और यह भी कि बीजेपी बार-बार मुद्दों की दिशा बदलने में सफल रहती है और अपने राजनीतिक विरोधियों को हांफता हुआ छोड़ देती है.
राजनीतिक रूप से वंदे मातरम पर पार्टी का रुख एक बड़ा विरोधाभास है. एक ऐसी पार्टी जो गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर और सुभाष चंद्र बोस का सम्मान करने की बात करती है, वह राष्ट्रीय गीत के उस छोटे किए गए संस्करण की निंदा कैसे कर सकती है जिसे बंगाल के इन दो बड़े प्रतीकों ने मंजूरी दी थी? और जो पार्टी 2047 तक विकसित भारत की बात करती है, वह सिर्फ एक चुनाव के लिए ऐसा काम कैसे कर सकती है जो लंबे समय में देश के लिए बहुत खतरनाक हो सकता है?
केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय के वंदे मातरम से जुड़े आदेश को ध्यान से पढ़िए. मैं सिर्फ एक उदाहरण देता हूं. “सभी स्कूलों में दिन का काम राष्ट्रीय गीत के सामूहिक गायन से शुरू हो सकता है” और इसमें यह भी जोड़ा गया है कि स्कूल प्रशासन अपने कार्यक्रमों में इसे लोकप्रिय बनाने के लिए पर्याप्त व्यवस्था करें. नागालैंड में दीक्षांत समारोह के दौरान जब वंदे मातरम गाया गया, तो छात्र बैठे रहे और सत्तारूढ़ पार्टी ने सार्वजनिक रूप से इसका विरोध किया. वे ऐसा इसलिए कर सके क्योंकि नागालैंड में बीजेपी को उनकी ज़रूरत है, लेकिन बीजेपी और प्रशासन की प्रतिक्रिया कहीं और ऐसी नहीं भी हो सकती—मान लीजिए अगर किसी आधिकारिक कार्यक्रम में ईसाई या मुस्लिम सरकारी कर्मचारी खड़े होकर इसे नहीं गाते, या बिहार, उत्तर प्रदेश या महाराष्ट्र में स्कूलों और कॉलेजों में ईसाई और मुस्लिम छात्र वही करते हैं जो नागालैंड में छात्रों ने किया.
अगर किसी राज्य या जिले का प्रशासन गृह मंत्रालय के इस आदेश को राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल करने का फैसला करता है, तो सांप्रदायिक तनाव रोज की बात बन सकता है. फिर “विकसित भारत 2047” का नारा और सपना दोनों खत्म हो जाएंगे. यही बड़ा संदेश है जो बीजेपी और केंद्र की एनडीए सरकार को पिछले हफ्ते नागालैंड में हुई घटना से लेना चाहिए.
वैसे, बीजेपी के कितने सांसद और विधायक राष्ट्रीय गीत के संशोधित आधिकारिक संस्करण को पूरा सुना सकते हैं? चलिए इंतज़ार करते हैं उस समारोह का, जब प्रधानमंत्री मोदी और गृह मंत्री शाह दूसरे मंत्रियों के साथ इसे पूरा गाकर सुनाएंगे.
अलग से: 2015 में नई दिल्ली में हुए एक काफी चर्चित समारोह में भारत सरकार ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मौजूदगी में नेशनलिस्ट सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नागालिम (इसाक-मुइवा) के साथ एक फ्रेमवर्क एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर किए थे. 11 साल बाद भी वह फ्रेम अभी खाली है क्योंकि अंतिम समझौता अब तक नहीं हो पाया है. इस बीच उस समझौते पर हस्ताक्षर करने वाले नागा शांति वार्ता के मध्यस्थ आरएन रवि अब पश्चिम बंगाल के राज्यपाल बन चुके हैं. चुनी हुई सरकार के साथ शांति बनाना—इस मामले में, उनकी खासियत नहीं मानी जाती, जैसा कि चेन्नई राजभवन में उनके रिकॉर्ड से पता चलता है. उन्हें बंगाल क्यों लाया गया है, जहां बीजेपी को उम्मीद है कि कुछ महीनों में वह सरकार बना लेगी, यह अभी भी एक बड़ा सवाल है.
डीके सिंह दिप्रिंट के पॉलिटिकल एडिटर हैं. उनका एक्स हैंडल @dksingh73 है. व्यक्त किए गए विचार निजी हैं.
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