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Tuesday, 10 March, 2026
होममत-विमतUSA भारत की तरक्की को रोकने की कोशिश करेगा. नई दिल्ली को रिश्तों में अपनी मासूमियत पीछे छोड़नी होगी

USA भारत की तरक्की को रोकने की कोशिश करेगा. नई दिल्ली को रिश्तों में अपनी मासूमियत पीछे छोड़नी होगी

भारत ने खामोशी से यह कबूल लिया है कि अमेरिका कुछ मामलों में उसका मददगार है, तो कुछ दूसरे मामलों में एक अड़ंगा भी. भारत के उत्कर्ष की रफ्तार को धीमा करने में चीन और अमेरिका, दोनों का एक अबोला स्वार्थ है.

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अमेरिकी उप-विदेश मंत्री क्रिस्टोफर लैंडौ ने एक ऐसी टिप्पणी की है जिसे कई लोग भारत के साथ अपनी साझीदारी के बारे में अमेरिका के नजरिए का खास खुलासा करने वाली, मगर असंवेदनशील टिप्पणी कह सकते हैं.

5 मार्च को ‘रायसीना डायलॉग’ में दिए अपने बयान के शुरू में तो लैंडौ ने भारत की बड़ी तारीफ की कि वह इस सदी में कितनी ऊंचाई को छूने वाला है, कि भारत और अमेरिका की साझीदारी किस तरह दोनों के हित में है जिससे दोनों को ही लाभ होने वाला है. लेकिन इस सब पर उन्होंने यह कहकर पानी डाल दिया कि “लेकिन, भारत को समझ लेना चाहिए कि हम भारत के मामले में फिर से वैसी गलतियां नहीं करने वाले हैं जो हमने 20 साल पहले चीन के मामले में की थी और यह कहा था कि हम आपको इन सभी बाज़ारों का विकास करने देंगे, और इसके बाद हमने जाना कि आपलोग हमें कई व्यापारिक मामलों में पीछे छोड़ रहे हैं. हम इस बात की पूरी व्यवस्था करेंगे कि हम जो भी करेंगे वह हमारे लोगों के लिए उचित होगा. क्योंकि अंततः हमें अपने लोगों के प्रति जवाबदेह होना है, ठीक वैसे ही जैसे भारत की सरकार को अपनी जनता के प्रति जवाबदेह होना है.”

अब सवाल यह है कि लैंडौ के इस बयान का क्या आशय था कि “हम भारत के मामले में फिर से वैसी गलतियां नहीं करने वाले हैं जो हमने 20 साल पहले चीन के मामले में की थी और यह कहा था कि हम आपको इन सभी बाज़ारों का विकास करने देंगे, और इसके बाद हमने जाना कि आपलोग हमें कई व्यापारिक मामलों में पीछे छोड़ रहे हैं”.

क्या उनका आशय यह था कि अमेरिका भारत को ऊंचाई छूने में और कुछ मामलों में उससे होड़ लेने में मदद तो नहीं ही करेगा बल्कि जहां भी संभव होगा वहां उसे वैश्विक रूप से कमजोर करने की ही कोशिश करेगा?

इधर कुछ अरसे से भारत ने खामोशी से यह कबूल लिया है कि अमेरिका उसका मित्र-शत्रु है, यानी कुछ मामलों में उसका मददगार, तो कुछ दूसरे मामलों में एक अड़ंगा. बात जब भारत के उत्कर्ष की आती है तब उसके उभार की रफ्तार को धीमा करने में चीन और अमेरिका, दोनों का एक अबोला स्वार्थ है.

इतिहास पर नजर डालना बेहतर होगा. 1971 में हेनरी किसिंजर के चीन दौरे के बाद अमेरिका ने चीन को सोवियत संघ के मुक़ाबले खड़ा करने के लिए तैयार करने का फैसला किया. वहां कुछ अरसे बाद माओ का युग फीका पड़ गया तब चीन ने तंग श्याओ पिंग के नेतृत्व में अपने यहां सुधारों को लागू करने के लिए अपनी ओर अमेरिका के झुकाव का फायदा उठाया. चीन ने आंतरिक सुधार करके, खुद को सरकार आधारित मरणासन्न अर्थव्यवस्था से बाजार आधारित अर्थव्यवस्था में तब्दील किया. इसने कई पश्चिमी कंपनियों को अपना सप्लाई चेन चीन में स्थानांतरित करने, अपनी उत्पादन लागत कम करने की सुविधा उपलब्ध कराई, बेशक इससे चीन को वैश्विक प्रतिस्पर्द्धा में शामिल होने की ताकत भी मिली. उस दौर में, अमेरिका ने चुपके से चीन के साथ अनुकूल सौदा करके उसे विश्व व्यापार संगठन में दाखिल करवा दिया और उसे संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में ताइवान वाली दिलवा दी. चीन ने इस सबका फायदा उठाते हुए अपने यहां आंतरिक सुधारों को तेजी से लागू किया और हाल तक एशिया के शेर बने देशों के मुक़ाबले ज्यादा तेजी से आर्थिक वृद्धि की.

बेशक यह कहना सही होगा कि अमेरिका ने चीन के उत्कर्ष में परोक्ष सहायता की, लेकिन यह कहना भी उतना ही सही होगा कि अमेरिका ने दूसरे विश्वयुद्ध के बाद यूरोप के उत्कर्ष में; और दक्षिण कोरिया, होंगकोंग (चीन में इसकी वापसी से पहले), थाईलैंड, इंडोनेशिया, मलेशिया, सिंगापुर, ताइवान, फिलीपींस आदि-आदि के उत्कर्ष में भी मदद की. लेकिन अमेरिका ने यह सब सिर्फ अपनी उदारता के कारण नहीं किया. यह नीति उसके भू-राजनीतिक लक्ष्यों के लिए माकूल थी, और इसने अमेरिकी उपभोक्ताओं को सर्वश्रेष्ठ उत्पाद यथासंभव न्यूनतम कीमत में उपलब्ध कराए. इस नीति ने डॉलर को वैश्विक मानक मुद्रा बनाने के विशेषाधिकार भी अमेरिका को दिए जिसके बूते उसे अपनी आर्थिक वृद्धि के लिए निरंतर उधार लेने की सुविधा हासिल हो गई. यह तब भी जारी रहा जब अमेरिका ने रिचर्ड निक्सन के राज में डॉलर का रिश्ता सोने से तोड़ दिया. इसका सीधा-सा अर्थ यह है कि उसने वित्तीय नतीजों और मुद्रास्फीति की परवाह किए बिना डॉलर छापने का अधिकार हासिल कर लिया.

यही बात आप दुनिया को पछाड़ने वाली भारतीय सॉफ्टवेयर सेवाओं और दवा उद्योग के लिए अमेरिकी ‘समर्थन’ के बारे में भी कह सकते हैं. इससे भारत को जबकि उच्च स्तरीय नौकरियों के रूप में भारी लाभ हुआ है, अमेरिकी कंपनियां अपनी तकनीकी क्षमताओं में सुधार करके ज्यादा प्रतिस्पर्द्धी बन पाई हैं. भारत में ग्लोबल कैपीबिलिटी सेंटरों की स्थापना ने भी अमेरिकी कंपनियों को न केवल अपनी तकनीकी ताकत बढ़ाने में मदद की है बल्कि अपनी आपसी प्रक्रियाओं से उभरे ज्ञान को कायम रखने में भी मदद की है. अमेरिका में स्वास्थ्य सेवा के ऊंचे बिल में भारतीय जेनरिक दवाओं के उपयोग से कमी आ रही है.

इसलिए, लैंडौ जब यह कहते हैं कि अमेरिका इन बाज़ारों के विकास में भारत की मदद नहीं करेगा ताकि वह उसे उसके ही खेल में मात न दे, तो वे वास्तव में बेतुकी बात कह रहे हैं. वास्तव में, इसका दूसरा पहलू भी है. भारत यह देख सकता है कि श्रम-मोलभाव आधारित सॉफ्टवेयर सेवाओं के निर्यात के मामले में अमेरिकी बाज़ारों पर अति निर्भरता के कारण हमने अपने प्रोडक्ट पर और प्लेटफॉर्म विकास की जरूरत पर ध्यान नहीं दिया. दरअसल, अमेरिका ने हमें टेक्नोलॉजी के मामले में आंशिक गुलाम जैसा बना दिया. लैंडौ के बयान का असली मतलब उनकी मंशा में निहित है. जब उन्होंने यह कहा कि भारत अमेरिका से वैसी मदद नहीं पाने वाला जैसी अमेरिका ने कथित तौर पर चीन को उसके उभार के लिए दी थी, तब उनका मतलब शायद यह था कि अमेरिका तो दरअसल हमारे उत्कर्ष को किसी तरह भंग करने की ही कोशिश करेगा. हमारे पड़ोस में जिस तरह अस्थिरता पैदा हो रही है, और ट्रंप सरकार कथित तौर पर रूस से तेल खरीदने के लिए भारत पर जो टैरिफ थोप रहा है, वह सब इसी तरह की कोशिशों में शामिल मानी जा सकती है.

भारत को इस बात की चिंता होनी चाहिए कि अमेरिका हमारे उत्कर्ष में यथासंभव कई तरह के अड़ंगे लगा सकता है, जिनमें आंतरिक असंतोष और ध्रुवीकरण को बढ़ावा देना शामिल हो सकता है जबकि वह हमारी मदद का दिखावा करने के लिए ऐसे क्षेत्रों को चुन सकता है जिनमें हमारी मदद करने से उसे ही लाभ हो.

भारत के लिए चेतावनी: अमेरिकी मंशाओं की मासूमियत पर भरोसा करना भूल जाइए.

आर. जगन्नाथन, स्वराज्य मैगज़ीन के पूर्व संपादकीय निदेशक हैं. वह @TheJaggi हैंडल से ट्वीट करते हैं. व्यक्त विचार  निजी हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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