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Thursday, 5 March, 2026
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हरियाणा राज्यसभा उपचुनाव में नया मोड़: बीजेपी उपाध्यक्ष बतौर निर्दलीय मैदान में उतरे

बीजेपी को उम्मीद है कि वह सुभाष चंद्रा और कार्तिकेय शर्मा की तरह सफलता दोहरा पाएगी. चंद्रा 2016 में हरियाणा से बतौर निर्दलीय राज्यसभा के लिए चुने गए थे और शर्मा 2022 में.

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गुरुग्राम: हरियाणा में राज्यसभा उपचुनाव के आखिरी दिन एक नया मोड़ आया, जब भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के राज्य उपाध्यक्ष सतीश नंदल गुरुवार को रिटर्निंग ऑफिसर के दफ्तर पहुंचे और बतौर निर्दलीय उम्मीदवार अपना नामांकन दाखिल कर दिया. उनके साथ तीन निर्दलीय विधायक भी थे—सावित्री जिंदल, देवेंद्र कादयान और राजेश जून.

रोहतक के रहने वाले कारोबारी और पूर्व INLD नेता नंदल, जिन्होंने 2019 विधानसभा चुनाव से पहले बीजेपी जॉइन की थी, उस साल गढ़ी सांपला-किलोई सीट से पूर्व मुख्यमंत्री भूपिंदर सिंह हुड्डा के खिलाफ चुनाव लड़ने के लिए जाने जाते हैं. हालांकि, वे चुनाव हार गए थे, लेकिन उन्होंने जोरदार मुकाबला किया था.

रिटर्निंग ऑफिसर के दफ्तर के बाहर मीडिया से बात करते हुए नंदल ने कहा कि वह निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ रहे हैं और जीत के लिए बीजेपी, कांग्रेस और INLD के विधायकों से समर्थन मांगेंगे.

बीजेपी के सूत्रों ने दिप्रिंट को बताया कि पार्टी ने नंदल को गुरुवार सुबह चंडीगढ़ बुलाया था और उनसे तुरंत पहुंचने को कहा था. नामांकन दाखिल करने से पहले उन्होंने मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी से उनके घर पर मुलाकात भी की. उस बैठक में क्या बात हुई, यह साफ नहीं है, लेकिन इतना ज़रूर साफ है कि उसके बाद नंदल ने निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में नामांकन दाखिल कर दिया.

हरियाणा सरकार में मीडिया कोऑर्डिनेटर अशोक छाबड़ा ने कहा कि हर व्यक्ति को निर्दलीय के रूप में चुनाव लड़ने का अधिकार है. “सिर्फ इसलिए कि नंदल बीजेपी के राज्य उपाध्यक्ष हैं, इसका मतलब यह नहीं है कि पार्टी ने उन्हें उम्मीदवार बनाया है. जब वह समर्थन मांगेंगे तब पार्टी फैसला करेगी. बीजेपी उन्हें कांग्रेस उम्मीदवार को हराने के लिए समर्थन भी दे सकती है.”

अब मैदान में तीन उम्मीदवार हैं—बीजेपी के संजय भाटिया, कांग्रेस के करमवीर बौद्ध और अब सतीश नंदल. ऐसे में 16 मार्च को होने वाला हरियाणा राज्यसभा चुनाव मुकाबले की ओर बढ़ गया है.

ताकत संख्या में

90-सदस्यों वाली हरियाणा विधानसभा में इस समय बीजेपी के 48 विधायक हैं, कांग्रेस के 37, INLD के 2 और तीन निर्दलीय विधायक हैं.

अपने आधिकारिक उम्मीदवार संजय भाटिया की जीत के लिए बीजेपी को 31 वोट चाहिए. 48 विधायकों के साथ सत्तारूढ़ पार्टी के पास 17 वोट अतिरिक्त हैं. अगर ये 17 वोट, तीन निर्दलीय और दो INLD विधायकों के वोट के साथ नंदल को मिलते हैं, तो उनके पास 22 वोट हो जाएंगे. उन्हें राज्यसभा पहुंचने के लिए कांग्रेस के 37 विधायकों में से अभी भी 8 और वोट चाहिए होंगे.

ऐसी स्थिति में कांग्रेस के पास 29 वोट बचेंगे, जो निर्दलीय उम्मीदवार से कम होंगे. इससे सीट नंदल को मिल जाएगी. यह गणित बहुत कड़ा है, लेकिन असंभव नहीं है. यही बात कांग्रेस के नेताओं को परेशान कर रही है.

हालांकि, वरिष्ठ कांग्रेस विधायक भारत भूषण बत्रा ने दिप्रिंट से कहा कि पार्टी का एक भी विधायक आधिकारिक उम्मीदवार के खिलाफ वोट नहीं देगा.

2016 और 2022 की गूंज

हरियाणा में राज्यसभा चुनावों का एक लंबा इतिहास रहा है, जहां घोटाले, क्रॉस-वोटिंग और अचानक हुए उलटफेर देखने को मिले हैं. बीजेपी इसे अक्सर “खेला” कहती है—ऐसा खेल जिससे वह विपक्ष की सीट पर अपने उम्मीदवार को जिता सके.

जून 2016 में बीजेपी समर्थित निर्दलीय और मीडिया कारोबारी सुभाष चंद्रा ने हरियाणा से दूसरी राज्यसभा सीट जीत ली थी. यह तब हुआ जब कांग्रेस और INLD ने सुप्रीम कोर्ट के वकील आर.के. आनंद का समर्थन किया था. दोनों पार्टियों के पास मिलकर 34 विधायक थे, कांग्रेस के 15 और INLD के 19.

लेकिन 12 कांग्रेस विधायकों के वोट अमान्य घोषित कर दिए गए क्योंकि उन्होंने बैलेट पर निशान लगाने के लिए रिटर्निंग ऑफिसर द्वारा दिए गए बैंगनी (वायलेट) पेन की जगह दूसरे पेन का इस्तेमाल किया था.

इस घटना को बाद में ‘इंकगेट’ घोटाला कहा गया. इस मामले में विधानसभा के तत्कालीन सचिव आर.के. नंदल के खिलाफ एफआईआर भी दर्ज हुई थी, जो उस समय रिटर्निंग ऑफिसर थे. उन पर जानबूझकर गड़बड़ी करने के आरोप लगे थे.

आखिर में चंद्रा को 29 वोट मिले और आनंद को 21 वोट. 12 वोट अमान्य घोषित कर दिए गए थे.

छह साल बाद, जून 2022 में इतिहास फिर दोहराया गया. कांग्रेस उम्मीदवार अजय माकन बीजेपी समर्थित निर्दलीय कार्तिकेय शर्मा से हार गए. कार्तिकेय शर्मा पूर्व कांग्रेस नेता विनोद शर्मा के बेटे हैं. यह हरियाणा के सबसे करीबी और विवादित राज्यसभा चुनावों में से एक था.

शर्मा को 29.6 वोट मिले, जबकि माकन को 29 वोट मिले. ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि कांग्रेस विधायक कुलदीप बिश्नोई का वोट खारिज कर दिया गया और एक अन्य विधायक ने वोट नहीं डाला.

बिश्नोई ने पार्टी लाइन के खिलाफ खुलकर वोट किया था और बाद में बीजेपी में शामिल हो गए.

राज्यसभा चुनाव में हर विधायक के वोट की कीमत 1 नहीं बल्कि 100 अंक होती है. इससे यह व्यवस्था बनती है कि जीतने वाले उम्मीदवार के बचे हुए वोट बैलेट पर अगली पसंद वाले उम्मीदवार को ट्रांसफर किए जा सकें, बिना गणितीय गड़बड़ी के.

2022 में 88 वैध वोट थे. जीतने के लिए 2,934 अंक चाहिए थे—यानी लगभग 29.34 वोट.

बीजेपी के कृष्ण लाल पंवार ने पहली पसंद के वोटों से ही यह आंकड़ा आसानी से पार कर लिया. इसके बाद उनके बचे हुए अंक अपने आप उन बैलेट पर दूसरे पसंद के उम्मीदवार, कार्तिकेय शर्मा को ट्रांसफर हो गए.

इस ट्रांसफर के बाद शर्मा के कुल अंक 2,960 हो गए, यानी 29.6 वोट.

माकन 2,900 अंक पर ही रह गए. कांग्रेस का जो एक वोट खारिज हुआ था, उसकी कीमत 100 अंक थी. यही अंतर बना. अगर वह वोट गिना जाता, तो माकन के 3,000 अंक हो जाते और वह जीत जाते, लेकिन क्योंकि वह वोट नहीं गिना गया, इसलिए सिस्टम के हिसाब से वह 0.6 वोट से हार गए.

नंदल की एंट्री को इसी पृष्ठभूमि में समझना चाहिए.

नंदल साफ कर चुके हैं कि वह बीजेपी के खिलाफ नहीं, बल्कि उसकी अप्रत्यक्ष सहमति के साथ चुनाव लड़ रहे हैं. सत्तारूढ़ पार्टी के पास भाटिया की जीत सुनिश्चित करने के बाद 17 अतिरिक्त वोट हैं. वह इन अतिरिक्त वोटों को बिना सार्वजनिक समर्थन घोषित किए नंदल की ओर भेज सकती है.

अगर कांग्रेस के 8 विधायक क्रॉस-वोटिंग करते हैं या किसी तरह उनके वोट अमान्य हो जाते हैं, तो नंदल जीत जाएंगे और बौद्ध हार जाएंगे.

दोनों ही हालात में बीजेपी को फायदा है. अगर नंदल जीतते हैं, तो सत्तारूढ़ पार्टी बिना सीधे तौर पर ऐसा करते हुए कांग्रेस से सीट छीन लेगी और अगर यह रणनीति सफल नहीं होती और बौद्ध जीत जाते हैं, तो भी बीजेपी की छवि को नुकसान नहीं होगा.

जब हरियाणा कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता से पूछा गया कि क्या नंदल को बीजेपी का समर्थन उनके गणित को बिगाड़ सकता है, तो उन्होंने कहा कि पार्टी के विधायक हाईकमान के निर्देश का पालन करेंगे.

लेकिन 16 मार्च को जब विधायकों के हाथ में असली बैलेट पेपर होंगे, तब यह भरोसा कितना टिकेगा, यह अलग सवाल है.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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