बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का जाना काफी समय से तय माना जा रहा था. सवाल सिर्फ यह था कि कब होगा. इसलिए जब 75 साल के नेता ने गुरुवार को राज्यसभा चुनाव के लिए नामांकन पत्र दाखिल किया और लगभग साफ कर दिया कि बिहार में अब नेतृत्व बदलने वाला है, तो राजनीतिक हलकों में बहुत कम लोग हैरान हुए. हालांकि, जिस बात ने चौंकाया, वह था उनके जाने का वक्त—बतौर मुख्यमंत्री 10वीं बार शपथ लेने के सिर्फ ढाई महीने बाद ही यह फैसला हो गया.
उनके लिए यह श्रेय की बात है कि जनता दल (यूनाइटेड) और भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के नेता आखिरी समय तक इंतज़ार करते रहे, जब तक कि उन्होंने खुद गुरुवार सुबह यह फैसला घोषित नहीं कर दिया. आखिर, पहले भी कितनी बार उन्होंने मुख्यमंत्री की कुर्सी बचाने के लिए अपने सहयोगी बदले थे? 2020 के चुनाव के बाद 243 सदस्यीय बिहार विधानसभा में जेडी(यू) के पास सिर्फ 43 विधायक थे, फिर भी पांच साल के अंदर दो बार सहयोगी बदलकर वह मुख्यमंत्री बने रहे.
तो जब जेडी(यू) के पास 85 विधायक हैं और बीजेपी के पास 89, तो इस बार उन्हें पीछे हटने के लिए क्या मजबूर किया? सच्चाई यह है कि पहले की तरह इस बार उनकी पार्टी पूरी तरह उनके साथ खड़ी नहीं थी. हाल के समय में जेडी(यू) के कई बड़े नेता इस बात से आश्वस्त हो गए थे कि अब वह शासन चलाने में सक्षम नहीं रहे हैं. यह भी कोई राज नहीं है कि कई बार वह पार्टी और सरकार के अपने पुराने साथियों को भी पहचान नहीं पाते थे. सार्वजनिक कार्यक्रमों में उनकी गलतियां और असहज व्यवहार देखकर भी लोगों को लगने लगा था कि उम्र का असर उन पर तेज़ी से पड़ रहा है.
उनके करीबी सहयोगी लंबे समय से उनसे मिलने-जुलने को नियंत्रित कर रहे थे, मीडिया से उनकी बातचीत को सीमित कर रहे थे और सार्वजनिक बैठकों में उन्हें लिखे हुए भाषण पढ़ने के लिए कहते थे. पार्टी के करीबी नेता उन्हें पद छोड़ने और उनके बेटे निशांत की राजनीति में एंट्री के साथ उत्तराधिकार की योजना बनाने के लिए समझा रहे थे. हालांकि, यह योजना कैसे काम करेगी, यह अभी साफ नहीं है. नई सरकार और पार्टी में निशांत की भूमिका क्या होगी, इस पर अभी काम चल रहा है, जबकि बिहार में आने वाले दिनों में पहली बार बीजेपी का मुख्यमंत्री बनने की संभावना है.
ऑटो-पायलट पर चल रही सरकार
नीतीश कुमार का आखिरकार मुख्यमंत्री पद छोड़ना बिहार के लिए अच्छा है. 2005 से 2010 के बीच का उनका कार्यकाल अलग था, जब उन्होंने बिहार में बदलाव लाकर ‘विकास पुरुष’ की पहचान बनाई, लेकिन इसके बाद के उनके कार्यकाल ज्यादा यादगार नहीं रहे क्योंकि मुख्य ध्यान कुर्सी बचाने पर रहने लगा. पिछले कुछ वर्षों में स्थिति और खराब हो गई, जब बढ़ती उम्र का असर उनकी याददाश्त और सोचने-समझने की क्षमता पर दिखने लगा. वह मुख्यमंत्री की कुर्सी पर तो थे, लेकिन सरकार लगभग ऑटो-पायलट पर चल रही थी और ज्यादातर काम नौकरशाह संभाल रहे थे.
बिहार नीतीश कुमार का बहुत ऋणी है, लेकिन अब राज्य को एक नए मुख्यमंत्री की दरकार है—ऐसा नेता जिसके पास बिहार के लिए लंबी सोच और स्पष्ट योजना हो. जो व्यक्ति दो विधानसभा चुनाव हारने के बाद व्यापार करने का सोच रहा था और जिसने 1985 के चुनाव में पत्नी की बचत के 20,000 रुपये के सहारे आखिरी सफलता पाई, उनका राजनीतिक सफर सपनों के जैसा रहा. अब वह राज्यसभा में पहुंचकर धीरे-धीरे सक्रिय राजनीति से विदा ले रहे हैं.
तो अब बिहार की राजनीति में आगे क्या होगा? एक बात साफ है—2003 में बनी जेडी(यू) के अंत की शुरुआत हो चुकी है. नीतीश कुमार के बेटे निशांत को चाहे जो भी भूमिका मिले—उपमुख्यमंत्री या कुछ और उनके लिए अपने पिता की जगह लेना आसान नहीं होगा. जेडी(यू) के पास अभी भी लोकसभा में 12 और राज्य विधानसभा में 85 सदस्य हैं, लेकिन नीतीश कुमार के बिना पार्टी के सामने नेतृत्व की बड़ी कमी है.
जेडी(यू) में ऐसा कोई दूसरा नेता नहीं है जिसका प्रभाव अपनी सीट से बाहर तक हो. जब कोई ऐसा नेता नहीं होगा जो वोट दिला सके, तो आने वाले महीनों और वर्षों में पार्टी में टूट-फूट और दल बदल की संभावना बढ़ जाएगी. बीजेपी पहले से ही नीतीश कुमार के वोट बैंक पर नज़र लगाए हुए है, इसलिए उनके जाने से यह प्रक्रिया जल्द शुरू हो सकती है.
यह भी पढ़ें: प्रशांत को नीतीश की मानसिक हालत पर संदेह है, CM के बेटे के आने से बिहार की राजनीति में क्या मायने हैं
विपक्ष के लिए मौका?
दूसरी बात, बीजेपी का मुख्यमंत्री बनना पार्टी के लंबे समय से चले आ रहे सपने को पूरा करेगा. संभावना है कि पार्टी जल्द ही अपना विस्तार अभियान शुरू करे और सबसे पहले नीतीश कुमार के वोट बैंक पर नज़र डाले. बिहार की राजनीति में तीन बड़े ध्रुव रहे हैं—बीजेपी, जेडी(यू) और राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी). ऐसे में जब भी इनमें से कोई दो साथ आ जाते थे, तीसरे की हार लगभग तय हो जाती थी, लेकिन बीजेपी इस स्थिति को बदलने की कोशिश कर रही है.
पिछले साल विधानसभा चुनाव से पहले, जब बीजेपी के कुछ नेता पार्टी का घोषणापत्र तैयार करने को लेकर अमित शाह से मिले, तो केंद्रीय गृह मंत्री ने उनसे कहा कि अपने वादों में “महत्वाकांक्षी” बनें. बैठक में मौजूद एक नेता ने बाद में बताया कि शाह ने उनसे कहा था—“जो वादा करना है करो. बिहार का चेहरा बदलने के लिए केंद्र जो भी ज़रूरी होगा, देगा.” यह बिहार में बीजेपी की बड़ी योजना का शुरुआती संकेत था.
अब सबसे अहम सवाल यह है कि नीतीश कुमार के जाने का विपक्ष पर क्या असर पड़ेगा? सिद्धांत रूप में देखें तो इससे आरजेडी को फायदा होना चाहिए था. पार्टी उम्मीद कर सकती है कि वह अपने वोट बैंक को बढ़ा सके, जो अभी मुख्य रूप से मुसलमानों और यादवों तक सीमित माना जाता है. वह नीतीश कुमार के समर्थकों—महिलाओं, महादलितों, अत्यंत पिछड़े वर्गों और कुर्मी समुदाय में भी अपनी पकड़ बनाने की कोशिश कर सकती है.
लेकिन तेजस्वी यादव अब तक अपनी पार्टी का सामाजिक आधार बढ़ाने की क्षमता या मजबूत इच्छाशक्ति नहीं दिखा पाए हैं. इसके उलट अखिलेश यादव ने पिछले लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी के लिए कुछ हद तक यह काम किया था. ऐसी स्थिति में नए राजनीतिक खिलाड़ियों, जैसे प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी के लिए उम्मीदें ज़रूर बन सकती हैं, लेकिन फिलहाल यह संभावना बहुत कमज़ोर मानी जा रही है.
डीके सिंह दिप्रिंट के पॉलिटिकल एडिटर हैं. उनका एक्स हैंडल @dksingh73 है. व्यक्त किए गए विचार निजी हैं.
(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)
यह भी पढ़ें: ऑपरेशन सिंदूर से बना बिहार में माहौल — फिर भी दुश्मनों और मित्र-शत्रुओं के बीच नीतीश क्यों हैं परेशान
